इस चिट्ठी में, डाबर फॅम क्रीम ब्लीचिंग के विज्ञापन पर उठे विवाद पर चर्चा है।
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Wednesday, October 27, 2021
Sunday, October 30, 2016
द इमिटेशन गेम
ऐलेन ट्यूरिंग आधुनिक कंप्यूटर के पिता कहे जाते हैं। दूसरे विश्व युद्ध में उनका योगदान महत्वपूर्ण था। इस चिट्ठी में, उनकी जीवनी 'ऐलेन ट्यूरिंग - द एनिगमा' (Alan Turing: The Enigma) पर बनी फिल्म 'द इमिटेशन गेम' की (The Imitation Game) की समीक्षा है।
Sunday, June 28, 2015
अब, मां को बताने पर शर्म कैसी।
इस चिट्टी में, अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय के नवीनतम फैसले की चर्चा है जिससे समलैंगिक लोगों के बीच शादी को, कानूनी मान्यता दे दी गयी है।
Saturday, February 28, 2009
लाल धब्बों की कहानी - महिलाओं की जुबानी
चिट्ठी में रजोधर्म के बारे समाज में अज्ञानता का वर्णन है और 'मेरी छोटी सी लाल किताब' (My Little Red Book) की समीक्षा है।
कुछ समय पहले डेसमंड मॉरिस ने डिस्कवरी चैनल पर 'मानव लिंग' (The Human Sexes) नामक एक श्रंखला निम्न पांच भागों में की थी।
- Different but Equal
- The Language of the Sexes
- Patterns of Love
- Passages of Life
- The Maternal Dilemma
महिलाओं और पुरुषों में बहुत कुछ भिन्नता तो सदियों से दोनो को अलग अलग कार्य करने के कारण या उनके लालन पालन में है पर कुछ भिन्नता जैविक भी है। जैविक भिन्नता का सबसे पुख्ता सबूत रजोधर्म (Menstruation) है। लेकिन जब अब पुरुष भी बच्चे पैदा करने लगे तो शायद यह भिन्नता भी नहीं रहे।
अधिकतर सभ्यताओं में, महिलाओं को रजोधर्म के समय अपवित्र माना गया। वे इसके दौरान न तो खाना बना सकती थी न ही पूजा कर सकती थीं। मेरे विचार में यह बीते हुऐ कल की बात है और आज ऐसा नहीं समझा जाता है। मैं, यह इसलिये सोचता था क्योंकि मैं एक सयुंक्त परिवार में बड़ा हुआ हूं। हमारे परिवार में चाचियां, बहनें, भाभियां थीं पर मुझे कभी भी पता नहीं चलता था कि वे कब इस दौर से गुजर रहीं हैं। मेरे परिवार में महिलाओं के साथ कभी भी रजोधर्म के समय उनसे कोई अन्तर नहीं किया गया।
लगता है कि, मेरी सोच सही नहीं है। रजोधर्म के बारे में लोगों की अज्ञानता समाप्त नहीं हुई है।
मैंने कुछ दिन पहले 'आज की दुर्गा - महिला सशक्तिकरण' की कहानी कई कड़ियों में अपने उन्मुक्त चिट्ठे पर लिखी थी। इसे बाद में संकलित कर इसी नाम से अपने चिट्ठे लेख में यहां प्रकाशित किया है। इस श्रंखला की एक कड़ी, महिलाओं में रजोधर्म (Menstruation) से संबन्धित थी। इसमें मैंने सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले का जिक्र किया था जिसमें इसके बारे में सूचना को एकान्तता के अन्दर बताया गया था। किसी को इसके बारे में सूचना मांगना अनुचित कहा गया। मेरे विचार से, इस तरह की सूचना मांगना, अज्ञानता की निशानी है।
