इस चिट्ठी में, गिलियन थॉमस (Gillian Thomas) की लिखी पुस्तक 'बिकॉस ऑफ सेक्स' (Because of Sex) की समीक्षा है।
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Sunday, March 15, 2020
Tuesday, March 08, 2011
आप को कैसी फिल्में पसन्द हैं
| ऍलिसन बेचडेल का चित्र विकिपीडिया से |
किसी विचारधारा को समाज में पहुंचाने के लिये, फिल्में और टीवी एक महत्वपूर्ण अंग हैं। फिल्में और टीवी कार्यक्रम किस प्रकार के हों जो महिला सशक्तिकरण को समाज में पहुंचा सकते हैं अथार्त - चर्चा बेचडेल टेस्ट की।
Friday, February 18, 2011
Tuesday, March 09, 2010
आप, क्यों नहीं, इसके बाल खींच कर देखते
Friday, December 11, 2009
पति, पत्नी के घर में रहते हैं
महल में बाहर की तरफ उन्नीसवीं शताब्दी की बनी एक खास घड़ी, जिसमें
घन्टे के पूरे होने पर उतनी बार ऊपर के बकरों सिर, एक दूसरे से टक्कर मारते
हैं।
Wednesday, August 19, 2009
पति, बिल्लियों की देख-भाल कर रहे हैं
ताज गार्डन रिट्रीट, कुमाराकॉम में मेरी मुलाकात कई लोगों से हुई। इस चिट्ठी में ऑस्ट्रेलियायी महिलाओं से मुलाकात और महिला सशक्तिकरण के एक दूसरे रुप की चर्चा है।
कुमाराकॉम में भी अप्रवाही जल है। शाम के समय हमने वहां पर नाव से सैर की और सूर्यास्त का नज़ारा लिया।
शाम को गर्मी और उमस थी। मैं नेकर पहने था। उस महिला ने कहा कि वह भी नेकर पहनना चाहती थी पर उनसे बताया गया था कि वे भारत में ऐसे कपड़े न पहने। मैंने बताया,
‘भारत में पुरूष लोग नेकर पहन लेते हैं पर महिलाएं नहीं। हांलाकि इस होटल में नेकर पहन कर या नहाने की ड्रेस पहन कर घूमने में कोई एतराज़ नहीं करेगा।‘उसने कहा,
‘तब तो मैं भी कल नेकर ही पहनूगी।‘यह दोनो महिलाएं निरोषध चिकित्सक (Physiotherapist) थीं। उनके मुताबिक ऑस्ट्रेलिया में इस पेशे में पैसा बहुत कम है शायद आने वाले समय में इसमें पैसा मिले।
इन दोनों ऑस्ट्रेलियाई महिलाओं के पति साथ में नहीं थे न ही उनके बच्चे साथ थे। मैंने पूछा, कि क्या आपके पति ऑस्ट्रेलिया में बच्चों की देखभाल करने के लिए रूक गये हैं। उसने कहा, नहीं। हमारे बच्चे बहुत बड़े हो गये हैं। उनकी शादी भी हो गयी है। वे लोग अलग रहते है। उसके बाद बताया,
‘हमने कई बिल्लियां पाल रखी हैं। हमारे पति ऑस्ट्रेलिया में रहकर बिल्लियों की देखभाल कर रहे हैं और हम दोनों भारत में मस्ती मारने आयें हुए हैं।‘
यह भी महिला सशक्तिकरण का एक अलग रूप है। पति ऑस्ट्रेलिया में बिल्लियां देखें और पत्नियां भारत घूमे।
रात्रि भोज पर, मेरी मुलाकात फिर से इन महिलाओं से हुयी। शाम को नाव की सैर करते समय वे नेकर तो नहीं पहने थी पर अनौपचारिक परिधान पहने थीं। रात के भोजन पर वे एकदम औपचारिक परिधान पहन कर आयीं थीं। मैंने उनकी तारीफ की वे बोली,
'रात्रि का भोजन तो खास होता है। इसलिए ये खास परिधान।‘रात्रि भोज पर कुछ युवतियां केरल के पारम्परिक नृत्य कर रही थी। केरल में, परम्परागत परिधान में सफेद या हल्के पीले रंग की साड़ी पहनी जाती है। जिसमें सुनहरा किनारा होता है। वे इसी तरह की साड़ी पहने थीं। नृत्य के पहले वे मलयालम में उस नृत्य के बारे में बताती थी। यह हमारे या वहां पर भोजन कर रहे किसी के समझ में नहीं आ रहा था। मैं इनकी मुख्य नृतकी के पास गया और उससे कहा कि वह अंग्रेजी में हमें इसके बारे में बताये ताकि हम उसे ठीक से समझ सके। अगले नृत्य के पहले उसने ऎसा ही किया पर उसकी अंग्रेजी बहुत अच्छी नहीं थी । मै इतना ही समझ पाया कि वह नृत्य शिव वंदना से जुड़ा है।
कुमाराकॉम में, एक पक्षीशाला है। इस श्रंखला की अगली कड़ी में वहीं घूमने चलेंगे।
कोचीन-कुमाराकॉम-त्रिवेन्दम यात्रा
क्या कहा, महिलायें वोट नहीं दे सकती थीं।। मैडम, दरवाजा जोर से नहीं बंद किया जाता।। हिन्दी चिट्ठकारों का तो खास ख्याल रखना होता है।। आप जितनी सुन्दर हैं उतनी ही सुन्दर आपके पैरों में लगी मेंहदी।। साइकलें, ठहरने वाले मेहमानो के लिये हैं।। पुरुष बच्चों को देखे - महिलाएं मौज मस्ती करें।। भारतीय महिलाएं, साड़ी पहनकर छोटे-छोटे कदम लेती हैं।। पति, बिल्लियों की देख-भाल कर रहे हैं।। हिन्दी में नवीनतम पॉडकास्ट Latest podcast in Hindi
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- Windows पर कम से कम Audacity, MPlayer, VLC media player, एवं Winamp में;
- Mac-OX पर कम से कम Audacity, Mplayer एवं VLC में; और
- Linux पर सभी प्रोग्रामो में – सुन सकते हैं।
बताये गये चिन्ह पर चटका लगायें या फिर डाउनलोड कर ऊपर बताये प्रोग्राम में सुने या इन प्रोग्रामों मे से किसी एक को अपने कंप्यूटर में डिफॉल्ट में कर लें।
सांकेतिक शब्द
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Tuesday, July 21, 2009
भारतीय महिलाएं, साड़ी पहनकर छोटे-छोटे कदम लेती हैं
Sunday, July 12, 2009
पुरुष बच्चों को देखे - महिलाएं मौज मस्ती करें
ताज गार्डन रिट्रीट कुमाराकॉम में महिला सशक्तिकरण के कई रुप देखने को मिले। इस चिट्ठी में उनमें से एक रूप की चर्चा है।
सुबह के समय अप्रवाही जल से कुमाराकॉम का दृश्य
Friday, May 29, 2009
क्या कहा, महिलायें वोट नहीं दे सकती थीं
यह मेरी कोचीन-कुमाराकॉम-त्रिवेन्दम यात्रा की पहली कड़ी है।
मुझे त्रिवेन्द्रम में होली के आस-पास कुछ काम था। मुझे लगा कि यह बहुत अच्छा मौका है कि जब हम होली में उत्तर भारत से दूर रह सकते हैं और केरल घूम सकते है। इसीलिए हम लोगों ने ऎसा प्रोग्राम बनाया कि मैं त्रिवेन्द्रम में अपना काम कर सकूं और हम केरल भी घूम सकें।
उस समय आकाश में केवल एक ही तारा चमक रहा था और बहुत देर बाद अस्त हुआ। मेरे विचार मे वह शुक्र (venus) ग्रह था। वह तारा हमको अपने कस्बे में काफी नीचे दिखाई पड़ता है पर यहां ऊंचाई पर था। शायद, यह इसलिए था कि हम हवाई जहाज में बहुत ऊपर थे।
हम लोग हवाई जहाज पर दिल्ली से कोचीन गये। रास्ते में, एक महिला ने इस बात की घोषणा की। उसने जानकारी दी कि,
- आज अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस है।
- यह दिन, किस प्रकार से लोगों को महिलाओं का सम्मान व आदर करने की याद दिलाता है।
- वे चाहते हैं कि महिलाओं को सम्मान की दृष्टि से देखा जाय।
'यह घोषणा मैंने नहीं पर हवाई जहाज की महिला चालक ने की थी। उसने भी, यह अपने मन से नहीं कहा था पर उसे कम्पनी के तरफ से जो सामग्री दी गयी थी उसे केवल पढ़ा था।'मैंने कहा कि लेकिन जो पढ़ा था क्या उसमें यह क्यों नहीं बताया गया था कि महिला दिवस क्यों शुरू हुआ क्योंकि और यह रोचक है। परिचायिका ने कहा,
'यदि आपको इसके बारे में मालुम है तो बतायें।'
यूरोप के बहुत सारे देशों में, महिलाओं को वोट देने का अधिकार बीसवीं शताब्दी में, द्वितीय विश्वयुद्व के बाद ही मिला।
