Wednesday, May 31, 2006

रिचर्ड फिलिप्स फाइनमेन-२

मैने पिछली बार चर्चा की थी कि मै कैसे फाइनमेन के संसार से आबरू हुआ| इस बार कुछ उनके बचपन के बारे मे
रिचर्ड फिलिप्स फाइनमेन, का जन्म ११ मई १९१८ में हुआ था और मृत्यु १९८८ में कैंसर से हो गयी। छुटपन में फाइनमेन अक्सर सोचा करते थे कि वह बडे होकर क्या बनें: विदूषक (Comedian), या वैज्ञानिक। बडे होकर उन्होंने इन दोनो रोलो को एक साथ बाखूबी निभाया| लोग कहते हैं कि वह इतने मशहूर क्यों हुये पर उनके बारे में वैज्ञानिक ठीक ही कहते हैं:
' फाइनमेन तो ऐतिहासिक व्यक्ति हैं उनको जितना सम्मान मिला वे उस सब के अधिकारी हैं ।'

फाइनमेन के पिता का बातों को बताने का अपना ही ढंग था| एक बार का किस्सा है कि पिता और पुत्र पार्क मे घूम रहे थे पिता ने एक चिड़िया की तरफ वह इशारा करके बताया कि यह चिड़िया दुनिया में अलग-अलग नामो से जानी जाती है। यह जरूरी नहीं है कि आप उन सब नामो को जाने, न ही महत्वपूर्ण है। पर महत्वपूर्ण यह है कि वह क्या और कैसे करती है। वे बच्चे के मन मे जिज्ञासा जगाने की कोशिश करते थे यह बताने की जरूरत नहीं है कि फाइनमेन बचपन से जिज्ञासु तथा कुतुहली थे।

फाइनमेन के पिता को आजकल के टीवी के क्विज प्रोग्रामो जैसे 'कौन बनेगा करोड़पति' से तुलना करें कितना अन्तर पायेंगे। इस तरह के क्विज प्रोग्राम तो केवल यह बताते हैं कि कौन कितना रट सकता है। आज के क्विज प्रोग्रामो से यह पता नहीं चलता कि कौन कितना अच्छा सोच सकता है, किसमे कितना बूता है और कौन विज्ञान की दुनिया को बदलने की ताकत रखता है|

फाइनमेन बचपन के दिनों में रेडियों ठीक किया करते थे| उस समय वाल्व रेडियो हुआ करते थे| उनके पड़ोसी का रेडियो में शुरू होने के थोड़ी देर बाद खरखराने लगता था| उसने फाइनमेन से रेडिये ठीक करने के लिये कहा| फाइनमेन रेडियो को छूने के बजाय वही बैठ कर सोचने लगे| उन्हे लगा कि गर्म होने पर बिजली का अवरोध बढ जाता है जिससे खरखराहट बढ जाती है और दो वाल्वों को एक दूसरे से बदलने में यह दूर हो सकती है| उसने ऐसे ही किया और खरखराहट बन्द हो गयी और तभी से कई लोग उन्हे उस लड़के की तरह से याद रखते हैं जो केवल सोच कर रेडियो ठीक किया करता था।

स्कूल में वह गणित में सबसे अच्छे और गणित टीम के हीरो थे| पर उन्होंने गणित को छोड़ दिया उन्हे लगा कि गणित मे उच्च शिक्षा प्राप्त करके वे दूसरों को गणित पढ़ाने के अलावा और कुछ नहीं कर सकते। वह कुछ व्यवहारिक करने का सोच कर, पहले इलेक्ट्रिकल इन्जीनियरिंग की तरफ गये पर बाद में भौतिक शास्त्र की पढ़ाई की| शायद यही ठीक था| यह बीसवीं शताब्दी थी: भौतिक शास्त्रियों की शताब्दी| इस शताब्दी मे यदि कोई विज्ञान की दुनिया को बदलने का दम रखता था तो भौतिक शास्त्र ही उसका विषय था| यह उसी तरह से जैसे इक्कीसवीं शताब्दी जीव शास्त्रियों की शताब्दी है। चलिये हम वापस फाइनमेन पर चलें और अगली बार कुछ युवा फाइनमेन के बारे मे बात करेंगे।

