Tuesday, October 31, 2006

मां को दिल की बात कैसे पता चली

कुछ दिन पहले मैंने छुटपुट चिट्टे पर 'मां को दिल की बात कैसे बतायें' चिट्ठी पोस्ट की। इस पर दो प्रतिक्रियायें आयीं। पहले में अतुल जी ने चिट्ठा चर्चा करते समय कहा,
'उन्मुक्त की रचना अछूते विषय पर उड़ती सी नजर डाल गयी दिखी। सच में, इससे ज्यादा की उम्मीद थी उन्मुक्त आपसे। वैसे आपने विषय बहुत हृदयस्पर्शी चुना है।'
मैंने भी 'आईने, आईने यह तो बता - दुनिया में सबसे सुन्दर कौन' चिट्ठी लिखते समय यह बात पूछी थी कि क्या इस बारे में विस्तार में पढ़ना पसन्द करेंगे। कुछ टिप्पणियां भी आयीं जिसमें पाठक गण ने इसे पढ़ने में रुचि जतायी। मेरे छुटपुट चिट्ठे पर सर्च कर सबसे ज्यादा लोग इसी चिट्ठी पर आते हैं पर यह विषय कुछ लम्बा , मुश्किल, एवं विवदास्पद है। कुछ आत्मविश्वास की भी कमी लगती है - लोग क्या सोचेंगे, क्या कहेंगे - फिर भी लिखने का प्रयत्न करूंगा।

दूसरी प्रतिक्रियाया क्षितिज जी की है। वे अपनी समस्या इस प्रकार से बता रहें हैं,
'आज सुबह उन्मुक्त की रचना मां को कैसे बतायें पढ़ी। हालांकि वे सिर्फ अन्य लोगों के विचार प्रस्तुत कर के चुप हो गए, मेरे लिए यह एक गंभीर समस्या है, और तब तक रहेगी जब तक मैं स्वयं अपनी मां (और पिता) को नहीं बता पा रहा।'
मुझे कुछ जिज्ञासा हुई कि विक्रम सेठ की मां, न्यायमूर्ति लीला सेठ, को यह बात कैसे पता चली।

न्यायमूर्ति लीला सेठ ने पटना में वकालत शुरु की। उसके बाद उन्होने वकालत दिल्ली में की और वहीं पर न्यायधीश बनी। वे हिमाचल प्रदेश की मुख्य न्यायधीश नियुक्त हुईं और वहीं से अवकाश ग्रहण किया। उन्होने अपनी जीवनी लिखी है इसका नाम है
'On Balance'। इसे Penguins India प्रकाशित किया है। इसमें इस बात का कुछ जिक्र है।

विक्रम सेठ ने कुछ समय चीन में बिताया। न्यायमूर्ति लीला सेठ और उनके पति चीन घूमने और उससे मिलने गये थे। वहां का वर्णन करते समय वे इस बात का आभास, इन शब्दों में देती हैं,
'The night before his thirtieth birthday, he [Vikram Seth] suddenly asked me where Gabrielle [Vikram's friend] would stay if she came to India. I [Justice Seth] said she would share a room with Aradhana [Vikram's sister]. He replied, ‘But she is my friend. Why shouldn’t she share the room with me? Before I could answer, he asked, ‘If I had a male friend visiting me, where would he stay? I replied, ‘He would share the room with you.’ ‘Vikram responded: ‘So you are driving me arms of men.’ I was a bit taken aback by his remark and the annoyed and sarcastic way in which he said it, but tried to remain calm and explained that in Indian society that was how things were done. I asked him what the staff would think if it were done any other way; even my colleagues, if they got to know, would be horrified. He declared aggressively, ‘You are more concerned with the opinion of others than the happiness of your children.’ I was upset by the remark, but told him, ‘When you come to our home, you must observe our rules, and when we stay in your house we will abide by yours.’ He retorted, ‘I thought that the house in Delhi was my house too.’ I found the situation was getting tense, and I didn’t want to get into a heated argument. I decided to go to bed quietly and ignore the subject for the rest of the trip.'
वे आगे कहती हैं कि,
'At the time I didn’t realise that Vikram was bisexual. This understanding came to me later and I found it hard to come to terms with his homosexuality. Premo [Vikram's father] found it even afraid that someone might try to exploit him because of it. It is only now that I realize that many creative persons share this propensity and that it gives them a special nurturing and emotional dimension.'

यह किताब कैसी है, इसमें क्या है - यह सब अगली बार।

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Sunday, October 29, 2006

गायब ... Don’t you have time to think?

रिचर्ड फिलिप्स फाइनमेन के बारे में पोस्ट यहां देखें
पहली पोस्ट: Don’t you have time to think?
दूसरी पोस्ट: पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा
यह पोस्ट: गायब

मैंने कुछ दिन पहले दो चिट्ठियां 'अदृश्य हो जाने का वरदान', और 'अदृश्य हो जाने का अभिशाप' शीर्षक से छुटपुट चिट्ठे पर लिखीं। इसमें यह बताया कि अदृश्य हो जाना अभिशाप है क्योंकि ऐसा व्यक्ति अन्धा हो जायेगा। इन चिट्ठियों में मैंने यह नहीं बताया था कि क्या कोई तरीका है जिससे अदृश्य हुआ जा सकता है कि नहीं। लोग, अन्धे हो जाने वाली बात न समझते हुऐ, अदृश्य हो जाने कि इच्छा रखते हैं और इसके लिये तरीका ढूढते रहते हैं। नेवा नामक व्यक्ति ने एक बार फाइनमेन से यह सवाल पूछा कि क्या कोई तरीका है जिसके द्वाारा अदृश्य हुआ जा सकता है। इसका उत्तर देते समय फाइनमेन अगस्त १९७५ लिखते हैं कि,
'I would suggest that the best way to get a good answer to your question is to ask a first-rate professional magician. I do not mean this answer to be facetious or humorous, I am serious. A magician is very good at his making things appear in an unusual way without violating any physical laws, by arranging matter in a suitable way. I know of no physical phenomenon such as X-rays, etc., which will create invisibility as you want, therefore, if it is possible at all it will be in accordance with familiar physical phenomenon. That is what a first-rate magician is good for, to create apparently impossible effect from “ordinary” causes.'
इसका अर्थ तो यह हुआ कि असंभ्व है।

यह पत्र आज भी उतना सही है जितना कि तब, जब यह लिखा गया।

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Saturday, October 28, 2006

हरिवंश राय बच्चन: इलाहाबाद

हरिवंश राय बच्चन
भाग-१: क्या भूलूं क्या याद करूं
पहली पोस्ट: विवाद
दूसरी पोस्ट: क्या भूलूं क्या याद करूं

भाग-२: नीड़ का निर्माण फिर
तीसरी पोस्ट: तेजी जी से मिलन
चौथी पोस्ट: इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय के अध्यापक
पांचवीं पोस्ट: आइरिस, और अंग्रेजी
छटी पोस्ट: इन्दिरा जी से मित्रता,
सातवीं पोस्ट: मांस, मदिरा से परहेज
आठवीं पोस्ट: पन्त जी और निराला जी
नवीं पोस्ट: नियम
भाग-३: बसेरे से दूर
यह पोस्ट: इलाहाबाद से दूर
अगली पोस्ट: भाग -४ दशद्वार से सोपान तक