मैंने उसे बताया, कि महिला दिवस, बीसवीं शताब्दी के शुरू में, महिलाओं को वोट का अधिकार दिलवाने के लिये शुरू किया गया था। परिचायिका को यह सुनकर आश्चर्य हुआ और उसने पूछा,'क्या कभी ऎसा भी था जब महिलाओं को वोट देने का अधिकार नहीं था?'मैंने उसे बताया कि बीसवीं शताब्दी में अधिकतर देशों में महिलाओं को वोट देने का अधिकार नहीं था और यूरोप के बहुत सारे देशों में तो यह बीसवीं शताब्दी में, द्वितीय विश्वयुद्व के बाद ही मिला। इंगलैंड में भी उन्नीसवी शताब्दी में महिलाओं को वोट देने का अधिकार नहीं था। उन्हे भी यह अधिकार बीसवीं शताब्दी में, १९१८ में मिला।
६ मई १९१२ को न्यू यॉर्क में वोट के अधिकार के लिये जलूस निकालती महिलायें - चित्र विकिपीडिया से।
मैंने उसे यह भी बताया कि दुनिया में पहले महिलाओं को व्यक्ति नहीं माना गया (विस्तार से यहां और यहां पढ़ें)। सबसे पहले महिलाओं को व्यक्ति इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने माना उन्होंने यह कॉर्निया सौरबजी नामक महिला को ९ अगस्त १९२१ में वकील के रूप में पंजीकृत कर किया। यह कार्य, हाऊस आफ लार्ड ने १९२८ में, इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय के लगभग सात साल बाद, किया।
हम लोग साढ़े आठ बजे तक कोचीन पहुंचे। हम लोगो को रात कोचीन में ही बितानी थी और अगले दिन कुमराकॉम जाना था।
हम लोगों ने घूमने का पैकेज 'इन्टर साइट टूरस् एवं ट्रैवल्स्' कम्पनी से लिया था। उनकी तरफ से हवाई अड्डे पर हमें प्रवीन लेने आये थे। इस ट्रवैल कम्पनी और प्रवीन के बारे में अगली बार।
कोचीन-कुमाराकॉम-त्रिवेन्दम यात्रा
क्या कहा, महिलायें वोट नहीं दे सकती थीं।।
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- मज़हबों में सृष्टि और प्राणि उत्पत्ति की कहानी: ►
- डार्विन की समुद्र यात्रा: ►
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Sunday, September 23, 2007
एकान्तता और निष्कर्ष: आज की दुर्गा
(इस बार चर्चा का विषय है एकान्तता और इस श्रंखला का निष्कर्ष। इसे आप सुन भी सकते हैं। सुनने के लिये ► चिन्ह पर और बन्द करने के लिये ।। चिन्ह पर चटका लगायें।)
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हमारे संविधान का कोई भी अनुच्छेद, स्पष्ट रूप से एकान्तता की बात नहीं करता है। अनुच्छेद २१ स्वतंत्रता एवं जीवन के अधिकार की बात करता है पर एकान्तता की नहीं। १९९२ में मुकदमे Neera Mathur Vs. Life Insurance Corporation में उच्चत्तम न्यायालय ने एकान्तता के अधिकार को, अनुच्छेद २१ के अन्दर, स्वतंत्रता एवं जीवन के अधिकार का हिस्सा माना।
नीरा माथुर, जीवन बीमा निगम में प्रशिक्षु थीं। अपने प्रशिक्षण के दौरान उसने अवकाश लिया पर जब वह वापस आयीं तो उनकी सेवायें समाप्त कर दी गयी। उन्होने दिल्ली उच्च न्यायालय में गुहार लगायी। निगम ने न्यायालय को बताया कि, उसे नौकरी से इसलिये हटा दिया गया क्योंकि उसने नौकरी पाने के समय झूठा घोषणा पत्र दिया था।
निगम में सेवा प्राप्त करने से पहले एक घोषणा पत्र देना होता है। महिलाओं को इसमें कुछ खास सूचनायें बतानी पड़ती थीं, जैसे कि,
- रजोधर्म की आखिरी तिथि क्या है?
- क्या वे गर्भवती हैं?
- उनका कभी गर्भपात हुआ है कि नहीं, इत्यादि।
दिल्ली उच्च न्यायालय ने नीरा माथुर की याचिका खारिज कर दी पर उच्चतम न्यायालय ने उसकी अपील स्वीकार कर, उसे सेवा में वापस कर दिया। उनके मुताबिक यह सूचना किसी महिला की एकान्तता से सम्बन्धित है। न्यायालय ने कहा कि,
'The particulars to be furnished under columns (iii) to (viii) in the declaration are indeed embarrassing if not humiliating.'
इस तरह की सूचना मांगना यदि अपमानजनक नहीं है तो कम से कम शर्मिन्दा करने वाली है।
निष्कर्ष
हम लोग इस समय २१वीं सदी में पहुंच रहे हैं। लैंगिक न्याय की दिशा में बहुत कुछ किया जा चुका है पर बहुत कुछ करना बाकी भी है। क्या भविष्य में महिलाओ को लैंगिक न्याय मिल सकेगा। इसका जवाब तो भविष्य ही दे सकेगा पर लगभग ३० साल पहले रॉबर्ट केनेडी ने कहा था,
'Some men see the things as they are and say why, I dream things that never were and say why not?'
केवल कानून के बारे में बात कर लेने से महिला सशक्तिकरण नहीं हो सकता है। इसके लिये समाजिक सोच में परिवर्तन होना पड़ेगा। फिर भी, यदि हम लैंगिक न्याय के बारे में सोचते हैं, इसके बारे में सपने देखते हैं - तब, आज नहीं तो कल, हम उसे अवश्य प्राप्त कर सकेंगे।
आज की दुर्गा
महिला दिवस|| लैंगिक न्याय - Gender Justice|| संविधान, कानूनी प्राविधान और अंतरराष्ट्रीय दस्तावेज।। 'व्यक्ति' शब्द पर ६० साल का विवाद – भूमिका।। इंगलैंड में व्यक्ति शब्द पर इंगलैंड में कुछ निर्णय।। अमेरिका तथा अन्य देशों के निर्णय – विवाद का अन्त।। व्यक्ति शब्द पर भारतीय निर्णय और क्रॉर्नीलिआ सोरबजी।। स्वीय विधि (Personal Law)।। महिलाओं को भरण-पोषण भत्ता।। Alimony और Patrimony।। अपने देश में Patrimony - घरेलू हिंसा अधिनियम।। विवाह सम्बन्धी अपराधों के विषय में।। यौन अपराध।। बलात्कार परीक्षण - साक्ष्य, प्रक्रिया।। दहेज संबन्धित कानून।। काम करने की जगह पर महिलाओं के साथ छेड़छाड़।। समानता - समान काम, समान वेतन।। स्वतंत्रता।। एकान्तता और निष्कर्ष।।
Tuesday, September 11, 2007
स्वतंत्रता: आज की दुर्गा
(इस बार चर्चा का विषय है स्वतंत्रता। इसे आप सुन भी सकते हैं। यह ऑडियो फाइले ogg फॉरमैट में है। इस फॉरमैट की फाईलों को आप,
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मौलिक अधिकार, संविधान के भाग तीन में हैं। यह सारे, कुछ न कुछ, स्वतंत्रता के अलग अलग पहलूवों से संबन्ध रखते हैं पर इस बारे में संविधान के अनुच्छेद १९ तथा २१ महत्वपूर्ण हैं। अनुच्छेद १९ के द्वारा कुछ स्पष्ट अधिकार दिये गये हैं और जो अनुच्छेद १९ या किसी और मौलिक अधिकार में नहीं हैं वे सब अनुच्छेद २१ में समाहित हैं। आइये इस सम्बन्ध में C.B.Muthamma IFS Vs. Union of India (मुथन्ना केस) को समझें।
विदेश सेवा के नियमों के अन्दर ,
- विवाहित महिलाओं का विदेश सेवा में चयन नहीं किया जा सकता था;
- विदेश सेवा में काम करने वाली अविवाहित महिला को, शादी करने से पहले सरकार से अनुमति लेनी पड़ती थी; और
- यदि सरकार इस बारे में संतुष्ट है कि उसका परिवार उसके रास्ते में आयेगा तो वह उसकी सेवायें समाप्त कर सकती थी।
यह नियम केवल महिलाओं के लिए था पुरूषों के लिए नहीं। यह नियम, १९७९ में, मुथन्ना केस में अवैध घोषित कर दिया गया। न्यायालय ने कहा कि,
'Discrimination against women, in traumatic transparency, is found in this rule......if the family and domestic commitments of a woman member of the service are likely to come in the way of efficient discharge of duties, a similar situation may well arise in the case of a male member. In these days...one fails to understand the naked bias against the gentler of the species.......
