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Sunday, December 25, 2022

माननीय योगी जी, कृपया निलंबन वापस करवायें

इस चिट्ठी में, 'लब पे आती है दुआ बनके तमन्ना मेरी' प्रार्थना पर उठे विवाद पर चर्चा है।

 यहां इस प्रार्थना को सुनें। यह कितनी मधुर और मन को शान्त करने वाली है। यह प्रार्थना सिद्धार्थ नगर उत्तर प्रदेश के स्कूल में गायी जा रही है।


Thursday, October 15, 2020

हम कहां जा रहे हैं

 इस चिट्ठी में तनिष्क विज्ञापन पर उठे विवाद पर चर्चा है।


Tuesday, March 12, 2019

यह हम क्या कर रहे हैं

इस चिट्ठी में सर्फ-एक्सल के नये के विज्ञापन पर उठे विवाद पर चर्चा है। 

Friday, November 19, 2010

मेरी खूबसूरती का राज़ है ...

इस चिट्ठी में महिलाओं की सुन्दरता के बारे में कहे गये ऑड्री हेपबर्न के शब्द हैं। हांलाकि,  यह पुरुषों के लिये भी सच हैं।
फिल्म रोमन हॉलीडे में ऑड्री हेपबर्न

Saturday, September 19, 2009

जो वायदा किया, वो निभाना पड़ेगा

इस चिट्ठी में सॉफ्टवेयर फ्रीडम डे और लोकप्रिय  ओपेन सोर्स सॉफ्टवेयर  के बारे में चर्चा है।
'अरे उन्मुक्त जी कौन सा वायदा,  किसने किया,  कब किया?'
अरे, वही वायदा, जो आपने, हिन्दी चिट्ठाजगत ने - अपने आप से किया था। आज सितम्बर माह का तीसरा शनिवार है। इस दिन प्रत्येक साल, सॉफ्टवेयर मुक्ति दिवस (Software Freedom Day) बनाया जाता है। याद नहीं, आपने वायदा नहीं किया था कि आज के दिन से, कम से कम, आप एक ओपेन सोर्स सॉफ्टवेयर का प्रयोग करना शुरू करेंगे। अरे इस दिवस के बारे में, मैंने पिछले सालों में,  'आइम् लविंग इट' और 'मुक्त सॉफ्टवेयर दिवस' शीर्षक से बताया था। लगता है कि आप भूल गये। 

चलिये, कोई बात नहीं। मैं पुनः कुछ मुक्त सॉफ्टवेयरों के बारे चर्चा करता हूं जिन्हें आप बहुत आसानी से  विंडोज़ पर इस्तेमाल कर सकते हैं। यह लिनेक्स पर भी चलते हैं। पहले आप इन्हें विंडोज़ पर प्रयोग कीजिये फिर जब मन आये तब लिनेक्स शुरू कर दीजियेगा। ठीक, अब वायदा पक्का, थम्ब प्रॉमिस (thumb promise),  याद रखेंगे न।


linux Pictures, Images and Photos

सबसे पहले मॉज़िला के तीन बेहतरीन मुक्त प्रोग्राम के बारे में बात करते हैं।  यह तीनो मॉज़िला पब्लिक लाइसेन्स, जो कि एक ओपेन सोर्स लाइसेन्स है, के अन्दर प्रकाशित हैं। 
  • फायरफॉक्स: यह अन्तरजाल पर सबसे बेहतरीन वेब ब्रॉउज़र है। मैं सारे काम इसी पर करता हूं। अपने चिट्ठे, पॉडकास्ट इसी पर करता हूं। आपकी चिट्ठियां भी इसी पर पढ़ता हूं। इसमें पहले हिन्दी के साथ कुछ मुश्किल थी पर अब नहीं।
  • थंडरबर्ड: यह ई-मेल भेजने और प्राप्त करने के सॉफ्टवेर है। मैं आपकी ईमेल इसी पर प्राप्त करता हूं और इसी से आपको ईमेल लिखता हूं।  इसमें चिट्ठों की आरएसएस फीड भी स्थापित की जा सकती है। मैंने पहले इसी पर फीड स्थापित कर चिट्‌ठों को पढ़ता था।
  • सनबर्ड: यह ई-मैनेजर है। यह आपको प्रिय जनों का जन्मदिन, शादी की सालगिरह की याद दिलाता है। मैंने अपने मित्रों, सहयोगियों का जन्मदिन, शादी की सालगिरह इसी पर नोट कर रखी है। उन्हें हमेशा आश्चर्य होता है कि मैं कैसे उन सब का जन्मदिम और शादी की सालगिरह याद रखता हूं। बस, इसका यही राज है। इसे आप अलग से या फिर थंडरबर्ड या फायरफॉक्स के साथ स्थापित कर चला सकते हैं। मैंने इसे  थंडरबर्ड के साथ स्थापित कर रखा है।

मैं कार्यलाय से संबन्धित सारे कार्य ओपेनऑफिस डाट कॉम के आफिस स्वीट में करता हूं।मुझे इसमें या एमएस वर्ड में कोई अन्तर नहीं लगता यह उतना ही अच्छा है। बस इसका फायदा यह है कि यह मुफ्त है। इसमें कई प्रोग्राम हैं
  • राइटर: इसका प्रयोग मैं लिखने के लिये करता हूं। मैं अपनी सारी चिट्ठियां, समय की सुविधा के अनुसार ऑफलाइन पर लिख लेता हूं। इसके बाद धीरे धीरे कड़ियों पर उन्हें अपने चिट्ठों पर डालता हूं। इसमें एक बेहतरीन सुविधा है कि यह न केवल आपकी फाइलों को पीडीएफ मानक में बदल सकता है पर यह पीडीऐफ फाइलों को संशोधित भी कर सकता है। मेरा काम लिखने से संबन्धित है। यह सारे मैं इसी पर करता हूं। मैंने कुछ पुस्तकें अंग्रेजी में लिखी हैं। सौभाग्य से इनके कई संस्करण भी निकलें हैं। यह सारे मैंने इसी पर किये हैं। मुझे इसमें कभी भी कोई मुश्किल नहीं हुई। यह डिफॉल्ट में मुक्त मानक में फाइलों को सुरक्षित करता है। लेकिन आप चाहें तो किसी भी अन्य मानक या  एमएस वर्ड के डिफॉल्ट मानक डॉक पर भी फाइलें सुरक्षित कर सकते हैं। आप अपने एमएस वर्ड पर काम करने वाले मित्र को उसी के मनचाहे मानक पर फाइलें भेज सकते हैं या फिर उनसे सन-माइक्रोसिस्टम का यह मुफ्त प्लग-इन डाउनलोड कर अपने एमएस वर्ड के प्रोग्राम में स्थापित करने के लिये कह सकते हैं ताकि यह मुक्त मानक की फाइलों को पढ़ सकें।
  • इम्प्रेस: मुझे  अकसर सम्मेलन में या फिर विद्यार्थियों के बीच बोलने का मौका मिलता है। मैं प्रस्तुतिकरण (presentation) के लिये इसी का प्रयोग करता हूं। मेरे सुनने वालों ने कभी नहीं कहा कि मेरा प्रस्तुतिकरण किसी प्रकार भी पावर पॉइंट पर बने प्रस्तुतिकरण से कम अच्छा है। मैं सुविधा के लिये अपने प्रस्तुतिकरण की एक फाइल पीपीटी मानक और पीडीएफ मानक पर भी बना कर ले जाता हूं। यह सुविधा भी इसमें है। 
  • इसके अतिरक्त कार्यालय के अन्य तरह के काम करने के लिये चार अन्य प्रोग्राम, मैथ, कैल, ड्रॉ, और बेस भी हैं। जिन पर बाकी सारी तरह की फाडलें बना सकते हैं। मुझे उनका प्रयोग करने की जरूरत नहीं पड़ती है। इसलिये मैं उनके बारे में नहीं लिख पा रहा हूं। आप  लिख सकतें हों तो क्या बात है। 