बसेरे से दूर, बच्चन जी की आत्म कथा का तीसरा भाग है यह तब लिखी गयी जब वह इलाहाबाद से दूर चले गये। यह भाग के बारे में कुछ लोग विवाद करते हैं मेरे कई मित्र इलाहाबाद के पुराने बाशिन्दे रहे हैं। उनके पिताओं से कभी कभी मुलाकात होती है। एक बार जब मैंने इस भाग कि कुछ घटनाओं, खास कर तेजी जी के साथ घटित घटना, की बात की तो उनका कहना था कि यह सही तरह से वर्णित नहीं है और वास्तविकता कुछ और है। मैं नहीं जानता कि क्या सच है पर लगा कि इस बारे में कुछ विवाद अवश्य है।

इस भाग में बच्चन जी के इलाहाबाद से जुड़े खट्टे मीठे अनुभव हैं - ज्यादातर तो खट्टे ही हैं। यदि आप इलाहाबाद प्रेमी हैं, तो शायद यह भाग आपको न अच्छा लगे, पर एक जगह बच्चन जी इलाहाबाद के बारे में यह भी कहते हैं। ‘
इलाहाबाद भी क्या अजीबोगरीब शहर है । यह इसी शहर में सम्भव था कि एक तरु तो यहां ऐसी नई कविता लिखी जाय जिस पर योरोप और अमरीका को रश्क हो और दूसरी तरु यहां से एक ऐसी पत्रिका प्रकाशित हो जिसका आधुनिकता से कोई संबंध न हो - संपादकीय को छोडकर। पंडित श्रीनारायण चतुर्वेदी "सरस्वती" को द्विवेदी युग से भी पीछे ले जाकर जिलाए जा रहे थे, आश्चर्य इस पर था।‘
तो दूसरी जगह यह भी कहते हैं,
‘इलाहाबाद की मिटटी में एक खसूसियत है – बाहर से आकर उस पर जमने वालों के लिये वह बहुत अनुकूल पडती है । इलाहाबाद में जितने जाने-माने, नामी-गिरामी लोग हैं, उनमें से ९९% आपको ऐसे मिलेंगे जो बाहर से आकर इलाहाबाद में बस गए, खासकर उसकी सिविल लाइन में - स्यूडो इलाहाबादी । और हां, एक बात और गौर करने के काबिल है कि इलाहाबाद का पौधा तभी पलुहाता है, जब वह इलाहाबाद छोड दे ।‘

इसमें कुछ तो सच है। नेहरू, सप्रू, काटजू, बैनर्जी वगैरह तो इलाहाबाद में बाहर से आये और फूले फले। नेहरू की सन्तानें और आगे तब बढ़ी जब वे इलाहाबाद से बाहर गयीं। यह बात हरिवंश राय बच्चन के पुत्र अमिताभ बच्चन पर भी लागू होती है - वे तभी फूले फले जब पहुंचे बौलीवुड।

यहां पर गौर करने की बात है कि ‘नीड़ का निर्माण फिर’ में बच्चन जी इलाहाबाद का जिक्र करते हुये कहा था कि,
‘इलाहाबाद बड़े विचित्र ढंग से बसा है, या बसा था। मैं आज से तीस बरस पहले के इलाहाबाद की बात कर रहा हूँ जिसे मैंने अपने लड़कपन से जाना था। मुख्य भाग था उसका दक्षिणी भाग-मुहल्लों, गली, कूचों का। उत्तर का भाग कटरा कहलाता था-दक्षिण से बिलकुल कटा, या जुड़ा तो लम्बे कम्पनी बाग से। इलाहाबाद के प्राचीन, मूल बाशिंदे इन्हीं दो भागों में बसे थे। कम्पनी बाग के पश्छिम का भाग सिविल लाइंस कहलाता था, जिसमें प्राय: अंग्रेज, ऐंग्लो-इंडियनस पारसी और कश्मीरी रहते थे। पूर्व का भाग जार्ज टाउन, जिसमें प्राय: बाहर से आए सम्भ्रांत उत्तर भारतीय लोग थे। सिविल लाइंस और जार्ज टाउन दोनों में मकान बंगले-नुमा थे, तो जार्ज टाउन में सिविल लाइंस की बनिस्बत अंग्रेजी या योरोपीय वातावरण कम था। सिविल लाइंस का प्रतिनिधि आप सर तेज बहादुर सप्रू को कह सकते थे तो जार्ज टाउन का डॉ. गंगानाथ झा को। पंडित मदन मोहन मालवीय मुहल्लों, गली, कूचों वाले ठेठ इलाहाबाद के प्रतिनिधि माने जा सकते थे। इलाहाबाद वालों को अपने बाप-दादों की पुश्तैनी जमीन से बड़ा लगाव है। ऐसे परिवार उँगलियों पर गिने जा सकते हैं जो अपनी समृद्धि में अपने मुहल्लों की जमीन छोड़कर सिविल लाइंस या जार्ज टाउन में जा बसे हों।‘

मेरे इलाहाबादी मित्र कहते हैं कि
'इलाहाबाद शहर अपने मैं अनूठा है - न ही किसी शहर ने देश को इतने प्रधान मन्त्री दिये, न ही साहित्यकार, न ही इतने सरकारी अफसर, न ही इतने वैज्ञनिक, और न ही न्यायविद। इससे सम्बन्धित लोग दुनिया में फैले हैं।'
वे लोग यह भी कहते हैं कि,
'जहां तक साहित्यकारों की बात है जब तक वे इलाहाबाद में रहे सरस्वती उनके साथ रहीं, जब उन्होने इलाहाबाद छोड़ा लक्षमी तो मिली, पर सरस्वती ने साथ छोड़ दिया। उन्हें प्रसिद्धि उस काम के लिये मिली जो उन्होने इलाहाबाद में किया - चाहें वे हरिवंश राय बच्चन हों या धर्मवीर भारती। हरिवंश राय बच्चन माने या न माने उन्होने अपनी सबसे अच्छी कृति (मधुशाला) उनके इलाहाबाद रहने के दौरान लिखी गयी। उन्हें जो भी प्रसिद्धि मिली वह उन कृतियों के लिये मिली, जो उन्होने इलाहाबाद में लिखी। 'सुमित्रा नन्दन पन्त, या महादेवी वर्मा, या राम कुमार वर्मा इस लिये लिख पाये क्योंकि वे इलाहाबाद में ही रहे।'
मैं साहित्य का ज्ञाता नहीं हूं। मैं नहीं कह सकता कि यह सच है कि नहीं और न ही कुछ टिप्पणी करने का सार्मथ्य रखता हूं - फिर भी कुछ सवाल मन में उठते हैं,
  • क्या इलाहाबाद की मिट्टी कुछ अलग है?
  • क्या इलाहाबाद वासी अपने शहर के लिये एहसान फरामोश हैं?
  • क्या कुछ हादसों पर किसी शहर को आंकना ठीक है?
  • क्या आने वाले समय में इलाहाबद शहर गुमनामी में खो जायगा?
मालुम नहीं - इलाहाबाद वासी या उसके एहसान फरामोशी ही जाने।