Tuesday, May 30, 2006

रिचर्ड फिलिप्स फाइनमेन-१

रिचर्ड फिलिप्स फाइनमेन बीसवीं शताब्दी के महानतम वैज्ञानिकों में से एक थे। इस चिट्ठी में चर्चा है कि मैंने कैसे उनके बारे में जाना। 

 लाल बाईंडिंग में, प्रसिद्ध पुस्तकें

Monday, May 29, 2006

अधूरे सपने

मैने विज्ञान से स्नातक की डिग्री लेने के बाद, विज्ञान की उच्च शिक्षा के लिये, कसबे से बाहर प्रवेश लिया| सब तय भी कर लिया पर फिर पिता के कहने पर नहीं गया; लगभग ४० वर्षों से फाईलों को इधर से उधर कर रहा हूं| मन आया कुछ नया करूं - ब्लौगिंग करने की सोची: पर हिन्दी मे करूं या अंग्रेजी मे|

भारत सरकार ने कुछ समय पहले Unicode font प्रकाशित की, लगा कि हिन्दी में ब्लौगिंग की जा सकती है लगभग तीन महीने पहले हिन्दी मे ब्लौग करना शुरू किया| उस समय मैं हिन्दी चिठ्ठों के संसार से अनभिज्ञ था| मुझे नहीं मालुम था कि यह कैसी लिखी जाय फिर कुछ कोशिश और गलतियों के साथ हिन्दी मे ब्लौगिंग शुरू कर दी| कुछ समय बाद सर्वज्ञ और नारद का पता चला और नारद के द्वारा अन्य चिठ्ठेकारों का| कुछ दिनो बाद सब कुछ समान्य, पहले जैसा|

फिर एक दिन सुनीलजी ने अपने चिठ्ठे पर बचपन के सपने नाम की चिठ्ठी पोस्ट की| मालुम नहीं कि क्या हो गया: कितनी यादें, कितनी बातें - वापस आकर मन को कचोटने लगीं| कितना समय बिताया बीते हुऐ समय को याद करने मे| पर समय तो किसी की प्रतीक्षा नहीं करता वह तो वापस आयेगा नहीं, पर पुरानी बातों की यादों मे खोने के बाद लगा कि उन लोगों के बारे मे लिखूं जिनसे प्रेणना लेकर सपने देखे थे| क्या हुआ यदि मेरे सपने अधूरे रह गये, वे लोग तो अब भी प्रेणना के सोत्र हैं|

इन लोगों मे से कुछ तो मेरे परिवार के सदस्य हैं जिन्हे न तो आप जानते हैं न जानने मे दिलच्सपी रखते हैं पर ऐसे भी कुछ हैं जो कि जानी-मानी हस्ती हैं और आपने उनका नाम सुना होगा यदि नहीं तो शायद सुनना चाहिये उन्ही मे से कुछ के बारे मे बात करते हैं| शायद कोई इन चिठ्ठियों को, कहीं, कभी पढ़े और वह अपने सपने पूरे करने की ठान ले| उसे इतनी हिम्मत मिले कि वह मेरे जैसा कमजोर होकर केवल फाईल पलटने वाला न बन जाय| वह अपने सपने पूरे कर सके|

मै सबसे पहले बात करना चाहूंगा, १९६६ के नोबेल परुस्कार से स्म्मानित भौतिक शास्त्री रिचर्ड फिलिप्स फाइनमेन के बारे मे, जो कि बहुत समय कैलिफोर्निया इं‍स्टिट्यूट आफ टेक्नोलोजी (कैल-टेक) मे रहे और डिक के नाम से जाने जाते थे| मै उनसे कब और कैसे आबरू हुआ यह अगली बार|

Saturday, May 27, 2006

सृष्टि का अन्त: नारद जी की छड़ी और शतरंज का जादू

इस विषय की पहली पोस्ट पर हम लोगों ने इस पर चर्चा करने का क्रम तय किया था और दूसरी पोस्ट पर मार्टिन गार्डनर की पुस्तकों के अलावा पहेलियों कि अन्य अच्छी पुस्तकों के बारे मे बात की। तीसरी पोस्ट पर शतरंज के जादू के बारे मे बात चीत की और इस बार देखते हैं कि सृष्टि का अन्त कब होगा।