And if the executive....makes [ such] rules....[then] the inference of die..hard allergy to gender parity is inevitable.'
इन नियमों में महिलाओं के खिलाफ भेद-भाव स्पष्ट रूप से दिखायी पड़ता है। यदि पारिवारिक एवं घरेलू जिम्मेदारियां महिला कार्यक्षमता को प्रभावित कर सकती हैं तो यह बात पुरूषों पर भी लागू होती है। महिलाओं के प्रति इस समय भी इस तरह का पूर्वाग्रह हमारी समझ के बाहर है।
यदि कार्यपालिका इस तरह के नियम बनाती है उससे महिलाओं के प्रति भेदभाव स्पष्ट रूप से झलकता है।
अगली बार चर्चा करेंगे एकान्तता की। वह इस श्रंखला की आखरी कड़ी है। तभी चर्चा करेंगे, इस श्रंखला के निष्कर्ष की।
आज की दुर्गा
महिला दिवस|| लैंगिक न्याय - Gender Justice|| संविधान, कानूनी प्राविधान और अंतरराष्ट्रीय दस्तावेज।। 'व्यक्ति' शब्द पर ६० साल का विवाद – भूमिका।। इंगलैंड में व्यक्ति शब्द पर इंगलैंड में कुछ निर्णय।। अमेरिका तथा अन्य देशों के निर्णय – विवाद का अन्त।। व्यक्ति शब्द पर भारतीय निर्णय और क्रॉर्नीलिआ सोरबजी।। स्वीय विधि (Personal Law)।। महिलाओं को भरण-पोषण भत्ता।। Alimony और Patrimony।। अपने देश में Patrimony - घरेलू हिंसा अधिनियम।। विवाह सम्बन्धी अपराधों के विषय में।। यौन अपराध।। बलात्कार परीक्षण - साक्ष्य, प्रक्रिया।। दहेज संबन्धित कानून।। काम करने की जगह पर महिलाओं के साथ छेड़छाड़।। समानता - समान काम, समान वेतन।। स्वतंत्रता
Saturday, September 01, 2007
समानता - समान काम, समान वेतनः आज की दुर्गा
(इस बार चर्चा का विषय है समानता - समान काम, समान वेतन। इसे आप सुन भी सकते हैं। सुनने के चिन्ह ► तथा बन्द करने के लिये चिन्ह ।। पर चटका लगायें। यह ऑडियो फाइले ogg फॉरमैट में है। इस फॉरमैट की फाईलों को आप,
किसी भी सफल न्याय प्रणाली के लिये समानता (equality), स्वतंत्रता (liberty) और एकान्तता, (privacy) का अधिकार महत्वपूर्ण है। यह लैंगिक न्याय के परिपेक्ष में भी सच है। यह बात न्यायालयों ने कई निर्णयों में कहा है। आइये इसमें से कुछ को देखें।
महिलायें किसी भी तरह से पुरूषों से कम नहीं है। यदि वे वही काम करती है जो कि पुरूष करते हैं तो उन्हें पुरूषों के समान वेतन मिलना चाहिये। यह बात समान पारिश्रमिक अधिनियम (Equal Remuneration Act) में भी कही गयी है और इसे (M/s Mackinnon Mackenzie and Co. Ltd. Vs. Audrey D'costa and other) में लागू किया।
इसमें महिला आशुलिपिक को पुरूषों से कम वेतन मिलता था। कम्पनी के अनुसार केवल महिलायें ही व्यक्तिगत आशुलिपिक (Confidential Stenographer) नियुक्त की जा सकती है और उनका वर्ग पुरूष आशुलिपिक से अलग है। इसलिये उन्हें कम वेतन दिया जाता है। उच्चतम न्यायालय ने इसे नहीं माना। न्यायालय का कहना था कि,
महिलायें व्यक्तिगत आशुलिपिक बनने के लिये न तो खास तौर से शिक्षित है न ही वे लिंग के कारणों से किसी अन्य कार्य करने के लिये अक्षम हैं। यह प्रबंधतंत्र की नीति है कि वे महिलाओं को व्यक्तिगत आशुलिपिक बनाते हैं। यदि वे इस तरह की नीति अपनाते हैं तो इस कारण वे महिलाओं को पुरूषों के बराबर वेतन देने को मना नहीं कर सकते हैं।
अगली बार चर्चा का विषय रहेगा - स्वतंत्रता
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किसी भी सफल न्याय प्रणाली के लिये समानता (equality), स्वतंत्रता (liberty) और एकान्तता, (privacy) का अधिकार महत्वपूर्ण है। यह लैंगिक न्याय के परिपेक्ष में भी सच है। यह बात न्यायालयों ने कई निर्णयों में कहा है। आइये इसमें से कुछ को देखें।
समान काम, समान वेतन Equal pay for equal work
समानता का अधिकार संविधान के अनुच्छेद १४ से १८ में है पर यह लैंगिक न्याय के दायरे में 'समान काम, समान वेतन' के दायरे में महत्वपूर्ण है। 'समान काम, समान वेतन' की बात संविधान के अनुच्छेद ३९ (घ) में कही गयी है पर यह हमारे संविधान के भाग चार 'राज्य की नीति के निदेशक तत्व' (Directive Principles of the State policy) के अन्दर है। यह न्यायालय द्वारा क्रियान्वित (Enforce) नहीं किया जा सकते है पर देश को चलाने में इसका ध्यान रखना आवश्यक है ।महिलायें किसी भी तरह से पुरूषों से कम नहीं है। यदि वे वही काम करती है जो कि पुरूष करते हैं तो उन्हें पुरूषों के समान वेतन मिलना चाहिये। यह बात समान पारिश्रमिक अधिनियम (Equal Remuneration Act) में भी कही गयी है और इसे (M/s Mackinnon Mackenzie and Co. Ltd. Vs. Audrey D'costa and other) में लागू किया।
इसमें महिला आशुलिपिक को पुरूषों से कम वेतन मिलता था। कम्पनी के अनुसार केवल महिलायें ही व्यक्तिगत आशुलिपिक (Confidential Stenographer) नियुक्त की जा सकती है और उनका वर्ग पुरूष आशुलिपिक से अलग है। इसलिये उन्हें कम वेतन दिया जाता है। उच्चतम न्यायालय ने इसे नहीं माना। न्यायालय का कहना था कि,
'If only women are working as Confidential Stenographers it is because the management wants them there. Women are neither specially qualified to be Confidential Stenographer nor disqualified on account of sex to do the work assigned to the male Stenographers. Even if there is a practice in the establishment to appoint women as Confidential Stenographer such practice can not be relied on to deny them equal remuneration due to them under the Act.'