इस भाग में भी मुझे वह बात (बच्चन-पन्त विवाद) की चर्चा नहीं मिली, जिसके लिये मैंने बच्चन जी की जीवनी पढ़ना शुरु किया - शायद चौथे और अन्तिम भाग में हो।

Thursday, October 26, 2006

पृथ्वी की गतियां: ... टोने टुटके

ज्योतिष, अंक विद्या, हस्तरेखा विद्या, और टोने-टुटके
पहली पोस्ट: भूमिका
दूसरी पोस्ट: तारे और ग्रह
तीसरी पोस्ट: प्राचीन भारत में खगोल शास्त्र
चौथी पोस्ट: यूरोप में खगोल शास्त्र
पांचवीं पोस्ट: Hair Musical हेर संगीत नाटक
यह पोस्ट: पृथ्वी की गतियां
अगली पोस्ट: राशियां Signs of Zodiac

हमारी पृथ्वी की बहुत सारी गतियां हैं:-
  1. पृथ्वी अपनी धुरी पर २४ घंटे में एक चक्कर लगा रही है। इसलिये दिन और रात होते हैं।
  2. पृथ्वी सूरज के चारों तरफ एक साल में एक चक्कर लगाती है। यदि हम उस तल (plane) की कल्पना करें जिसमें पृथ्वी और सूरज का केन्द्र, तथा उसकी परिक्रमा है तो पायेंगे कि पृथ्वी की धुरी, इस तल से लगभग साढ़े २३ डिग्री झुकी है पृथ्वी के धुरी झुके रहने के कारण अलग-अलग ऋतुयें आती हैं। हमारे देश में गर्मी के दिनों में सूरज उत्तरी गोलार्द्ध में रहता है और जाड़े में दक्षिणी गोलार्द्ध में चला जाता है। यानी कि साल के शुरू होने पर में सूरज दक्षिणी गोलार्द्ध में रहता है पर वहां से चलकर उत्तरी गोलार्द्ध और फिर वापस दक्षिणी गोलार्द्ध के उसी विन्दु पर पहुंच जाता है।
  3. पृथ्वी की धुरी भी घूम रही है और पृथ्वी की धुरी लगभग २५,७०० साल में एक बार घूमती है। इस समय हमारी धुरी सीधे ध्रुव तारे पर है इसलिये ध्रुवतारा हमको घूमता नहीं दिखाई पड़ता है और दूसरे तारे घूमते दिखाई देते हैं। हजारों साल पहले हमारी धुरी न तो ध्रुव तारा पर थी और न हजारों साल बाद यह ध्रुव तारा पर होगी। तब ध्रुवतारा भी रात में पूरब की तरफ से उदय होगा और पश्चिम में अस्त होता दिखायी देगा।
  4. हमारा सौरमंडल एक निहारिका में है जिसे आकाश गंगा कहा जाता है। इसका व्यास लगभग १,००,००० प्रकाश वर्ष है। हमारी पृथ्वी आकाश गंगा के केन्द्र से लगभग ३०,००० प्रकाश वर्ष दूर है और हमारा सौरमंडल भी इस आकाश गंगा के चक्कर लगा रहा है और हमारी पृथ्वी भी उसके चक्‍कर लगा रही है।
  5. हमारी आकाश गंगा और आस-पास की निहारिकायें भी एक दूसरे के पास आ रही हैं। यह बात डाप्लर सिद्धान्त से पता चलती है। जिसके बारे में यहां बताया गया है। हमारी पृथ्वी भी इस गति में शामिल है।
मुख्य रूप से हम पृथ्वी की पहली और दूसरी गति ही समझ पाते हैं, तीसरी से पांचवीं गति हमारे जीवन से परे है। वह केवल सिद्धान्त से समझी जा सकती है, उसे देखा नहीं जा सकता है। हमारे विषय के लिये दूसरी और तीसरी गति महत्वपूर्ण है।

आकाश में अनगिनत तारा समूह हैं पर केवल १२ तारा समूह जो कि राशियां कहलाती हैं, ही महत्व पूर्ण हो गयीं - ऐसा क्यों है, इन तारा समूह में क्या खास बात है। इस बारे में अगली बार चर्चा होगी।

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Wednesday, October 25, 2006

आप किस बात पर, सबसे ज्यादा झुंझलाते हैं

मुझे दो बातें हमेशा से पसन्द हैंं: आईसक्रीम और पुस्तकें।

किसी भी शहर में मेरे लिए समय व्यतीत करने का सबसे प्रिय तरीका: वहां के अच्छे रेस्तराँ में जाकर आईसक्रीम खाना और पुस्तकों की दूकानों पर समय बिताना। उम्र के चढ़ते चढ़ते, गले के नाजुक होने के कारण आईस क्रीम खाना बन्द हो गया। मेरे डाक्टर मित्र कहते हैं कि ठंडी चीज खाने से और गले की खराबी का कोई सं‍बन्ध नहीं है फिर भी मैंने कोई ठन्डी चीज खायी नहीं कि गला हुआ खराब। मालुम नहीं मेरे डाक्टर मित्र सही हैं या मेरा अनुभव, पर मैंने ठन्डी चीज खाना या पीना बन्द कर दिया है हालांकि पुस्तकों से प्रेम अब भी जारी है।

मुझे अक्सर काम के सिलसिले में दूसरे शहरों में जाना पड़ता है, इसमें हैदराबाद भी है। एक बार हैदराबाद जाने का मौका मिला तो वहां की पुस्तकों की दुकान जाने का कार्यक्रम बनाया। पूंछने पर पता चला कि वहां की सबसे अच्छी पुस्तक की दुकान वाल्डन, बेगम पेठ के इलाके में है। बस वहां पहुंच गया।

वाल्डन दुकान काफी बड़ी है किताबों का चयन अच्छा है पर किताबों की रैक बहुत पास-पास है थोड़ी घुटन सी लगी। यदि कुछ दूर दूर होती तो ज्यादा अच्छा रहता। दुकान में एक अंग्रेजी गाना 'सलोरी ...सलोरी' कहते हुये बज रहा था। कोने में एक संगीत और वीडियो कैसेट का भाग था। वहां हिन्दी का गाना ‘कभी अलविदा न कहना’ बज रहा था। दोनों का मिश्रण कुछ अजीब तरह का माहौल पैदा कर रहा था। संगीत इतनी जोरों से था जैसा कि डिस्को में अक्सर होता है। यह अक्सर किताबों की दुकानों के साथ होता है। किसी भी पुस्तक की दुकान पर जोर जोर से संगीत बजना, मुझे सबसे ज्यादा झुंझलाता है।