गुणाकर मुले अपनी किताब मे सृष्टि का अन्त की कथा का वर्णन कुछ इस तरह से करते हैं। यह उन्ही के शब्दों मे,


सृष्टि का अन्त
कथा बहुत प्राचीन है । उस समय काशी में एक विशाल मन्दिर था । कहा जाता है कि ब्रम्हा ने जब इस संसार की रचना की, उसने इस मंदिर में हीरे की बनी हुई तीन छड़ें रखी और फिर इनमें से एक में छेद वाली सोने की ६४ तश्तरियां रखीं सबसे बड़ी सबसे नीचे और सबसे बड़ी सबसे ऊपर। फिर ब्रह्मा ने वहां पर एक पुजारी को नियुक्त किया। उसका काम था कि वह एक छड की तश्तरियां दूसरी छड़ में डालता जाए। इस काम के लिए वह तीसरी छड़ का सहारा ले सकता था परन्तु दो नियमों का पालन जरूरी था,
  • पुजारी एक समय केवल एक ही तश्तरी उठा सकता था; और 
  • छोटी तश्तरी के उपर बडी तश्तरी नहीं रखी जा सकती थी। 
इस विधि से जब सभी ६४ तश्तरियां एक छड से दूसरी छड़ में पहुंच जाएंगी, सृष्टि का अन्त हो जाएगा।

'उन्मुक्त जी, आप भी अच्छा मजाक कर लेते हैं। तब तो सृष्टि का अन्त हो जाना चाहिए था। ६४ तश्तरियों को एक छड़ से दूसरी छड़ में स्थानान्तरित करने में समय ही कितना लगता है!'

नहीं, यह 'ब्रह्म-कार्य' इतनी शीघ्र समाप्त नहीं हो सकता। मान लीजिए कि एक तश्तरी के बदलने में एक सेकेंड का समय लगता है। इसके माने यह हुआ कि एक घंटे में आप ३६०० तश्तरियां बदल लेंगे। इसी प्रकार एक दिन में आप लगभग १००,००० तश्तरियों और १० दिन में लगभग १,०००,००० तश्तरियां बदल लेंगे।

आप तो सोचते होंगे, 

'इतने परिवर्तनो में तो ६४ तश्तरियां निश्चित रूप से एक छड़ से दूसरी छड़ में पहुंच जाएगीं' 
लेकिन आपका अनुमान गलत है। उपरोक्त 'ब्रह्म-नियम' के अनुसार ६४ तश्‍तरियों को बदलने में पुजारी महाशय को कम से कम ५००,०००,०००,००० वर्ष लगेंगे।

इस बात पर शायद यकायक आप विश्वास न करें । परन्तु गणित के हिसाब से कुल परिवर्तनों की संख्या होती है, (२^६४)-१ अर्थात १८,४४६,७४४,०७३,७०९,५५१,६१५

आपने गौर किया कि यह वही नम्बर है जितने गेहूं के दाने राजा को देने थे। इसका हल भी गुणाकर मुले कि किताब मे है पर उसमे मुझे मजा नहीं आया। मै चाहूंगा कि हमारे चिठ्ठेकारों मे कोई इसके जवाब को तर्कसंगत ढ़ंग से रखे। अगली बार चर्चा करेंगे नारद जी की छड़ी पहेली के अन्य रूप।


नारद जी की छड़ी और शतरंज का जादू 

Friday, May 26, 2006

५. लिनेक्स: अन्य लम्बित मुकदमे

हम लोग लिनेक्स की यूनिक्स से यात्रा, इसके करनल, डिस्ट्रीब्यूशन, डेस्कटौप का प्रयोजन, यूनिक्स पर चले मुकदमे, आई.बी.एम. पर चले रहे मुकदमे के बारे मे जिक्र कर चुके हैं| आज लिनेक्स के कारण अन्य मुकदमो के बारे मे| इस तरह के मुख्यत: चार और मुकदमे चल रहें हैं|