मल्टीमीडिया और चित्रों के लिये ओपेन सोर्स में बेहतरीन प्रोग्राम हैं।
  • वीएलसी मीडिया प्लेयर और एमप्लेयर: आप इन दोनो प्रोग्राम में ऑडियो और वीडियो के प्रत्येक प्रकार के मानकों की फाइलों को सुन सकते हैं। मैं इसी पर सुनता या देखता हूं।
  • ऑडेसिटी: इस प्रोग्राम में, ऑडियो फाइलों को सुना, संपादित, और रिकॉर्ड किया जा सकता है। मैं अपनी बकबक (मेरे पॉडकास्ट), इसी पर रिकॉर्ड करता हूं। इसमें एमपी-३ पइलों के लिये प्लग-इन डालना होता है। यह करने में कोई मुश्किल नहीं होती है। आप  एमपी-३ मानक में भी रिकॉर्ड कर सकते हैं। किसी भी मानकों की फाइलों को दूसरे मानक में बदल सकते हैं। मैं अपने पॉडकास्ट ऑग मानक पर रिकॉर्ड करता हूं। पॉडभारती में मेरे दो पॉडकास्ट 'स्कॉट की अन्तिम यात्रा' और 'पापा क्या आप उलझन में हैं' को पुनः यहां और यहां प्रकाशित किया है। वे एमपी-३ मानक में हैं। मेरे विचार से यह उन्होंने, इसी प्रोग्राम का प्रयोग कर किया है।
  • गिम्प: इस प्रोग्राम का प्रयोग चित्रों को संपादित करने के लिये कया जाता है। इसमें आप चित्रों सम्पादित और उनका पिक्सल कम कर सकते हैं। चिट्ठों पर चित्र डालते समय उन्हें अक्सर सम्पादित करना पड़ता है। क्योंकि यदि चित्र के किसी भाग का महत्व उस चिट्ठी के लिये नहीं है तो उसे रखने की कोई जरूरत नहीं। चिट्ठों पर चित्रों  को हमेशा पिक्सल कम करके डालना चाहिये। इससे चिट्ठा और वह चिट्ठी दोनो जल्दी लोड होती हैं।  यह  काम मैं इसी पर करता हूं। 
यदि आप और मुक्त सॉफ्टवेयर के प्रोग्रामों के बारे में जानना चाहें तो आप मेरी बिटिया को लिखी चिट्ठी 'ओपेन सोर्स की पाती - बिटिया के नाम' पर या फिर 'वेलेंटाइन दिवस, ओपेन सोर्स के साथ मनायें' चिट्ठी पर पढ़ सकते हैं।
linux Pictures, Images and Photos
'उन्मुक्त जी, जब बाज़ार में सारे प्रोग्राम दस रुपये की सीडी में मिल जाते हैं तो फिर   ओपेन सोर्स के टंटे करने का क्या फायदा?'
सवाल तो वाज़िफ है। मैं जवाब देने की कोशिश करता हूं।
  • मैं लिनेक्स और ओपेन सोर्स प्रोग्राम का प्रयोग इसलिये करता हूं क्योंकि मैं चाहता हूं सब इनका प्रयोग करें। यह धुर सत्य है, आप जैसी  दुनिया चाहो, वैसा स्वयं बनो। 
  • महात्मा गांधी ने एक बार कहा, 'साधन, अन्त से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।' यह बात यहां भी लागू होती। इसके लिये मैं उलझन में नहीं रहता
  • न केवल बच्चे, पर हम सब व्यवहार से सीखते हैं न कि उपदेश से। इस पर काम करने से 'एक घन्टा, एक मिनट लगता है' :-)
  • इनका प्रयोग करने के कारणों में, सबसे मुख्य बात यह है कि इनका प्रयोग करने में कॉपीराइट का उल्लंघन नहीं होता और यह मुफ्त हैं। इसका प्रयोग आप अपनी अन्तरात्मा को बिना गिरवी रखे कर कर सकते हैं।
  • आपने पंचतंत्र की  कछुवा और खरगोश की कहानी तो सुनी होगी। इसमें, आजकल  बदलाव हो हो गया है। यह बदलाव ओपेन सोर्स के करीब है। आपको नहीं मालुम तो यहां पढ़ लीजिये।
  • यही वह जगह जहां पेंग्युन भी उड़ सकती हैं
  • आपको तो मालुम ही है कि ओपेन सोर्स सॉफ्टवेयर का सबसे जाना माना प्रोग्राम लिनेक्स है और इसे प्रयोग करने वाले पुरुष तो खास होते हैं। वे न केवल जोशीले और उत्साही होते हैं पर उन्हें महिलायें भी अधिक पसन्द करती हैं। पुरुष पाठक समय न गवायें,  तुरन्त खुद ही यहां पढ़ें। 
  • क्या कहा, आप पुरुष नहीं, महिला हैं।  कोई बात नहीं। अब वह सुबकने वाली, पुरुषों का साया ढ़ूढ़ने वाली महिला कहां रह गयी है। महिला तो आज की दुर्गा है उसका सशक्तिकरण हो चुका है। वे पुरुषों से किसी क्षेत्र में कम नहीं, फिर देर किस बात की - शुरू करिये प्रयोग करना ओपेन सोर्स के प्रोग्राम।

मैं जानता हूं कि आप यहां ओपेन सोर्स का भाषण सुनने नहीं आये हैं। आप तो आये हैं ताजमहल के प्यारे से गाने को सुनने के लिये जो इस चिट्ठी का शीर्षक है। लीजिये वह भी सुन लीजिये। लेकिन इस गाने कुछ को इस तरह से समझियेगा,
जो वायदा किया, वो निभाना पड़ेगा।
रोके तुम्हारा डर चाहे,
तुमको मुक्त सॉफ्टवेयर प्रयोग करना पड़ेगा
हो वायदा किया है तुमने,  
मुक्त सॉफ्टवेयर प्रयोग करने का।
वह वायदा तो तुम्हें निभाना पड़ेगा, निभाना पड़ेगा।



जब आप में से अधिकांश यह चिट्ठी पढ़ रहे होंगे तो मैं अपने कस्बे से दूर, कुछ दिनो तक हिमाचाल, हरियाणा, और पंजाब के दौरे पर रहूंगा। मेरा अपने आप से वायदा है कि मैं लैपटॉप न ले जाउं और इस काल्पनिक दुनिया से दूर रहूं। देखता हूं कि इसमें सफल रहता हूं कि नहीं। 

 मेरी 'केरल यात्रा' एवं 'डार्विन, विकासवाद, और मज़हबी रोड़े'  श्रंखलायें समाप्त हो रही हैं।  बहुत जल्द, मैं आपको नयी श्रंखलाओं  पर ले चलूंगा। इनमें से एक ऐसे उपन्यास और उससे जुड़ी कहानियों के बारे में है जो न केवल २०वीं शताब्दी के उत्कृष्ट अमेरिकन साहित्य में गिना जाना जाता है पर,  मेरी बिटिया के अनुसार, जिसे अमेरिका के कॉलेज जाने वाले प्रत्येक विद्यार्थी ने कम से कम एक बार पढ़ा है। दूसरा हो सकता है कि मैं आपको कुल्लू मनाली की यात्रा पर ले चलूं। 
 






मुक्त सॉफ्टवेयर से संबन्धित अन्य चिट्ठियां




About this post in Hindi-Roman and English

is post per software freedom day or lokpriya open source program ke baare mein charchaa hai. kumarkom mein pkshishaala hai. yeh hindi (devnaagree) mein hai. ise aap roman ya kisee aur bhaarateey lipi me padh sakate hain. isake liye daahine taraf, oopar ke widget ko dekhen.


This post is about software freedom day and popular open source programme. It is in Hindi (Devanagari script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.

सांकेतिक शब्द
 software freedom day,
Free software, information , Information Technology, Intellectual Property Rights, information technology, Internet, Internet, Open source software, software, software, technology, technology, Technology, technology, technology, Web, आईटी, अन्तर्जाल, इंटरनेट, इंटरनेट, ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर, टेक्नॉलोजी, टैक्नोलोजी, तकनीक, तकनीक, तकनीक, सूचना प्रद्योगिकी, सॉफ्टवेयर, सॉफ्टवेर,

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Sunday, August 02, 2009

अंकल, क्या आप मुझे इसका पप दे सकते हैं

मैंने दस साल पहले जरूर कोई अच्छा काम किया होगा क्योंकि तभी ईश्वर ने मुझे मेरे जीवन का सबसे अच्छा उपहार दिया।

टॉमी का जन्म अप्रैल १९९९ में हुआ था। वह हमारे पास जून १९९९ में आया। हम उसे दिल्ली के एक डॉग केनल से ले कर आये थे। उसने न केवल हमारे जीवन में खुशियां भरी पर उन बहुत से लोगों के जीवन में भी जो हमारे अपने हैं हमसे करीब हैं और बहुत से अजनबी लोगों के भी। उसके पिल्ले जो कि अब स्वयं बड़े हो गये हैं, उनके जीवन में खुशियां बिखेर रहें हैं।

