Saturday, February 28, 2009

लाल धब्बों की कहानी - महिलाओं की जुबानी

चिट्ठी में रजोधर्म के बारे समाज में अज्ञानता का वर्णन है और 'मेरी छोटी सी लाल किताब' (My Little Red Book) की समीक्षा है।

कुछ समय पहले डेसमंड मॉरिस ने डिस्कवरी चैनल पर 'मानव लिंग' (The Human Sexes) नामक एक श्रंखला निम्न पांच भागों में की थी।

  1. Different but Equal
  2. The Language of the Sexes
  3. Patterns of Love
  4. Passages of Life
  5. The Maternal Dilemma
प्रत्येक भाग में भी कई कड़ियां थीं। पहले भाग में बताया गया था कि महिला और पुरुष भिन्न पर एक दूसरे के बराबार हैं - किसी में महिलायें आगे हैं तो किसी में पुरुष। इस श्रंखला के पहले भाग की पहली कड़ी देख सकते हैं। इसकी कई अन्य कड़ियां भीं अन्तरजाल पर उपलब्ध हैं और देखने योग्य हैं।

महिलाओं और पुरुषों में बहुत कुछ भिन्नता तो सदियों से दोनो को अलग अलग कार्य करने के कारण या उनके लालन पालन में है पर कुछ भिन्नता जैविक भी है। जैविक भिन्नता का सबसे पुख्ता सबूत रजोधर्म (Menstruation) है। लेकिन जब अब पुरुष भी बच्चे पैदा करने लगे तो शायद यह भिन्नता भी नहीं रहे।

अधिकतर सभ्यताओं में, महिलाओं को रजोधर्म के समय अपवित्र माना गया। वे इसके दौरान न तो खाना बना सकती थी न ही पूजा कर सकती थीं। मेरे विचार में यह बीते हुऐ कल की बात है और आज ऐसा नहीं समझा जाता है। मैं, यह इसलिये सोचता था क्योंकि मैं एक सयुंक्त परिवार में बड़ा हुआ हूं। हमारे परिवार में चाचियां, बहनें, भाभियां थीं पर मुझे कभी भी पता नहीं चलता था कि वे कब इस दौर से गुजर रहीं हैं। मेरे परिवार में महिलाओं के साथ कभी भी रजोधर्म के समय उनसे कोई अन्तर नहीं किया गया।

लगता है कि, मेरी सोच सही नहीं है। रजोधर्म के बारे में लोगों की अज्ञानता समाप्त नहीं हुई है।

मैंने कुछ दिन पहले 'आज की दुर्गा - महिला सशक्तिकरण' की कहानी कई कड़ियों में अपने उन्मुक्त चिट्ठे पर लिखी थी। इसे बाद में संकलित कर इसी नाम से अपने चिट्ठे लेख में यहां प्रकाशित किया है। इस श्रंखला की एक कड़ी, महिलाओं में रजोधर्म (Menstruation) से संबन्धित थी। इसमें मैंने सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले का जिक्र किया था जिसमें इसके बारे में सूचना को एकान्तता के अन्दर बताया गया था। किसी को इसके बारे में सूचना मांगना अनुचित कहा गया। मेरे विचार से, इस तरह की सूचना मांगना, अज्ञानता की निशानी है।

कुहू जी, मुझे अन्तरजाल पर मिली थी। मैंने उनका परिचय, अपनी चिट्ठी 'अंतरजाल पर हिन्दी कैसे बढ़े' में करवाया था। उन्होंने कुछ दिन पहले अंग्रेजी में 'The Red Coloured Blues' और हिन्दी में सुनो, सुनो एक बात सुनो नामक चिट्ठी लिखी है। वे एक शादी में चेन्नई गयी हुई थीं। वहां रजोधर्म के दौरान क्या हुआ यह इस चिट्ठी में लिखा है। उन्हें एक कोने में बैठा दिया गया। उनके खाने के बर्तन बदल दिये गये। यह मुझे अविश्वसनीय लगता है। मैं सोच ही नहीं सकता कि आधुनिक भारत में इस तरह का बर्ताव हो सकता है।

मेरे कुछ मित्रों की पत्नियां रजोधर्म के दौरान कम काम करती हैं। उनके मुताबिक उन्हें कमजोरी रहती है। हो सकता है कि यह सच न हो और सच कुछ और ही हो क्योंकि शुभा के मुताबिक इस दौरान कोई भी कमजोरी नहीं होती है। यह केवल मनोवैज्ञानिक है पर इसके अतिरिक्त मैंने, समाज में, रजोधर्म के समय महिलाओं के साथ बर्ताव में कोई अन्तर नहीं पाया। ।

आज जब मैं रजोधर्म के बारे में बात कर रहा हूं तो इस संबन्ध पर एक पुस्तक का जिक्र करना चाहूंगा। रैशल कॉंडर नालेबफ (Rachel Kauder Nalebuff ) ने एक पुस्तक 'मेरी छोटी लाल किताब' (My Little Red Book) (माई लिटल रेड बुक) नाम से लिखी है। इसमें उन्होंने ९२ युवतियों के पहले रजोधर्म के संस्मरण लिखें है।

'मेरी छोटी लाल किताब' में एक संस्मरण बैंगलोर की युवती का है जो कुहू जी की चिट्ठी में वर्णित व्यवहार की तरह है। इस पुस्तक में कुछ अजीब तरह के अनुभवों को बांटा गया है। यह पुस्तक, शायद पुरुषों को रुचिकर न लगे पर महिलाओं को अवश्य भायेगी। यह पुस्तक हर युवती को पढ़नी चाहिये। शायद पुरुषों को भी - वे उनकी मुश्किलों को, उनके साथ होते अन्याय को, ज्यादा अच्छी तरह समझ सकेंगे।

यदि आप इस पुस्तक के बारे में इसकी लेखिका रैशल से जानना चाहते हैं तो यहां सुन सकते हैं।

इस तरह का व्यवहार अज्ञानता के कारण होता है। रजोधर्म के बारे में अज्ञानता, अथार्त यौन शिक्षा का आभाव। रजोधर्म के बारे में अज्ञानता के बारे में मैंने अपनी चिट्ठी यौन शिक्षा में भी जिक्र किया है। लोग अक्सर यौन शिक्षा का सही अर्थ नहीं जानते हैं और उसकी निन्दा करते हैं। यौन शिक्षा का सही मतलब इस तरह की अज्ञानता को दूर करना है।

महिलाओं के साथ, इस तरह का व्यवहार, न केवल यौन शिज्ञा के महत्व को उजागर करता है पर इसकी जरूरत को भी दर्शाता है।





यौन शिक्षा पर लिखी मेरी अन्य चिट्ठियां

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This post talks about wrong practises about menstruation and reviews 'My Little Red Book'. It is in Hindi (Devnaagaree script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.