कुहू जी, मुझे अन्तरजाल पर मिली थी। मैंने उनका परिचय, अपनी चिट्ठी 'अंतरजाल पर हिन्दी कैसे बढ़े' में करवाया था। उन्होंने कुछ दिन पहले अंग्रेजी में 'The Red Coloured Blues' और हिन्दी में सुनो, सुनो एक बात सुनो नामक चिट्ठी लिखी है। वे एक शादी में चेन्नई गयी हुई थीं। वहां रजोधर्म के दौरान क्या हुआ यह इस चिट्ठी में लिखा है। उन्हें एक कोने में बैठा दिया गया। उनके खाने के बर्तन बदल दिये गये। यह मुझे अविश्वसनीय लगता है। मैं सोच ही नहीं सकता कि आधुनिक भारत में इस तरह का बर्ताव हो सकता है।
मेरे कुछ मित्रों की पत्नियां रजोधर्म के दौरान कम काम करती हैं। उनके मुताबिक उन्हें कमजोरी रहती है। हो सकता है कि यह सच न हो और सच कुछ और ही हो क्योंकि शुभा के मुताबिक इस दौरान कोई भी कमजोरी नहीं होती है। यह केवल मनोवैज्ञानिक है पर इसके अतिरिक्त मैंने, समाज में, रजोधर्म के समय महिलाओं के साथ बर्ताव में कोई अन्तर नहीं पाया। ।
आज जब मैं रजोधर्म के बारे में बात कर रहा हूं तो इस संबन्ध पर एक पुस्तक का जिक्र करना चाहूंगा। रैशल कॉंडर नालेबफ (Rachel Kauder Nalebuff ) ने एक पुस्तक 'मेरी छोटी लाल किताब' (My Little Red Book) (माई लिटल रेड बुक) नाम से लिखी है। इसमें उन्होंने ९२ युवतियों के पहले रजोधर्म के संस्मरण लिखें है।
'मेरी छोटी लाल किताब' में एक संस्मरण बैंगलोर की युवती का है जो कुहू जी की चिट्ठी में वर्णित व्यवहार की तरह है। इस पुस्तक में कुछ अजीब तरह के अनुभवों को बांटा गया है। यह पुस्तक, शायद पुरुषों को रुचिकर न लगे पर महिलाओं को अवश्य भायेगी। यह पुस्तक हर युवती को पढ़नी चाहिये। शायद पुरुषों को भी - वे उनकी मुश्किलों को, उनके साथ होते अन्याय को, ज्यादा अच्छी तरह समझ सकेंगे।
यदि आप इस पुस्तक के बारे में इसकी लेखिका रैशल से जानना चाहते हैं तो यहां सुन सकते हैं।
महिलाओं के साथ, इस तरह का व्यवहार, न केवल यौन शिज्ञा के महत्व को उजागर करता है पर इसकी जरूरत को भी दर्शाता है।
उन्मुक्त की पुस्तकों के बारे में यहां पढ़ें।
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सांकेतिक शब्द
Family, Life, Sex education, दर्शन, यौन शिक्षा, विचार,
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Tuesday, March 04, 2008
क्या, अंतरजाल तकनीक पर काम करने वालों पर, वाई क्रोमोसोम हावी है?