मैंने अपने जीवन में बहुत से नस्ल के कुत्ते पाले हैं देसी, एलसेशियन, लेब्रॉडर, पॉम, डोबरमैन, बॉक्सर पर टॉमी गोल्डन रिट्रीवर था, उसकी बात ही अलग थी। वह इन सबसे अलग क्लास में था। शायद इसलिये गोल्डन रिट्रीवर न केवल दुनिया में सबसे लोकप्रिय पारिवारिक कुत्ते माने जाते हैं पर रजिस्ट्रेशन के मुताबिक हैं भी। मालुम नहीं, मेरे किस जीवन का दोस्त था जो इतने दिन बाद मिला।



मेरे घर के सामने से अनगिनत कारें निकलती हैं पर मजाल कि वह उठे भी पर मेरी कार जब २०० मीटर दूर भी हो तो उसकी पूंछ का हिलना और भौंकना देखने काबिल होता था। अक्सर पहली बार हमारे घर में आये लोगों को अजीब लगता था कि एकदम से उसे क्या हो गया पर कुछ देर बाद समझ में आता था जब मेरी कार गेट के अन्दर आती थी।


मैं जब भी घर के अन्दर आता, वह हमेशा गेट पर पूंछ हिलाते और भौंकते ही मिलता था। लगता था कि वह दिन भर मेरे इंतजार में ही बैठा रहता था। शुभ्रा को हमेशा मुझसे जलन होती थी उसके आने पर पूंछ तो हिलाता था पर गेट पर पहुंच कर भौंकता नहीं था।

मैं कभी कभी शुभ्रा की कार लेकर भी बाहर जाता था पर वह न केवल कार की आवाज ही समझता था पर यह भी कि उसमें कौन है। यदि मैं उसमें हूं तो उसका बर्ताव वही होता था जो कि मेरी कार के लिये। शायद इसीलिये शुभ्रा को लगता था कि वह मेरे तीन प्रेमों में से एक था और इसीलिये क्रिकेट की नेटवेस्ट की सिरीस् जीतने के बाद वह भी हमारे साथ आइसक्रीम खाने गया था।

टॉमी का पहला काम था प्रतिदिन सुबह गेट से अखबार, पत्रिकायें लाना। वह पत्र, निमत्रंण कार्ड भी लाता था। अक्सर मैं डाकियों से कहता कि पत्र टॉमी को दे दें। वे उसे आश्चर्य से देखते फिर और भी आश्चर्य में डूबते जब वह चिट्ठी मुझे ला कर देता। हां उसे इसके लिये हमेशा एक बिस्किट मिलता।

मुझे याद है कि कुछ साल पहले हमारे कस्बे में लिओनिडस् उल्कापात (leonids meteor shower) सबसे अधिक था। हम रात को ढाई बजे नदी के किनारे इसे देखने गये थे। टॉमी भी हमारे साथ था। उसे साथ रखने में, मुझे विश्वास रहता था कि वह मुझे कुछ भी गड़बड़ी से बचा लेगा।


पिछले कुछ सालों को छोड़ कर, कस्बे में हुऐ सारे डॉग शो में, उसने भाग लिया। वह शो राष्ट्रीय स्तर का, या राज्य स्तर का, या फिर जिले स्तर का, उसे प्रत्येक में कोई न कोई पुरुस्कार मिला।

डॉग शो में, वह बच्चों के बीच वह सबसे लोकप्रिय होता था। बच्चे अक्सर मुझसे पूछते कि क्या वे उसे छू सकते हैं। मेरे जवाब होता कि न केवल वे उसे छू सकते हैं पर चूम भी सकते हैं। शायद ही कोई बच्चा होगा जिसने इसके गले में हाथ डाल कर इसे प्यार न किया हो। वे हमेशा मुझसे कहते,
'अंकल, क्या आप मुझे इसका पप दे सकते हैं।'
मेरा जवाब होता जरूर पर पहले तुम्हारी मां को उसके सेवा करने की जिम्मेवारी लेनी होगी। बहुत कम मांएं यह काम अपने हाथ में लेने के तैयार होती।

कुछ लोग, कुत्तों की मेटिंग पसन्द नहीं करते हैं। वे इसके लिये मना करते हैं। मुझे यह ठीक नहीं लगता। मेरे विचार से यह प्राकृतिक है। इसकी अनुमति देनी चाही।

टॉमी के पास, न केवल मेरे कस्बे से, पर दूर दूर की जगहों से लोग मेटिंग के लिये कुत्तियां ले कर आते थे। आप चाहें तो इसके लिये पैसा ले लें या फिर अपनी पसन्द का पिल्ला। हमें पैसे की जरूरत नहीं। ईश्वर ने हमें बहुत दिया। हमने हमेशा पप ही लिया। उसे, उन्हें उपहार में दिया जो हमारे दिल के पास हैं। इसी तरह से टॉमी उनके जीवन में वह खुशियां दे पाया जिसकी उन्हें आशा भी न थी।

टॉमी को गेंद लाना पसन्द था। आप गेंद फेंकते फेंकते थक जायेंगे पर वह गेंद लाते नहीं। कुछ साल पहले मुन्ना अमेरिका से उसके लिये एक गेंद फेंकने वाला लाया। इसमें गेंद को हाथ से छूना नहीं पड़ता गेंद उसमें फंसायी जा सकती है और आसानी से फेंकी जा सकती है। जब से वह आया तब से कुछ राहत आयी।


जिन कुत्तों के पूंछ में बाल होते हैं उनका पिछला भाग बहुत साफ नहीं रह पाता है। उसे खास तरह से साफ करना होता है क्योंकि बाल के कारण कुछ गन्दगी फंसी रह जाती है जिससे बिमारी हो जाती है। हम यह सफाई करते थे पर शायद ठीक प्रकार से नहीं। शायद यही कारण था कि उसके पिछले भाग में एक ट्यूमर हो गया था। हमने उसका ऑपरेशन करवाया था पर यह कुछ मुश्किल करता था। लेकिन वह ठीक था।

छः दिन पहले मुझे लगा कि उसे खड़े होने पर मुश्किल हो रही है। अगले दिन वह खड़ा नहीं हो पा रहा था। उसे मुश्किल होने लगी। हम उसे सुबह और शाम डाक्टर के पास ड्रिप लगवाने के लिये ले जाते थे। कल जब वह ड्रिप लगवा कर वापस आया तो तकलीफ में था। हमें लगा कि ड्रिप से उसे तकलीफ होती है और फिर ड्रिप न लगवाने की सोची।

टॉमी की हालत बिगड़ रही थी। वह उठ नहीं पाता था, इसलिये गन्दा भी हो गया और बदबू भी करता था। मैंने कल शाम को उसे पाउडर लगाया, ब्रश किया। वह महकने लगा, जंच रहा था, बिलकुल हीरो की तरह।

मैंने उसे, शाम को ही बाहर लॉन में लिटा दिया। रात को अन्दर किया। उस समय वह जीवित था। कुछ देर बाद, मैं उसे दूध पिलाने के लिये गया। उसके मुंह के चारो तरफ खून था। वह वहां चला गया था जहां से कोई वापस नहीं आता।

मैंने उसे पुनः साफ किया। रात में ही, हम ने उसे, घर में सामने की ओर, लॉन के बगल में, चूने और नमक के साथ गाड़ दिया। उसकी आखें फाटक और घर की तरफ - हमारी चौकीदारी करते हुऐ। वह हमेशा इसी तरह से बैठता था - एक नजर मुझ पर दूसरी नजर बाकी सारी जगह पर - कहीं कोई मुझ पर हमला न कर दे। मैं जब घर में होता, वह मेरा पीछा, साये की तरह करता।

कितनी यादें हैं कितने सुनहरे पल हैं, कितनी खुशियां है। मेरे लिये सब लिखना संभव नहीं।

हे ईश्वर, तुम्हें धन्यवाद कि तुमने मुझे ऐसा उपहार दिया।

अलविदा मेरे मित्र, मित्रता दिवस पर तुम्हें सलाम। तुम हमेशा मेरे जहन में, मेरी यादों में रहोगे। मेरे साथ इतने सुनहरे पल बिताने का शुक्रिया।

पुनः हमने टॉमी की याद में, उसकी कब्र के दो तरफ, बेला और काजू का पेड़ लगाया है ताकि आने वाले समय में, उसकी महक और याद, हमेशा रहे।