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Wednesday, February 25, 2009

फैंटम, टार्ज़न ... यह कौन हैं?

साउथ अफ्रीका की यात्रा विवरण की इस कड़ी में, क्रुगर पार्क में दोपहर और शाम को ली गयी सफारी का वर्णन है और वहां देखे जानवरों के चित्र हैं।


हम लोगों ने क्रुगर पार्क में सबसे पहले दोपहर में सफारी ली। इस सफारी में, हमारे साथ न्यूजीलैड से आए हुए एक दम्पत्ति, उनकी पुत्री व ब्रिट्रानी दम्पत्ति थे ।


भारत के जंगल के पार्क में सबसे ज्यादा चीतल दिखाई पड़ते है और यहां पर सबसे ज्यादा इम्पाला है। यह हिरण जाति का एक जानवर है। हम लोग हिरण जाति के लगभग सभी जानवरों को देखा।

हिरणों के अतिरिक्त, हमने ज़ेबरा (Zebra), हिप्पोपोटामस (Hippopotamus), जंगली सुअर (Wild Boar), ज़िराफ (Giraffe), बबून बंदर (Baboon), नीला वाइल्डबीस्ट (Blue Wildebeest),   हाथी (Elephant),    गेंडें (Rhinoceros), जंगली भैसों (African Buffalo), (Spotted Hyena) के झुण्डों को देखा। 

यहां पर हमनें तरह-तरह की चिड़ियों (लगभग ४०-५० तरह की) को भी देखा। चिड़ियाएं तेजी से उड़ती थी कि हम लोगों ने उनका चित्र  नहीं खींच पाए।



 
रॉडिक्स के पास जानवरों की एक बहुत अच्छी गाइड पुस्तक थी। जब हम किसी जानवर के बारें मे पूछते  थे तो रॉडिक्स हमें उसी से दिखाते थे ताकि हम उसे ठीक प्रकार से जान सकें।  


जंगल में घूमते समय मैने रॉड्रिक्स से पूछा कि क्या यहाँ पर टार्जन और फैन्टम के चरित्र लोकप्रिय हैं? उसने कहा,
'मैंने न तो, यह नाम, कभी सुने हैं न ही वे लोकप्रिय हैं।'


मुझे आश्चर्य हुआ। जो चरित्र अफ्रीका के जंगलो पर आधारित है वे अफ्रीका में ही नहीं जाने जाते हैं। मुझे इस पर भी आश्चर्य हुआ कि इनके बारे में न्यूजीलैंड और इग्लैंड से आये दम्पत्ति को भी कुछ नहीं मालूम था हांलाकि उन्होंने किंग सॉलमन माइनस् का नाम सुना था पर पढ़ी नहीं थी।  यह पुस्तक  अंग्रेजी साहित्य की उच्च कोटि की पुस्तक मानी जाती है और इसी ने लोगों के मन में अफ्रीका के जंगलो के बारे में उत्सुक्ता जताई और टार्जन एवं फैन्टम  जैसे चरित्र का जन्म हुआ। 


रॉड्रिक्स  ने  शाम को हमें पार्क में  छोड़ दिया। पार्क के आफिस से हमें शाम की सफारी लेनी थी और यह सफारी केवल पार्क के लोग ही करा सकते थे। न्यूजीलैंड से  आये दम्पत्ति  यह सफारी नहीं ले सकें क्योंकि यह उन्हें पिछली रात लेनी थी पर वे इसे नहीं ले पाये थे। 


इस सफारी में हमारें साथ कुछ और लोग (तीन लड़के व एक लड़की) भी थे। मेरे विचार से  अमेरिकन लग रहे थे। वे बात-चीत से घमण्ड़ी लगते थे। यह अमेरिकनों की खास पहचान है वे दुनिया के सबसे बड़े दादा है। वे जो करते हैं वह ही ठीक- अपने आगे दूसरों को कम समझते है। अब समय बदल रहा है शायद वह कुछ सीखें और बर्ताव में परिवर्तन करें। नम्रता, दूसरों को समझना, सबसे बड़ा गुण है यही कारण है कि हमारी सभ्यता इतनी पुरानी होते हुए  आज भी जीवित है पर अन्य पुरानी सभ्यतायें समाप्त हो गयी। 


लौटते समय हम लोगों की गाड़ी के साथ दो अलग-अलग समय खरगोश आगे आ गये और आगे आगे चलते रहे। जब गाडी तेज हो तो वे तेजी से दौड़ कर सड़क पार करते थे मानों वे हमें  रोकना चाहते हैं। हमारे गाईड ने बताया कि इन्हे रोशनी पसंद है और ये रोशनी से खेलना चाहते है। हम लोगों ने जब अपनी गाड़ी की लाइट बंद कर दी तो वे वापस जंगल में चले गये। 

हमारी शाम की सफारी,  रात के लगभग ८ बजे खत्म हुई और हम लोग वापस अपनी लॉज में आ गये। 

भारतीय लोग बिल्लियों से डरते हैं। इस यात्रा विवरण की अगली कड़ी में, कुछ इसी के बारे में चर्चा करेंगे।


इस चिट्ठी में, नीले वाइल्डबीस्ट और जंगली भैसें का यह चित्र मैंने नहीं खींचा है। इसे एक जर्मन नवयूवक रासमस ने खींचा है। मेरी उससे मुलाकात क्रुगेर पार्क में हुई। मैं, उससे, आपकी मुलाकात आगे करवाउंगा।

