Wednesday, April 28, 2010

तू डाल डाल, मैं पात पात

यह चिट्ठी, साइबर अपराधों पर नयी श्रृंखला की भूमिका है।
इस चिट्ठी को, सुनने के लिये यहां चटका लगायें। यह पॉडकास्ट ogg फॉरमैट में है। यदि सुनने में मुश्किल हो तो दाहिने तरफ का विज़िट,
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फिल्म 'इंडिपेंडेन्स डे' से

Friday, April 23, 2010

'बुलबुल मारने पर दोष लगता है' श्रृंखला के नाम का चयन कैसे हुआ

'बुलबुल मारने पर दोष लगता है' श्रृंखला, 'To Kill A Mockingbird' उपन्यास के बारे में थी। इस श्रृंखला में चर्चा थी कि यह उपन्यास क्यों लिखा गया , इसकी क्या कहानी थी, इसकी क्या शिक्षा है। इस चिट्ठी में चर्चा है कि इसका श्रृंखला के नाम का चयन कैसे हुआ।

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मेरी बिमारी के समय मेरे बेटे और बिटिया रानी ने कुछ पुस्तकें पढ़ने के लिये भिजवायीं थीं। इनमें से एक पुस्तक  'हू द हेल इज़ ओ ॑-हारा'  (Who the Hell is O'Hara) है। इस पुस्तक में, दुनिया के ५० बेहतरीन लिखे उपन्यासों के बारे में लिखा है कि वे किस प्रकार से लिखे गये हैं। यह पुस्तक पढ़ने योग्य है।

इस पुस्तक में एक लेख 'टू किल अ मॉकिंगबर्ड' उपन्यास के बारे में था। इस उपन्यास को मैंने अपने बचपन में पढ़ा था तभी इस पर बनी फिल्म भी देखी थी। इसी को पढ़ते समय मुझे इस श्रृंखला को लिखने का विचार आया और इसकी रूप रेख बनायी। फिर सवाल उठा कि इस श्रृंखला का क्या नाम रखा जाय।

इस उपन्यास में एक वाक्य है।
'It is sin to kill a mockingbird'
मुझे लगा कि इस श्रृंखला का यही नाम होना चाहिये। अब सवाल उठा कि इसका उचित हिन्दी अनुवाद क्या होगा।

मॉकिंगबर्ड एक छोटी सी चिड़िया होती है। यह मुधर आवाज़ के लिये जानी जाती है। यह केवल अमेरिका में पायी जाती है। इसलिये इसका हिन्दीं में कोई नाम नहीं है। शास्त्री जी ने अनुवाद नहीं सुझाया पर कहा,
'Mockingbird is a harmless bird, but since it tends to sing after midnight, many are irritated and kill it. I have not seen a Hindi equivalent. Any saying that says we should not kill the innocent due to our personal annoyance will do. I have not come across any Hindi saying for that.'
मॉकिंगबर्ड निर्दोष चिड़िया होती है। यह आधी रात के बाद गाती है इसलिये लोग खिजाते हैं और मारते हैं। मुझे इसके बारे में हिन्दी में कहावत नजर नहीं आयी। लेकिन कोई भी कहावत जो यह कहती हो कि निर्दोष को मारना गलत है ठीक होगी।

अरविन्द जी ने सुझाया,
'सोन  चिरैया को मारने पर दोष लगता है।'
सोन चिरैया - चित्र विकिपीडीया से
सोन चिरैया या Indian bustard एक बड़ी चिड़िया है और अपनी सुंदरता के लिये जानी जाती है अपनी मधुर आवाज़ या गाने के लिये नहीं। यह लुप्त हो रही है यदि हमने इसे रोका नहीं तो यह हमेशा के लिये गायब हो जायगी। 

मुझे सुनने में यह शीर्षक अच्छा लगा। लेकिन इस उपन्यास में मॉकिंगबर्ड  गाने वाली छोटी चिड़िया है और निर्दोषता का प्रतीक है। मैं  किसी छोटी गाने वाली चिड़िया का ही नाम रखना चाहता था। मेरे परिवार वालों ने कोयल, मैना, शमा नाम सुझाया पर मुझे में बुलबुल नाम ठीक लगा। 