ऑस्ट्रेलिया की सबसे बड़ी अदालत, वहां का उच्च न्यायालय है।
न्यायमूर्ति माइकेल किरबी वहां न्यायधीश हैं। इस समय, वे विश्व में, कानून के क्षेत्र में सबसे ज्यादा जाने माने व्यक्ति हैं।
न्यायमूर्ति किरबी
२१ फरवरी २००८ को, इंटरनेट इंडस्ट्री एसोसिएशन का वार्षिक रात्रि-भोज था। न्यायमूर्ति किरबी वहां मुख्य अथिति थे। वहां पर भाषण देते समय उन्होने इस बात पर गौर किया कि सुनने वालों में अधिकतर व्यक्ति पुरुष थे। उनके मुताबिक यदि वे किसी और पेशे के लोगों के बीच भाषण दे रहे होते तो उसमें पुरुषों और महिलाओं की संख्या लगभग बराबर होती। वे आगे कहते कि,
मैं न्यायमूर्ति किरबी की बात से सहमत हूं। मुझे भी यह बात सही नहीं लगती की अंतरजाल की तकनीक में अच्छा होने के लिये वाई क्रोमोसोम का कोई महत्व है पर यह भी गौर करने की बात है कि इस पेशे में पुरुषों की संख्या अधिक है। यह नहीं होना चाहिये।
कुछ दिन पहले शोभा डे ने एक लेख लिखा था कि कैसे एक पत्रकार यूवक ने, अपनी मां को, अपने समलैंगिक होने के बारे में बताया था। मेरे विचार से वह सही नहीं कह रही थी क्योंकि कोई यूवक इतना क्रूर नहीं हो कता। मैंने इस पर, आक्रोशवश, अपने चिट्ठे छुटपुट पर, मां को दिल की बात कैसे बतायें नामक चिट्ठी लिखी थी। आप यह सब वहां जा कर पढ़ सकते हैं।
न्यायमूर्ति किरबी भी समलैंगिक हैं। उनहोने अपनी मां को कभी नही बताया कि वे समलैंगिक हैं। उनके मुताबिक वे जो हैं, जैसे हैं, वह ईश्वर के कारण है। इसमें उनका कोई दोष नहीं पर उनकी मां यह नहीं समझ पाती और यह पता चलने पर उन्हे बहुत दुख होता। उनकी मां अपने को ही दोषी ठहरातीं। चूंकि वे अपनी मां को दुख नहीं देना चाहते थे इसलिये यह बात गुप्त रखी। आज उनकी मां जीवित नहीं हैं। इसलिये वे सच बात को छुपाने का कोई औचित्य नहीं समझते है।
मेरे विचार से, जो व्यक्ति दूसरे की भावनाओं को समझता है, आदर करता है, परिपक्व होता है - वही इस तरह की बात कह सकता है।
न्यायमूर्ति माइकेल किरबी वहां न्यायधीश हैं। इस समय, वे विश्व में, कानून के क्षेत्र में सबसे ज्यादा जाने माने व्यक्ति हैं।न्यायमूर्ति किरबी
२१ फरवरी २००८ को, इंटरनेट इंडस्ट्री एसोसिएशन का वार्षिक रात्रि-भोज था। न्यायमूर्ति किरबी वहां मुख्य अथिति थे। वहां पर भाषण देते समय उन्होने इस बात पर गौर किया कि सुनने वालों में अधिकतर व्यक्ति पुरुष थे। उनके मुताबिक यदि वे किसी और पेशे के लोगों के बीच भाषण दे रहे होते तो उसमें पुरुषों और महिलाओं की संख्या लगभग बराबर होती। वे आगे कहते कि,
'My conversationalist said, it all goes back to the fact that to be good in this type of technology, you have got to have that very strange mental quirk. And that’s a male phenomenon. It’s on the Y chromosome, in the male genes. That’s probably why they are mostly men here.इसे आप स्वयं सुन सकते हैं। यह उनके भाषण का आखरी भाग है। यह बात इसके अन्त में है। यदि आप इसके पहले भाग भी सुनना चाहें तो यहां, यहां, यहां, यहां, और यहां सुन सकते हैं।
I don’t know that I accept that.
...
But it’s a thing for you to look to. Women are the great networkers. And toilers in the Internet are in the business of the greatest network of them all.'
लोगों का कहना है कि इस तकनीक में अच्छा होने के लिये एक खास तरह का दिमाग होना चाहिये और यह पुरुषों के पास - वाई क्रोमोसोम के कारण - है। शायद इसी लिये आज अधितर व्यक्ति, पुरुष हैं।
मै इस बात को नहीं मानता हूं।
...