Saturday, May 09, 2009

डार्विन, विकासवाद, और मज़हबी रोड़े - भूमिका

यह चिट्ठी, चार्लस् डार्विन के जन्म के २००वें साल पर शुरू की गयी नयी श्रंखला, 'डार्विन, विकासवाद, और मज़हबी रोड़े' की भूमिका है।
इसे आप सुन भी सकते है। सुनने के लिये यहां चटका लगायें। यह ऑडियो फाइल ogg फॉरमैट में है। इस फॉरमैट की फाईलों को आप,
  • Windows पर कम से कम Audacity, MPlayer, VLC media player, एवं Winamp में;
  • Mac-OX पर कम से कम Audacity, Mplayer एवं VLC में; और
  • Linux पर सभी प्रोग्रामो में,
सुन सकते हैं। ऑडियो फाइल पर चटका लगायें। यह आपको इन फाइल के पेज पर ले जायगा। उसके बाद जहां Download और उसके बाद फाइल का नाम अंग्रेजी में लिखा है वहां चटका लगायें। इन्हेंं डाउनलोड कर ऊपर बताये प्रोग्राम में सुने या इन प्रोग्रामों मे से किसी एक को अपने कंप्यूटर में डिफॉल्ट में कर ले।


कुछ समय पहले शास्त्री जी ने एक चिट्ठी 'ईश्वर की ताबूत का आखिरी कील!' नामक शीर्षक से लिखी थी। इसमें ईश्वर का संदर्भ देते हुऐ चार्ल्स डार्विन (Charles Darwin) के विकासवाद (evolution) के सिद्धांत को गलत बताने का प्रयत्न किया गया था।



इस पर अरविन्द जी ने टिप्पणी की,
'मैं कोई पुराना चिट्ठाबाज़ तो नही हूँ मगर अल्प समय मे आपके मानवीय गुणों ने मुझे प्रभावित किया है, मगर मुझे यह असुविधाजनक अंदेशा भी रहा है की आपका कोई प्रायोजित मकसद भी है। मुझे यह भी डर था की आप देर सवेर अपने ब्लॉग पर डार्विन को घसीटेंगे जरूर और सच मानिए मेरा संशय सच साबित हो गया। डार्विन ... की पुस्तक डिसेंट ऑफ़ मैन ने सचमुच मनुष्य के पृथक सृजन की बाइबिल -विचारधारा पर अन्तिम कील ठोक दी थी तब से बौद्धिकों मे डार्विन के विकास जनित मानव अस्तित्व की ही मान्यता है। इस मुद्दे पर मैं आपसे दो दो हाथ करने को तैयार हूँ। आप कृपया यह बताये कि डार्विन के किस तथ्य को बाइबिल वादियों ने ग़लत ठहराया है? एक एक कर कृपया बताएं ताकि इत्मीनान से उत्तर दिया जा सके। हिन्दी के चिट्ठाकार बंधू भी शायद गुमराह होने से बच सकें।'


इस चिट्ठी पर मेरी टिप्पणी यह थी,

'शायद इस चिट्ठी की बातें न तो प्रमाणिक हैं न ही ठीक।
डार्विन एक महानतम वैज्ञानिकों में से एक हैं। वे स्वयं पादरी बनना चाहते थे इसलिये उन्होने Origin of Species प्रकाशित करने में देर की। उनका जीवन संघर्षमय रहा। यदि आप Irving Stone की The Origin पुस्तक पढ़ें तो उनके बारे में सारे तथ्य सही परिपेक्ष में सामने आयेंगे।
इस बारे में, अमेरिका में ... मुकदमा चला। पहला तो १९२० के दशक में था। इसमें फैसला Origin of Species के विरुद्ध रहा। यह अमेरिका के कानूनी इतिहास के शर्मनाक फैसलों में गिना जाता है। इसके बाद [के] ... फैसले ... Origin of Species के पक्ष में हुऐ हैं।
...
विज्ञान और धर्म दो अलग अलग क्षेत्र की बातें हैं। मेरे विचार से दोनो को जोड़ना ठीक नहीं।
मैं agnostic [अज्ञेयवादी] हूं यदि मेरे विचारों से दुख पहुंचा तो क्षमा प्रार्थी हूं।'
यह श्रंखला इसी विषय के बारे में है।


एक तरफ इस श्रंखला को लिखने कुछ हिचक सी लग रही है। इसका कारण यह है कि डारविन के बारे में बहुत कुछ सामग्री हिन्दी चिट्ठाजगत पर उपलब्ध है। अरविन्द जी कुछ बेहतरीन चिट्ठियां अपने चिट्ठे पर यहां और यहां तथा कुछ Science Blogger's Association of India पर लिखीं हैं। रचनाकार में सूरज प्रकाश और के पी तिवारी ने उनकी आत्मकथा का हिन्दी में अनुवाद प्रकाशित किया है। सच यह है कि मैं अपने आप को, इस सामग्री में कुछ भी जोड़ पाने में असमर्थ पाता हूं।


नवयूवक वैज्ञानिक डार्विन का चित्र विकिपीडिया से

दूसरी तरफ,
  • डारविन न ही केवल महानतम वैज्ञानिकों से एक थे पर वे हिम्मती और बेहतरीन व्यक्ति थे। शायद उनकी जैसी हिम्मत वाला और बेहतरीन व्यक्तित्व का कोई अन्य वैज्ञानिक नहीं हुआ है। मुझे लगता है कि मेरे जीवन काल में इस साल से बेहतर समय, इस महान व्यक्ति को श्रधांजलि देने के लिये नहीं आयेगा
  • चर्च ऑफ इंगलैंड (Church of England) ने डार्विन के साथ किये गये अन्याय पर माफी मांग ली है पर हर मज़हब में कुछ लोग कट्टरवादी होते हैं। वे अक्सर विज्ञान, तथ्य, और तर्क को स्वीकार नहीं कर पाते हैं। मैंने कुछ समय पहले 'ज्योतिष, अंक विद्या, हस्तरेखा विद्या, और टोने-टुटके' नामक श्रंखला भी, ऐसी ही एक अन्य भ्रांति दूर करने के लिये लिखी थी। इस समय, एक अन्य भ्रांति, सर्जनवाद (Creationism) (नया नाम Intelligent Design) के नाम पर अपना फन उठा रही है। मेरे जीवन काल में, इस विषय पर लिखने के लिये, शायद वर्ष २००९ से बेहतर कोई अन्य साल नहीं होगा।
  • इस दुनिया से, विदा हो जाने के बाद ही, यह चिट्टा मेरी याद दिलायेगा, सनद रहेगा कि मैं इस अंधकार में खो नहीं गया था - मैंने भी अपनी आपत्ति दर्ज की थी; मैंने भी एक दिया इस अन्धकार को मिटाने के लिये जलाया था।
बस यही कारण है कि मैं यह श्रंखला शुरु कर रहा हूं।

इस श्रंखला में हम चर्चा करेंगे,
  • डार्विन की;
  • प्रणियों के उत्पत्ति की, विकासवाद की;
  • मज़हबों की, सृजनवाद की;
  • सृजनवादियों की विकासवाद के विरुद्ध आपत्तियों की;
  • इन दोनो विचारधाराओं से जुड़े विवाद; तथा
  • इससे जुड़े चर्चित मुकदमों की।
हो सकता है कि, यह श्रंखला कुछ लोगों को कष्ट पहुंचायें। मैं पहले से ही उन लोगों से माफी मांगता हूं। मेरा कोई उद्देश्य किसी को दुख पहुंचाने या उसकी भावनाओं को ठेस पहुचाना नहीं है पर मैं अपनी बात, जो मेरे हिसाब से ठीक है, उसे में सबके सामने रखना चाहता हूं।


अगली बार डार्विन के जीवन से जुड़ी कुछ बातें, उसके जीवन के महत्वपूर्ण पड़ाव।

रिचर्ड डॉकिंस् (Richard Dawkin) जीव वैज्ञानिक हैं। वे ऑक्सफर्ड विश्विद्यालय में प्रोफेसर रह चुके हैं। इस समय विज्ञान को लोकप्रिय बनाने के लिये लिखते हैं। डार्विन के महत्व और विज्ञान एवं मज़हब के बीच द्वन्द को इस प्रकार से समझाते हैं।

डार्विन, विकासवाद, और मज़हबी रोड़े
भूमिका,


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yeh chitthi, charles darwin ke janm ke 200vein saal per nayee shrankhla 'darwin, vikaasvaad, aur majhabi rore' kee bhumika hai. yeh hindi (devnaagree) mein hai. ise aap roman ya kisee aur bhaarateey lipi me padh sakate hain. isake liye daahine taraf, oopar ke widget ko dekhen.