अफ्रीकन सफारी: साउथ अफ्रीका की यात्रा
झाड़ क्या होता है? - अफ्रीकन सफारी पर।। साउथ अफ्रीकन एयर लाइन्स और उसकी परिचायिकायें।। मान लीजिये, बाहर निलते समय, मैं आपका कैश कार्ड छीन लूं।। साउथ अफ्रीका में अपराध - जनसंख्या अधिक और नौकरियां कम।। यह मेरी तरफ से आपको भेंट है।। क्रुगर पार्क की सफाई देख कर, अपने देश की व्यवस्था पर शर्म आती है।। हम दोनो व्यापार कर बहुत पैसा कमा सकते हैं।। फैंटम टार्ज़न ... यह कौन हैं?।। भारतीय लोग बिल्लियों क्यों डरते हैं।।

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This post describes our afternoon and evening safari in Kruger park, South Africa. It is in Hindi (Devnaagaree script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.


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Friday, February 20, 2009

जयंत विष्णु नार्लीकर की विज्ञान कहानी - वामन की वापसी

मुक्त मानक और 'वामन की वापसी' श्रंखला की यह कड़ी 'वामन की वापसी' विज्ञान कहानी की समीक्षा है। इसे आप रोमन या किसी और भारतीय लिपि में पढ़ सकते हैं। इसके लिये दाहिने तरफ ऊपर के विज़िट को देखें।
इसे आप सुन भी सकते है। सुनने के लिये यहां चटका लगायें। यह ऑडियो फाइल ogg फॉरमैट में है। इस फॉरमैट की फाईलों को आप,
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सुन सकते हैं। ऑडियो फाइल पर चटका लगायें फिर या तो डाउनलोड कर ऊपर बताये प्रोग्राम में सुने या इन प्रोग्रामों मे से किसी एक को अपने कंप्यूटर में डिफॉल्ट में कर ले। डाउनलोड करने के लिये पेज पर पहुंच कर जहां Download फिर फाईल का नाम लिखा है, वहां चटका लगायें।


पंचतत्र की एक कहानी कछुआ और खरगोश के बीच हुई रेस के बारे में है। आधुनिक युग में, इस कहानी में कुछ जोड़ा गया है। मैंने इस कुछ दिन पहले इसी चिट्ठे पर लिखा था। इसके द्वारा मैंने ओपेन सोर्स सॉफ्टवेयर के महत्व को बताने का प्रयत्न किया था। लेकिन मुक्त मानक का महत्व बताने के लिए मैं एक दूसरी कहानी 'वामन की वापसी' (The Return of Vaman) के बारे में चर्चा करना चाहूंगा। यह प्रसिद्व खगोलशास्त्री जयंत विष्णु नार्लीकर (Jayant Vishnu Narlikar) के द्वारा लिखी एक विज्ञान कहानी है।


यह कहानी तीन व्यक्तियों के इर्द-गिर्द घूमती है।
  • भौतिक शास्त्री,
  • कम्यूटर वैज्ञानिक, और
  • पुरातत्ववेता
भौतिक शास्त्री, गुरूत्वाकर्षण के बारे में प्रयोग करना चाहता था इसके लिए उसे गहरा गड़ढा खोदना था। यह गड्ढा खोदते समय उन्हें एक प्लेट मिलती है जिसमें कुछ लिखा हुआ है पर वे समझ नहीं पाते हैं कि उसमें क्या लिखा है क्योंकि लोग उसकी लिपि पढ़ने में असमर्थ हैं।


नीचे और खोदने पर एक घन मिलता है। घन पर तरह-तरह के चित्र बने हुए हैं। ये चित्र कुछ अजीब से हैं। प्लेट और घन दोनों एक अनजाने पदार्थ के द्वारा बने हुए हैं। जिससे उन्हें यह लगता है कि वास्तव में यह किसी उन्नत सभ्यता के द्वारा वहाँ रखे गये हैं।


लोगों के समझ में नहीं आता है कि घन को कैसे खोला जाए। लेकिन घन पर बने चित्रों में एक चित्र में दो हाथी घन को विपरीत दिशा से खींच रहे होते हैं पर उसके बाद भी वे हाथी उसे खोलने में असमर्थ दिखते हैं। यह चित्र देखकर उन्हें १७वीं शताब्दी के जर्मन वैज्ञानिक आटो वान ग्यूरिक के द्वारा किये गये एक प्रयोग का ख्याल आता है। उसने दो ताँबें के ५१ सेमी. व्यास के अर्द्व गोलों, को आपस में जोड़कर उसके अंदर की हवा को बाहर निकाल दी थी। इसके बाद दोनो तरफ आठ-आठ घोड़ों के खींचने पर भी वे अलग नहीं हुए थे। ग्यूरिक, इससे हवा के दबाव का महत्व बताना चाहते थे। इस प्रयोग को याद आते ही उन्हें लगा कि शायद इस घन के अंदर से भी हवा निकाल दी गई हो। वे घन पर एक पतला से छेद करते हैं जिससे हवा अंदर चली जाती है और वह घन तुरन्त खुल जाता है।


यह घन एक तरह का टाइम कैपसूल है जिसमें उस उन्नत सभ्यता के बारे में बातें थी। इस सभ्यता के लोग, कोई बीस हजार वर्ष पूर्व पृथ्वी पर रहते थे। कैपसूल के अन्दर यह बताया गया था कि किस तरह से एक खास तरह का आधुनिक कम्पयूटर बनाया जा सकता है। वे उस कम्पयूटर को बनाते हैं और उसका नाम गुरू रखते हैं। यह कम्पयूटर उन्हें एक मीटर ऊचां रोबोट बनाने का तरीका बताता है। यह रोबोट बौना है इसलिए इसका नाम वामन रखा जाता है।