किताबों की दुकानें, पुस्तक प्रेमियों के द्वारा या उस व्यापारी वर्ग के द्वारा जो कि पुस्तक प्रेमियों की मनोवृत्ति को अच्छी तरह समझते थे, के द्वारा शुरू की गयीं थी पर अब उनकी जगह उनके नयी पीढियों ने जगह ले ली है। नयी पीढ़ी तो डिस्को सभ्यता में विश्वास करती है और पुस्तक की दुकान को भी उसी रंग में रंगना चाहते हैं। मैं हमेशा इस बात को उनके मैनेजर से कहता हूं, इस बात को उनकी शिकायत पुस्तिका में दर्ज करता हूं - मालुम नहीं असर होता है कि नहीं पर मैं शिकायत दर्ज करता चलता हूं।

मैंने वाल्डन में कुछ किताबें खरीदी और पैसे देते समय अपनी शिकायत दर्ज की। मेरे साथ एक बुजुर्ग भी कुछ खरीद रहे थे, वे मुस्कराये और सहमति जतायी। मालुम नहीं दुकान वाले की समझ में आया कि नहीं पर मुझे इतना लगा कि मेरी मनोवृति उस बुजुर्ग की तरह है।

खैर अगली बार वाल्डन जाऊंगा तो देखूंगा कि कुछ असर हुआ कि नहीं।

Sunday, October 22, 2006

पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा: Don't you have time to think?

रिचर्ड फिलिप्स फाइनमेन के बारे में पोस्ट यहां देखें
पहली पोस्ट: Don’t you have time to think?
यह पोस्ट: पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा

'कयामत से कयामत तक' की पिक्चर का एक गाना है,

पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा,
बेटा हमारा ऐसा काम करेगा।
मगर यह तो कोई न जाने,
कि मेरी मंजिल है कहां।

मैंने इस पिक्चर को नहीं देखा है पर यह गाना मुझे बहुत पसन्द है लेकिन किसी के पापा का केवल यह कहना या सोचना कि - बेटा ऐसा काम करेगा - पर्याप्त नहीं है। बेटा कोई अच्छा काम करे, इसके लिये पापा को बहुत कुछ करना पड़ेगा। अब यदि फाइनमेन के जीवन को देखें तो पायेंगे कि उसमें, उनके पिता ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। उनको विज्ञान में रुचि पैदा करने में, उनके पिता का बहुत बड़ा हांथ था।

NBC टेलीविजन ने १९६१ में 'About time' नामक फिल्म विज्ञान सीरीस के अर्न्तगत बनायी थी। फाइनमेन इसमें वैज्ञानिक सलाहकार थे। इस फिल्म के प्रदर्शन के पहले जब इसके बारे में जब लिखा जाने लगा तो फाइनमेन से पूछा गया कि उन्हें विज्ञान मे किस प्रकार से रुचि आयी तो उन्होंने बताया कि,

'My father, a businessman, had a great interest in science. He told me fascinating things about the stars, numbers, electricity, etc. Wherever we went there were always new wonders to hear about; the mountains, the forest, the sea. Before I could talk he was already interesting me in mathematical designs made with blocks. So I have always be a scientist. I have always enjoyed it, and thank him for this great gift to me.'

१९८१ में रौडिनी ल्यूस को पत्र लिखते हुऐ फइनमेन बताते हैं कि नीरस पाठ्य पुस्तक से मत घबराओ। उनको केवल तथ्यों के लिये पढ़ो, फिर उन बातों को अपनी तरह से प्रकृति के आश्चर्य की तरह सोचो। वे आगे बताते हैं कि किस प्रकार उनके पिता ने उन्हें इस तरह से सोचने के लिये प्रेरित किया। वे कहते हैं कि,
'My father taught me how to do that when I was a little boy on his knee and he read the Encyclopaedia Britannica to me! He would stop every once in a while and say—now what does that really mean. For example, “the head of tyrannosaurus rex was four feet wide, etc.” —it means if he stood on the long outside his head would look in at your bedroom on the second floor, and if the poked it in the window it would break casement on both sides. Then when I was a little older when would read that again he would remind me of how strong the next muscles had to be—of ratios of weight and muscle area—and why land animals can’t become size of whales—and why grasshoppers can jump just about as high as a horse can jump. All this, by thinking about the size of a dinosaur’s head!'

सच, हमारे बच्चे ही हमारी सबसे बड़ी पूंजी हैं। उनको अच्छे संस्कार मिलना, उनका ठीक दिशा में रहना ही हमारी सबसे बड़ी एवं महत्वपूर्ण उपलब्धि है। वे अच्छे व्यक्ति बने, इसका दायित्व हम पर है। पुरानी कहावत है,
'पूत सपूत तो क्या धन संचय, पूत कपूत तो क्या धन संचय।'
हम अक्सर अपने में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि अपने बच्चों के साथ समय बिताना, उन्हे अच्छी बातें बताना, जो कि सबसे महत्वपूर्ण है, उसे भूल जाते हैं।

इस गाने को यहां देखें

Friday, October 20, 2006

हेर संगीत नाटक - Hair Musical: ... टोने टुटके

ज्योतिष, अंक विद्या, हस्तरेखा विद्या, और टोने-टुटके
पहली पोस्ट: भूमिका
दूसरी पोस्ट: तारे और ग्रह
तीसरी पोस्ट: प्राचीन भारत में खगोल शास्त्र
चौथी पोस्ट: यूरोप में खगोल शास्त्र
यह पोस्ट: Hair Musical हेर संगीत नाटक
अगली पोस्ट: पृथ्वी की गतियां

मेरे विद्यार्थी जीवन में हेयर संगीत नाटक {Hair (musical)} का मंचन अमेरिका में शुरू किया गया। इसका सबसे पहले मंचन १७ अक्टूबर १९६७ को हुआ। इसका मंचन आज तक अलग-अलग देशों में हो रहा है पर अपने देश में कभी नहीं हुआ। यह काफी चर्चित और विवादास्पद है। यह उस समय शुरू हुआ जब अमेरिका में लोग वियतनाम जंग के खिलाफ हो रहे थे, हिप्पी सभ्यता जन्म ले रही थी। बहुत से लोगों का कहना है कि हिप्पी सभ्यता, इसी संगीत नाटक से जन्मी। इसमें लड़के और लड़कियां राशि के चिन्हों को दर्शाते थे, कुछ दृश्यों में निर्वस्त्र होते थे कुछ में वे अमेरिकी झण्डे को पहने होते थे। इसलिये शायद यह चर्चित तथा विवादास्पद हो गया।

इसका शीर्षक गीत 'This is the dawning age of Aquarius' है। इस गाने के शब्द यहां हैं और इस गाने को आप यहां देख वा सुन सकते हैं। यह गाना अपने देश में भी प्रचलित था। मेरे कई दोस्त इसे पसंद करते थे, इसके बारे में बात करते थे। इस गाने का शब्दिक अर्थ है कि कुम्भ राशि का समाय आने वाला है मेरे मित्र शब्दिक अर्थ तो जानते थे - पर समझते नहीं थे कि यह क्या है। क्या वास्तव में कुम्भ राशि का समय आ रहा है? यह क्यों कहा जा रहा है? इसका गाने के अर्थ का भी हमारे विषय से सम्बन्ध है। इसको समझने के लिये जरूरी है कि पृथ्वी की गतियों को राशियों को समझें - तो अगली बार बात करेंगे पृथ्वी की गतियों के बारे में।