बुलबुल एक छोटी गाने वाली चिड़िया है जो निर्दोष है और अपने देश में जानी जाती है। इसकी प्यारी आवाज यहां सुन सकते हैं। यह मेरे घर में बहुत आती है। अब सवाल उठा कि शीर्षक क्या होना चाहिये। 

मेरी पत्नी शुभा ने कुछ अन्य शीर्षक सुझाये,

बुलबुल हत्या, पाप है।
बुलबुल हत्यारा दोषी है।
बुलबुल मारना, पाप है
बुलबुल को मारना पाप है

अन्त में मुझे अरविन्द जी का शीर्षक ही पसन्द आया। बस सोन चिरैया की जगह बुलबुल कर दिया और 'को' शब्द गायब कर दिया - मिल गया इस श्रंखला का शीर्षक, 'बुलबुल मारने पर दोष लगता है'।  

अभी कुछ कम समझ में आ रहा है और समय की भी कमी लगती है। देखिये कब कोई नयी श्रृंखला शुरू कर पाता हूं।

इस श्रृंखला की पिछली कड़ियां नीचे चटका लगा कर पढ़ें। यदि उस कड़ी को सुनना चाहें तब उस कड़ी के आगे लगे ► चिन्ह पर चटका लगायें। यह पॉडकास्ट ogg फॉरमैट में है। यदि सुनने में मुश्किल हो तो दाहिने तरफ का विज़िट, 'मेरे पॉडकास्ट बकबक पर नयी प्रविष्टियां, इसकी फीड, और इसे कैसे सुने' देखें।

भूमिका: ।। वकीलों की सबसे बेहतरीन जीवनी - कोर्टरूम: ।। सफल वकील, मुकदमा शुरू होने के पहले, सारे पहलू सोच लेते हैं: ।। कैमल सिगरेट के पैकेट पर, आदमी कहां है: ।। अश्वेत लड़कों ने हमारे साथ बलात्कार किया है: ।। जुरी चिट्ठे में जालसाज़ी की गयी है: ।। क्या 'टु किल अ मॉकिंगबर्ड'  हर्पर ली की जीवनी है: ।। बचपन के दिन भी क्या दिन थे: ।।
पुनः लेख - 'बुलबुल मारने पर दोष लगता है' श्रृंखला के नाम का चयन कैसे हुआ: ।।








About this post in Hindi-Roman and English 'bulbul maarne per dosh lagtaa hai' shrankhlaa ‘To kill a mockingbird’ upnyaas ke baare mein thee. is chtthi mein chachaa hai ki is shrnkhlaa ka naam kaise para. yeh {devanaagaree script (lipi)} me hai. ise aap roman ya kisee aur bhaarateey lipi me padh sakate hain. isake liye daahine taraf, oopar ke widget ko dekhen.

The series 'Bulbul maarne per dosh lataa hai' was about the novel ‘To Kill a Mockingbird’. This post explains why this series was so named. It is in Hindi (Devnagri script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.


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Friday, April 16, 2010

छोटे बांध बनाना, बड़े बांध बनाने से ज्यादा अच्छा है

इस चिट्ठी में शिमला से मनाली के रास्ते की चर्चा है।

हम लोग सुबह -७ बजे शिमला से मनाली के लिए चले। कार से यह दूरी लगभग -७ घंटे में पूरी होती है। 

लगभग ४० साल पहले मैं, अपने विद्यार्थी जीवन में दोस्तों के साथ मनाली गया था। बहुत सारी यादें, ताजी हो गयी। मुझे याद है कि जब हम पिछली बार  जा रहे थे तब एक जगह एक फिल्म की शूटिंग हो रही थी। जिसमे जॉनी वॉकर और मुमताज थे। मुमताज किसी गाने पर नाच रहीं थी। जॉनी वॉकर हास्य भूमिका के लिए जाने जाते है। लेकिन वहां पर  बहुत गम्भीर किस्म के व्यक्ति लगे।

पिछली बार मनाली जाते समय रास्ते में कोई भी सुरंग नही थी पर इस बार,   थलोट और आउट के बीच लारज़ी ट्रैफिक सुरंग (Larji Traffic Tunnel) मिली यह २००४ में बनी थी और २.६ किमी लम्बी है। पवन के अनुसार, इस सुरंग बनने के कारण १५ किमी रास्ते में कमी हो गयी है।