वामन कोई साधारण रोबोट नही हैं वह एक अत्यंत आधुनिक किस्म का रोबोट है। इस तरह के रोबोट की कल्पना आइज़ेक एसीमोव (Isaac Asimov) ने बाईसेन्टीनियल मैन (The Bicentennial man) नामक विज्ञान कहानी में की थी। इस कहानी में, उस रोबोट का नाम एंड्रयूज़ था। एसीमोव ने, बाद में इस कहानी को पॉस्ट्रॉनिक मैन (Positronic Man) नामक उपन्यास में बदल दिया। इसी के आधार पर बाईसेन्टीनियल मैन (Bicentennial Man) नामक फिल्म भी बनी है।

इस फिल्म का ट्रेलर आप देखें। फिल्म की कहानी, मूल कहानी से बदल दी गयी है और फिल्म में यह एक प्यारी सी प्रेम कहानी है जहां एक रोबॉट प्रेम के कारण मानव (नश्वर) बनता है। यदि आपने इसे नहीं देखा है तो देखें।

वामन बुद्विमान रोबोट है और उसमें स्वतन्त्र निर्णय लेने की क्षमता है। वह मुश्किलों को समझता है और उसका ठीक निर्णय भी लेता है। वामन अपने बनाने वालों से इस बात की प्रार्थना करता है कि उसे बताया जाए कि वह कैसे अपनी तरह के और रोबोट बना सकता है ताकि मानव जाति की सेवा की जा सके। यह पता नही चलता था कि उस उन्नत सभ्यता का क्या हुआ इसलिए भौतिक शास्त्री और कम्पयूटर वैज्ञानिक उसे यह विधि नहीं सिखाते हैं। वामन अपने आप को दूसरों से चोरी, इस वायदे पर करवाता है कि वे लोग उसे और वामन बनाने का तरीका सिखा देगें।

एक ऎसी जगह जहाँ काम न करना पड़े, आराम ही आराम हो , स्वर्ग हो, जीवन का अंत है।


आधुनिक सभ्यता के समाप्त होने का कारण प्लेट पर लिखा था पर चूंकि कोई उसकी लिपि नही पढ़ पा रहा था इसलिए यह पता नही चल पा रहा था। अंत में पुरातत्ववेत्ता लिपि को पढ़ने में सफल हो जाता है जिससे पता चलता है कि जब वामन को अपने जैसा वामन बनाने की विधि मालूम होती है और बहुत से वामन बन जाते हैं तो वे मानव जाति का सारा काम अपने हाथ में लेते हैं । एक दिन वे काम करना बंद कर देते है। तब तक वह उन्नत सभ्यता इतनी अभ्यस्त हो चुकी थी कि वह अपने आप के चला नहीं पायी। सच है,
'Utopia, if there is one, is end of life.'
एक ऎसी जगह जहाँ काम न करना पड़े, आराम ही आराम हो , स्वर्ग हो, जीवन का अंत है।
सभ्यता का अंत पता चलने के बाद, यह बहुत जरूरी हो गया कि वामन को समाप्त किया जाए ताकि वह दूसरे वामन न बना सके। वह सभ्यता वामन को भी समाप्त कर देती है। यह सब कैसे होता है यही है इस कहानी में है।

मुक्त मानक और वामन की वापसी
भूमिका।। मुक्त मानक क्यों महत्वपूर्ण हैं?।। मुक्त मानक क्या होते हैं?।। मुक्त मानक क्यों उचित साधन हैं।। जयंत विष्णु नार्लीकर की विज्ञान कहानी -वामन की वापसी।। 'वामन की वापसी' विज्ञान कहानी का मुक्त मानक से सम्बंध


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This post is review of the science fiction 'The Return of Vaman by Jayan Vishnu Narlikar. It is in Hindi (Devnaagaree script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.


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Sunday, February 15, 2009

जाने क्यों, साफ कहते डरते हैं

मैंने अपनी चिट्ठी 'जाने क्यों लोग, ज़हर, ज़िन्दगी में भरते हैं' पर वेलेंटाईन दिवस पर होनी वाली अभद्रता पर आपत्ति दर्ज की थी। उसी चिट्ठी के अन्त में लिखा कि मुझे भारतीय संस्कृति-सभ्यता के नाम पर मैंगलोर के एक पब में किये गये बर्ताव पर भी आपत्ति है और इसके बारे में शीघ्र ही लिखूंगा। आज उसी के बारे में कुछ विचार।


मैंने वेलेंटाइन दिवस पर किये गये व्यवहार के बारे में जो भी लिखा या आज लिखने जा रहा हूं उससे अधिकतर पुरुष चिट्ठाकार सहमत नहीं हैं। इस पर बहुत कुछ कटु शब्दों में व्यक्त किया गया है। आशा करता हूं कि इन विचारों को स्वस्थ बहस के रूप में, सकारात्मक चर्चा की तरह से, लिया जायगा।


कुछ दिन पहले मैंगलोर के एक पब (public house) में कुछ युवतियों के द्वारा शराब पीने पर, उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया। मैं इस पर भी शर्मिन्दा हूं।


मैंने अपनी चिट्ठी 'यहां सेक्स पर बात करना वर्जित है' पर लिखा था कि १९६० का दशक मेरी किशोरावस्था का समय था। यह वह दशक था जिसमें हेर संगीत नाटक का मंचन हुआ। इसका जिक्र मैंने 'ज्योतिष, अंक विद्या, हस्तरेखा विद्या, और टोने-टुटके' की श्रंखला में किया है। इसी दशक पर हिप्पी आंदोलन अपनी चरम सीमा पर था। हम लोगों के बीच होने वाली पार्टियों में युवतियां भी रहती थीं। इन पार्टियों में न केवल सिग्रेट और शराब, पर चरस और गांजा भी चलता था। हममे से कुछ उस आनन्द की प्राप्ति भी करते थे जो यौन संबन्धों से मिलता है। लेकिन मैं इन सब का हिस्सा नहीं था। मैंने आज तक इन पदार्थों का एक बार भी सेवन नहीं किया। मेरे बेटे और बिटिया रानी भी इससे दूर रहते हैं।