१: यह स्पष्ट नहीं है कि नौवल ने एस.सी.ओ. को क्या बेचा क्योंकि नौवल के अनुसार उसने एस.सी.ओ. को यूनिक्स के बौद्धिक सम्पदा अधिकार नहीं बेचे हैं। उसने एस.सी.ओ. को केवल यूनिक्स का विकास करने तथा दूसरे को लाइसेंस देने का अधिकार दिया था। इस पर एस. सी. ओ. ने एक मुकदमा नौवल पर चलाया है कि,
  • नौवल गलत कह रहा है कि एस.सी.ओ. यूनिक्स के बौद्धिक सम्‍पदा अधिकार का मालिक नहीं है;
  • नौवल का यह कहना कि नौवल यूनिक्स के बौद्धिक सम्पदा अधिकारों का मालिक है एस.सी.ओ. के व्यापार में रूकावट डाल रहा है उसे रोका जाय;
  • इस बात कि घोषणा की जाय कि एस.सी.ओ. यूनिक्स के बौद्धिक सम्पपदा अधिकार का मालिक है न कि नौवल;
  • उसे नौवल से हर्जाना दिलवाया जाय|

२-३: एस.सी.ओ. ने १५०० कम्पनियों को नोटिस भेजा है कि,
  • वे लिनेक्स प्रयोग करने से पहले उससे लाइसेंस ले लें; और
  • वह देखें कि यूनिक्स का कोड ओपेन सोर्स सौफटवेर से न मिल जाय।
उसने ओटोजोन तथा डैमलर क्राईसलर के खिलाफ अलग अलग मुकदमे अपने अधिकार के उल्लंघन के बारे में दायर किये हैं ।

डैमलर काईसलर के खिलाफ मुकदमा अंशत: ९-८-२००४ को खारिज हो गया| फिर मुकदमा २१-१२-२००४ को यह कहते हुये खारिज हो गया कि वह पुन: दूसरा मुकदमा तब तक नहीं ला सकते हैं जब तक डैमलर क्राईसलर के पहले मुकदमे का सारा खर्चा न अदा कर दें | एस.सी.ओ. ने इसके खिलाफ अपील प्रस्‍तुत कर रखी है ।

४: रेड हैट लिनेक्स डिस्ट्रीब्यूशन कम्पनी है। इसने एक मुकदमा इसलिये दायर किया है कि घोषणा की जाय कि उसने लिनेक्स को वितरण करने में एस.सी.ओ. के किसी भी अधिकार का अतिक्रमण नहीं किया है|

यह कहना मुश्किल है कि इन मुकदमों में क्या होगा। यह इन पर आयी गवाही पर निर्भर करेगा| सारे मुकदमे एस.सी.ओ . बनाम आई.बी.एम. के मुकदमे के निर्णय पर निर्भर करेंगे।

बहुत सी प्रमुख कम्पनियां लिनेक्स को अपना रही हैं। इनमें आई.बी.एम., रेड हैट, तथा एच.पी. मुख्य हैं इन्होने इन मुकदमो को मद्दे नज़र रखते हुये, अपने खरीदारों को कहा है कि यदि यह पाया जाता है कि उनका कोई भी सौफ्टवेर किसी के बौद्धिक सम्‍पदा अधिकारों का अतिक्रमण कर रहे हैं तो वे न ही उसके पूरे हर्जाने की क्षतिपूर्ति करेंगे पर उन्हें नया सौफ्टवेर बना कर देगें| देखिये अगर दो सालो में क्या ‍ होता है ।

इसी कड़ी के साथ लिनेक्स पर यह लेख समाप्त कर रहा हूं हांलाकि लिनेक्स के उपर चल रहे मुकदमो कि चर्चा समय समय पर करते रहेंगे

अन्त करते समय मै आपका ध्यान लिनूस टोरवाल की आत्म कहानी Just for fun: The story of an Accidental Revolutionary की तरफ ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा। यह बहुत अच्छी तथा प्रेरणादायक पुस्तक है। इसमें कुछ चैप्टर बौद्धिक सम्पदा अधिकारों के बारे में हैं। यह कुछ हमारे पुरातन विचारो से मेल खाते हैं और पश्चिम के समाज पर जिस तरह से इन अधिकारों की परिभाषा तथा व्याख्या की जाती है उस पर नयी तरह से प्रकाश डालती है - पढ़ कर देंखें। यह किताब भी वैसे ही खरीदी जा सकती हैं जैसे कि मैने मार्टिन गार्डनर की पुस्तकें की पोस्ट पर बताया है|