शिमला से जाते समय थलोट के कुछ पहले, व्यास नदी के दूसरी तरफ, एक  छोटा सा बिजली की परियोजना बन रही है। जिसमें पहाड़ी के दूसरी तरफ बांध बनेगा।  बांध के बाद, पानी पाइप के द्वारा नीचे लाया जायेगा। यहां पर  १.५ मेगावाट बिजली बनेगी। पाइप लाइन तो बिछ गयी है पर बांध अभी तैयार नहीं हुआ है। अभी एक साल और लगेगा। 

यहीं पर पहाड़ी से गिरता हुआ झरना भी है। जिसे देखकर बहुत अच्छा लगा।

आउट पर एक पानी का बांध बना हुआ है। वहां एक सुरंग के द्वारा व्यास नदी का पानी, अंदर ले जाया जाता है और यह पानी थलोट जहां पर यह सुरंग खत्म होती है वहां पर बाहर निकलता है। इस जगह पर एक बिजली की परियोजना भी है। जहां १२६ मेगावाट बिजली बनायी जाती है।

हिमाचल में जगह जगह छोटे छोटे बांध बनाये जा रहे हैं। छोटे बांध बनाना बड़े बांध बनाने से ज्यादा अच्छा है। बड़े बांध से लोग, जानवर विस्थापित होते है।  इन्हे पुन: स्थापित करना, अपने में बहुत बड़ी चुनौती है। जहां जहां बहुत बड़े बांध बन रहें हैं वहां इन विस्थापित लोगों को पुन: स्थापित करने में मुश्किल हो रही है। इसके अतिरिक्त इसका पर्यावरण पर भी असर होता है। पेड़, जंगल समाप्त हो जाते हैं। यह पर्यावरण के लिये कभी भी अच्छा नहीं होता है। इसलिए हमेशा छोटे बांध बनाना ही अच्छी बात है। मुझे, इस तरह का अनुभव, सिक्किम यात्रा के दौरान भी हुआ। जिसका जिक्र मैंने अपनी चिट्ठी 'टिस्ता नदी (सिक्किम) पर बांध बने अथवा नहीं' में किया है।


हम लोग दोपहर ३ बजे मनाली पहुंचे। अगली बार मनाली के बारे में। 



देव भूमि, हिमाचल की यात्रा
वह सफेद चमकीला कुर्ता और चूड़ीदार पहने थी।। यह तो धोखा देने की बात हुई।। पाडंवों ने अज्ञातवास पिंजौर में बिताया।। अखबारों में लेख निकले, उसके बाद सरकार जागी।। जहां हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के बंटवारे की बात हुई हो, वहां मीटिंग नहीं करेंगे।। बात करनी होगी और चित्र खिंचवाना होगा - अजीब शर्त है।। हनुमान जी ने दी मजाक बनाने की सजा।। छोटे बांध बनाना, बड़े बांध बनाने से ज्यादा अच्छा है।। आप, क्यों नहीं, इसके बाल खींच कर देखते।।

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This post is talks about our experience from Shimla to Manali. It is in Hindi (Devnagri script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.

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Friday, April 09, 2010

हनुमान जी ने दी मजाक बनाने की सजा

इस श्रृंखला की पिछली चिट्ठी में हनुमान जी से मिलवाने की बात की थी। इस चिट्ठी में उनसे मुलाकात और शिमला के जाखू पर्वत पर हनुमान जी के मन्दिर की चर्चा है।

इस मन्दिर की कथा कुछ इस प्रकार है कि जब लक्ष्मण जी को मेघनाथ की शक्ति लगी तब हनुमान जी संजीवनी बूटी लाने के लिए निकले। जब वे जाखू पर्वत पर पहूंचे, तो वहां पर  तपस्या कर रहे  ऋषि ने  बताया कि संजीवनी बूटी  किस प्रकार की है और कहां  मिलेगी।
चित्र शिमला के पर्यटन विभाग की वेबसाइट के सौजन्य से