मेरे विचार से न केवल चरस और गांजा पर शराब का सेवन अनुचित है। लेकिन यदि कोई शराब का सेवन करता है तो क्या मैंगलोर पर किया गया व्यवहार उचित है? क्या हमारी संस्कृति इतनी संकीर्ण है कि हम अपनी बात समझाने के बजाय, लाठी के जोर पर स्वीकार करवाते हैं? कट्टरवादिता तो हमारी संस्कृति-सभ्यता का हिस्सा नहीं रही; हम तो कभी भी इसके साथ नहीं रहे; हमारी सभ्यता लाठी के बल पर बात मनवाने पर विशवास नहीं करती - फिर आज क्या हो गया है कि हम समझा कर, बातचीत कर, अपनी बात नहीं कहना चाहते।


मेरे विचार से शराब, चरस गांजा का सेवन इसलिये अनुचित है क्योंकि यह स्वास्थ के लिये हानिकारक है। यह पुरुषों के लिये भी उतना ही हानिकारक है जितनी महिलाओं के लिये। फिर महिलाओं के खिलाफ इस तरह का व्यवहार क्यों? क्या यह इसलिये कि वे कमज़ोर हैं? क्या फिर इसलिये की वे पुरुषों से लड़ नहीं सकती और उन्हें इसका जवाब मारपीट के द्वारा नहीं दे सकती थीं? क्या इसलिये कि पुरुष इसका जवाब उसी भाषा में, मारपीट करके, दे सकते थे।

एक अच्छे अंत को पाने के लिए, खराब साधन को ठीक नहीं कहा जा सकता है।

महात्मा गाँधी ने एक बार कहा था,
'Means are more important than the end: it is only with the right means that the desired end will follow.'
साधन अंत से ज्यादा महत्वपूर्ण है। यदि साधन ठीक होगें तो ही वांछित अंत मिल सकता है।


उनका दर्शन, कानून का भी मूलभूत सिद्वांत है। लार्ड डैनिंग (Lord Denning) पिछले शताब्दी के सबसे प्रसिद्व न्यायाधीशों में से एक थे। उनका कहना है,
'But it is fundamental in our law that the means that are adopted... should be lawful means. A good end does not justify bad means.' RVS IRC Exparte Rossminster Ltd. 1979 ( 3) AllELR 385.
हमारी न्याय प्रणाली में यह महत्वपूर्ण है कि जो भी साधन प्रयोग में लाये जाएँ वे कानूनी हो। एक अच्छे अंत को पाने के लिए, खराब साधन को ठीक नहीं कहा जा सकता है।


शराब का सेवन न केवल महिलाओं के लिये पर पुरुषों के लिये भी अनुचित है। इसे रोकने यह तरीका नहीं है जो कि मैंगलोर पब में अपनाया गया। मेरे विचार से एक अच्छे अन्त पाने के लिये यह गलत साधन है। यह न केवल दर्शन, पर कानून की दृष्टि में भी गलत है।


इसका एक अन्य दृष्टिकोण भी है। सरकार शराब और सिग्रेट बेचने की एवं पीने की अनुमति देती है। सरकार ने इसके लिये लाइसेन्स भी दे रखे हैं। यदि कोई इस तरह की कानूनी जगह पर शराब का सेवन करता है और वह सेवन उसके व्यवहार को अशोभनीय नहीं बनाता तो किसी को आपत्ति करने का क्या अधिकार है। जो लोग इसके विरुद्ध हैं उन्हें चाहिये कि पहले उस कानून को बदलवायें जो इस तरह से शराब पीने की अनुमति देता है। कानून के अन्दर सेवन की गयी वस्तु का इस तरह लाठी, मारपीट, अभद्रता से विरोध करना अनुचित है।


लोगों को यह बात अपने आप स्वयं समझ में आनी चाहिये कि इसका सेवन ठीक नहीं पर आप यदि जबरदस्ती कर उनसे यह मनवाना चाहेंगे तो इसका असर उल्टा ही होगा।


बच्चों को सही दिशा देना हमारा, माता-पिता, समाज का काम है पर पुलिस नैतिकता से ठीक उसका उल्टा होता है। यह गलत है। यदि आप मुझसे पूछें कि मैं किस तरह का समाज चाहूंगा - जहां लोगों (जिसमें लड़कियां भी हैं) को पब में जाकर शराब पीने की स्वतंत्रता है, या जहां पुलिस नैतिकता है तो निःसन्देह मैं वह समाज चुनना चाहूंगा जहां पर लोगों को पब में जा कर शराब पीने की स्वतंत्रता है। क्योंकि इस तरह की स्वतंत्रता ही लोगों की समझ को प्रेरित कर सकती है कि यह गलत कार्य है। इतिहास गवाह है कि जब, जब और जहां जहां शराब पीना मना किया गया वहां अवैध तरीके से शराब बनाने और पीने का सिलसिला शुरू हो गया जो कि समाज के लिये ज्यादा हानिकारक है - पुलिस नैतिकता गलत है: कानून नैतिकता ही सही है।


मुझे इस घटना से संबन्धित कुछ अन्य बातों पर भी मुझे आपत्ति है।


कुछ महिलाओं ने मैंगलोर पब में हुए अनुचित व्यवहार पर, उन पुरुषों को जवाब उन्हीं की भाषा (मारपीट) में न देकर एक शान्तिपूर्ण तरीके से दिया। उन्होंने अनुचित व्यवहार करने वालों को गुलाबी.. भेजने की बात की। यह केवल ऐसे लोगों को शर्मिन्दा करने के लिये, उनका हास्य बनाने के लिये किया गया है। यह सच है कि गुलाबी.. का संबन्ध एक शरीर के प्राइवेट भाग से है। मैं स्वयं इस तरह से आपत्ति दर्ज नहीं करता पर यह तरीका शन्तिपूर्ण है - अनुचित नहीं है। इसमें कुछ भी गलत नहीं है।


मुझे व्यक्तिगत तौर पर महिलाओं के द्वारा गुलाबी.. भेजने पर कोई बात अनुचित नहीं लगती पर यदि यह किसी को अनुचित लगती है तो क्या उन महिलाओं पर व्यक्तिगत आक्षेप या गाली गलौज, डन्डा चलाना उचित है। मेरे विचार से यह गलत है।