महिलायें व्यक्तिगत आशुलिपिक बनने के लिये न तो खास तौर से शिक्षित है न ही वे लिंग के कारणों से किसी अन्य कार्य करने के लिये अक्षम हैं। यह प्रबंधतंत्र की नीति है कि वे महिलाओं को व्यक्तिगत आशुलिपिक बनाते हैं। यदि वे इस तरह की नीति अपनाते हैं तो इस कारण वे महिलाओं को पुरूषों के बराबर वेतन देने को मना नहीं कर सकते हैं।
अगली बार चर्चा का विषय रहेगा - स्वतंत्रता
आज की दुर्गा
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Monday, August 20, 2007
काम करने की जगह पर महिलाओं के साथ छेड़छाड़
(इस बार चर्चा का विषय है काम करने की जगह पर महिलाओं के साथ छेड़छाड़। इसे आप सुन भी सकते हैं। सुनने के चिन्ह ► तथा बन्द करने के लिये चिन्ह ।। पर चटका लगायें।)
काम करने की जगह पर महिलाओं के साथ छेड़छाड़ उससे कहीं अधिक है जितना कि हम और आप समझते हैं। यह बात, शायद काम करने वाली महिलाये या वे परिवार जहां कि महिलायें घर के बाहर काम करती हैं ज्यादा अच्छी तरह से समझ सकते हैं। इस बारे में संसद के द्वारा बनाया गया कोई कानून नहीं है पर १९९७ में Vishakha Vs. State of Rajasthan (विशाखा केस) में प्रतिपादित या फिर कहें कि बनाया गया है।| Sexual harassment ... |
यह निर्णय, न केवल महत्वपूर्ण है, पर अनूठा भी है।
संसद का काम कानून बनाना है, कार्यपालिका का काम उस पर अमल करना है; और न्यायालय का काम कानून की व्याख्या करना है। प्रसिद्घ न्यायविद फ्रांसिस बेकन ने कहा कि, न्यायाधीश का काम,
'To interpret law and not to make law'न्यायविद हमेशा से इसी पर जोर देते चले आ रहे हैं। हालांकि २०वीं शताब्दी में ब्रिटेन के न्यायाधीश जॉन रीड ने कहा
न्याय की व्याख्या करना है न कि कानून बनाना।
'We do not believe in fairy tales any more.'
हम अब इस तरह की परी कथाओं में विश्वास नहीं करते हैं।
विशाखा केस में न्यायायलय ने यौन उत्पीड़न (Sexual harassment) को परिभाषित किया और वे सिद्घान्त बनाये जो काम किये जाने की जगह पर अपनाये जाने चाहिये। यह काम संसद का है न कि न्यायपालिका का नहीं फिर भी न्यायालय ने ऐसा किया। यह अपने देश का पहला केस है जिसमें न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कानून बनाया। न्यायालय के शब्दों में,
'The guidelines and norms [ regarding sexual harassment at working place] would be strictly observed in all workplaces for the preservation and enforcement of the right to gender equality of the working women. These directions would be binding and enforceable in law until suitable legislation is enacted to occupy the field.'
यह सिद्घान्त तब तक लागू रहेंगे जब तक इस बारे में कोई कानून न बनाया जाय।
विशाखा केस के सिद्घान्तों को १९९९ में Apparel Export promotion Council Vs. A.K.Chopra (चोपड़ा केस) में लागू किया गया। इस केस में चोपड़ा की सेवायें, विभागीय कार्यवाही में, इसलिये समाप्त कर दी गयी क्योंकि उसने काम की जगह पर, एक कनिष्क महिला कर्मचारी के साथ छेड़छाड़ की थी। दिल्ली उच्च न्यायालय ने चोपड़ा की याचिका स्वीकार करते हुये उसे वापस सेवा में ले लिया परन्तु जितने समय तक उसने काम नहीं किया था, उसका वेतन नहीं दिलवाया।
उच्चतम न्यायालय ने इस निर्णय के विरूद्घ अपील को स्वीकार कर, चोपड़ा की सेवायें समाप्त करने के विभागीय आदेश को बहाल कर दिया। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि,
'That sexual harassment at the place of work, results in violation of the fundamental right to gender equality and the right to life and liberty.. the two most precious fundamental rights guaranteed by the Constitution of India.'.....
कार्य की जगह यौन उत्पीड़न का होना लैंगिक समानता, स्वतंत्रता एवं जीने के मौलिक अधिकारों का हनन है। यह अधिकार, हमारे संविधान के दो बहुमूल्य अधिकार हैं।
उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली उच्च न्यायालय को फटकार लगाते हुये कहा,
'The observations made by the High Court to the effect that since the respondent did not “actually molest” Miss X but only “tried to molest” her and, therefore, his removal from service was not warranted, rebel against realism and lose their sanctity and credibility....The High Court overlooked the ground realities and ignored the fact that the conduct of the respondent against hhis junior female employee, Miss X, was wholly against moral sanctions, decency and was offensive to her modesty. Reduction of punishment in a case like this....is a retrograde step.'
उच्च न्यायालय ने कहा है कि विपक्ष पक्ष [चोपड़ा] ने सुश्री 'क' के साथ छेड़छाड़ नहीं की थी पर केवल इसका प्रयत्न किया था इसलिये उसे सेवा से हटाया जाना ठीक नहीं था। उनकी यह टिप्पणी वास्तविकता के खिलाफ है। विपक्ष पक्ष का अपनी कनिष्ठ महिला कर्मचारी के साथ का बर्ताव किसी तरह से क्षम्य नहीं था इस तरह के मामले में सजा कम करना पीछे जाने का कदम है। उच्च न्यायालय ने मामले को गलत तरीके से देखा है।
लैंगिक न्याय के परिपेक्ष में - समानता (equality), स्वतंत्रता (liberty) और एकान्तता (privacy) – का क्या अर्थ है यह अगली बार।
आज की दुर्गा
महिला दिवस|| लैंगिक न्याय - Gender Justice|| संविधान, कानूनी प्राविधान और अंतरराष्ट्रीय दस्तावेज।। 'व्यक्ति' शब्द पर ६० साल का विवाद – भूमिका।। इंगलैंड में व्यक्ति शब्द पर इंगलैंड में कुछ निर्णय।। अमेरिका तथा अन्य देशों के निर्णय – विवाद का अन्त।। व्यक्ति शब्द पर भारतीय निर्णय और क्रॉर्नीलिआ सोरबजी।। स्वीय विधि (Personal Law)।। महिलाओं को भरण-पोषण भत्ता।। Alimony और Patrimony।। अपने देश में Patrimony - घरेलू हिंसा अधिनियम।। विवाह सम्बन्धी अपराधों के विषय में।। यौन अपराध।। बलात्कार परीक्षण - साक्ष्य, प्रक्रिया।। दहेज संबन्धित कानून।। काम करने की जगह पर महिलाओं के साथ छेड़छाड़
Monday, August 13, 2007
दहेज संबन्धित कानून
(इस बार चर्चा का विषय है दहेज संबन्धित कानून। इसे आप सुन भी सकते हैं। सुनने के चिन्ह ► तथा बन्द करने के लिये चिन्ह ।। पर चटका लगायें।)
| dowry prhibition w... |
दहेज बुरी प्रथा है। इसको रोकने के लिये दहेज प्रतिषेध अधिनियम १९६१ बनाया गया है पर यह कारगर सिद्घ नहीं हुआ है। इसकी कमियों को दूर करने के लिये फौजदारी (दूसरा संशोधन) अधिनियम १९८६ के द्वारा, मुख्य तौर से निम्नलिखित संशोधन किये गये हैं:
- भारतीय दण्ड संहिता में धारा ४९८-क जोड़ी गयी;
- साक्ष्य अधिनियम में धारा ११३-क, यह धारा कुछ परिस्थितियां दहेज मृत्यु के बारे में संभावनायें पैदा करती हैं;
- दहेज प्रतिषेध अधिनियम को भी संशोधित कर मजबूत किया गया है।
'Laws are not enough to combat the evil. A wider social movement of educating women of their rights, to conquer the menace, is....needed more particularly in rural areas where women are still largely uneducated and less aware of their rights and fall an easy prey to their exploitation.....