हनुमान जी के बहुत सारे अन्य साथी भी थे।  वे थके हुये थे और  सो गये। हनुमान जी जल्दी में थे। इसलिए वे तुरन्त आगे की ओर निकल गये। उनके  साथी वहीं छूट गये। इस मंदिर में बंदरों की बहुत बड़ी संख्या है। कथा के अनुसार वे हनुमान जी के वही साथी ही हैं जो  वहां पर छूट गये थे।

हनुमान जी लौटते समय इस पर्वत पर नहीं आये और छोटे मार्ग से लक्ष्मण जी के पास पहुंच गये। इस पर ऋषि  व्याकुल हो गये तब हनुमान जी ने प्रकट होकर न रुकने का कारण बताया। उनके अन्तर ध्यान  होते ही वहां पर एक मूर्ती प्रकट हो गयी जो कि  वहीं पर स्थापित है।  पंडित जी ने मुझे कुछ प्रसाद दिया। बाहर लिखा हुआ था कि बन्दरों को प्रसाद  बानर राज जगह में ही दें। मैंने वहीं जाकर बन्दरों में प्रसाद बांटा।

अधिकतर लोग, वहां पर डंडा लिये हुये थे। यह डंडा पांच रूपया किराया देकर  मिलता है। यह बंदर को डराने के लिये है ताकि वे पास न आयें। वहां पर  कुछ युवक और युवतिया भी थीं। युवक के पास डंडा था मैंने कहा, 

'क्या तुम्हे मालुम नहीं कि बंदर लोग उन्ही के पास आते हैं जिनके पास डंडा रहता है।'
उसने पूछा ऎसा क्यों है। मैंने कहा, 
''वे समझते हैं कि वह मदारी है और वे मदारी के पास ही पहुंचते हैं।'
उसके साथ की युवतियां हंस कर उसे मदारी कह कर चिढ़ाने लगीं। लेकिन किसी का मजाक बनाना अच्छा नहीं। मुझे इसकी सजा मिली। लगता है हनुमान जी ने स्वयं आकर यह सजा दी।
१९वीं शताब्दि में जाखू मन्दिर - चित्र विकिपीडिया से

मै जब नीचे आ रहा था तो मेरे पास सामने से एक बडा सा बंदर आ गया मुझे लगा कि इसको डांटना या झगड़ा करना व्यर्थ है। कहीं वह मुझे काट न ले। मैं उसी जगह खडा हो गया। मैं  कैमरा कार में ही छोड़ गया था। क्योंकि  लोगो ने बताया था कि हो सकता है कि बंदर आपका कैमरा छीन ले। मुझे लगा कि यदि कैमरा छीन कर फेंक देगा तो वह टूट जायेगा। मेरे पास कैमरा तो नहीं पर चश्मा और पर्स था।  इस कारण मेरी जेब कुछ फूली हुई थी। बंदर ने बहुत सावधानी से मेरी जेब में हाथ डाला।  शायद प्रसाद ढूंढ रहा था। लेकिन वह तो पहले ही बन्दरों को दे दिया गया था। उसने जेब से मेरा पर्स निकाल लिया और उसे  अंदर खोलकर देखने लगा कि उसमें क्या है। वह पर्स को मुंह में दबाकर  दूर बैठकर मेरी तरफ देखने लगा। जैसे कि  कह रहा हो, 
'जब तक मुझे प्रसाद नहीं मिलेगा तब तक पर्स नहीं दूंगा।'
मेरी पत्नी  शुभा नीचे जाकर कुछ प्रसाद खरीद कर ले आयी। उसने प्रसाद को एक जगह पर रख दिया।  उस बंदर ने प्रसाद ले लिया और पर्स वहीं छोड़ दिया जैसे कि कह रहा हो,
'मैं तो यहीं चाहता था।'
क्या मालूम, शायद हनुमान जी स्वयं बताना चाह रहें हो कि आगे से किसी का मजाक मत बनाना, नहीं तो कड़ी सजा दूंगा। मैंने  अपने रुपयों को उठा कर  पर्स में रखा और नीचे चला आया। 

अगली बार चलेंगे मनाली

देव भूमि, हिमाचल की यात्रा
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This post is Jakhoo temple in Shimla. It is in Hindi (Devnagri script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.