लेकिन इस पर गौर करने की जरूरत है क्योंकि महिलायें बहुत बेहतरीन नेटवर्कर होती हैं और आप दुनिया के सबसे बड़े नेटवर्क में काम काम करते हैं।
मैं न्यायमूर्ति किरबी की बात से सहमत हूं। मुझे भी यह बात सही नहीं लगती की अंतरजाल की तकनीक में अच्छा होने के लिये वाई क्रोमोसोम का कोई महत्व है पर यह भी गौर करने की बात है कि इस पेशे में पुरुषों की संख्या अधिक है। यह नहीं होना चाहिये।
कुछ दिन पहले शोभा डे ने एक लेख लिखा था कि कैसे एक पत्रकार यूवक ने, अपनी मां को, अपने समलैंगिक होने के बारे में बताया था। मेरे विचार से वह सही नहीं कह रही थी क्योंकि कोई यूवक इतना क्रूर नहीं हो कता। मैंने इस पर, आक्रोशवश, अपने चिट्ठे छुटपुट पर, मां को दिल की बात कैसे बतायें नामक चिट्ठी लिखी थी। आप यह सब वहां जा कर पढ़ सकते हैं।
न्यायमूर्ति किरबी भी समलैंगिक हैं। उनहोने अपनी मां को कभी नही बताया कि वे समलैंगिक हैं। उनके मुताबिक वे जो हैं, जैसे हैं, वह ईश्वर के कारण है। इसमें उनका कोई दोष नहीं पर उनकी मां यह नहीं समझ पाती और यह पता चलने पर उन्हे बहुत दुख होता। उनकी मां अपने को ही दोषी ठहरातीं। चूंकि वे अपनी मां को दुख नहीं देना चाहते थे इसलिये यह बात गुप्त रखी। आज उनकी मां जीवित नहीं हैं। इसलिये वे सच बात को छुपाने का कोई औचित्य नहीं समझते है।
मेरे विचार से, जो व्यक्ति दूसरे की भावनाओं को समझता है, आदर करता है, परिपक्व होता है - वही इस तरह की बात कह सकता है।
हिन्दी में नवीनतम पॉडकास्ट Latest podcast in Hindi
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- पुस्तक समीक्षा: माइक्रोब हंटरस् - जीवाणुवों के शिकारी (Microbe Hunters by Paul de Kruif) ►
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इस चिट्ठी का चित्र विकीपीडिया से है और ग्नू स्वतंत्र अनुमति पत्र की शर्तों के अन्तर्गत प्रकाशित किया गया है।
| इस पोस्ट पर न्यायमूर्ति माइकेल किरबी के द्वारा २१ फरवरी २००८ को इंटरनेट इंडस्ट्री एसोसिएशन का वार्षिक रात्रि-भोज दिये गये भाषण की चर्चा है। यह हिन्दी (देवनागरी लिपि) में है। इसे आप रोमन या किसी और भारतीय लिपि में पढ़ सकते हैं। इसके लिये दाहिने तरफ ऊपर के विज़िट को देखें। is post per justice miachael kirby ke dvaraa 21 February 2008 ko internet industry association ke ratri bhoj per diye gaye bhaashan ki charchaa hai. yah hindi (devnagri) mein hai. ise aap roman ya kisee aur bhaarateey lipi me padh sakate hain. isake liye daahine taraf, oopar ke widget ko dekhen. This post is about - a cooment made by by Justice Miachael Kirby on 21st February before Internet Industry associatio. It is in Hindi. You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script. |
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Monday, August 27, 2007
यौन शिक्षा और सांख्यिकी