This post is introduction to the new series 'Darwin, Evolution and Religious Fundamentalism'. It is in Hindi (Devanagari script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.




सांकेतिक चिन्ह
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Sunday, April 12, 2009

शुक्रिया ... एक शर्मीली शख़्सियत का

मैंने अपनी पिछली चिट्ठी 'भगवान की दुनिया - तभी दिखायी देगी जब खिड़की साफ हो' पर भेड़ाघाट-धुआंधार का सुन्दर चित्र लगाया था। वह मेरे द्वारा नहीं खींचा गया था । उसे मैंने कहीं से चुराया था। मेरा वायदा था कि मैं उसके बारे में, अगली चिट्ठी में लिखूंगा - यह चिट्ठी उसी चोरी के बारे में है।

'लेकिन उन्मुक्त जी, आप भेड़ाघाट-धुआंधार चित्र ...?'
हां, हां उसी चित्र के बारे में बता रहा हूं। इतने उतावले क्यों हो रहे हैं।

मैंने भेड़ाघाट-धुंआंधार का चित्र नितिन जी के चिट्ठे 'पहला पन्ना' से लिया था। इस चिट्ठे पर कुछ बेहतरीन चित्र हैं। इस चिट्ठी में सारे चित्र उसी चिट्ठे से ही लिये गये हैं।


बसन्त ऋतु में पेड़ों की सुन्दरता

मैं जब पहली बार उनके चिट्ठे पर पहुंचा तो मुझे लगा कि वे किसी व्यावसायिक छविकार से कम नहीं हैं। मैं नहीं जानता वे क्या करते हैं पर शायद कंप्यूटर इंजीनियर हैं। यह मैं उनके अपने बारे में लिखे परिचय के आधार पर कह रहा हूं। वे लिखते हैं कि वे तकनीक से जुड़े हैं और उनका व्यवसाय - माथा पच्ची है। वे, अपने बारे में लिखते हैं
'अमेरिका के एक गाँव में एक भारतीय...'
अरे, इतना छोटा परिचय जो अपने बारे में कुछ न बताये। क्या आपको नहीं लगता कि वे बेहद शर्मीले हैं? मुझे तो वे शर्मीले व्यक्तित्व के लगते हैं।

मेरी उनसे मित्रता उनकी उनकी एक चिट्ठी पर टिप्पणी करने के बाद शुरू हुई। यह आज भी बरकरार है। इसके लिये मैं अपने को खुशकिस्मत और भाग्यशाली मानता हूं। वे मेरी चिट्ठियों पर अक्सर टिप्पणियां करते हैं हांलाकि मैं उनके चिट्ठे पर टिप्पणी करने से चूक जाता हूं। गलत बात है न। लेकिन यह उनके व्यक्तित्व का बड़प्पन दिखाता है कि वे दूसरे के चिट्ठे पर टिप्पणियां अपने चिट्ठे पर टिप्पणियां पाने के लिये नहीं करते। यह, टिप्पणियों के विश्लेषण में लिखी गयी, बहुत सी चिट्ठियों को नकारता है।


लगभग तीन साल पहले, उन्होंने मुझे एक पहेली भेजी जिसमें में ४=५ सिद्ध किया गया था। मैंने जब उनके पास पहेली का हल भेजा तब उन्होंने मुझे इस पर कुछ लिखने का आग्रह किया। मैंने इस पेहली को 'चार बराबर पांच, पांच बराबर चार, चार…' नामक चिट्ठी में लिखा। मैंने इसका हल नहीं लिखा क्योंकि इसका हल कुछ चिट्ठाकार बन्धुवों ने उसी चिट्ठी पर टिप्पणियों द्वारा दे दिया था।

मैंने उक्त पहेली की व्याख्या अलग तरीके से 'आईने, आईने, यह तो बता - दुनिया मे सबसे सुन्दर कौन' नामक चिट्ठी में लिखी। शायद वह नहीं सोचते थे कि इस पहेली की इस तरह से भी व्याख्या की जा सकती है।

'एक अनमोल तोहफ़ा' चिट्ठी में, सवालों के जवाब देने के लिये, उन्हें भी नामित किया गया था। सवालों का जवाब उन्होंने
अपनी चिट्ठी 'खेल खेल में' लिखा है। सवाल, 'क्या हिन्दी चिट्ठेकारी ने आपके व्यक्तिव में कुछ परिवर्तन या निखार किया?' का वे जवाब देते हुऐ लिखते हैं,
'यहां पर लिखने और पढने से मेरे विचार भी बदले हैं और आम जीवन में होने वाली घटनाओं का विश्लेषण करने का तरीका भी । उदाहरण के तौर पर मेरी लिखी ४=‍‍‍५ वाली ईमेल और उसका इतना गंभीर मतलब! शायद मैं ऐसा कभी ना सोच पाता।'



प्रेम की अभिव्यक्ति शायद इससे बेहतर ब्यान नहीं हो सकती

यह सच है कि उनके द्वारा भेजी गयी पहेली की व्याख्या करते समय असमंजस में था। कई बार लगा कि मैं उस व्याख्या को भूल जाऊं। फिर हिम्मत कर, उसे प्रकाशित किया। यह ठीक किया क्योंकि यह मेरी अधिक पढ़ी जाने वाली चिट्ठियों में से एक है। इस पर आज भी लोग सर्च कर पढ़ने आते हैं।

उक्त चिट्ठी के कारण ही, मैंने कुछ अन्य अधिक पढ़ी जाने वाली चिट्ठियां, 'मां को दिल की बात कैसे बतायें','मां को दिल की बात कैसे पता चली', 'यौन शिक्षा जरूरी है', और 'उफ, क्या मैं कभी चैन से सो सकूंगी' जैसी चिट्ठियां लिखीं। सच तो यह है कि मेरे उन्मुक्त चिट्ठे या छुटपुट चिट्ठे पर यौन शिक्षा (यहां और यहां देखें) पर लिखी सारी चिट्ठियां इसी के कारण लिखीं गयीं। मेरे चिट्ठे पर लोग इस श्रेणियों की चिट्ठियों को, या फिर इस श्रेणी पर, सबसे ज्यादा चटका लगाते हैं।

'लेकिन उन्मुक्त जी, आप भेड़ाघाट-धुआंधार चित्र की बात कर रहे हैं ...?'

ओफ हो, पहले क्यों नहीं बताया कि आप धुआंधार के चित्र को फिर से देखना चाहते हैं। मैं उसे फिर से दिखा देता हूं। इसमें क्या मुश्किल है।


हैं न कितना सुन्दर।
'उन्मुक्त जी, यदि आपने अपनी बकबक बन्द नहीं की तो मैं यहां से चला जाउंगा और कसम आपकी, मैं यहां फिर कभी नहीं आउंगा। आप भी न, बस, बिना सवाल सुने बहकने लगते हैं। मैं यह जानना चाहता हूं कि आप भेड़ाघाट-धुआंधार चित्र की बात कर रहे हैं पर पहला चित्र हाथी का क्यों लगा रखा है? क्या आपको सवाल समझ में आया या फिर से बताऊं।'
अरे भाई, अरे बहना, यह पहले क्यों नहीं बताया। इसका जवाब तो बहुत आसान है। यह चित्र नितिन जी ने अपने परिचय में अपने चित्र की जगह लगाया है। वहीं से मैंने लिंक दी है।
'उन्मुक्त जी, उन्होंने हाथी का चित्र क्यों लगया है क्या वे हाथी की तरह भारी-भरकम हैं?'
अब मैं तो यह कह नहीं सकता। मैं न तो उनसे मिला हूं न ही उनका चित्र देखा है। इसका सही उत्तर तो वही दे सकते हैं। ऐसे मैं कुछ अनुमान लगा सकता हूं।

लोग गलत समझते हैं कि जंगल का राजा शेर होता है। शायद यह इसलिये कहा जाता कि वह मांसभक्षी है। वास्तव में, हाथी शाकाहारी होने बावजूद भी, जंगल का राजा है क्योंकि वह सबसे शक्तिशाली जानवर है। शेर भी उसके रास्ते में नहीं आता है। हाथी जिस रास्ते से जाता है शेर उसके लिये वह रास्ता छोड़ देता है। शायद वास्तविक जीवन में, नितिन जी हाथी जैसे शक्तिशाली व्यक्तित्व के धनी हैं। ऐसे अन्तरजाल के काल्पनिक संसार में तो वे ऐसे ही लगते हैं।

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This post talks about Hindi bloggr Nitin Vyas (Pahlaa panna). It is in Hindi (Devanagari script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.