अन्य चिट्ठों पर क्या नया है इसे आप दाहिने तरफ साईड बार में, या नीचे देख सकते हैं।

Tuesday, October 17, 2006

हरिवंश राय बच्चन: नियम

हरिवंश राय बच्चन
भाग-१: क्या भूलूं क्या याद करूं
पहली पोस्ट: विवाद
दूसरी पोस्ट: क्या भूलूं क्या याद करूं

भाग-२: नीड़ का निर्माण फिर
तीसरी पोस्ट: तेजी जी से मिलन
चौथी पोस्ट: इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय के अध्यापक
पांचवीं पोस्ट: आइरिस, और अंग्रेजी
छटी पोस्ट: इन्दिरा जी से मित्रता,
सातवीं पोस्ट: मांस, मदिरा से परहेज
आठवीं पोस्ट: पन्त जी और निराला जी
यह पोस्ट: नियम
अगली पोस्ट: भाग-३: बसेरे से दूर

कुछ दिन पहले नारद में हुई घटनाओं के कारण जीतेन्द्र जी ने परिचर्चा पर 'नारद पर हिन्दी चिट्टों के लिये नियमावली' नामक एक चर्चा शुरु की। जब उन्हे सही जवाब नहीं मिल सके तो कुछ सवाल रख कर उन पर विचार मागें। यह सवाल निम्न थे,
  1. क्या नारद पर ब्लॉग अपने आप शामिल किए जाए, अथवा जब ब्लॉग लेखक उन्हे शामिल करने के लिए कहे तभी करे?
  2. शामिल करते समय क्या हम ब्लॉग लेखक से एक नियमावली पर सहमति कराए, जिसमे हम उन्हे ब्लॉग को नारद पर शामिल होने और निकाले जाने की शर्तो को उल्लेख करें?
  3. यदि किसी ब्लॉग मे हिन्दी और अंग्रेजी का मिश्रण होता है तो उस स्थिति मे क्या डिसीजन लें? (कई लोग अंग्रेजी मे लिखना शुरु करते है धीरे धीरे हिन्दी पर नियमित रुप से लिखने लगते है।)
  4. अश्ललीलता, गाली गलौच,वर्जित विषय, सामाजिक द्वेष, नफ़रत फैलाने वाले अथवा अन्य समाज विरोधी ब्लॉग्स का क्या करें?
  5. ब्लॉग को नारद के फीड से अलग करने के लिये क्या क्या नियम रखें?
  6. कुछ लोग अपने ब्लॉग मे लगातार बदलाव करके नारद के प्रथम पृष्ठ पर आने की कोशिश करते है, उस स्थिति मे क्या करें?
  7. कुछ ब्लॉग दूसरों के ब्लॉग से कन्टेन्ट चोरी करके अपने ब्लॉग पर लिखते है, उनका क्या करें?
  8. कुछ अपने प्रोडक्ट की तारीफ़ के लिये ब्लॉग लिखते है (डायरेक्ट मार्केटिंग) उनका क्या करे?
मेरे विचार में नियम कम से कम होने चाहिये। इन सवालों के मेरे जवाब यह थे,
  1. हिन्दी का ब्लौग हो तो बिना पूछे शामिल कर लेना चाहिये। वेब में लिखने का अर्थ है कि लिखने वाले की सहमति है जब तक वह स्वयं स्पष्ट रूप से न मना करे। सच तो यह है कि यदि वह मना करता है तो उसे वेब में लिखना नहीं चाहिये।
  2. नियमावली में सहमति करवाने की कोई जरूरत नहीं है।
  3. नारद की केवल एक शर्त होनी चाहिये कि मुख्यत: हिन्दी में चिट्ठा हो यदि अंग्रेजी में कोई चिट्ठी लिख दी तो कोई बात नहीं। यदि मिश्रित भाषा है तो भी कोई बात नहीं, उसे लेना चाहिये।
  4. हर व्यक्ति अपना conscience keeper है। इन सब बातों के अर्थ अलग अलग लोगों के लिये अलग है। देश विरोधी या समप्रदायिक बात कर रहा है तो सरकार उस चिट्ठे को हटाने के लिये सक्षम है। उसे नारद द्वारा हटाना ठीक नहीं।
  5. उत्तर के लिये जवाब २, ३ देखें।
  6. जहां तक में समझता हूं कि नारद में समय के अनुसार प्रथम पेज पर पोस्ट आती है प्रथम पेज पर आने के लिये नयी पोस्ट करनी पड़ेगी। यह कभी कभी करनी पड़ती है उसके कई कारण होसकते हैं, ब्लौगर ठीक नहीं चलता है; कभी कभी तकनीक का अच्छा ज्ञान नहीं होता है; और कभी इन्टरनेट कि अच्छी सुविधा नहीं होती है। यदि कोई व्यक्ति नारद के प्रथम पेज पर रोज रहे लेकिन कूड़ा लिखता हो तो कोई भी उसे खुद नहीं पढ़ेगा। नारद को कुछ करने कि जरूरत नहीं है। यदि वह अच्छा लिखता हो तो वह यदि महीने में एक भी चिट्ठी लिखेगा तो भी सब पढ़ेंगे और उसका इन्तजार करेंगे। नारद उसे हटा भी देगा तो भी लोग उसे पढ़ेंगे। मेरे विचार से उसे चलने देना चाहिये। गलतफहमी में नयी पोस्ट को पुरानी पोस्ट समझ कर गलती हो सकती है।
  7. कब चोरी है कब नहीं, यह तय करना थोड़ा मुश्किल कार्य है। यह, जिसने चोरी की है तथा जिसकी चोरी हुई है, उनके बीच में छोड़ देना चाहिये। नारद को इसमे नहीं पड़ना चाहिये। नारद को कोई न कोई manage करता है परन्तु नारद को, उस व्यक्ति से पृथक होना चाहिये। मुझे तो सुनील जी कि बात अच्छी लगती है, जो उन्होने अपने चिट्ठे पर लिखी है।
  8. आजकल तो official bloggers भी होते हैं। यदि कोई लिखता है तो लिखे। उसे इस पर हटाने कि जरूरत नहीं।'