कुछ दिन पहले शास्त्री जी ने यौन शिक्षा पर एक लेख 'यौन शिक्षा — पाश्चात्य राज्यों का अनुभव क्या कहता है ?' लिखा। मैंने इस पर टिप्पणी की,
यह टिप्पणी किसी कारणवश उस समय प्रकाशित नहीं हो पायी। उसके बाद नीरज जी ने शास्त्री जी असहमत हो कर 'यौन शिक्षा: दो टूक बातें !' नाम की चिट्ठी लिखी। जिस पर उनकी अनुमति से, मैंने यह टिप्पणी कर दी। शास्त्री जी से असहमत हो कर, पंकज जी ने भी एक चिट्ठी 'मेंढक बहरा हो गया' नाम से लिखी। शास्त्री जी इनका जवाब पांच चिट्ठियों यहां, यहां, यहां, यहां, और यहां दिया है। उनके जवाब को एकदम से नहीं नकारा जा सकता।
इस विषय पर इसके पहली लिखी चिट्ठियों की लिंक मेरी दोनो चिट्ठियों में है। यह सब इस विषय पर रोचक और ज्ञानवर्धक बहस है। यह बहस, कम से कम इन चिट्ठियों कि उन टिप्पणियों से बेहतर है जिन टिप्पणियों के द्वारा, यह कहा गया कि लोग इस विषय पर नहीं पढ़ना चाहते चाहे जितना अच्छा लिखा हो। मेरे विचार से बहस इस तरह से होनी चाहिये न की उस तरह से जैसे अक्सर हो जाती है।
यौन शिक्षा के संदर्भ में, मैं ११-१२वीं कक्षा के विद्यार्थियों को 'फिर मिलेंगे' फिल्म देखने के लिये भी सलाह दूंगा। यदि आपने इसे नहीं देखी हो तो देखें। आप इसे अपने मुन्ने, मुन्नी के साथ देखें या अलग - यह आपके उनके रिश्तों के ऊपर है। मैंने तो यह फिल्म अपने बच्चों के साथ देखी, हांलाकि जब यह फिल्म आयी तब तक वे अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर चुके थे।
यह तो बात हूई, यौन शिक्षा पर - अब चलते हैं सांख्यिकी पर।
सांख्यिकी के बारे अक्सर कहा जाता है - पहले झूट, फिर बिलकुल झूट, उसके बाद सांख्यिकी। यही बात मैंने अपनी टिप्पणी पर भी लिखी थी। इसका एक उदाहरण, टिप्पणी पर बताया था। इसको समझाने के लिये, यह भी कहा जाता है,
यह कार्टून मैथली जी ने, इसी कहावत को उजागर करने के लिये बनाया है। मैथली जी, कौन? अरे वही कैफे हिन्दी और ब्लॉगवाणी वाले - मेरा धन्यवाद और आभार।
किसी और संदर्भ में, मैथली जी के बारे में, मैंने दो चिट्ठियां - 'डकैती, चोरी या जोश या केवल नादानी' और 'हिन्दी चिट्ठाकारिता, मोक्ष, और कैफे हिन्दी' नाम से लिखी हैं।
मैंने, सांख्यिकी, ४० वर्ष पहले अपने विद्यार्थी जीवन में पढ़ी थी। उसके बाद कभी जरूरत नहीं पड़ी। यह टिप्पणी लिखते समय मैंने अपने विद्यार्थी जीवन को याद किया और याद किया उस समय सांख्यिकी पर पढ़ी कई बेहतरीन पुस्तकों को, जो आज भी सांख्यिकी की लाजवाब पुस्तकें मानी जाती हैं। अगली बार, उन्हीं के बारे में बात करेंगे।
'शास्त्री जी आप गलत नहीं कहते पर फिर भी मैं कहना चाहूंगा कि सांख्यिकी का पहला सिद्धान्त है There are lies, damned lies and statistics. इसका कारण है।
आप सांख्यिकी को जिस तरह से चाहें, प्रयोग कर सकते हैं और वह विश्वसनीय लगता है। सांख्यिकी का प्रयोग सही है या गलत - केवल विशेषज्ञ ही बता सकते हैं। मान लीजिये मैं कहूं कि 'क' टूथपेस्ट अच्छा है क्योंकि इससे मंजन करने वालों में ९०% लोगों के दांत अच्छे रहते हैं। इसका यह अर्थ नहीं कि यह अच्छा टूथपेस्ट है क्योंकि हो सकता है इससे न मंजन करने वालों में से ९५% के दांत अच्छे रहते हों। यदि ऐसा है तो यह खराब टूथपेस्ट हो जायगा।