Sunday, February 15, 2009

जाने क्यों, साफ कहते डरते हैं

मैंने अपनी चिट्ठी 'जाने क्यों लोग, ज़हर, ज़िन्दगी में भरते हैं' पर वेलेंटाईन दिवस पर होनी वाली अभद्रता पर आपत्ति दर्ज की थी। उसी चिट्ठी के अन्त में लिखा कि मुझे भारतीय संस्कृति-सभ्यता के नाम पर मैंगलोर के एक पब में किये गये बर्ताव पर भी आपत्ति है और इसके बारे में शीघ्र ही लिखूंगा। आज उसी के बारे में कुछ विचार।


मैंने वेलेंटाइन दिवस पर किये गये व्यवहार के बारे में जो भी लिखा या आज लिखने जा रहा हूं उससे अधिकतर पुरुष चिट्ठाकार सहमत नहीं हैं। इस पर बहुत कुछ कटु शब्दों में व्यक्त किया गया है। आशा करता हूं कि इन विचारों को स्वस्थ बहस के रूप में, सकारात्मक चर्चा की तरह से, लिया जायगा।


कुछ दिन पहले मैंगलोर के एक पब (public house) में कुछ युवतियों के द्वारा शराब पीने पर, उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया। मैं इस पर भी शर्मिन्दा हूं।


मैंने अपनी चिट्ठी 'यहां सेक्स पर बात करना वर्जित है' पर लिखा था कि १९६० का दशक मेरी किशोरावस्था का समय था। यह वह दशक था जिसमें हेर संगीत नाटक का मंचन हुआ। इसका जिक्र मैंने 'ज्योतिष, अंक विद्या, हस्तरेखा विद्या, और टोने-टुटके' की श्रंखला में किया है। इसी दशक पर हिप्पी आंदोलन अपनी चरम सीमा पर था। हम लोगों के बीच होने वाली पार्टियों में युवतियां भी रहती थीं। इन पार्टियों में न केवल सिग्रेट और शराब, पर चरस और गांजा भी चलता था। हममे से कुछ उस आनन्द की प्राप्ति भी करते थे जो यौन संबन्धों से मिलता है। लेकिन मैं इन सब का हिस्सा नहीं था। मैंने आज तक इन पदार्थों का एक बार भी सेवन नहीं किया। मेरे बेटे और बिटिया रानी भी इससे दूर रहते हैं।


मेरे विचार से न केवल चरस और गांजा पर शराब का सेवन अनुचित है। लेकिन यदि कोई शराब का सेवन करता है तो क्या मैंगलोर पर किया गया व्यवहार उचित है? क्या हमारी संस्कृति इतनी संकीर्ण है कि हम अपनी बात समझाने के बजाय, लाठी के जोर पर स्वीकार करवाते हैं? कट्टरवादिता तो हमारी संस्कृति-सभ्यता का हिस्सा नहीं रही; हम तो कभी भी इसके साथ नहीं रहे; हमारी सभ्यता लाठी के बल पर बात मनवाने पर विशवास नहीं करती - फिर आज क्या हो गया है कि हम समझा कर, बातचीत कर, अपनी बात नहीं कहना चाहते।


मेरे विचार से शराब, चरस गांजा का सेवन इसलिये अनुचित है क्योंकि यह स्वास्थ के लिये हानिकारक है। यह पुरुषों के लिये भी उतना ही हानिकारक है जितनी महिलाओं के लिये। फिर महिलाओं के खिलाफ इस तरह का व्यवहार क्यों? क्या यह इसलिये कि वे कमज़ोर हैं? क्या फिर इसलिये की वे पुरुषों से लड़ नहीं सकती और उन्हें इसका जवाब मारपीट के द्वारा नहीं दे सकती थीं? क्या इसलिये कि पुरुष इसका जवाब उसी भाषा में, मारपीट करके, दे सकते थे।

एक अच्छे अंत को पाने के लिए, खराब साधन को ठीक नहीं कहा जा सकता है।

महात्मा गाँधी ने एक बार कहा था,
'Means are more important than the end: it is only with the right means that the desired end will follow.'
साधन अंत से ज्यादा महत्वपूर्ण है। यदि साधन ठीक होगें तो ही वांछित अंत मिल सकता है।


उनका दर्शन, कानून का भी मूलभूत सिद्वांत है। लार्ड डैनिंग (Lord Denning) पिछले शताब्दी के सबसे प्रसिद्व न्यायाधीशों में से एक थे। उनका कहना है,
'But it is fundamental in our law that the means that are adopted... should be lawful means. A good end does not justify bad means.' RVS IRC Exparte Rossminster Ltd. 1979 ( 3) AllELR 385.
हमारी न्याय प्रणाली में यह महत्वपूर्ण है कि जो भी साधन प्रयोग में लाये जाएँ वे कानूनी हो। एक अच्छे अंत को पाने के लिए, खराब साधन को ठीक नहीं कहा जा सकता है।


शराब का सेवन न केवल महिलाओं के लिये पर पुरुषों के लिये भी अनुचित है। इसे रोकने यह तरीका नहीं है जो कि मैंगलोर पब में अपनाया गया। मेरे विचार से एक अच्छे अन्त पाने के लिये यह गलत साधन है। यह न केवल दर्शन, पर कानून की दृष्टि में भी गलत है।


इसका एक अन्य दृष्टिकोण भी है। सरकार शराब और सिग्रेट बेचने की एवं पीने की अनुमति देती है। सरकार ने इसके लिये लाइसेन्स भी दे रखे हैं। यदि कोई इस तरह की कानूनी जगह पर शराब का सेवन करता है और वह सेवन उसके व्यवहार को अशोभनीय नहीं बनाता तो किसी को आपत्ति करने का क्या अधिकार है। जो लोग इसके विरुद्ध हैं उन्हें चाहिये कि पहले उस कानून को बदलवायें जो इस तरह से शराब पीने की अनुमति देता है। कानून के अन्दर सेवन की गयी वस्तु का इस तरह लाठी, मारपीट, अभद्रता से विरोध करना अनुचित है।


लोगों को यह बात अपने आप स्वयं समझ में आनी चाहिये कि इसका सेवन ठीक नहीं पर आप यदि जबरदस्ती कर उनसे यह मनवाना चाहेंगे तो इसका असर उल्टा ही होगा।


बच्चों को सही दिशा देना हमारा, माता-पिता, समाज का काम है पर पुलिस नैतिकता से ठीक उसका उल्टा होता है। यह गलत है। यदि आप मुझसे पूछें कि मैं किस तरह का समाज चाहूंगा - जहां लोगों (जिसमें लड़कियां भी हैं) को पब में जाकर शराब पीने की स्वतंत्रता है, या जहां पुलिस नैतिकता है तो निःसन्देह मैं वह समाज चुनना चाहूंगा जहां पर लोगों को पब में जा कर शराब पीने की स्वतंत्रता है। क्योंकि इस तरह की स्वतंत्रता ही लोगों की समझ को प्रेरित कर सकती है कि यह गलत कार्य है। इतिहास गवाह है कि जब, जब और जहां जहां शराब पीना मना किया गया वहां अवैध तरीके से शराब बनाने और पीने का सिलसिला शुरू हो गया जो कि समाज के लिये ज्यादा हानिकारक है - पुलिस नैतिकता गलत है: कानून नैतिकता ही सही है।


मुझे इस घटना से संबन्धित कुछ अन्य बातों पर भी मुझे आपत्ति है।


कुछ महिलाओं ने मैंगलोर पब में हुए अनुचित व्यवहार पर, उन पुरुषों को जवाब उन्हीं की भाषा (मारपीट) में न देकर एक शान्तिपूर्ण तरीके से दिया। उन्होंने अनुचित व्यवहार करने वालों को गुलाबी.. भेजने की बात की। यह केवल ऐसे लोगों को शर्मिन्दा करने के लिये, उनका हास्य बनाने के लिये किया गया है। यह सच है कि गुलाबी.. का संबन्ध एक शरीर के प्राइवेट भाग से है। मैं स्वयं इस तरह से आपत्ति दर्ज नहीं करता पर यह तरीका शन्तिपूर्ण है - अनुचित नहीं है। इसमें कुछ भी गलत नहीं है।


मुझे व्यक्तिगत तौर पर महिलाओं के द्वारा गुलाबी.. भेजने पर कोई बात अनुचित नहीं लगती पर यदि यह किसी को अनुचित लगती है तो क्या उन महिलाओं पर व्यक्तिगत आक्षेप या गाली गलौज, डन्डा चलाना उचित है। मेरे विचार से यह गलत है।