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Friday, April 02, 2010

हम न मानेंगे, हमारे मूरिसान लंगूर थे

इस चिट्ठी में चर्चा है कि, हिन्दुओं में विकासवाद का क्यों नहीं विरोध हुआ, और क्या भगवान विष्णु का वामन अवतार होमो फ्लॉरेसिएन्सिस (जिसके अस्थि पंजर इंडोनीशिया में मिले हैं) से प्रेरित है।
इस चिट्ठी को, सुनने के लिये यहां चटका लगायें। यह पॉडकास्ट ogg फॉरमैट में है। यदि सुनने में मुश्किल हो तो दाहिने तरफ का विज़िट,
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पाश्चात्य देशों में, डार्विन के विकासवाद का विरोध हुआ। अमेरिका में यह अब भी जारी है। हिन्दुओं में यह विरोध नहीं हुआ। ऐसा क्यों है? 

मुझे लगता है कि हिन्दूओं में सृष्टि रचना के बारे में कई विचारधारायें हैं। इनके बारे में, मैंने अपनी चिट्ठियों में लिखा है। इन कहानियों में, एक में तो सृजनवाद है पर किसी और में नहीं - शायद यही कारण हो कि हिन्दुओं में डार्विन के विकासवाद का विरोध नही हुआ। इस बारे में जब मैंने विस्तार से जानना चाहा तो कुछ यह पता चला।
पतञ्जलि योग पीठ में, ऋषि पतञ्जलि की प्रतिमा चित्र विकिपीडिया से


मेरे पिता के अनुसार, पतञ्जलि का योग दर्शन कुछ और नहीं पर डार्विन का विकासवाद है। विकिपीडिया में कुछ भी कुछ इस तरह के भी विचार हैं कि स्वामी विवेकानन्द ने, पतञ्जलि  के योगसूत्र पर लिखते हुऐ कहा है कि अद्वैत वेदान्त का विकासवाद, डार्विन के विकासवाद के सिद्धान्त के अनुरूप है। भारतीय दर्शन या पतञ्जलि  का योग दर्शन मैंने नहीं पढ़ा है। इसे  पढ़ने का प्रयत्न किया। लेकिन मुझे यह मुश्किल लगा। मुझे अच्छा लगेगा यदि दीपक भारतीय जी, या कोई अन्य चिट्टाकार बन्धु इसकी आसान शब्दों में व्याख्या कर, लिखे।

एक अन्य विचारधारा के अनुसार, सृजनवाद पढ़ाना और डार्विन का विरोध - ईसायित से जुड़ गया है। इसका विरोध ईसायित का समर्थन समझा जाने लगा। इसलिये और धर्मों में, डार्विन के विकासवाद का विरोध नहीं के बराबर हुआ।

अरविन्द मिश्र जी ने मेरा ध्यान, जवाहर लाल नेहरू की पुस्तक 'द डिस्कवरी ऑफ इंडिया' (The Discovery of India published by Oxford University Press) पर दिलाया। इसके पेज ११६ पर नेहरू जी लिखते हैं,
'Nevertheless the Old Indians, unlike the other ancient nations, had vast conceptions of time and space. They thought in a big way. Even their mythology deals with ages of hundreds of millions of years. To them the vast periods of modern geology or the astronomical distances of the stars would not have come as surprise. Because of this background, Darwin's and other similar theories could not create in India the turmoil and inner conflict which they produced in Europe. The popular mind in Europe was used to a time scale which did not go beyond a few thousand years.'
प्राचीन भारतीय, अन्य देशों की तरह से नहीं थे। उन्हें दूरी एवं यगान्तर का ज्ञान था। वे बड़ी तरह से सोचते थे। हमारे पुराण खरबों साल की बात करते हैं। हमें भूगर्भशास्त्र में लम्बे समय के कालचक्र या तारों की दूरी से, कोई आश्चर्य नहीं हुआ। यही कारण है कि डार्विन के या इस तरह के अन्य सिद्धान्त ने उस तरह की मुश्किल नहीं खड़ी की, जैसा युरोप में हुआ। युरोप के लोगों के दिमाग में,  इतने बड़े समय का विचार ही नहीं था। वे केवल कुछ हज़ार साल के बारे में सोचते थे।
इस श्रंखला की तीन चिट्ठियां हिन्दूओं में सृष्टि रचना के बारे में यहां, यहां, और यहां लिखी हैं। इन चिट्ठियों और इस चिट्ठी पर अशोक पाण्डेय जी, दीपक भारतीय जी, ने इस तरफ इशारा किया है।