सोचिये यदि पाश्चात्य देशों में यौन शिक्षा न हुई होती तो क्या हाल होता। यदि तब हाल अच्छे होते तब ही आपकी बात ठीक लगती है अन्यथा नहीं।
अपने देश में जिस तरह के टीवी प्रोग्राम आते हैं जिस तरह की खबरे आती हैं, जिस तरह अंतरजाल पर सब उपलब्ध है - उसे देख कर तो मुझे लगता है कि यौन शिक्षा होनी चाहिये।
इस बारे में मैंने अपने तथा अपने परिवार के व्यक्तिगत अनुभव भी 'यहां सेक्स पर बात करना वर्जित है' और 'यौन शिक्षा' नाम से लिखे हैं। मैं चाहूंगा इनको भी आप देखें फिर राय कायम करें।
ऐसे यौन शिक्षा पर व्यापक बहस जरूरी है।'
यह टिप्पणी किसी कारणवश उस समय प्रकाशित नहीं हो पायी। उसके बाद नीरज जी ने शास्त्री जी असहमत हो कर 'यौन शिक्षा: दो टूक बातें !' नाम की चिट्ठी लिखी। जिस पर उनकी अनुमति से, मैंने यह टिप्पणी कर दी। शास्त्री जी से असहमत हो कर, पंकज जी ने भी एक चिट्ठी 'मेंढक बहरा हो गया' नाम से लिखी। शास्त्री जी इनका जवाब पांच चिट्ठियों यहां, यहां, यहां, यहां, और यहां दिया है। उनके जवाब को एकदम से नहीं नकारा जा सकता।
इस विषय पर इसके पहली लिखी चिट्ठियों की लिंक मेरी दोनो चिट्ठियों में है। यह सब इस विषय पर रोचक और ज्ञानवर्धक बहस है। यह बहस, कम से कम इन चिट्ठियों कि उन टिप्पणियों से बेहतर है जिन टिप्पणियों के द्वारा, यह कहा गया कि लोग इस विषय पर नहीं पढ़ना चाहते चाहे जितना अच्छा लिखा हो। मेरे विचार से बहस इस तरह से होनी चाहिये न की उस तरह से जैसे अक्सर हो जाती है।
यौन शिक्षा के संदर्भ में, मैं ११-१२वीं कक्षा के विद्यार्थियों को 'फिर मिलेंगे' फिल्म देखने के लिये भी सलाह दूंगा। यदि आपने इसे नहीं देखी हो तो देखें। आप इसे अपने मुन्ने, मुन्नी के साथ देखें या अलग - यह आपके उनके रिश्तों के ऊपर है। मैंने तो यह फिल्म अपने बच्चों के साथ देखी, हांलाकि जब यह फिल्म आयी तब तक वे अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर चुके थे।मेरा अब भी, यह मत है,
'यौन शिक्षा - कम से कम प्रारम्भिक स्तर की - होनी चाहियेः शायद घर में सबसे अच्छी हो।'हांलाकि न तो सब इसे ठीक प्रकार से बताने में सक्षम हैं, न ही इस पर लिखी सब पुस्तकें ठीक हैं।
यह तो बात हूई, यौन शिक्षा पर - अब चलते हैं सांख्यिकी पर।
सांख्यिकी के बारे अक्सर कहा जाता है - पहले झूट, फिर बिलकुल झूट, उसके बाद सांख्यिकी। यही बात मैंने अपनी टिप्पणी पर भी लिखी थी। इसका एक उदाहरण, टिप्पणी पर बताया था। इसको समझाने के लिये, यह भी कहा जाता है,
'यदि आपका सर रैफ्रीजरेटर में हो और पैर जलते स्टोव पर तो सांख्यिकी के अनुसार, औसतन, आप ठीक ठाक हैं।'
यह कार्टून मैथली जी ने, इसी कहावत को उजागर करने के लिये बनाया है। मैथली जी, कौन? अरे वही कैफे हिन्दी और ब्लॉगवाणी वाले - मेरा धन्यवाद और आभार।