It is expected that the courts would deal with such cases in a more realistic manner and not allow the criminals to escape on account of procedural technicalities or insignificant lacunae in the evidence as otherwise the criminals would receive encouragement and the victims of crime would be totally discouraged by the crime going unpunished. The courts are expected to be sensitive in cases involving crime against women. The verdict of acquittal made by the trail court in this case is an apt illustration of the lack of sensitivity on the part of the trial court.'
दहेज की बुराई केवल कानून से दूर नहीं की जा सकती है। इस बुराई पर जीत पाने के लिये सामाजिक आंदोलन की जरूरत है। खास तौर पर ग्रामीण क्षेत्र में, जहां महिलायें अनपढ़ हैं और अपने अधिकारों को नहीं जानती हैं। वे आसानी से इसके शोषण की शिकार बन जाती हैं।. . . .
न्यायालयों को इस तरह के मुकदमे तय करते समय व्यावहारिक तरीका अपनाना चाहिये ताकि अपराधी, प्रक्रिया संबन्धी कानूनी बारीकियों के कारण या फिर गवाही में छोटी -मोटी, कमी के कारण न छूट पाये। जब अपराधी छूट जाते हैं तो वे प्रोत्साहित होते हैं और आहत महिलायें हतोत्साहित। महिलाओं के खिलाफ आपराधिक मुकदमे तय करते समय न्यायालयों को संवेदनशील होना चाहिये।
इस मुकदमे में परीक्षण न्यायालय ने दोषी को छोड़ दिया था। यह दर्शाता है कि न्यायालय संवेदनशील नहीं हैं।
उच्चतम न्यायालय का कथन अपनी जगह सही है पर मेरे विचार से दहेज की बुराई तभी दूर हो सकती है जब,
- महिलायें शिक्षित हों; और
- आर्थिक रूप से स्वतंत्र हों।
अगली बार - काम करने की जगह पर यौन उत्पीड़न।
आज की दुर्गा
महिला दिवस|| लैंगिक न्याय - Gender Justice|| संविधान, कानूनी प्राविधान और अंतरराष्ट्रीय दस्तावेज।। 'व्यक्ति' शब्द पर ६० साल का विवाद – भूमिका।। इंगलैंड में व्यक्ति शब्द पर इंगलैंड में कुछ निर्णय।। अमेरिका तथा अन्य देशों के निर्णय – विवाद का अन्त।। व्यक्ति शब्द पर भारतीय निर्णय और क्रॉर्नीलिआ सोरबजी।। स्वीय विधि (Personal Law)।। महिलाओं को भरण-पोषण भत्ता।। Alimony और Patrimony।। अपने देश में Patrimony - घरेलू हिंसा अधिनियम।। विवाह सम्बन्धी अपराधों के विषय में।। यौन अपराध।। बलात्कार परीक्षण - साक्ष्य, प्रक्रिया।। दहेज संबन्धित कानून
Friday, August 03, 2007
बलात्कार परीक्षण - साक्ष्य, प्रक्रिया: आज की दुर्गा
(इस बार चर्चा का विषय है बलात्कार परीक्षण: साक्ष्य, प्रक्रिया। इसे आप सुन भी सकते हैं। सुनने के चिन्ह ► तथा बन्द करने के लिये चिन्ह ।। पर चटका लगायें।)
| rape evidence proc... |
विधि आयोग ने अपनी ८४वीं रिपोर्ट पर साक्ष्य अधिनियम को भी बदलने के लिए संस्तुति की थी। इस रिपोर्ट के द्वारा साक्ष्य अधिनियम की धारा १४६ की उपधारा ४ और नयी धारा ५३-क जोड़ने की बात है। लेकिन सरकार ने रिपोर्ट की इन संतुतियों को स्वीकार नहीं किया। यह संशोधन साक्ष्य अधिनियम में नहीं किया गया है। इसके बावजूद न्यायालयों ने इसके सिद्घान्त को अपने निर्णयों के द्वारा स्वीकार कर लिया है। मुख्यत:, यह कार्य उन्होंने, १९९१ और १९९६ में दो अलग-अलग निर्णयों State of Maharashtra Vs. Madhukar Narain Mardikar (मधुकर केस) और १९९६ में State of Punjab Vs. Gurmeet Singh (गुरमीत केस), में किया है।
मधुकर केस, सेवा से सम्बन्धित केस था। एक पुलिस इंस्पेक्टर पर, बलात्कार करने में और उसके सम्बन्ध में गलत कागजात तैयार करने का आरोप था। विभागीय कार्यवाही में, यह आरोप सिद्घ हो जाने के बाद, पुलिस इन्स्पेक्टर को नौकरी से हाथ धोना पड़ा। पुलिस इन्स्पेक्टर ने, बम्बई उच्च न्यायालय में गुहार लायी। उसकी याचिका स्वीकार कर ली गयी और उसे नौकरी पर वापस कर दिया गया। उच्चतम न्यायालय इस फैसले को यह कहते हुए रद्द कर दिया,
'The High Court observes that since Banubi [the women who was raped] is an unchaste women it would be extremely unsafe to allow the fortune and career of a government official to be put in jeopardy upon the uncorroborated version of such a woman who makes no secret of her illicit intimacy with another person. She was honest enough to admit the dark side of her life. Even a woman of easy virtue is entitled to privacy and no one can invade her privacy as and when he likes. … Therefore, merely because she is a woman of easy virtue, her evidence cannot be thrown overboard.'उच्च न्यायालय ने कहा कि, बनुबी [महिला जिसके साथ बलात्कार किया गया] गिरे चरित्र की महिला थी और किसी भी सरकारी अफसर का भविष्य ऎसी महिला के असमर्थित बयान पर तय करना ठीक नहीं होगा जो कि अपने और दूसरे व्यक्ति के साथ गलत सम्बन्धों को स्वीकार करती है। इस महिला ने अपने जीवन के गिरे हिस्से को स्वीकार कर सच्चाई बरती है। आसान सतीत्व चरित्र की महिलाओं को भी एकान्तता का अधिकार है। उनकी एकान्तता के साथ कोई व्यक्ति मनमानी नहीं कर सकता है। किसी महिला की गवाही केवल इसलिये नहीं नकारी जा सकती है कि वह आसान सतीत्व चरित्र की है।
गुरमीत सिंह का केस बलात्कार से सम्बन्धित दाण्डिक केस था। विचारण न्यायालय ने गुरमीत सिंह को छोड़ दिया था लेकिन पंजाब व हरियाणा उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार की अपील को स्वीकार कर गुरमीत सिंह को सजा दे दी थी। उच्चतम न्यायालय ने गुरमीत सिंह की सजा बहाल करते हुये कहा,
'The courts must deal with such [rape] cases with utmost sensitivity. The courts should examine the broader probabilities of a case and not get swayed by minor contradictions of insignificant discrepancies in the statement of the prosecutrix. … If evidence of the prosecutrix inspires confidence, it must be relied upon without seeking corroboration of her statement in material particulars.'…न्यायालयों को बलात्कार के मामलों पर संवेदनशीलता से विचार करना चाहिए। न्यायालयों को मुकदमें की व्यापक संभावनाओं को देखना चाहिए और अभियोक्त्री के कथन में मामूली विसंगतियों या अमहत्वपूर्ण अंतर के कारण डांवाडोल नहीं होना चाहिए। यदि अभियोक्त्री का साक्ष्य विश्वास उत्पन्न करता है तो उस पर बिना किसी समर्थित गवाही के भरोसा किया जाना चाहिए।
Some defence counsels adopt the strategy of continual questioning of the prosecutrix as to the details of the rape. Then victim is required to repeat again and again the details of rape incident not so much a to bring out the facts on record or to test her credibility but to test her story for inconsistencies with a view to attempt to twist the interpretation of events given by her so as to make them appear inconsistent with her allegations. … The court must also ensure that cross-examination is not made a means of harassment or causing humiliation to the victim of crime. The Court, therefore, should not sit as a silent spectator while the victim of crime is being cross-examined by the defence. It must effectively control the recording of evidence in the court.