कुछ समय पहले यात्रा करते समय एक ज्ञानी जन से मुलाकात हुई। उनसे इस विषय पर चर्चा होने लगी। उन्होंने बताया कि पुराणों में भगवान के २४ अवतारों का वर्णन है। इसमें भगवान विष्णु के १० अवतार मुख्य हैं यह दस कुछ इस तरह से हैं
  1. मत्स्य (मछली) पानी में रहने वाले जीव;
  2. कच्छप kchchhp  (कछुआ) उभयचर जन्तुओं की उत्पत्ति; 
  3. वाराह Varaah (सुअर) – जमीन के जानवरों की उत्पत्ति;
  4. नृसिंह Narasingh – आधे मानव;
  5. वामन – बौने मानव; 
  6. परशुराम – पूर्ण विकसित मानव;
  7. राम Rama – मानव, शस्त्रों के साथ;
  8. कृष्ण – मानव, संगीत के साथ;
  9. गौतम बुद्ध Budhha – शांति और करुणा का प्रतीक;
  10. कल्कि Kalki शायद यह ८४ हज़ार साल बाद आना है। इसी के साथ कलियुग की समाप्ति है और एक चक्र पूरा होगा।
यह वही क्रम है जो डार्विन के विकासवाद में, जीवों की उत्पत्ति का क्रम है। उन सज्जन के मुताबिक डार्विन के विकासवाद का विरोध इसी कारण नहीं हुआ क्योंकि इसे हमारे पुराणों में, इसे पहले से ही बताया गया है। 

इन दस अवतारों में तीसरे के बारे में कछ बहस है। कुछ का कहना है कि वाराह अवतार तीसरा न होकर पहला है। जो इसे पहला अवतार कहते हैं वे इसे पृथ्वी की रचना से जोड़ते हैं न कि जमीन के जानवरों की उत्पत्ति से।

कुछ दिन पहले, मैंने  साइंटिफिक अमेरिकन के नवंबर २००९ के अंक में 'Rethinking "Hobbits": What They Mean for Human Evolution' नामक एक लेख पढ़ा।

'उन्मुक्त जी, क्या इस लेख का संबन्ध, भगवान विष्णु के १० अवतारों से है?'
शायद, मेरे भाई, मेरी बहना इतनी जल्दी में क्यों रहते हैं। कुछ तो इंतज़ार करिये।

सन २००४ में, इंडोनीशिया के लॅसर सुन्दा द्वीप समूह के फलॉरस्  द्वीप की, लिएंग बुआ गुफा में  कुछ अस्थि पंजर मिले थे। साइंटिफिक अमेरिकन  का उक्त लेख, उन्हीं के बारे में था। इस अस्थिपंजर को, इस गुफा के नाम पर, एलबी१ (LB1) का नाम दिया गया। यह अस्थिपंजर, हजारों साल पहले के लुप्त मानव के हैं।  चूंकि यह फलॉरस् द्वीप पर मिलें हैं। इसलिये इनका वैज्ञानिक नाम होमो फ्लॉरेसिएन्सिस रखा गया। लेकिन इनका लोकप्रिय नाम, यह नहीं है। इन्हें जेआरआर टोकियन  के लोकप्रिय उपन्यासों के मानव,  हॉबिट के नाम से जाना जाता है। क्या आपको मालुम है कि ऐसा क्यों है? 