Tuesday, May 23, 2006

शतरंज का जादू: नारद जी की छड़ी और शतरंज का जादू

इस विषय की पहली पोस्ट पर हम लोगों ने इस पर चर्चा करने का क्रम तय किया था और दूसरी पोस्ट पर मार्टिन गार्डनर की पुस्तकों के अलावा पहेलियों कि अन्य अच्छी पुस्तकों के बारे मे बात की। इस बार शतरंज के जादू के बारे मे।

गुणाकर मुले की किताब 'गणित की पहेलियां' मे एक अध्याय 'अंकगणित की पहेलियों' पर है इसी मे वह 'शतरंज के जादू' के बारे मे बताते हैं। इसका बयान करने से पहले मैं आपको एक सांकेतिक चिन्ह के बारे मे बता दूं क्योंकि इसका प्रयोग मै करूंगा।
१=२/२=२^०
२=२=२^१
४=२x२=२^२
८=२x२x२=२^३
१६= २x२x२x२=२^४

यह सब नम्बर दो को दो से एक बार या दो से कई बार गुणा करके मिले हैं या यह कह लीजये कि ये दो की पावर (power) हैं। इन्टरनेट पर देखने के लिये इन्हे २^०, २^१, २^२, २^३, २^४ .... से लिखते हैं। पावर को इन्टरनेट पर देखने के लिये ^ चिन्ह का प्रयोग किया जाता है और मै भी इस चिठ्ठे पर इसी प्रकार से लिखूंगा।

अब देखते हैं कि गुणाकर मुले किस तरह से शतरंज के जादू के बारे मे ब्यान करते हैं। यह उन्ही के शब्दों मे,


शतरंज का जादू
शतरंज के खेल के नियमों को आप न भी जानते हों तो कम से कम इतना तो सभी जानते हैं कि शतरंज चौरस पटल पर खेला जाता है। इस पटल पर ६४ छोटे-छोटे चौकोण होते हैं।

प्राचीन काल में पर्सिया में शिर्म नाम का एक बादशाह था। शतरंज की अनेकानेक चालों को देखकर यह खेल उसे बेहद पसंद आया। शतरंज के खेल का आविष्कर्ता उसी के राज्य का एक वृद्ध फकीर है, यह जानकर बादशाह को खुशी हुई। उस फकीर को इनाम देने के लिये दरबार में बुलाया गया:
'तुम्हारी इस अदभुत खोज के लिये मैं तुम्हें इनाम देना चाहता हूं । मांगो, जो चाहे मांगो,'
बादशाह ने कहा। फकीर - उसका नाम सेसा था - चतुर था । उसने बादशाह से अपना इनाम मांगा:
'हुजूर, इस पटल में ६४ घर हैं। पहले घर के लिये आप मुझे गेहूं का केवल एक दाना दें, दूसरे घर के लिये दो दाने, तीसरे घर के लिये ४ दाने, चौथे घर के लिये ८ दाने और .... इस प्रकार ६४ घरों के साथ मेरा इनाम पूरा हो जाएगा।'
'बस इतना ही ?'
बादशाह कुछ चिढ गया,
'खैर, कल सुबह तक तुम्‍हें तुम्‍हारा इनाम मिल जाएगा।'
सेसा मुस्कराता हुआ दरबार से लौट आया और अपने इनाम की प्रतीक्षा करने लगा।

बादशाह ने अपने दरबार के एक पंडित को हिसाब करके गणना करने का हुक्म दिया। पंडित ने हिसाब लगाया ... १+ २+ ४+ ८+ १६+ ३२+ ६४+ १२८... (६४ घरों तक ) अर्थात १+ २^२ + २^३ + २^४... = (२^६४)-१ अर्थात १८,४४६,७४४,०७३,७०९,५५१,६१५ गेहूं के दाने। गेहूं के इतने दाने बादशाह के राज्य में तो क्या संपूर्ण पृथ्वी पर भी नहीं थे। बादशाह को अपनी हार स्वीकार कर लेनी पड़ी।