…
Wherever possible it may also be worth considering whether it would not be more desirable that the cases of sexual assaults on the females are tried by lady Judges, wherever available, so that the prosecutrix can make her statement with greater ease. …
The courts should, as far as possible, avoid disclosing the name of the prosecutrix in their orders to save further embarrassment to the victim of sex crime. …
We … hope that the trial courts would take recourse to the provisions of Sections 327(2) and (3) CrPC liberally. Trial of rape cases in camera should be the rule and an open trial in such cases an exception.'
कई अधिवक्ता, अभियोक्त्री से बलात्कार के संबंध में निरंतर प्रश्न करते रहने की नीति अपनाते हैं। उससे बलात्कार संबंधित घटना के ब्यौरे को बार-बार दोहराने की अपेक्षा इसलिये नहीं की जाती है, ताकि अभिलेख पर तथ्यों को लाया जा सके अथवा उसकी विश्वसनीयता का परीक्षण किया जा सके बल्कि इसलिये कि घटनाक्रम के निर्वचन को मोड़कर उसमें विसंगति लायी जा सके। न्यायालय को यह देखना चाहिए कि प्रतिपरीक्षा, आहत व्यक्ति को परेशान करने या जलील करने का तरीका तो नहीं है। प्रतिपरीक्षा के समय, न्यायालय को मूक दर्शक के रूप में नहीं बैठना चाहिये पर उस पर कारगर रूप से नियंत्रण करना चाहिये।
यह भी विचारणीय है कि क्या यह अधिक वांछनीय नहीं कि, जहां तक संभव हो लैंगिक आघात के मामलों का विचारण महिला न्यायाधीशों द्वारा, किया जाए। इस तरह आहत महिला आसानी से अपना बयान दे सकती है।
जहां तक संभव हो, न्यायालय आहत महिला का नाम निर्णयों में न लिखें जिससे उसे आगे जलील न होना पड़े।
हम यह आशा करते हैं कि विचारण न्यायालय दंड प्रक्रिया संहिता की धारा ३२७ (२) और (३) के अन्दर निहित अधिकारों का उपयोग उदारतापूर्वक करेंगे। सामान्यत: बलात्कार के मुकदमे बन्द न्यायालय में होने चाहिये और खुला विचारण अपवाद होना चाहिए।
इन दो निर्णयों के द्वारा न्यायालयों ने इन छः सिद्धानतों को प्रतिपादित किया हैः
- किसी महिला की गवाही केवल इसलिये नहीं नकारी जा सकती है कि वह आसान सतीत्व चरित्र की है;
- यदि अभियोक्त्री का साक्ष्य विश्वास उत्पन्न करता है तो उस पर बिना किसी समर्थित गवाही के भरोसा किया जाना चाहिए;
- प्रतिपरीक्षा के समय, न्यायालय को मूक दर्शक के रूप में नहीं बैठना चाहिये पर उस पर कारगर रूप से नियंत्रण करना चाहिये;
- जहां तक संभव हो लैंगिक आघात के मामलों का विचारण महिला न्यायाधीशों द्वारा, किया जाए;
- न्यायालय आहत महिला का नाम निर्णयों में न लिखें;
- सामान्यत: बलात्कार के मुकदमे बन्द न्यायालय में होने चाहिये और खुला विचारण अपवाद होना चाहिए।
अगली बार चर्चा का विषय रहेगा दहेज प्रतिषेध कानून के बारे में।
आज की दुर्गा
महिला दिवस|| लैंगिक न्याय - Gender Justice|| संविधान, कानूनी प्राविधान और अंतरराष्ट्रीय दस्तावेज।। 'व्यक्ति' शब्द पर ६० साल का विवाद – भूमिका।। इंगलैंड में व्यक्ति शब्द पर इंगलैंड में कुछ निर्णय।। अमेरिका तथा अन्य देशों के निर्णय – विवाद का अन्त।। व्यक्ति शब्द पर भारतीय निर्णय और क्रॉर्नीलिआ सोरबजी।। स्वीय विधि (Personal Law)।। महिलाओं को भरण-पोषण भत्ता।। Alimony और Patrimony।। अपने देश में Patrimony - घरेलू हिंसा अधिनियम।। विवाह सम्बन्धी अपराधों के विषय में।। यौन अपराध।। बलात्कार परीक्षण - साक्ष्य, प्रक्रिया
Sunday, July 29, 2007
यौन अपराध: आज की दुर्गा
(इस बार चर्चा का विषय है यौन अपराध। इसे आप सुन भी सकते हैं। सुनने के चिन्ह ► तथा बन्द करने के लिये चिन्ह ।। पर चटका लगायें।)
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यौन अपराध के मुकदमों में सबसे ज्यादा चर्चित मुकदमा Tuka Ram Vs. State of Maharashtra है। यह मथुरा बलात्कार केस के नाम से भी जाना जाता है। इसके अन्दर मथुरा नाम की लड़की अपने प्रेमी के साथ भाग गयी थी। उसके भाई ने प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करायी। इस पर वह पकड़ी गयी और पुलिस स्टेशन लायी गयी। वहां उसका बयान भी दर्ज किया गया। कहा जाता है कि पुलिस स्टेशन के अन्दर, उसके साथ हेड कांस्टेबिल और अन्य कांस्टेबिलों ने उसके साथ बलात्कार किया। मैं यह इसलिये कह रहा हूं क्योंकि यह आरोपी, उच्चतम न्यायालय के द्वारा वे छोड़ दिये गये हैं। इस केस की महत्वपूर्ण बात यह थी कि इसमें इस बात से कोई इंकार नहीं था कि पुलिस स्टेशन के अन्दर हेड कांस्टेबिल और बाकी कांस्टेबिलों ने लड़की के साथ संभोग किया पर सवाल यह था कि क्या इस संभोग में लड़की की रजामंदी थी अथवा नहीं।
इस मुकदमे में परीक्षण न्यायालय ने आरोपियों को छोड़ दिया था पर बम्बई उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार की अपील स्वीकार कर ली थी। उच्चतम न्यायालय ने आरोपियों की अपील स्वीकार कर, उन्हें छोड़ दिया। उच्चतम न्यायालय के अनुसार,
'The consent in question was not a consent which could be brushed aside as passive submission'.अधिकतर न्यायविद इस निर्णय को गलत निर्णय मानते हैं। मेरे विचार से यह उच्चतम न्यायालय के अच्छे निर्णयों में से नहीं है।
...
'It [ The High Court ] did not give a finding that such fear [for sexual intercourse] was shown to be that of death or hurt.'
प्रश्नगत सहमति ऎसी सहमति नहीं थी जिसे यह कहकर अस्वीकृत किया जा सके कि वह निश्चेष्ट आत्म-समर्पण है।
...