कुछ पुरुषों ने, महिलाओं के द्वारा गुलाबी.. भेजने पर, उन्हें गुलाबी-- भेजने की बात कही गयी है। गुलाबी-- का भी संबन्ध एक शरीर के प्राइवेट भाग से है। मैं इस तरह से भी आपत्ति दर्ज नहीं करता पर यह तरीका भी शन्तिपूर्ण है। यदि आप किसी बात से सहमत नहीं हैं तो उसका जवाब शन्तिपूर्ण तरीके से दीजिये - लाठी, डन्डे के जोर पर या व्यक्तिगत आक्षेप, या गाली गलौज करके न दीजिये।


मेरे लिये तो इन दोनो तरीकों का प्रयोग करना दूर है - मैं तो इनका नाम भी अपने चिट्ठे पर लिखने से हिचकिचा रहा हूं। मैं स्वयं इन तरीकों का कभी प्रयोग नहीं करता पर यदि कोई इन तरीकों को अपनाता है तो मुझे इस पर कोई आपत्ति नहीं है क्योंकि यह शान्तिपूर्ण तरीके हैं। यह अपनी बात कहने के उन तरीकों से कहीं अच्छे हैं जैसा कि मैंगलोर पब में अपनाये गये। मैं अपनी आपत्ति उसी तरह से दर्ज करता जैसा कि मैं यहां पर कर रहा हूं या फिर किसी अन्य शान्तपूर्वक तरीके, जैसे जलूस इत्यादि निकाल कर, लेकिन उस तरह से कभी नहीं जैसा कि मैंगलोर में हुआ - यह कायरता, शर्मिन्दगी का तरीका है।


'उन्मुक्त जी, आपका पक्ष तो समझ में आया पर आपकी इस चिट्ठी का शीर्षक समझ में नहीं आया। इसका इस चिट्ठी से क्या मतलब?'
कुछ चिट्ठाकारों (अधिकतर महिलाओं) ने, इस प्रकरण पर चिट्ठियां लिखते या टिप्पणी करते समय, इस तरह का आभास दिया कि इस घटना पर बहुत से हिन्दी चिट्ठाकार (अधिकतर पुरुष) चुप हैं, वे इस पर बोलने से घबराते हैं, इसकी मौन स्वीकृति देते हैं। यह बात सच नहीं है। हममें से कई यह भिन्न कारणों से ऐसा करते हैं। जब मैंने इस विषय पर लिखने की बात सोची तो लगा कि वे शब्द जो इन चिट्टाकारों के आभास को व्यक्त कर सकें, वही इस चिट्ठी का सही शीर्षक होगा।


मैंने वेलेंटाइन दिवस पर हुऐ बर्ताव पर क्षोभ प्रगट करते हुऐ एक चिट्ठी 'जाने क्यों लोग, ज़हर, ज़िन्दगी में भरते हैं' लिखी है। इस चिट्ठी में 'दिल चाहता है' फिल्म के एक गाने 'जाने क्यों लोग, प्यार करते हैं' का जिक्र किया है। इस गाने की एक पंक्ति इस आभास को व्यक्त करती है इसी लिये उसे ही इस चिट्ठी का शीर्षक दे दिया।


'उन्मुक्त जी, यहां सब कहने की स्वतंत्रता है फिर लोग क्यों अपनी बात नहीं कहते हैं?'
बहुत से चिट्ठाकार, कुछ व्यक्तिगत विवशता के कारण, ऐसे विषय पर लिखना वा टिप्पणी करना नहीं पसन्द करते हैं। कई विवाद में नहीं पड़ना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि इस पर विवाद बेकार में तूल पकड़ेगा, बढ़ेगा। चुप रहने पर जल्द ही समाप्त हो जायगा और चिट्ठाकार पुनः उन विषयों पर लिखने लगेंगे जिसकी हिन्दी चिट्ठाजगत को आवश्यकता है। लेकिन इस घटना पर, लिखने और टिप्पणी, न करने का यह अर्थ बिलकुल न लगाया जाय कि सब मैंगलोर पर महिलाओं के साथ हुऐ बर्ताव को उचित मानते हैं या फिर महिलाओं के द्वारा शुरू किये गुलाबी.. भेजने के विरोद्ध में लिखी गयी बातों से सहमत हैं।


'उन्मुक्त जी, फिर आपने इस विषय पर क्यों लिख दिया? आप भी तो विवादों नहीं पड़ना चाहते।'
मुझे कुछ चिट्ठाकारों की टिप्णियों, चिट्ठियों पर आश्चर्य हुआ; दुख लगा कि इतने सुलझे लोगों कि सोच इस तरह से हो सकती है। इस प्रकरण पर बहुत कुछ व्यक्तिगत आक्षेप होने लगे, अपशब्द भी हो गये। इसलिये यह चिट्ठी लिखी कि यदि कोई हिन्दी चिट्ठाकार इस विषय पर मौन हैं तो इसका अर्थ यह नहीं है कि वे मैंगलोर काण्ड से या महिलाओं के द्वारा गुलाबी.. भेजने की बात पर व्यक्तिगत आक्षेप वा अपशब्द कहने वाले विचारों से सहमत हैं। बहुत से पुरुष इसको एकदम गलत मानते हैं। मैं नहीं बता सकता कि मेरे अतिरिक्त इस तरह के विचार रखने वाला और कौन अन्य चिट्ठाकार हैं पर मैं इस तरह के विचार रखने वालों में से एक हूं।


'उन्मुक्त जी, आप को इन गुलाबी तरीकों से असहमति प्रकट करने वाले तरीकों पर व्यक्तिगत आपत्ति है क्या गुलाबी रंग से परहेज है या फिर गुलाबी तरीकों को पसन्द नहीं करते?'
नहीं मुझे गुलाबी रंग पसन्द है। यह तो रुमानी रंग है - प्रेम का प्रतीक है। मुझे बांदा की यह गुलाबी महिलायेंं, उनका मकसद, उनका ऐतराज पसन्द आता है।