राजा के तो समझ रहा था कि फकीर ने बहुत छोटा इनाम मांगा है उसकी समझ मे नहीं आया कि उसे कितना गेहूं देना था। यही है शतरंज का जादू।

गौर फरमाइयेगा कि हर खाने मे कितने गेहूं के दाने रखे जा रहे हैं क्योंकि यही हमारे इस विषय के लिये महत्वपूर्ण है और यही इसे नारद जी की पहेली से जोड़ेगा।

अगली बार - सृष्टि का अन्त। 


नारद जी की छड़ी और शतरंज का जादू 

Monday, May 22, 2006

४. लिनेक्स: आई.बी.एम. पर मुकदमा

हम लोगों लिनेक्स की यूनिक्स से यात्रा, इसके करनल, डिस्ट्रीब्यूशन, डेस्कटौप का प्रयोजन, तथा यूनिक्स पर चले मुकदमे का जिक्र कर चुके हैं| आज लिनेक्स के कारण आई.बी.एम. पर चले रहे मुकदमो के बारे मे|

कैलडरा कम्पनी, पहले इसी नाम से लिनेक्स का एक डिस्ट्रीब्यूशन निकालती थी यह बहुत सफल नहीं था - कम से कम रेड हैट, सूसे ( नौवल ) तथा मैनड्रिवा के जितना तो नहीं| कैलडरा बाद मे सैन्टा क्रूज औपरेशन (एस.सी.ओ.) हो गयी| एस.सी.ओ. का कहना है कि उसने नौवल से यूनिक्स के बौद्धिक सम्पदा अधिकार खरीद लिये हैं तथा उसने यूनिक्स का एक्स (AIX) नाम का रूपान्तर निकालने लगी जिसे उसने आई.बी.एम. को दिया है। एस.सी.ओ. ने 2003 में एक मुकदमा आई.बी.एम. पर यह कहते हुये दायर किया कि आई.बी.एम. ने,
  • एस.सी.ओ. के ट्रेड सीक्रेट का हनन किया है;
  • ऐक्स यूनिक्‍स का सोर्स कोड लिनेक्स में मिला दिया है;
  • एस.सी.ओ. के साथ ऐक्‍स के बारे में हुयी संविदा का उल्लंघन किया है।

आई.बी.एम. ने इस मुकदमें में अपना उल्टा क्लेम दाखिल किया है कि
  • आई.बी.एम. ने ऐक्स का कोई सोर्स कोड लिनेक्स में नहीं मिलाया है।
  • उसने एस.सी.ओ. की संविदा को नहीं तोडा है।
  • संविदा तो एस.सी.ओ. ने तोडी है।
यह मुकदमा अभी चल रहा है और इन्टरनेट का सबसे चर्चित मुकदमा है| इस मुकदमे के बारे मे हफ्ते मे कम से कम एक बार तो आपको अवश्य कुछ न कुछ पढ़ने को मिल जायगा|

अगली बार हम लोग लिनेक्स के कारण अन्य लम्बित मुकदमो की चर्चा करेंगे|

Saturday, May 20, 2006

बचपन की यादों में गुणाकर मुले: नारद जी की छड़ी और शतरंज का जादू

पिछली पोस्ट पर हम लोगों ने नारद जी की सोने की छड़ी और शतरंज का जादू विषय पर चर्चा करने का क्रम तय किया था उसी के अनुसार इस पोस्ट पर पहेलीयों की अन्य अच्छी पुस्तकें।

मैने मार्टिन गार्डनर की चिठ्ठी पर उनके द्वारा लिखी पुस्तकों का जिक्र किया था। इस पर रवी-रतलाम जी ने टिप्पणी कर उनके प्रकाशक के बारे मे पूछा। उस समय मैने मार्टिन गार्डनर की पुस्तकें वाली पोस्ट लिखने से पहले मेरे पास पहेलियों कि पुरानी किताबों को निकाला था और उनसे धूल साफ की थी। मुझे तब मार्टिन गार्डनर की पुस्तकों के अलावा, पहेलियों की कुछ अन्य अच्छी पुस्तकें मिली। यह पुस्तकें निम्न हैं,