बच्चन जी भी नियम और सिद्धान्त से बंधना नहीं चाहते थे इसलिये किसी क्लब या कला सदस्य के सदस्य नहीं रहे पर यदि निमंत्रण होता तो अवश्य जाते थे। इसके बारे में कहते हैं कि,
’मेरा कार्य युनिवर्सिटी में पढ़ाने और अपने अध्ययन-कक्ष में पढ़ने-लिखने तक सीमित हो गया। मैं कभी किसी क्लब वगैरह का सदस्य नहीं बना, किसी कला-साहित्य संस्था का भी नहीं। अलबत्ता अगर कोई मुझे निमन्त्रित करती तो मैं उसमें सहर्ष भाग लेता। संस्थाऍ किसी-न-किसी सिद्धान्त से बंधती हैं- मैं अपने को किसी सिद्धान्त से बांधना नहीं चाहता था। मैं अब भी समझता हूं कि मुक्त दृष्टि कलाकार की पहली आवश्यकता है। और यह भी कि बौद्धिक विकास और सृजन, समूह में नहीं, एकान्त में ही सम्भव हैं। संस्था अगर उसे कह सकें तो एक छोटी-सी मैंने अपने घर पर ही खोल दी थी। इसका नाम मैंने ‘निशान्त’ रख दिया था। इसके न कोई नियम थे, न सदस्यता की कोई फीस थी। कुछ लोग जिनमें अधिकतर युनिवर्सिटी के नाते मेरे विद्यार्थी थे - महीने के अन्तिम शनिवार को 10 बजे रात से बैठते थे। और काव्‍य-पाठ, साहित्य चर्चा में रात बिताते थे। एक या दो बजे रात को हमीं लोग मिल-मिलाकर कॉफी अथवा कोई ताजी-गरम खाने की चीज बनाते, खाते-पीते, और तारों की महफिल के उठने तक हम अपनी बैठक जमाए रहते। दूसरे दिन इतवार होता और लोग दिन को सोकर रात की नींद पूरी कर लेते।'


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Sunday, October 15, 2006

यूरोप में खगोल शास्त्र

यूरोप के पहले खगोलशास्त्री - टौलमी
ज्योतिष, अंक विद्या, हस्तरेखा विद्या, और टोने-टुटके श्रृंखला की इस चिट्ठी में, प्राचीन समय में यूरोप में खगोल शास्त्र की चर्चा है।
पहली पोस्ट: भूमिका
दूसरी पोस्ट: तारे और ग्रह
तीसरी पोस्ट: प्राचीन भारत में खगोल शास्त्र
यह पोस्ट: यूरोप में खगोल शास्त्र
अगली पोस्ट: Hair Musical हेर संगीत नाटक

Saturday, October 14, 2006

Don’t you have time to think


रिचर्ड फिलिप्स फाइनमेन, भौतिक शास्त्र में नोबल पुरुस्कार विजेता हैं। मैंने इनके बारे में पांच कड़ियों पर लेख उन्मुक्त के चिट्ठे पर लिखा। जिसकी आखरी कड़ी यहां है। यहां से आप सारी कड़ियों पर जा सकते हैं। इन सब कड़ियों को संजो कर, मैंने एक पोस्ट, अपने लेख चिट्ठे पर यहां की है। यह सब लिखने के बाद ‘Don’t you have time to think’ नामक पुस्तक प्रकाशित हुई। यह पुस्तक फाइनमेन की गोद ली हुई पुत्री, मिशेल (Michelle) ने प्रकाशित की हैं। इसमें उन्होंने फाइनमेन को लिखे गये कुछ पत्र तथा उनके
द्वारा लिखे गये लगभग सारे पत्रों को संकलन कर के छापा है। कुछ बातें इस किताब के बारे में - यह इस चर्चा की पहली कड़ी है।

इस किताब की प्रस्तावना में मिशेल अपने बचपन वा अपने पिता के बारे में बताती हैं। वे अपने पिता और अपने बड़े भाई कार्ल को एक दूसरे से विज्ञान के बारे में बात करते हुऐ सोचती हैं कि उन्होंने विज्ञान के क्षेत्र में क्यों नहीं कार्य किया। उन्हें लगता है कि कार्ल अपने पिता के साथ ज्यादा पास थे।

उन्हें अपना घर और घरों से अलग लगता था। रविवार के दिन फाइनमेन सुबह अखबार नहीं पढ़ते थे पर वह सब लोगों के साथ, संगीत सुनाते थे; ड्रम बजाते थे; और कहानी किस्से सुनाते थे। जब कभी प्रारम्भिक शिक्षा के स्कूल में बच्चों को ले जाने की फाइनमेन की बारी होती थी तो वह अक्सर गाड़ी चलाते हुये या तो केलटेक की तरफ चले जाते थे या नाटक करते थे कि वे रास्ता भूल गये। इस पर सब बच्चे चिल्लाने लगते थे कि यह गलत रास्ता है। फिर फाइनमेन का जवाब होता था कि,
'अच्छा, यह रास्ता नहीं है'
यह कहकर वह पुन: दूसरा गलत रास्ता पकड़ लेते थे। बच्चे फिर चीखते थे,
‘नहीं..ऽ..ऽ..ऽ..ऽ।’
बच्चों को लगता था कि वे स्कूल समय से नहीं पहुंच पायेंगे और उन्हें सजा मिलेगी पर फाइनमेन हमेशा बच्चों को स्कूल समय से पहुंचा देते थे।

मिशेल कहती हैं कि,
'मेरे पिता कई हुनर में माहिर थे पर उनका वह हुनर सबसे खास था जिसमें वह अपने को एक बेवकूफ सा दिखने का नाटक करते थे और मुझे सोचने देते थे कि वे मेरी बातों से बेवकूफ बन गये हैं। इस बात ने मेरे बचपन को सबसे ज्यादा निखारा है।'

मिशेल यह भी बताती हैं कि, वे बहुत सालों तक नहीं जानती थी कि सब लोग उनके पिता फाइनमेन का सम्मान एक बहुत बुद्धिमान व्यक्ति की तरह से करते थे। उनके मुताबिक,
'मेरे पिता फाइनमेन हमेशा लोगों को अपने बारे में अश्रद्धा रखने को प्रेरित करते थे। वे अक्सर ऐसी कहानियां सुनाया करते थे जिसमें उनकी बेवकूफी झलकती थी। रात के खाने पर वे बताया करते थे कि, किस तरह वह अपना स्वेटर भूल गये; या कुछ महत्वपूर्ण सूचना भूल गये; या लोगों से बात होने के बाद उन्हें उनका नाम याद नहीं रहा। उनकी कान्फ्रेन्स नये-नये होटलों में होती थी। वे अक्सर उससे बोर होकर अपना सामान लेकर जंगल चले जाया करते थे और वहीं कैम्पिंग कर रात बिताते थे। लौट कर, चटकारे लेकर इसका अनुभव हमें सुनने को मिलता था। मेरी मां इस पर हमेशा टिप्‍पणी करती थीं “ओह रिचर्ड” वह हमेशा अपने ऊपर हंसते थे और हम उनके ऊपर।‘

इस किताब में बहुत सारे फाइनमेन के लिखे हुये पत्र हैं, जिससे उनके चरित्र के बारे में पता चलता है और यह किताब बेशक पढ़ने योग्य है। आपको याद होगा कि फाईनमेन अरलीन से प्यार करते थे और नौकरी मिलने के बाद उसके साथ शादी रचाने की बात थी पर अरलीन को तपेदिक की बीमारी हो गयी। फाइनमेन उसे चूम भी नहीं सकते थे फिर भी उन्होंने उससे शादी की। मैं हमेशा सोचता था कि इस तरह की बात तो केवल किताबों और पिक्चरों में होती है, वास्तविक जीवन मैं नहीं।