इस चिट्ठी के चित्र बीबीसी के इस पेज पर के विडियो और इस पेज से है।

इस प्रकरण पर कई चिट्ठियों का जिक्र चिट्ठाचर्चा की इस चिट्ठी में है। हांलाकि इसमें सन्दर्भित चिट्ठियों के अतिरिक्त भी कुछ अन्य चिट्ठियां भी हैं और इसके बाद भी कई चिट्ठियां इस घटना पर लिखी गयी हैं।
कुछ अन्य विषयों पर एतराज प्रगट करती मेरी चिट्ठियां
  1. धार्मिक उन्माद
  2. वेलेंटाईन दिन और इसका स्पष्टिकरण डैनिश व्यंगकार - कार्टून
  3. Trans-gendered – सेक्स परिवर्तित पुरुष या स्त्री
  4. डकैती, चोरी या जोश या केवल नादानी
  5. बनेंगे हम सुकरात या फिर हो जायेंगे नील कण्ठ
  6. जाने क्यों लोग, ज़हर, ज़िन्दगी में भरते हैं
  7. जाने क्यों, साफ कहते डरते हैं

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This post talks about our culture in connection of the incident in the Mangalore pub. It is in Hindi (Devnaagaree script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.


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culture, Family, life, Life, जीवन शैली, समाज, कैसे जियें, जीवन दर्शन, जी भर कर जियो, पसन्द-नापसन्द,




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Saturday, February 14, 2009

जाने क्यों लोग, ज़हर, ज़िन्दगी में भरते हैं

आज वेलेंटाइन दिवस है। आज के दिन अपने देश में भारतीय संस्कृति के नाम पर कुछ अजीब तरह के फतवे जारी किये जाते हैं और हरकतें की जाती हैं। उनके बारे में कुछ विचार।


Wednesday, February 11, 2009

हम दोनो व्यापार कर बहुत पैसा कमा सकते हैं

साउथ अफ्रीका की यात्रा विवरण की इस कड़ी में, हमारे क्रुगर पार्क में गाइड की नज़र में, साउथ अफ्रीका के जन-जीवन का वर्णन है।

रॉड्रिक्स, एक प्राइवेट गाइड है और जिस कम्पनी के साथ हमने पैकेज़ लिया था वे उसी के साथ काम करते हैं । 


साउथ अफ्रीका में ५०% शादियां टूट रहीं हैं।


दो दिन हम रॉड्रिक्स के साथ रहे। इस बीच मेरी इससे काफी मित्रता हो गयी। उसने हमें काफी कुछ अपने बारे में बताया। उसने बताया कि वह एकल पिता है और उसके दो बच्चे हैं जिनमें एक १५ साल का और दूसरा ११ साल का है। वे उन्हीं के साथ रहते हैं। पत्नी, उनसे अलग,  जॉहान्सबर्ग मे रहती है।  शायद, उन दोनो के बीच में तालाक हो गया है। मैंने इस बारे में और विस्तार से कुछ बात करना उचित  नहीं समझा। रॉड्रिक्स के मुताबिक साउथ अफ्रीका में ५०% शादियां टूट रहीं हैं। 

रॉड्रिक्स, अपने बच्चो के बारे में चिन्तित थे कि कहीं उनमें खराब आदत न पड़ जाए। इसी लिये वे उनके सामने शराब नहीं पीते हैं। उनके घर में  केवल कोल्ड ड्रिंक्स रहती हैं जिसे वे लेते हैं।


रॉड्रिक्स कुछ आगे बढ़ने वाले  व्यक्ति लगे क्योंकि उन्होनें कुछ देर बात चीत के बाद कहा,

'आप मुझे बहुत अच्छे लगे यदि आप मेरे साथ आ जाएं तो  हम व्यापार कर बहुत पैसा कमा सकते हैं।'
वे चाहते थे कि मैं उनके व्यापार में हाथ बंटाऊंं  या उन्हें ऎसे लोगों से मिला सकूं, जो उनके व्यापार में हाथ बंटा सके। मेरे लिए, यह मुश्किल काम है। मैंने कहा, 
'मुझे व्यापार करना नहीं आता है और मैं व्यापार नहीं कर पाऊंगा और यदि आप व्यापार करने को सोचते है तो आपको टूरिस्म के लिए काम करना चाहिए। इसके लिए इण्टरनेट का प्रयोग करना अच्छा है। व्यापार के लिए आवश्यक है कि वह सुव्यस्थित हो और इसके लिए अलग से व्यवस्था करनी होगी।'

रॉड्रिक्स के पास ट्योटा वैन थी जिसमें कुछ बदलाव कर दिये गये थे। इसमें बैठने के लिये सीटें तीन पक्तियों में थी। यह एक  खुली गाड़ी थी जो कि ऊपर से ढ़की थी। हमने इसी पर दोपहर की सफारी ली। अगली बार इस सफारी के बारे में। 


अफ्रीकन सफारी: साउथ अफ्रीका की यात्रा
झाड़ क्या होता है? - अफ्रीकन सफारी पर।। साउथ अफ्रीकन एयर लाइन्स और उसकी परिचायिकायें।। मान लीजिये, बाहर निलते समय, मैं आपका कैश कार्ड छीन लूं।। साउथ अफ्रीका में अपराध - जनसंख्या अधिक और नौकरियां कम।। यह मेरी तरफ से आपको भेंट है।। क्रुगर पार्क की सफाई देख कर, अपने देश की व्यवस्था पर शर्म आती है।। हम दोनो व्यापार कर बहुत पैसा कमा सकते हैं।।

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is post per krugar national park mein hamre guide Raudricks kee nazron se south africa dekhne ka praytna hai. yeh hindi (devnagree) mein hai. ise aap roman ya kisee aur bhaarateey lipi me padh sakate hain. isake liye daahine taraf, oopar ke widget ko dekhen.

In this post, life-style in South Africa is described as seen by our guide Raudricks, at  Krugar National Park. It is in Hindi (Devnaagaree script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.