उच्च न्यायालय ने इस तरह का कोई भी निष्कर्ष नहीं दिया गया कि संभोग करने के लिये मृत्यु या चोट पहुंचाने की धमकी दी गयी थी।'
इस निर्णय के आने के पहले ही, विधि आयोग ने १९७१ में ही अपनी ४२वीं रिपोर्ट पर बलात्कार के कानून को बदलने के लिए कहा था पर सरकार ने कुछ नहीं किया था। इस निर्णय के बाद उठे तूफान पर, सरकार ने पुन: विधि आयोग से रिपोर्ट देने की प्रार्थना की।
विधि आयोग ने १९८० में अपनी ८४वीं रिपोर्ट दी। इस रिपोर्ट की कुछ संस्तुतियों की स्वीकृति के बाद, Criminal Law Amendment Act 1983 ( Act no. 43 of 1983) के द्वारा फौजदारी कानून में इस विषय पर आमूल-चूल परिवर्तन किया गया।
इस संशोधन अधिनियम से,
- भारतीय दण्ड संहिता की धारा ३७५ व ३७६ के स्थान पर नई धारायें स्थापित की गयी और धारायें ३७६-क से ३७६-घ जोड़ी गयी।
- साक्ष्य अधिनियम में भी नयी धारा ११४-क जोड़ी गयी। इस संशोधन के द्वारा, कुछ परिस्थितियों में (जैसे कि मथुरा बलात्कार मुकदमे में थीं) आरोपी को सिद्घ करना है कि बलात्कार नहीं हुआ है।
- दंड प्रक्रिया संहिता की धारा ३२३ भी बदली गयी। अब न्यायालय बलात्कार के मुकदमे का विचारण बन्द कमरे में कर सकता है; या मीडिया में उसके प्रचार को मना कर सकता है।
आज की दुर्गा
महिला दिवस|| लैंगिक न्याय - Gender Justice|| संविधान, कानूनी प्राविधान और अंतरराष्ट्रीय दस्तावेज।। 'व्यक्ति' शब्द पर ६० साल का विवाद – भूमिका।। इंगलैंड में व्यक्ति शब्द पर इंगलैंड में कुछ निर्णय।। अमेरिका तथा अन्य देशों के निर्णय – विवाद का अन्त।। व्यक्ति शब्द पर भारतीय निर्णय और क्रॉर्नीलिआ सोरबजी।। स्वीय विधि (Personal Law)।। महिलाओं को भरण-पोषण भत्ता।। Alimony और Patrimony।। अपने देश में Patrimony - घरेलू हिंसा अधिनियम।। विवाह सम्बन्धी अपराधों के विषय में।। यौन अपराध
Friday, July 27, 2007
प्रेम तो है बस विश्वास, इसे बांध कर रिशतों की दुहाई न दो
यह कोई बीस साल पहले की बात है, शुभा पहली बार लम्बे समय के लिये विदेश जा रही थी। मुन्ने को कुछ गर्व था तो कुछ दुख कि मां इतने लम्बे समय के लिये छोड़ कर जा रही है। एक दिन उसने मुझसे पूछा, क्या मां हमें प्यार नहीं करती। मैंने कहा नहीं वह हम सबसे बहुत प्यार करती है पर तुम ऐसा क्यों सोचते हो। उन्होने पूछा,
हमने बैठ कर कई मुद्दों पर बात की। मैंने कहा, मैं तो रहूंगा, तुम्हें कोई मुश्किल नहीं होगी। उसने पूछा,
मैं नहीं जानता कि वह कितना समझ पाया लेकिन यह सच है कि उसने अपनी मां का विदेश जाना, स्वीकार कर लिया। उसके पीछे, वह बहुत खुश रहा। मैं नहीं जानता कि वह इसलिये की उन्हें मेरी बात समझ में आयी या इस लिये कि शुभा तो आर्मी की जनरल साहिबा हैं और मैं - शायद भावना में हर पल को जीने वाला। उसे कभी इतनी छूट नहीं मिली - इस समय भी नहीं जब वह अपना बसेरा, बहुत दूर, अपने घोसले में बसाने चला गया।
पिछले साल हम सब, मुन्ना, परी काफी समय बाद एक साथ थे। मैंने पूछा क्या तुम मुझे प्यार करते हो। उसका जवाब था,
प्यार तो है बस विश्वास, इसे बांध कर रिशतों की दुहाई न दो। यदि बांध कर रखा तो वही होगा, जैसा यहां हिन्दुस्तानी डाक्टर के साथ हुआ।
अगली बार हम बात करेंगे इस श्रंखला के निष्कर्ष की। क्या यह वह शायरी है जो मैंने अपने चिट्ठे में दहिने तरफ अपलोड कर रखी है या फिर कुछ और। जीवन में इतने दुख नहीं हैं इस श्रंखला का निष्कर्ष तो कुछ और ही है। अगली हम बात करेंगे उस गाने की जो मेरे विचार से इस श्रंखला का निचोड़ है, उस फिल्म की जिससे वह लिया गया है।
अच्छा आपके हिसाब से कौन सा गाना होना चाहिये? कौन सा गाना प्यार का सबसे अच्छा अर्थ बताता है? क्या कहा बौबी फिल्म का यह गाना - मजाक करते हैं :-)
भूमिका।। Our sweetest songs are those that tell of saddest thought।। कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन, बीते हुए दिन वो मेरे प्यारे पल छिन।। Love means not ever having to say you're sorry ।। अम्मां - बचपन की यादों में।। रोमन हॉलीडे - पत्रकारिता।। यहां सेक्स पर बात करना वर्जित है।। जो करना है वह अपने बल बूते पर करो।। करो वही, जिस पर विश्वास हो।। अम्मां - अन्तिम समय पर।। अनएन्डिंग लव।। प्रेम तो है बस विश्वास, इसे बांध कर रिशतों की दुहाई न दो।। निष्कर्षः प्यार को प्यार ही रहने दो, कोई नाम न दो।। जीना इसी का नाम है।।
'यदि वह हमसे प्यार करती है तो इतने दिन तक हमें क्यों छोड़ कर जा रही है। हमें कुछ मुश्किल होगी तो कौन बतायेगा।'मैं कैसे उन्हें बताऊं ।
हमने बैठ कर कई मुद्दों पर बात की। मैंने कहा, मैं तो रहूंगा, तुम्हें कोई मुश्किल नहीं होगी। उसने पूछा,
'क्या तुम्हारे पास समय है'मैंने कहा कि जब मां थी तो वह समय निकालती थी, जब तक वह नहीं है, तब मैं निकालूंगा। उनको यह बताने का प्रयत्न किया,
'प्यार तो विश्वास है, यह लोगों को बांधता नहीं पर उन्हें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है जो उनके जीवन में महत्वपूर्ण है। रिश्तों का बांध कर रखना ठीक नहीं।'
मैं नहीं जानता कि वह कितना समझ पाया लेकिन यह सच है कि उसने अपनी मां का विदेश जाना, स्वीकार कर लिया। उसके पीछे, वह बहुत खुश रहा। मैं नहीं जानता कि वह इसलिये की उन्हें मेरी बात समझ में आयी या इस लिये कि शुभा तो आर्मी की जनरल साहिबा हैं और मैं - शायद भावना में हर पल को जीने वाला। उसे कभी इतनी छूट नहीं मिली - इस समय भी नहीं जब वह अपना बसेरा, बहुत दूर, अपने घोसले में बसाने चला गया।
पिछले साल हम सब, मुन्ना, परी काफी समय बाद एक साथ थे। मैंने पूछा क्या तुम मुझे प्यार करते हो। उसका जवाब था,
'पापाऽऽ!! यह कैसा सवाल है।'मैंने बहुत सीरियस हो कर पूछा तुम बहुत दूर, सात समुंदर पार चले गये हो बस इसलिये जानना चाहा। वे मेरी सीरियस मुद्रा समझ गये। उनका मुस्कराते हुऐ, जवाब था
'पापा, मुझे तुम्हारी बीस साल पहले की बात आज भी याद है।'वे मुझसे कहते हैं कि मैं भी वहीं उनके पास आ जाऊं पर मैं जानता हूं कि मेरा जीना यहां ही है और मेरी मौत भी यहीं होगी।
प्यार तो है बस विश्वास, इसे बांध कर रिशतों की दुहाई न दो। यदि बांध कर रखा तो वही होगा, जैसा यहां हिन्दुस्तानी डाक्टर के साथ हुआ।
अगली बार हम बात करेंगे इस श्रंखला के निष्कर्ष की। क्या यह वह शायरी है जो मैंने अपने चिट्ठे में दहिने तरफ अपलोड कर रखी है या फिर कुछ और। जीवन में इतने दुख नहीं हैं इस श्रंखला का निष्कर्ष तो कुछ और ही है। अगली हम बात करेंगे उस गाने की जो मेरे विचार से इस श्रंखला का निचोड़ है, उस फिल्म की जिससे वह लिया गया है।
अच्छा आपके हिसाब से कौन सा गाना होना चाहिये? कौन सा गाना प्यार का सबसे अच्छा अर्थ बताता है? क्या कहा बौबी फिल्म का यह गाना - मजाक करते हैं :-)
भूमिका।। Our sweetest songs are those that tell of saddest thought।। कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन, बीते हुए दिन वो मेरे प्यारे पल छिन।। Love means not ever having to say you're sorry ।। अम्मां - बचपन की यादों में।। रोमन हॉलीडे - पत्रकारिता।। यहां सेक्स पर बात करना वर्जित है।। जो करना है वह अपने बल बूते पर करो।। करो वही, जिस पर विश्वास हो।। अम्मां - अन्तिम समय पर।। अनएन्डिंग लव।। प्रेम तो है बस विश्वास, इसे बांध कर रिशतों की दुहाई न दो।। निष्कर्षः प्यार को प्यार ही रहने दो, कोई नाम न दो।। जीना इसी का नाम है।।
Tuesday, July 03, 2007
विवाह सम्बन्धी अपराधों के विषय में: आज की दुर्गा
(इस बार चर्चा का विषय है वैवाहिक सम्बन्धी अपराध। इसे आप सुन भी सकते हैं। सुनने के चिन्ह ► तथा बन्द करने के लिये चिन्ह ।। पर चटका लगायें।)
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लैंगिक न्याय से सम्बन्धित, सबसे ज्यादा विवादास्पद विषय दण्ड न्याय का है। यहां पर न केवल लैंगिक न्याय को देखना है पर उसका अभियुक्त के अधिकारों के साथ ताल- मेल भी बैठाना है।
इसके पहले कि हम इस विषय पर हम नजर डालें, भारतीय दण्ड संहिता (Indian Penal Code) में विवाह सम्बन्धी अपराधों के विषय की दो धाराओं - धारा ४९७ (Adultery) और ४९८ (Enticing or taking away or detaining with criminal intent a married woman) - की चर्चा करना ठीक रहेगा। पर इन्हीं दो को क्यों?