फाइनमेन के परिवार वाले इस शादी के खिलाफ थे। इस बारे में फाइनमेन ने अपनी मां को एक लम्बा पत्र लिखा, जिसमें लिखा कि,
‘I want to marry Arline because I love her - which means I want to take care of her. That is all there is to it. I want to take care of her.’
प्यार का यह भी एक अर्थ – एकदम सत्य।

इस किताब में एक पत्र श्री वी.के. सिंह, अध्यापक भौतिक शास्त्र, राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर, का भी है। ये फाइनमेन की पुस्तक Lectures on Physics की तुलना रामायण से करते है और कहते हैं कि इसका अध्ययन भी, उतनी ही बारीकी से करना चाहिए जैसे कि रामायण का किया जाता है।

इसमें इलाहाबाद के श्री मदन मोहन पंत के पत्र का जिक्र है जिसमें पंत ने फाइनमेन को अपना पेन टीचर के कहा है।


इन पत्रों ने मुझे कई बातों की याद दिलायी:
  • मेरे बचपन की; या
  • कई ऐसे व्यक्तियों की जिन्होने मेरे बचपन में, मुझ पर सबसे ज्यादा असर डाला; या
  • कुल्लू मनाली में एक बिस्किट के पीछे, पूरी नदी पैदल पार करने की; या
  • उन क्षणों की भी, जो मैंने मुन्ने एवं मुन्नी के साथ पहेली बूझते हुऐ बिताये; या
  • मुन्ने एवं मुन्नी के साथ बितायी, नदी के किनारे तारों, लियोनिडस्, और पुच्छल तारे को देखते हुऐ रातों की; या
  • मुन्ने एवं मुन्नी के साथ बिताये, दुधुवा, जिम कौर्बेट, कान्हा, बान्धवगढ़, मदुमलाई, और बंदीपुर के जंगलों की; या
  • उन पिकनिकों की, जिसमें हमने सारा समय केकड़े और मछलियां पकड़ने में बिता दिया; या
  • मेले में उन रातों की, जो हमने हांथ की रेखायें पढ़ने, और नौटंकी , जादू देखने में गुजार दिये; या
  • पंचमढ़ी के जंगलों की, जब हम पानी के झरने के लिये छोटे रास्ते पर चलते जंगल में खो गये थे; या
  • पंचमढ़ी में पीछा करती मधुमक्खियों की, जिससे पानी के झरने में कूद कर जान बचायी; या
  • बम्बई में गोरे गांव में मिल्क डेरी की, जहां पर रेलिंग ही मुन्ने के उपर गिर गयी और बस हमें वहीं छोड़ के चली गयी, तब कई किलोमीटर की दूरी मुन्ने को गोदी में ले जाने की; या
  • चुनाव में उस उपद्रव की, जब चुनाव की निष्पक्षता कराने के पीछे मेरा सर पर अध्धा मार दिया गया, पांच टीके लगे, और मैं अब भी नहीं समझ पाता कि में उस दिन कैसे बच गया; या फिर
  • उस मीटिंग की जब अयोध्या में राम मन्दिर बनाने के खिलाफ बोलने पर लोग चप्पल से मारने मंच पर आ गये।
यह आपको भी कुछ ऐसी ही यादों पर वापस ले जायगी।

इस चिट्ठे पर चल रही कई सीरीसों के साथ, एक सीरीस यह भी - आने वाली कुछ पोस्टों पर फाइनमेन के द्वारा लिखे कुछ पत्रों का जिक्र होगा।


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Thursday, October 12, 2006

पेटेंट और कंप्यूटर प्रोग्राम: निष्कर्ष

भाग-१: पेटेंट
पहली पोस्ट: भूमिका
दूसरी पोस्ट: ट्रिप्स (TRIPS)
तीसरी पोस्ट: इतिहास की दृष्टि में
चौथी पोस्ट: पेटेंट प्राप्त करने की प्रक्रिया का सरलीकरण
पांचवीं पोस्ट: आविष्कार
छटी पोस्ट: पेटेंटी के अधिकार एवं दायित्व

भाग-२: पेटेंट और कंप्यूटर प्रोग्राम
पहली पोस्ट: भूमिका
दूसरी पोस्ट: अमेरिका में - पेटेंट और कंप्यूटर प्रोग्राम
तीसरी पोस्ट: अमेरिका में पेटेंट और कंप्यूटर प्रोग्राम - औद्योगिक प्रक्रिया के साथ
चौथी पोस्ट: अमेरिका में पेटेंट और कंप्यूटर प्रोग्राम - व्यापार के तरीके के साथ
पांचवीं पोस्ट: यूरोप और भारतवर्ष में पेटेंट और कंप्यूटर प्रोग्राम का कानून
यह पोस्ट: इस भाग का निष्कर्ष


अगली बार: भाग-३: पेटेंट और पौधों की किस्में एवं जैविक भिन्नता
 
इस चिट्ठी को आप नीचे प्लेयर पर प्ले करने वाले चिन्ह ► पर चटका लगा कर सुन सकते हैं।


Tuesday, October 10, 2006

प्राचीन भारत में खगोल शास्त्र: ... टोने टुटके

पुने में स्थित आर्यभट्ठ की मूर्ति
ज्योतिष, अंक विद्या, हस्तरेखा विद्या, और टोने-टुटके की इस चिट्ठी में प्राचीन भारत में खगोल शास्त्र की चर्चा है।
पहली पोस्ट: भूमिका
दूसरी पोस्ट: तारे और ग्रह
यह पोस्ट: प्राचीन भारत में खगोल शास्त्र
अगली पोस्ट: यूरोप में खगोल शास्त्र

Sunday, October 08, 2006

हरिवंश राय बच्चन: पन्त जी और निराला जी

हरिवंश राय बच्चन
भाग-१: क्या भूलूं क्या याद करूं
पहली पोस्ट: विवाद
दूसरी पोस्ट: क्या भूलूं क्या याद करूं

भाग-१: नीड़ का निर्ममाण फिर
तीसरी पोस्ट: तेजी जी से मिलन
चौथी पोस्ट: इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय के अध्यापक
पांचवीं पोस्ट: आइरिस, और अंग्रेजी
छटी पोस्ट: इन्दिरा जी से मित्रता,
सातवीं पोस्ट: मांस, मदिरा से परहेज
यह पोस्ट: पन्त जी और निराला जी
अगली पोस्ट: नियम

कलाकार भी कुछ अजीब होते हैं सुमित्रा नन्दन पंत जहां सुकुमार, वहां निराला जी पहलवान। इनके सम्बन्ध भी कुछ अजीब थे इन सम्बन्धों की चर्चा बच्चन जी नीड़ का निर्माण फिर में करते हैं वे लिखते हैं कि,
‘पंत और निराला एक-दूसरे से जितने "एलर्जिक" (एक-दूसरे के लिए कितने असह्य) थे, इसका अनुभव पहली बार मुझे हुआ। निराला जी उन दिनों पहलवानी मुद्रा में रहते थे, पांव में पंजाबी जूता, कमर में तहमद, बदन पर ढीला, लम्बा कुर्ता, सिर पर पतली साफी। कहीं अखाड़ा लोटकर चेहरे और मुंडे सिर पर मिट्टी भी पोत आते थे। आमना-सामना दोनों का कभी हो ही जाता।‘