कुछ पुरुषों ने, महिलाओं के द्वारा गुलाबी.. भेजने पर, उन्हें गुलाबी-- भेजने की बात कही गयी है। गुलाबी-- का भी संबन्ध एक शरीर के प्राइवेट भाग से है। मैं इस तरह से भी आपत्ति दर्ज नहीं करता पर यह तरीका भी शन्तिपूर्ण है। यदि आप किसी बात से सहमत नहीं हैं तो उसका जवाब शन्तिपूर्ण तरीके से दीजिये - लाठी, डन्डे के जोर पर या व्यक्तिगत आक्षेप, या गाली गलौज करके न दीजिये।


मेरे लिये तो इन दोनो तरीकों का प्रयोग करना दूर है - मैं तो इनका नाम भी अपने चिट्ठे पर लिखने से हिचकिचा रहा हूं। मैं स्वयं इन तरीकों का कभी प्रयोग नहीं करता पर यदि कोई इन तरीकों को अपनाता है तो मुझे इस पर कोई आपत्ति नहीं है क्योंकि यह शान्तिपूर्ण तरीके हैं। यह अपनी बात कहने के उन तरीकों से कहीं अच्छे हैं जैसा कि मैंगलोर पब में अपनाये गये। मैं अपनी आपत्ति उसी तरह से दर्ज करता जैसा कि मैं यहां पर कर रहा हूं या फिर किसी अन्य शान्तपूर्वक तरीके, जैसे जलूस इत्यादि निकाल कर, लेकिन उस तरह से कभी नहीं जैसा कि मैंगलोर में हुआ - यह कायरता, शर्मिन्दगी का तरीका है।


'उन्मुक्त जी, आपका पक्ष तो समझ में आया पर आपकी इस चिट्ठी का शीर्षक समझ में नहीं आया। इसका इस चिट्ठी से क्या मतलब?'
कुछ चिट्ठाकारों (अधिकतर महिलाओं) ने, इस प्रकरण पर चिट्ठियां लिखते या टिप्पणी करते समय, इस तरह का आभास दिया कि इस घटना पर बहुत से हिन्दी चिट्ठाकार (अधिकतर पुरुष) चुप हैं, वे इस पर बोलने से घबराते हैं, इसकी मौन स्वीकृति देते हैं। यह बात सच नहीं है। हममें से कई यह भिन्न कारणों से ऐसा करते हैं। जब मैंने इस विषय पर लिखने की बात सोची तो लगा कि वे शब्द जो इन चिट्टाकारों के आभास को व्यक्त कर सकें, वही इस चिट्ठी का सही शीर्षक होगा।


मैंने वेलेंटाइन दिवस पर हुऐ बर्ताव पर क्षोभ प्रगट करते हुऐ एक चिट्ठी 'जाने क्यों लोग, ज़हर, ज़िन्दगी में भरते हैं' लिखी है। इस चिट्ठी में 'दिल चाहता है' फिल्म के एक गाने 'जाने क्यों लोग, प्यार करते हैं' का जिक्र किया है। इस गाने की एक पंक्ति इस आभास को व्यक्त करती है इसी लिये उसे ही इस चिट्ठी का शीर्षक दे दिया।


'उन्मुक्त जी, यहां सब कहने की स्वतंत्रता है फिर लोग क्यों अपनी बात नहीं कहते हैं?'
बहुत से चिट्ठाकार, कुछ व्यक्तिगत विवशता के कारण, ऐसे विषय पर लिखना वा टिप्पणी करना नहीं पसन्द करते हैं। कई विवाद में नहीं पड़ना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि इस पर विवाद बेकार में तूल पकड़ेगा, बढ़ेगा। चुप रहने पर जल्द ही समाप्त हो जायगा और चिट्ठाकार पुनः उन विषयों पर लिखने लगेंगे जिसकी हिन्दी चिट्ठाजगत को आवश्यकता है। लेकिन इस घटना पर, लिखने और टिप्पणी, न करने का यह अर्थ बिलकुल न लगाया जाय कि सब मैंगलोर पर महिलाओं के साथ हुऐ बर्ताव को उचित मानते हैं या फिर महिलाओं के द्वारा शुरू किये गुलाबी.. भेजने के विरोद्ध में लिखी गयी बातों से सहमत हैं।


'उन्मुक्त जी, फिर आपने इस विषय पर क्यों लिख दिया? आप भी तो विवादों नहीं पड़ना चाहते।'
मुझे कुछ चिट्ठाकारों की टिप्णियों, चिट्ठियों पर आश्चर्य हुआ; दुख लगा कि इतने सुलझे लोगों कि सोच इस तरह से हो सकती है। इस प्रकरण पर बहुत कुछ व्यक्तिगत आक्षेप होने लगे, अपशब्द भी हो गये। इसलिये यह चिट्ठी लिखी कि यदि कोई हिन्दी चिट्ठाकार इस विषय पर मौन हैं तो इसका अर्थ यह नहीं है कि वे मैंगलोर काण्ड से या महिलाओं के द्वारा गुलाबी.. भेजने की बात पर व्यक्तिगत आक्षेप वा अपशब्द कहने वाले विचारों से सहमत हैं। बहुत से पुरुष इसको एकदम गलत मानते हैं। मैं नहीं बता सकता कि मेरे अतिरिक्त इस तरह के विचार रखने वाला और कौन अन्य चिट्ठाकार हैं पर मैं इस तरह के विचार रखने वालों में से एक हूं।


'उन्मुक्त जी, आप को इन गुलाबी तरीकों से असहमति प्रकट करने वाले तरीकों पर व्यक्तिगत आपत्ति है क्या गुलाबी रंग से परहेज है या फिर गुलाबी तरीकों को पसन्द नहीं करते?'
नहीं मुझे गुलाबी रंग पसन्द है। यह तो रुमानी रंग है - प्रेम का प्रतीक है। मुझे बांदा की यह गुलाबी महिलायेंं, उनका मकसद, उनका ऐतराज पसन्द आता है।



इस चिट्ठी के चित्र बीबीसी के इस पेज पर के विडियो और इस पेज से है।

इस प्रकरण पर कई चिट्ठियों का जिक्र चिट्ठाचर्चा की इस चिट्ठी में है। हांलाकि इसमें सन्दर्भित चिट्ठियों के अतिरिक्त भी कुछ अन्य चिट्ठियां भी हैं और इसके बाद भी कई चिट्ठियां इस घटना पर लिखी गयी हैं।
कुछ अन्य विषयों पर एतराज प्रगट करती मेरी चिट्ठियां
  1. धार्मिक उन्माद
  2. वेलेंटाईन दिन और इसका स्पष्टिकरण डैनिश व्यंगकार - कार्टून
  3. Trans-gendered – सेक्स परिवर्तित पुरुष या स्त्री
  4. डकैती, चोरी या जोश या केवल नादानी
  5. बनेंगे हम सुकरात या फिर हो जायेंगे नील कण्ठ
  6. जाने क्यों लोग, ज़हर, ज़िन्दगी में भरते हैं
  7. जाने क्यों, साफ कहते डरते हैं

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This post talks about our culture in connection of the incident in the Mangalore pub. It is in Hindi (Devnaagaree script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.


सांकेतिक शब्द
culture, Family, life, Life, जीवन शैली, समाज, कैसे जियें, जीवन दर्शन, जी भर कर जियो, पसन्द-नापसन्द,




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Saturday, February 14, 2009

जाने क्यों लोग, ज़हर, ज़िन्दगी में भरते हैं

आज वेलेंटाइन दिवस है। आज के दिन अपने देश में भारतीय संस्कृति के नाम पर कुछ अजीब तरह के फतवे जारी किये जाते हैं और हरकतें की जाती हैं। उनके बारे में कुछ विचार।

Wednesday, February 28, 2007

बनेंगे हम सुकरात या फिर हो जायेंगे नील कण्ठ

लक्षमी नरायन गुप्त जी ने मुझे यहां पुनः नामित कर पांच सवालों का जवाब देने के लिये कहा। इस सम्मान के लिये धन्यवाद।
यह चित्र मेरा नहीं है। अन्तरजाल पर, भगवान शिव से सम्बन्धित सारी वेबसाईटों पर है। इसीलिये यहां, बिना आभर प्रगट कियट डाल दिया है। पता चलते ही आभार प्रगट करना चाहूंगा।

उनके पहले दूसरे, चौथे, और पांचवें सवाल का जवाब रचना जी के सवालों का जवाब देते समय एक अनमोल तोहफ़ा की चिट्ठी पर दे चुका हूं बस तीसरे का जवाब देना नहीं हुआ है। मैं इसका जवाब जरूर देना चाहूंगा।

मैं किन विषयों पर लिखना पसंद/नापसंद करता हूं?