  • Vicious Circle and Infinity: An Anthology of Paradoxes by Patrick Hughes & George Brecht.
  • The Lady orthe Tiger? And Other Logical Puzzles by Raymond Smullyan
  • What is the name of the book? The Riddle of Dracula and Other Logical Puzzles by Raymond Smullyan
  • The Moscow Puzzles by Boris A. Kordemsky
  • Which Way did the Bicycle Go? ... And other Intriguing Mathmatical Mystries by Joseph D E Konhauser, Dan Velleman, Stan Wagon.
यह सब बहुत अच्छी हैं, पढ़ने योग्य हैं। इसमे से पहली चार पेंग्विन ने तथा पांचवीं mathematical Association of America Dolciani Mathematical Exposition No. 18 ने छापी है। इसमे से पांचवीं पुस्तक का स्तर ऊंचा है थोड़ी गणित ज्यादा है। यह किताबें भी वैसे ही खरिदी जा सकती हैं जैसे कि मैने मार्टिन गार्डनर की पुस्तकें की पोस्ट पर बताया है।

मुझे इनके अलावा एक किताब और मिली 'गणित की पहेलियां' लेखक गुणाकर मुले। इसे १९६१ मे राजकमल प्रकाशन ने छापा था। मेरे बाबा ने, उस समय यह पुस्तक मुझे भेंट की थी। यह हिन्दी मे है तब मुझे अंग्रेजी समझ मे नहीं आती थी। शुभा के अनुसार मुझे अभी भी अंग्रेजी समझ मे नहीं आती है।

गुणाकर मुले मेरे बचपन मे अकसर इस तरह के लेख लिखते थे। मालुम नहीं आप मे से कितनो को इनकी याद है या उस समय के हैं यह पहेलियों की मेरी पहली पुस्तक थी - बचपन की बहुत सारी यादें वापस ले आयी। 


उस समय न टीवी था, न कमप्यूटर, और न ही ट्रान्जिस्टर: एक वाल्व रेडियो था, जो कि मेरी मां के कमरे मे रहता था। हम भाईयों और बहन को केवल गर्मियों मे हवा-महल सुनने की आज्ञा थी। मालुम नही आप मे से कितनो को वाल्व रेडियो या हवा-महल कि याद होगी। उस समय हम भाईयों और बहन का आपस मे झगड़ना ,एक दूसरे से तरह तरह की पहेलियां बूझना, आंगन का गोबर से पुता रहना, गर्मी के दिनो मे पानी का छिड़काव। बचपन के सारे सपनो को वापस ले आयी। उस समय का एक गाना याद आया

सपने सुहाने लड़कपन के
मेरे नयनो मे डोले बहार बन के

खैर हमे तो बात करनी है नारद जी की छड़ी और शतरंज का जादू के बारे मे न कि बचपन के बारे मे। गुणाकर मुले की इस किताब मे एक अध्याय 'अंकगणित की पहेलियों' पर है इसी मे वह 'शतरंज के जादू' के बारे मे बताते हैं वह क्या है? वह जानेगें - अगली बार।


नारद जी की छड़ी और शतरंज का जादू 

Friday, May 19, 2006

३. लिनेक्स: यूनिक्स पर चला मुकदमा

हम लोगों लिनेक्स की यूनिक्स से यात्रा तथा इसके करनल, डिस्ट्रीब्यूशन, डेस्कटौप के बारे मे जिक्र कर चुके हैं| लिनेक्स पर चल रहे मुकदमो के बारे मे बात करने से पहले एक नजर - यूनिक्स पर चले मुकदमे के बारे मे|

ए.टी.&टी. ने कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, बरकले को यूनिक्स का सोर्स कोड शुरू में दिया था। इस विश्वविद्यालय ने उस पर कार्य किया तथा इसे काफी आगे बढाया। विश्वविद्यालय ने इसका अपना रूप भी निकाला जो कि बरकले सौफटवेर डिस्ट्रीब्यूशन (बी.एस.डी.) के नाम से प्रसिद्ध है। यह ओपेन सोर्स है। ए.टी.&टी. कम्पनी 1984 में टूट गयी तथा इसके एक हिस्से के पास कमप्यूटर का काम आया जिसे कमप्यूटर के व्यापार करने की स्वतंत्रता थी।