किसी और संदर्भ में, मैथली जी के बारे में, मैंने दो चिट्ठियां - 'डकैती, चोरी या जोश या केवल नादानी' और 'हिन्दी चिट्ठाकारिता, मोक्ष, और कैफे हिन्दी' नाम से लिखी हैं।
मैंने, सांख्यिकी, ४० वर्ष पहले अपने विद्यार्थी जीवन में पढ़ी थी। उसके बाद कभी जरूरत नहीं पड़ी। यह टिप्पणी लिखते समय मैंने अपने विद्यार्थी जीवन को याद किया और याद किया उस समय सांख्यिकी पर पढ़ी कई बेहतरीन पुस्तकों को, जो आज भी सांख्यिकी की लाजवाब पुस्तकें मानी जाती हैं। अगली बार, उन्हीं के बारे में बात करेंगे।
यौन शिक्षा और सांख्यिकी
Thursday, July 12, 2007
यौन शिक्षा
यह चिट्ठी यौन शिज्ञा के पक्ष में है।
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| ऐडस् के बारे में जगरुक करती फिल्म 'फिर मेलेंगे' में, सलमान खान और शेल्पा शैटी |
Tuesday, June 05, 2007
यहां सेक्स पर बात करना वर्जित है: हमने जानी है जमाने में रमती खुशबू
'हमने जानी है जमाने में रमती खुशबू' श्रृंखला की इस कड़ी में, यौन शिक्षा के बारे में डेविड र्यूबॅन (David Reuben) के द्वारा लिखी एक अच्छी पुस्तक ऍवेरीथिंग यू वान्टेड टू नो अबॉउट सेक्स बट वेर अफ्रेड टू आस्क (Everything you always wanted to know about sex but were afraid to ask) के बारे में चर्चा है।
Tuesday, June 27, 2006
Trans-gendered – सेक्स परिवर्तित पुरुष या स्त्री
कुछ दिन पहले सुनील जी ने 'पुरुष या स्त्री ?' नाम की एक चिट्ठी पोस्ट की। उन्होने एक दूसरी चिट्ठी भी 'मैं शिव हूँ' के नाम से पोस्ट की। उसी पर संजय जी और सृजन शिल्पी जी ने टिप्पणी की। सृजन शिल्पी जी ने बाद मे 'अर्धनारीश्वर और वाणभट्ट की आत्मकथा' नाम की चिट्ठी भी पोस्ट की। मेरा मन भी था कि इन सब पर टिप्पणी करूं, फिर लगा कि एक स्वतंत्र चिट्ठी लिखना ठीक होगा। इसलिये यह चिट्ठी पोस्ट कर रहा हूं।
कुछ लोगो को प्रकृति अलग तरह से बनाती है उन्हे मस्तिष्क तो एक लिङ्ग का देती और शरीर दूसरे लिङ्ग का। इन लोगों के अपने कष्ट होते हैं सर्जरी के बढ़ते आयाम ने इन लोगों को कुछ राहत दी है। ऐसे कुछ लोग सर्जरी करा कर अपना लिङ्ग बदल सकते हैं। सेक्स परिवर्तन कराने के बाद, इन लोगों को trans-gendered कहा जाता है। इन लोगों के भी अधिकार हैं पर हमारा समाज ऐसे लोगों की पीड़ा समझना तो दूर, इनका मजाक बनाने मे भी पीछे नहीं रहता।
कुछ साल पहले की बात है कि एक टीवी बनाने वाली कम्पनी ने अपने टीवी के विज्ञापन मे एक लड़के और लड़की को एक टीवी की दुकान मे दिखाया। लड़की सुन्दर है और लड़का उससे इश्क (flirt) करने की कोशिश कर रहा है। दुकान मे अलग- अलग कम्पनी के टीवी लगे हैं। उन सब मे एक प्रोग्राम आ रहा है जिसमे एक लड़की का साक्षात्कार हो रहा है जो कि लड़के से लड़की बनी थी। लड़की का चेहरा ढ़ंका हुआ है। अलग अलग टीवी मे लड़की का चेहरा ढ़का रहता है पर जब उस कम्पनी के टीवी के सामने पहुंचते हैं तो टीवी पर लड़की का चेहरा साफ दिखायी पड़ता है। यह टीवी वाले यह बताना चाहते थे कि उनके टीवी पर तस्वीर एकदम साफ आती है। यह लड़की वही है जो कि दुकान में है। जब लड़का उसे देखता है तो घृणा से मुंह बनाते हुऐ, उस दुकान से, लड़की को छोड़ कर, चला जाता है।