होमो फ्लॉरेसिएन्सिस एवं मानव कपाल - चित्र पीटर बॉउन/ न्यू इंगलैंड विश्विदयालय के सौजन्य से

टोकियन ने, हॉबिटों के बारे में चर्चा, सबसे पहले बच्चों के लिये लिखे उपन्यास 'द हॉबिट'  में की थी। इसके बाद इनकी चर्चा, लॉर्ड ऑफ रिंगस् की तीन पुस्तकों (Triolgy) में की। यह ऐसी सभ्यता है, जिसमें बौने (तीन से चार फीट के बीच) रहा करते हैं। इन बौनो को, उन्होंने  हॉबिट (Hobbit) कहा। इंडोनीशिया में मिले होमो फ्लॉरेसिएन्सिस  के अस्थिपंजर यह बताते हैं कि यह भी बौने थे और उनकी लम्बाई तीन से चार फीट के बीच थी। इसलिये इनका लोकप्रिय नाम हॉबिट है। क्या यह आपको किसी और की याद दिलाते हैं?

भगवान विष्णु, वामनअवतार में राजा बालि से तीन कदम जमीन मांगते हुऐ चित्र विकिपीडिया के सौजन्य से

क्या आपको इनका संबन्ध हिन्दू धर्म से लगता है? क्या भगवान विष्णु का चौथा अवतार होमो फ्लॉरेसिएन्सिस से प्रेरित था? क्या भगवान के विष्णु के अवतार,  डार्विन के विकासवाद को नहीं बताते हैं? मैं कह नहीं सकता, कुछ उलझन में फंस गया हूं।

चलते चलते, एक दिन मित्र मंडली के साथ डार्विन पर चर्चा हो रही थी। मेरे शायर दोस्त ने, अकबर इलाहाबादी का यह शेर सुनाया,
हज़रते डार्विन, हकीकत से बहुत दूर थे।
हम न मानेंगे, हमारे मूरिसान [पूर्वज] लंगूर थे।
यह श्रंखला तो पहले समाप्त हो गयी थी यह तो केवल पुनः लेख था। कोशिश करता हूं कि किसी नयी श्रृंखला के साथ मुलाकात करूं। लेकिन समय आभाव के कारण कुछ मुश्किल लग रहा है।


क्या आपने कभी विकासवाद क्यों सही है और सृजनवाद गलत इस बात को रैप नृत्य के साथ देखा है। नहीं न तो यहां इसका मजा लें।



डार्विन, विकासवाद, और मज़हबी रोड़े 
भूमिका।। डार्विन की समुद्र यात्रा।। डार्विन का विश्वास, बाईबिल से, क्यों डगमगाया।। सेब, गेहूं खाने की सजा।। भगवान, हमारे सपने हैं।। ब्रह्मा के दो भाग: आधे से पुरूष और आधे से स्त्री।। सृष्टि के कर्ता-धर्ता को भी नहीं मालुम इसकी शुरुवात का रहस्य।। मुझे फिर कभी ग़ुलाम देश में न जाना पड़े।। ऐसे व्यक्ति की जगह, बन्दरों से रिश्ता बेहतर है।। विकासवाद उष्मागति के दूसरे नियम का उल्लंघन करता है।। समय की चाल - व्यवस्था से, अव्यवस्था की ओर।। मैंने उसे थूकते हुऐ देखा है।। यदि विकासवाद जीतता है तो इसाइयत बाहर हो जायगी।। विकासवाद पढ़ाना मना करना, मज़हबी निष्पक्षता का प्रतीक नहीं।। सृजनवाद धार्मिक मत है विज्ञान नहीं है।। 'इंटेलिजेन्ट डिज़ाईन' - सृजनवादियों का नया पैंतरा।। यू हैव किल्ड गॉड, सर।। हम न मानेंगे, हमारे मूरिसान लंगूर थे।।

इस चिट्ठी का पहला एवं आखरी चित्र - विकीपीडिया के सौजन्य से

About this post in Hindi-Roman and English
is chitthi mein charcha hai ki, hinduon mein vikasvaad ka kyon nahee virodh hua, aur kyaa bhagwan vishnu ka vaman avtar, homo floresiensis (jiske asthi panjar indonesia mein mile) se prerit hai. yeh {devanaagaree script (lipi)} me hai. ise aap roman ya kisee aur bhaarateey lipi me padh sakate hain. isake liye daahine taraf, oopar ke widget ko dekhen.

This post talks about why there was no opposition of evolution among Hindus and was Vaman reincarnation of Vishu inspired by homo floresiensis, whose skeleton was found in Indonesia. It is in Hindi (Devanagari script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.


सांकेतिक चिन्ह
Hindi,।
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