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Monday, February 09, 2009

स्वीट डिश इस प्रकार से बांटी जाय

यह चिट्ठी ई-पाती श्रंखला की कड़ी है। यह श्रंखला, नयी पीढ़ी के साथ जीवन शैली को समझने, और उसके एवं अपने बीच दूरी कम करने का प्रयत्न है।

लीसा ऑस्ट्रिया के लिंज़ शहर की रहने वाली है। उस से मेरी मुलाकात वियाना में कॉन्वेंट में हुई थी। उसने एक ई-मेल पर बड़े दिन की पूर्व संध्या पर मित्रों के साथ पार्टी करने का जिक्र किया था। मैंने उससे अपने बचपन की पार्टियों की चर्चा करते हुऐ उस पहेली का जिक्र किया था जो मैं अक्सर ऐसी पार्टियों में पूछा करता था।

यह पहेली संक्षिप्त में इस प्रकार है कि १५ लोगों के बीच, बिना तराजू के, स्वीट डिश कैसे बांटी जाय ताकि सब संतुष्ट रहें।

इस श्रंखला कि पिछली कड़ी में, मैंने उसकी ई-मेल का जिक्र किया था जिसमें उसने वा उसके मित्रों ने इस पहेली का हल निकाल पाने में अपनी असमर्थता बतायी थी और लीसा ने मुझे चुनौती दी थी कि क्या मैं उसे टाइपिंग टेस्ट पर हरा सकता हूं।

इस कड़ी में उसे भेजा गया मेरा जवाब है और उस पहेली का हल भी है।

Tuesday, February 03, 2009

क्रुगर पार्क की सफाई देख कर, अपने देश की व्यवस्था पर शर्म आती है

इस चिट्ठी में साउथ अफ्रीका के क्रुगर राष्ट्रीय पार्क के बारे में सूचना है।

क्रुगर राष्ट्रीय पार्क (Kruger national park) पार्क साउथ अफ्रीका में जानवरों को सुरक्षित रखने की जगह है। यह लगभग १८,९८९ वर्ग किलोमीटर (७३३२ वर्ग मील) में फैला है और उत्तर दक्षिण ३५० किलोमीटर (२१७) मील और पूरब पश्चिम ६० किलोमीटर (३७मील) है। इस पार्क के चारो तरफ तार लगे है जिसमें हल्की सी बिजली दौड़ती रहती है। यह इसलिए की जानवर बाहर न जा सके।
State President Paul Kruger of the South Afric...Image via Wikipedia

पॉल क्रुगर (Paul Kruger) ट्रांसवाल गणराज्य (Transvaal Republic) के राष्ट्रपति थे। १८९८ में, उन्होंने, इस पार्क की स्थापना, घटते हुऐ जानवरों की संख्या और शिकार को रोकने के लिये, की।

क्रुगर नेशनल पार्क की सबसे अच्छी बात थी वहां की सफाई। हम लोगों ने दो दिन में लगभग १४ घण्टें, वहां पर व्यतीत किये। एक बार दिन में २ बजे से लेकर ८ बजे रात्रि तक और अगले दिन सुबह ६ बजे से २ बजे तक। वहां पर एक भी कागज, शीशे की बोतल, प्लास्टिक, या रैपर नहीं दिखायी पड़ा। हमें हिन्दुस्तान के कई नेशनल पार्क में जाने का अवसर मिला है और वहां पर रैपर और प्लास्टिक को देखकर शर्म आती है।

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पार्क में दूसरी अच्छी बात यह थी कि उस पार्क में दो ऎसी जगह हैं जहां पर आप नाश्ता या खाना खा सकतें हैं और बाथरूम जा सकते हैं। पूरी जगह की सफाई देखने लायक थी। इसे देख कर मुझे अपने देश की व्यवस्था के बारे में शर्म आयी।

इस पार्क में मुझे एक बात और बहुत अच्छी लगी। इसमें जगह जगह सोलर पैनल (Solar panel) और हवा की चक्की (Wind mill) लगी थी । मैंने वहां इसका कारण पूछा तो हमें बताया गया,
'एक बार यहां पानी की कमी के कारण जानवर मरने लगे तब सरकार ने इन्हें लगाया। इससे बिजली पैदा कर पम्प चलाये जाते हैं जो जमीन से पानी निकाल कर पोखरों में जानवरों के लिये डालते हैं। जंगल के अन्दर बिजली के तार इसलिये नहीं लगे हैं कि उससे आग लगने का खतरा होता है। इनमें यह खतरा नहीं है।'

यह वीडियो, वर्ष २००४ में कुगर पार्क में पानी के पोखरे के पास भेंसे, शेर और मगरमच्छ के बीच, शौकिया लोगों के द्वारा खींचा गया है। यह बहुत ही रोचक है और शायद जानवरों के बारे में सबसे ज्यादा देखा गया विडियो है। मेरी चिट्ठी 'यह मेरी तरफ से आपको भेंट है' पर सुब्रमनयम जी की टिप्पणी इसी विडियो के बारे में है।


मुन्ने को जानवर पसन्द थे। इसलिये साल में एक बार हम लोग जंगलों में जाया करते थे पर यह जंगल, भारत के जंगलों से एकदम अलग है। भारत में जंगल बहुत घने होते हैं जब कि यह जंगल घना नहीं है। और इसमें झाड़िया हैं और जहाँ तक आपकी नजर जाती है वहां तक सब देख सकतें है। इसी कारण यहां पर ज्यादा जानवर दिखाई पड़ते हैं। हम लोगों ने इस पार्क में जितने भी जानवर देखे उतने जानवर भारत के सारे जंगलो में मिलकर नहीं देखे थे।

क्रुगर पार्क में प्रति व्यक्ति को प्रति दिन में १३२ रैंड फीस देनी पड़ती है। उसको देने के बाद, हम लोग पार्क के अन्दर गये। जहां, हमारे जंगल में गाइड, रॉड्रिक्स, हमारा इन्तजार कर रहे थे।

अगली बार, कुछ रॉड्रिक्स के बारे में।



अफ्रीकन सफारी: साउथ अफ्रीका की यात्रा
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