मेरे विचार से यह विज्ञापन बहुत ओछा था। यदि इस विज्ञापन से जुड़े किसी व्यक्ति के परिवार मे ऐसा कोई सदस्य होता तो वह न तो यह विज्ञापन बनाता, न ही उसे अपनी कम्पनी के लिये मंजूरी देता। परिवार मे ऐसा कोई सदस्य होने की कोई जरूरत नहीं है, इसके लिये तो ऐसे लोगों की मुश्किलों को समझने की जरूरत है जो कि इस विज्ञापन को बनाने वाले या इस टीवी कम्पनी के पास नहीं थी।
संवेदनहीन (insensitive) इन्सान ही ऐसा कार्य करते हैं। मेरे विचार मे कोई भी कार्य करने से पहले उसे अपने ऊपर रख कर सोचने की जरूरत है, कि यदि वे उस जगह होते तो उन्हे कैसा लगता। मैंने इसके बारे मे कुछ लिखा-पढ़ी की और इसके पहले कुछ और कार्यवाही करता कि यह विज्ञापन दिखायी देना बन्द हो गया। कह नहीं सकता कि लिखा-पढ़ी का असर हुआ या उन्हे स्वयं लगा कि यह गलत है।
कुछ लोगो को प्रकृति अलग तरह से बनाती है उन्हे मस्तिष्क तो एक लिङ्ग का देती और शरीर दूसरे लिङ्ग का। इन लोगों के अपने कष्ट होते हैं सर्जरी के बढ़ते आयाम ने इन लोगों को कुछ राहत दी है। ऐसे कुछ लोग सर्जरी करा कर अपना लिङ्ग बदल सकते हैं। सेक्स परिवर्तन कराने के बाद, इन लोगों को trans-gendered कहा जाता है। इन लोगों के भी अधिकार हैं पर हमारा समाज ऐसे लोगों की पीड़ा समझना तो दूर, इनका मजाक बनाने मे भी पीछे नहीं रहता।
कुछ साल पहले की बात है कि एक टीवी बनाने वाली कम्पनी ने अपने टीवी के विज्ञापन मे एक लड़के और लड़की को एक टीवी की दुकान मे दिखाया। लड़की सुन्दर है और लड़का उससे इश्क (flirt) करने की कोशिश कर रहा है। दुकान मे अलग- अलग कम्पनी के टीवी लगे हैं। उन सब मे एक प्रोग्राम आ रहा है जिसमे एक लड़की का साक्षात्कार हो रहा है जो कि लड़के से लड़की बनी थी। लड़की का चेहरा ढ़ंका हुआ है। अलग अलग टीवी मे लड़की का चेहरा ढ़का रहता है पर जब उस कम्पनी के टीवी के सामने पहुंचते हैं तो टीवी पर लड़की का चेहरा साफ दिखायी पड़ता है। यह टीवी वाले यह बताना चाहते थे कि उनके टीवी पर तस्वीर एकदम साफ आती है। यह लड़की वही है जो कि दुकान में है। जब लड़का उसे देखता है तो घृणा से मुंह बनाते हुऐ, उस दुकान से, लड़की को छोड़ कर, चला जाता है।
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संवेदनहीन (insensitive) इन्सान ही ऐसा कार्य करते हैं। मेरे विचार मे कोई भी कार्य करने से पहले उसे अपने ऊपर रख कर सोचने की जरूरत है, कि यदि वे उस जगह होते तो उन्हे कैसा लगता। मैंने इसके बारे मे कुछ लिखा-पढ़ी की और इसके पहले कुछ और कार्यवाही करता कि यह विज्ञापन दिखायी देना बन्द हो गया। कह नहीं सकता कि लिखा-पढ़ी का असर हुआ या उन्हे स्वयं लगा कि यह गलत है।
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