Tuesday, June 27, 2006

Trans-gendered – सेक्स परिवर्तित पुरुष या स्त्री

कुछ दिन पहले सुनील जी ने 'पुरुष या स्त्री ?' नाम की एक चिट्ठी पोस्ट की। उन्होने एक दूसरी चिट्ठी भी 'मैं शिव हूँ' के नाम से पोस्ट की। उसी पर संजय जी और सृजन शिल्पी जी ने टिप्पणी की। सृजन शिल्पी जी ने बाद मे 'अर्धनारीश्वर और वाणभट्ट की आत्मकथा' नाम की चिट्ठी भी पोस्ट की। मेरा मन भी था कि इन सब पर टिप्पणी करूं, फिर लगा कि एक स्वतंत्र चिट्ठी लिखना ठीक होगा। इसलिये यह चिट्ठी पोस्ट कर रहा हूं।

कुछ लोगो को प्रकृति अलग तरह से बनाती है उन्हे मस्तिष्क तो एक लिङ्ग का देती और शरीर दूसरे लिङ्ग का। इन लोगों के अपने कष्ट होते हैं सर्जरी के बढ़ते आयाम ने इन लोगों को कुछ राहत दी है। ऐसे कुछ लोग सर्जरी करा कर अपना लिङ्ग बदल सकते हैं। सेक्स परिवर्तन कराने के बाद, इन लोगों को trans-gendered कहा जाता है। इन लोगों के भी अधिकार हैं पर हमारा समाज ऐसे लोगों की पीड़ा समझना तो दूर, इनका मजाक बनाने मे भी पीछे नहीं रहता।

कुछ साल पहले की बात है कि एक टीवी बनाने वाली कम्पनी ने अपने टीवी के विज्ञापन मे एक लड़के और लड़की को एक टीवी की दुकान मे दिखाया। लड़की सुन्दर है और लड़का उससे इश्क (flirt) करने की कोशिश कर रहा है। दुकान मे अलग- अलग कम्पनी के टीवी लगे हैं। उन सब मे एक प्रोग्राम आ रहा है जिसमे एक लड़की का साक्षात्कार हो रहा है जो कि लड़के से लड़की बनी थी। लड़की का चेहरा ढ़ंका हुआ है। अलग अलग टीवी मे लड़की का चेहरा ढ़का रहता है पर जब उस कम्पनी के टीवी के सामने पहुंचते हैं तो टीवी पर लड़की का चेहरा साफ दिखायी पड़ता है। यह टीवी वाले यह बताना चाहते थे कि उनके टीवी पर तस्वीर एकदम साफ आती है। यह लड़की वही है जो कि दुकान में है। जब लड़का उसे देखता है तो घृणा से मुंह बनाते हुऐ, उस दुकान से,
लड़की को छोड़ कर, चला जाता है।

मेरे विचार से यह विज्ञापन बहुत ओछा था। यदि इस विज्ञापन से जुड़े किसी व्यक्ति के परिवार मे ऐसा कोई सदस्य होता तो वह न तो यह विज्ञापन बनाता, न ही उसे अपनी कम्पनी के लिये मंजूरी देता। परिवार मे ऐसा कोई सदस्य होने की कोई जरूरत नहीं है, इसके लिये तो ऐसे लोगों की मुश्किलों को समझने की जरूरत है जो कि इस विज्ञापन को बनाने वाले या इस टीवी कम्पनी के पास नहीं थी।

संवेदनहीन (insensitive) इन्सान ही ऐसा कार्य करते हैं। मेरे विचार मे कोई भी कार्य करने से पहले उसे अपने ऊपर रख कर सोचने की जरूरत है, कि यदि वे उस जगह होते तो उन्हे कैसा लगता। मैंने इसके बारे मे कुछ लिखा-पढ़ी की और इसके पहले कुछ और कार्यवाही करता कि यह विज्ञापन दिखायी देना बन्द हो गया। कह नहीं सकता कि लिखा-पढ़ी का असर हुआ या उन्हे स्वयं लगा कि यह गलत है।

Sunday, March 12, 2006

डैनिश व्यंगकार – कार्टून

मैंने कुछ दिन पहले धार्मिक उन्माद के बारे मे लिखा था इस पर आलोक जी ने टिप्पणी की,
'धार्मिक नहीं, इसे साम्प्रदायिक उन्माद कहना चाहिए। धर्म और सम्प्रदाय में तो फ़र्क है।'
मुझे भाषा का बहुत अच्छा ज्ञान नहीं है शायद आलोक जी का शब्द चयन सही है।

मैंने यह चिट्ठी, एक मिनिस्टर के द्वारा विवादित कार्टून के बारे की गयी टिप्पणी पर लिखा था। इस कार्टून के बारे में रोनॉल्ड ड्वॉरकिन (Ronald Dworkin) के एक लेख के बारे में आपका ध्यान आकर्षित करना चहता हूं जो कि मुझे, आप जैसे, किसी एक ने भेजा है। यह लेख न्यू यॉर्क बुक रिवियू में यहां छपा है।

रोनॉल्ड ड्वॉरकिन अमेरिका के जाने माने कानून के विशेषज्ञ हैं। यह बहुत समय तक ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में कानून के अध्यापक रहे तथा अब न्यू यॉर्क विश्वविद्यालय में कानून के अध्यापक हैं। यह लेख मुझे सारे विचारों को समन्वित करते हुये लगता है, आपका क्या विचार है।
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Sunday, March 05, 2006

वेलेंटाईन दिन

हर साल १४ फरवरी को वेलेंटाईन के दिन पर हमारे देश में तरह तरह के विरोध होते हैं। दुकानो तथा होटलों में तोड़ फोड़ होती है। यदी कोई लड़का या लड़की साथ दिखायी पड़ जाय तो उनकी शामत ही समझिये। मुझे यह सब बेईमानी लगता है।

हमने ग्लोबलीकरण स्वीकार किया है, केबल टीवी आता ही है, पिक्चरों में यही सभ्यता दिखायी जाती है: जब उसे हम मना नहीं कर पा रहे तो उस स्भयता को मना कर पाना मुशकिल है। यह शायद सम्भव नहीं कि हम ग्लोबीकरण तथा केबल टीवी को तो स्वीकार कर लें पर उसमें दिखायी जाने वाली सभ्यता को नहीं। इन दोनो में बीच का रास्ता नहीं है: कम से कम आसान या व्यवहारिक तो नहीं लगता। एक को स्वीकार करना तथा दूसरे पर तोड़-फोड़, अभद्रता: है। यह मेरी समझ से बाहर है।

इसका एक पहलू और भी है यदि लड़की तथा लड़के या उनके माता पिता को कोई आपत्ति न हो तो तीसरे को बोलने का क्या अधिकार।

धार्मिक उन्माद

कुछ लोग अपने देश भारतवर्ष को धर्म निर्पेक्ष कहते हैं तो कुछ पंथ निर्पेक्ष। मैं इस विवाद में नही पड़ना चाहता कि क्या सही शब्द है पर मै इतना जानता हूं कि हमारा संविधान सब धर्मो का आदर करता हैपर फिर भी इतने सालो बाद हमें धार्मिक उन्माद या धार्मिक पागलपन के अलावा क्या मिलायदी मैं हुसैन होता तो सरस्वती का वह चित्र न बनाता जिस पर इतना बवाल हुआपर यदी चित्र बन गया था तब उस पर इतना बवाल बेकार था लोग अक्सर लीक से हट कर इसलिये काम करते हैं कि वे चर्चा में आ जायें या चर्चा में बने रहें। बवाल करके हुसैन को उससे ज्यादा महत्व दे दिया जितना उन्हे मिलना चाहिये था। इसी तरह से डैनिश व्यंगकार को पैगम्बर का कार्टून नहीं बनाना चाहिये था पर यदी बन गया तो उस पर यह पागलपन बेकार है तथा किसी सरकार के मिनिस्टर के व्दारा उस व्यंगकार के सर पर इनाम रखना; उस मिनिस्टर का सरकार में बने रहना: इस पर न तो मेरे पास उस मिनिस्टर के लिये, न ही उस सरकार के लिये कोई शब्द है