एक दिन तो दोनों में कुश्ती ही हो गयी।
‘निराला जी पंत जी को देखते तो अवज्ञा से पीठ या मुंह फेर लेते । पंत जी निराला को देखते तो अपने कमरे में जा बैठते। एक दिन तो निराला जी मेरे ड्राइंग रूम में आ धमके और उन्होंने पंत जी को कुश्ती के लिए ललकारा। उसका वर्णन मैं ‘नए पुराने झरोखे’ के एक निबन्ध ‘यह मतवाला-निराला’ में कर चुका हूँ। निराला जी के देहावसान के बाद उनके बारे में अद्भुत- अद्भुत संस्मरण लोगों ने गढ़े। खैरियत यह हुई कि उस दिन अमृत लाल नागर पंत जी के साथ बैठे हुए थे। और जो मैंने लिखा, उसके वे साक्षी हैं। यह मैंने संस्मरण में नहीं लिखा था - अमृत लाल ने बाद में कहा था कि अगर निराला पंत पर झपटते तो मैं उनसे पिल पड़ता। अपने मनोविकारों से ग्रस्त-विवश निराला मुझे इससे दयनीय कभी नहीं दिखे।‘

Saturday, October 07, 2006

तारे और ग्रह: ... टोने टुटके

ज्योतिष, अंक विद्या, हस्तरेखा विद्या, और टोने-टुटके की श्रृंखला की इस कड़ी में तारों और ग्रहों की चर्चा है।
ब्रह्माण्ड में बनते तारे


पहली पोस्ट: भूमिका
यह पोस्ट: तारे और ग्रह
अगली पोस्ट: प्राचीन भारत में खगोल शास्त्र

Thursday, October 05, 2006

यूरोप और भारतवर्ष में पेटेंट और कंप्यूटर प्रोग्राम

भाग-१: पेटेंट
पहली पोस्ट: भूमिका
दूसरी पोस्ट: ट्रिप्स (TRIPS)
तीसरी पोस्ट: इतिहास की दृष्टि में
चौथी पोस्ट: पेटेंट प्राप्त करने की प्रक्रिया का सरलीकरण
पांचवीं पोस्ट: आविष्कार
छटी पोस्ट: पेटेंटी के अधिकार एवं दायित्व

भाग-२: पेटेंट और कंप्यूटर प्रोग्राम
पहली पोस्ट: भूमिका
दूसरी पोस्ट: अमेरिका में - पेटेंट और कंप्यूटर प्रोग्राम
तीसरी पोस्ट: अमेरिका में पेटेंट और कंप्यूटर प्रोग्राम - औद्योगिक प्रक्रिया के साथ
चौथी पोस्ट: अमेरिका में पेटेंट और कंप्यूटर प्रोग्राम - व्यापार के तरीके के साथ
यह पोस्ट: यूरोप और भारतवर्ष में पेटेंट और कंप्यूटर प्रोग्राम का कानून
अगली पोस्ट: इस विषय पर कुछ अनिश्चित क्षेत्र

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Monday, October 02, 2006

हरिवंश राय बच्चन - मांस, मदिरा से परहेज

पहली पोस्ट: हरिवंश राय बच्चन – विवाद
दूसरी पोस्ट: हरिवंश राय बच्चन - क्या भूलूं क्या याद करूं
तीसरी पोस्ट: हरिवंश राय बच्चन – तेजी जी से मिलन
चौथी पोस्ट: हरिवंश राय बच्चन - इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय के अध्यापक
पांचवीं पोस्ट: हरिवंश राय बच्चन - आइरिस, और अंग्रेजी
छटी पोस्ट: हरिवंश राय बच्चन - इन्दिरा जी से मित्रता,
यह पोस्ट: हरिवंश राय बच्चन - मांस, मदिरा से परहेज
अगली पोस्ट: पन्त जी और निराला जी

कायस्थ, मांस खाने और मदिरा पीने में कोई परहेज नहीं करते हैं। बच्चन जी भी इसका उपभोग करते थे पर उन्होंने इसको छोड़ दिया। इसके छोड़ने का कारण उनके पुत्रों की बीमारी थी।

जब अमिताभ बीमार पड़े तो उस समय वह महू में विश्वविद्यालय के एन.सी.सी. से सम्‍बन्धित 8 सप्ताह की ट्रेनिंग में थे। उन्होंने प्रतिज्ञा की कि
‘अगर अमित अच्‍छा हो जाएगा तो वे कभी शराब नहीं पियेंगे।'
नीड़ का निर्माण फिर में इसका वर्णन कुछ इस प्रकार करते हैं कि,
‘इस प्रण से ही मेरा मन कुछ शान्त हो गया।
तेजी का जो दूसरा पत्र आया, उसमें लिखा था कि अमित की दशा में सुधार हो चला है।
मैं अपनी प्रतिज्ञा पर अडिग रहा, भले ही कोई अफसर या अफसर का चचा बुरा माने।
तेजी के तीसरे पत्र से अमित के और अच्छे होने की खबर आई।
और एक समाचार आया कि अमित बिल्‍कुल अच्छा हो गया है।
पचीस वर्ष से ऊपर हो चुके हैं। तब से मैंने शराब छुई नहीं। अमित अब स्वस्थ, सुन्‍दर कद्दावर जवान है। मैं जानता हूँ कि अमित के स्वस्थ, सुन्दर, कद्दावर होने और मेरे शराब न छूने में कोई सम्बन्ध नहीं है, पर आप मुझसे अपनी प्रतिज्ञा तोड़ने को मत कहें।'


इसी तरह की कुछ बात तब हुई जब अजिताभ बीमार पड़े वह २-३ महीने का था तो उसे दाने निकल आये और लोगों ने समझा कि उसे चेचक हो गयी है। बच्चन जी ‘नीड़ का निर्माण फिर' में कहते हैं।
'मैंने किसी तरह की प्रार्थना-विनती न की। एक पिछली बात याद आई। अमित के लिए मैंने सदा के लिए मदिरा छोड़ दी थी। मैंने अपने मन से कहा, यदि अजित बच जाएगा तो मैं कभी मांस नहीं खाऊंगा। रात का पिछला पहर था या सुबह का मुँह अँधेरा तेजी ने मुझे जोर से आवाज दी! मैंने समझा, कुछ अनिष्ट हो गया। पर वह तो तेजी के हर्ष-आश्चर्य का स्वर था। अजित के बदन से सारे दाने गायब हो गए थे! उसका बुखार उतर गया था और वह मुस्करा रहा था! चमत्कार हो गया था, चमत्कार ! मैंने किसी अज्ञात को धन्यवाद दिया। अजित अब तेईस वर्ष के हैं- स्वस‍थ-सुन्दर। अपनी निरामिषता और उनकी तन्दुरूस्ती में किसी प्रकार का सम्बन्ध न देखते हुए भी मैं अपने से ही अपनी प्रतिज्ञा निभाए जा रहा हूँ।'

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