ए.टी.&टी. के इस अलग घटक ने अपना व्यापारिक यूनिक्स निकाला| इस व्यापारिक यूनिक्स तथा विश्वविद्यालय के बी.एस.डी. यूनिक्स में होड़ होने लगी तब ए.टी.&टी. ने विश्वविद्यालय पर एक मुकदमा दायर किया कि केवल ए.टी.&टी. यूनिक्स के बौद्धिक सम्पदा अधिकार की मालिक है । विश्वविद्यालय का कहना था कि उसे बी.एस.डी. यूनिक्स वितरण करने का हक है क्योंकि इस पर उसने भी बहुत काम किया है। 1993 में ए.टी.&टी. के इस घटक ने नौवल को यूनिक्स का व्यापार बेच दिया तथा 1995 में नौवल तथा विश्वविद्यालय के बीच मुकदमें में सुलह हो गयी। लेकिन उसकी क्या शर्ते हैं यह किसी को मालुम नहीं है।

इस समय लिनेक्स से सम्बन्धित मुख्य रूप से पांच मुकदमे चल रहे हैं| यह मुकदमें क्यों चल रहे हैं, इसके बारे में कई अटकलें ईन्टरनेट पर हैं पर उन पर न जाकर, अगली बार इन मुकदमो के बारे मे चर्चा करेंगे|

Tuesday, May 16, 2006

भूमिका: नारद जी की छड़ी और शतरंज का जादू

पहेली बाज जी ने कुछ दिन पहले नारद जी की छड़ी नामक पहेली अपने चिठ्ठे पर बूझी। मिश्राजी ने इसका सही जवाब दिया। इस पहेली के कई रूप हैं और पहेली बाज जी द्वारा पूछा गया रूप इसका सबसे आसान रूप है| इसके कठिन रूप का जवाब इतनी आसानी से नहीं दिया जा सकता है। यह जवाब, जो वास्तव मे गणित के अंको की एक सिरीस है, मूलभूत है। इसका सम्बन्ध बहुत चीजों से है और शतरंज के जादू से भी है। यह शतरंज का जादू क्या बला है? नारद जी की छड़ी वाली पहेली का शतरंज के जादू से क्या सम्बन्ध है?

अरे भाई, इस पहेली का सम्बन्ध तो उससे से भी है, जिससे हम सब जुड़े हैं। यह सब पर चर्चा करने के लिये एक तरफ से चलना होगा ताकि कहीं हम चक्कर न खा जायें। चलिये एक क्रम तय कर लेते हैं, उसी पर चलेंगे। यह क्रम इस प्रकार रहेगा।

  1. भूमिका (यह चिठ्ठी जिसमे हम चर्चा का क्रम तय कर रहें हैं);
  2. मार्टिन गार्डनर की पुस्तकों के अलावा पहेलियों कि अन्य अच्छी पुस्तकें;
  3. शतरंज का जादू क्या है;
  4. सृष्टि का अन्त;
  5. नारद जी की छड़ी वाली पहेली के अन्य रूप। मैं चाहूंगा कि पहेली बाज इन रूपों को 'शतरंज का जादू क्या है' की कड़ी के बाद बूझें। क्योंकि पहेली बूझने का जिम्मा तो उनका है;
  6. इस पहेली के हल का शतरंज के जादू से रिश्ता;
  7. इस पहेली के हल का कमप्यूटर विज्ञान से सम्बन्धों का जिक्र।
यह हो सकता है कि किसी क्रम मे दो पोस्टे हों या दो क्रम को मिला कर एक पोस्ट मे काम चल जाये। पर हमारा क्रम यही रहेगा। आखरी कड़ी मे, इस पहेली के हल का, अन्य विषयों के साथ सम्बन्धों का जिक्र ही रहेगा। अन्य विषयों के साथ सम्बन्ध किस प्रकार से बन रहे हैं उसकी चर्चा कभी अलग से; यह कुछ बड़ा विषय है

तो अगली बार हम मिलते हैं मार्टिन गार्डनर की पुस्तकों के अलावा पहेलियों की अन्य अच्छी पुस्तकों के साथ।


नारद जी की छड़ी और शतरंज का जादू