विवाह सम्बन्धी अपराध, भारतीय दण्ड संहिता के २०वें अध्याय में हैं। इस अध्याय में छः धारायें हैं पर इन दो धारओं के बारे में, भारत सरकार के द्वारा गठित, राष्ट्रीय महिला आयोग ने इन्हें यह कहते हुऐ हटाने की मांग की थी कि,
- यह धारायें १९वीं शताब्दी की मान्यता को बनाये रखती हैं;
- इन मान्यताओं में पत्नी को पति की सम्पत्ति माना जाता था; और
- यह धारायें पत्नियों को पति से न्याय दिलाने में मुश्किल पैदा करती हैं।
गलत आचरण और कानून में अन्तर
आचरण कानूनी तौर पर गलत हो सकता है और अपराध भी, पर इन पर इन दोनों में अंतर है। यदि कोई आचरण, कानून के विरूद्घ है तो वह कानूनी तौर पर गलत आचरण है। सारे कानूनी तौर पर गलत आचरण के लिये सजा नहीं है और जिनके लिये है वे अपराध या फिर जुर्म कहलाते हैं। अर्थात हर अपराध, कानूनी तौर पर गलत आचरण होता है पर हर गलत आचरण अपराध नहीं होता है।कानूनी तौर पर गलत आचरण - यदि वह अपराध न भी हो तो भी - के व्यावहारिक परिणाम (civil consequences) हो सकते हैं।
धारा ४९७ - भारतीय दण्ड संहिता
किसी विवाहित व्यक्ति के लिए अपने पती/पत्नी की अनुमति के बिना, किसी अन्य व्यक्ति के साथ संभोग करना कानूनी तौर पर गलत आचरण है पर भारतीय दण्ड संहिता की धारा ४९७ केवल उस पुरूष को दण्डित करती है जो कि किसी विवाहित महिला के साथ उसके पति की अनुमति के बिना संभोग करता है। यहाँ यह आचरण विवाहित महिला के लिए अपराध नहीं है।यदि कोई विवाहित पुरूष किसी अविवाहित महिला के साथ अपनी पत्नी की अनुमति के बिना संभोग करता है तो यह अपराध नहीं है हालांकि कि यह कानूनी तौर पर गलत आचरण है।
जैसा मैंने पहले बताया है कि कानूनी तौर पर गलत आचरण के व्यावहारिक परिणाम हो सकते हैं। उपर बताये गये, कानूनी तौर पर गलत आचरण (जो अपराध नहीं हैं) पर तलाक हो सकता है।
धारा ४९७ - भारतीय दण्ड संहिता
इसी तरह से भारतीय दण्ड संहिता की धारा ४९८, विवाहित महिला को गलत इरादे से संभोग करने के लिये भगा ले जाने को, अपराध करार करती है।दण्ड प्रक्रिया की धारा १९८ (२) के अंतर्गत, इन दोनों अपराधों की संज्ञान भी खास परिस्थिति में ही लिया जा सकता है। अथार्त सब लोग इस बारे में शिकायत नहीं कर सकते हैं।
दुनिया के बहुत सारे देशों में इस तरह के आचरण को अपराधों की श्रेणी में नहीं रखा गया है पर तलाक लिया जा सकता है।
इन धाराओं की वैधता
यह दोनों धाराओं में महिलाओं से पक्षपात परिलक्षित होता है। इन दोनों धाराओं की वैधता को उच्चतम न्यायालय में Alamgir Vs. State of Biihar (१९५९) में चुनौती दी गयी थी। न्यायालय ने माना कि,‘The provisions of S. 498 like those of S 497 are intended to protect the rights of the husband and not those of the wife.
…
The policy underlying the provisions of S. 498 may no doubt sound inconsistent with the modern notions of the status of women and of the mutual rights and obligation under marriage.'
'[It] is a question of policy with which courts are not concerned.'
धारा ४९८, के प्राविधान धारा ४९७ की तरह पतियों के अधिकारों की सुरक्षा के लिये है न कि पत्नियों के अधिकारों के लिये।
...
आज के समय में धारा ४९८ की नीति, महिलाओं की सामाजिक स्थिति एवं शादी के आपसी अधिकारों व कर्तव्य से असंगत है।
...
यह नीति के सवाल हैं और इनका न्यायालय से कोई सम्बन्ध नहीं है।
यह सब स्वीकारने के बाद भी, न्यायालय ने, इन धाराओं को वैध मान लिया। बाद के फैसलों में भी यही मत रहा। अब तो शायद, संसद को ही कुछ करना पड़े या क्या मालुम कोई महिला न्यायमूर्ति आये - वही कुछ करे। महिला न्यायमूर्तिं ही क्यों?
यह भी एक रोचक विषय है कि,
- न्यायमूर्तीगण फैसला किस प्रकार से देते हैं;
- महत्वपूर्ण फेसला देते समय, वे क्या देखते हैं;
- किस कारण से, उनके बीच मतभेद हो जाता है; और
- महत्वपूर्ण फैसला देते समय, वे किन कारणों पर विचार करते हैं?
इस बारे में सबसे प्रसिद्ध पुस्तक अमरीका के न्यायमूर्ति कारडोज़ो ने 'The Nature of Judicial Prcess' (१९२१) के नाम से लिखी है। यह वास्तव में येल विश्वविद्यालय के सामने दिये गये 'स्टोरस् भाषण' (Storrs Lectures) हैं। यह आसान विषय नहीं है, लम्बा चलने वाला है - समय रहा तो इस पर भी लिखूंगा पर अभी तो यह श्रंखला समाप्त करनी है। इसमें अगली बार चर्चा रहेगी - यौन अपराधों के बारे में। इसमें हम देखेंगे कि किस तरह से इनसे संबन्धित कानून में परिवर्तन आया।
आज की दुर्गा
महिला दिवस|| लैंगिक न्याय - Gender Justice|| संविधान, कानूनी प्राविधान और अंतरराष्ट्रीय दस्तावेज।। 'व्यक्ति' शब्द पर ६० साल का विवाद – भूमिका।। इंगलैंड में व्यक्ति शब्द पर इंगलैंड में कुछ निर्णय।। अमेरिका तथा अन्य देशों के निर्णय – विवाद का अन्त।। व्यक्ति शब्द पर भारतीय निर्णय और क्रॉर्नीलिआ सोरबजी।। स्वीय विधि (Personal Law)।। महिलाओं को भरण-पोषण भत्ता।। Alimony और Patrimony।। अपने देश में Patrimony - घरेलू हिंसा अधिनियम।। विवाह सम्बन्धी अपराधों के विषय में
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