इस चिट्ठी में, परमाणु बम के जनक के नामे से जाने वाले वैज्ञानिक, रॉबर्ट ओपेनहाइमर, की सुरक्षा मंजूरी को समाप्त किये जाने वा इस आज्ञा को रद्द किये जाने की चर्चा है।
शर्लॉक होम्स को किसने नहीं पढ़ा - बचपन आर्थर कॉनन डॉयल द्वारा उस पर लिखी गई कहानियों को पढ़ने में बीता। लेकिन इस किरदार के प्रेरणासोत्र, डॉक्टर जोसेफ बेल थे।
बज़ार में मार्गलिट फॉक्स द्वारा लिखित एक नयी पुस्तक 'कॉनन डॉयल फॉर द डिफेंस' आयी है। यह एक ऐसे मामले के बारे में आयी है जहां कॉनन डॉयल शामिल थे और मैंने सोचा कि इस पुस्तक और शर्लॉक होम्स किरदार के प्रेरणासोत्र, डॉक्टर जोसेफ बेल के बारे में लिखना अच्छा होगा।
हर मोबाइल, हर देश में काम नही करते। इसका अनुभव मुझे अमेरिका में हुआ। गलती मेरी थी और में दोष नेटवर्क वालों को दे रहा था। इसी की चर्चा इस चिट्ठी में है।
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मुझे दिल्ली में एक अच्छी पुस्तक दुकान की तलाश थी। इस बार वह मिल गयी। इस चिट्ठी में उसी की चर्चा है।
शुभा के अनुसार, मेरे तीन प्यार में से, एक प्यार पुस्तकों से है। यह सच है, वे मेरी सबसे प्रिय मित्र हैं। हांलाकि, जबसे अन्तरजाल का चस्का लगा, तब से कुछ समय अन्तरजाल पर भी बीतता है। जाहिर है पुस्तकों के लिये समय कम हो गया। मैं बाहर जाते समय, पुस्तकों की जगह लैपटॉप ले जाने लगा। देव भूमि हिमाचल की यात्रा पर जाते समय मैंने तय कर लिया था कि लैपटॉप नहीं केवल पुस्तकें ले जाउंगा। यात्रा में, पढ़ने के लिये चार पुस्तकें ले गया था। यह अलग अलग विषय पर थीं।
पहली, फ्रीमन डाइसन की 'द सन, जनोम, एण्ड द इंटरनेट' (The Sun, Genome and the Internet by Freeman J Dyson) थी। यह विज्ञान और तकनीक से संबन्धित है;
दूसरी, मैनेजमेन्ट से संबन्धित शू शिन ली की 'बिज़िनस द सोनी वे' (Business the Sony Way by Shu Shin Luh) थी;
तीसरी, मेरी प्रिय लेखिका आशापूर्णा देवी की हिन्दी उपन्यास 'प्रारब्ध' थी; और
चौथी, कानून से संबन्धित, सदाकान्त कादरी की 'ट्रायल' (Trial by Sadakant kadri)।
इसमें में पहली तीन पढ़ पाया पर चौथी पूरी नहीं। आने वाले समय में, इन पुस्तकों की भी चर्चा करूंगा।
यात्रा के बाद, मुझे लगा कि केवल पुस्तकें ले जाना ठीक था - कम से कम तीन तो पढ़ लीं। लैपटॉप न रहने के कारण भी कुछ अनुभव भी हुऐ। यह हिमाचल यात्रा संस्मरण के दौरान लिखूंगा।
दूसरे शहर में, पुस्तकों की दुकान जाना, मेरा पसंदीदा शौक है। हैदराबाद में पुस्तक की दुकान में झुंझलाहट लगी। दिल्ली और लखनऊ में पुस्तकों की दुकान के बारे में, मार्टिन गार्डनर की पुस्तकों के बारे में जिक्र करते समय किया। बुकवर्म के बन्द हो जाने के बाद मैं टैक्सन जाने लगा पर वहां का अनुभव अच्छा नहीं रहा। लेकिन दिल्ली में मेरे ठिकाने के सबसे पास टैक्सन की ही दुकान है इसलिये वहीं जाता हूं। हिमाचल यात्रा के बाद, दिल्ली में रुकते समय वहां गया था।
इस बार टैक्सन में युवतियां बात तो नहीं कर रहीं थीं पर एक सज्जन जोर जोर से मोबाइल पर पुस्तकों के ऑर्डर के बारे में बात कर रहे थे। समय की कोई पाबंदी नहीं रही होगी क्योंकि जब तक मैं वहां था वे बात करते रहे। मैंने टैक्सन से, पांच पुस्तकें ली। अब लैपटॉप न रहने के कारण अन्तरजाल पर तो भ्रमण करना था इसलिये साइबर कैफे की तलाश, में चल दिया - कभी बायें तो कभी दायें। वहीं पर एक अन्य पुस्तक की दुकान बेसमेन्ट में दिखायी पड़ी। कभी उस तरफ गया नहीं था, इसलिये इस पर कभी नजर नहीं पड़ी थी। सोचा चलो इसको देखा जाय, साइबर कैफे को बाद ढ़ूँढ़ा जायगा।
इस पुस्तक दुकान का नाम मिडलैण्ड बुक शॉप था। यह जी-८ (बेसमेन्ट) साउथ एक्सटेंशन पार्ट-१, नयी दिल्ली में है। इसमें ज्यादा पुस्तकें दिखीं पर वे अस्त-वयस्त थी। मैंने जो पुस्तकें टैक्सन में खरीदी थीं वे सारी वहां थीं पर उसके साथ बहुत सारी वे भी थीं जो टैक्सन में नहीं थीं। मुझे लगा कि पुस्तकों के मामले में यह बेहतर दुकान है। यहां पर भी मैंने चार अन्य पुस्तकें लीं। मैंने इसके मालिक से कहा,
'आपके यहां बहुत पुस्तकें हैं। इनका सेल क्यों नहीं लगा लेते ताकि पुस्तकें ठीक से लगायी जा सके और पुस्तकें ढूढ़ने में सुविधा रहे।'
उसने कहा,
'मुझे पुस्तकों से प्यार है। मैं नहीं चाहता कि कोई ग्राहक पुस्तक लेने आये और हम उसे दे न सकें। इसलिये हमारी दुकान में अधिक पुस्तकें हैं। हम रोज़ एक अलमारी ठीक करते हैं लेकिन जब तक उस पर वापस आते हैं उसकी पुस्तकें पुनः अस्त-वयस्त हो जाती हैं।'
मैंने उससे बिल बनवाया तो लगभग २५०० रुपये का आया। उसने उस पर मुझे २०% कम कर दिया। मेरे कस्बे का दुकान वाला जहां मैं लगभग १५ दिन में, एक बार पहुंच जाता हूं २०% तो क्या १०% भी कम नहीं करता। यहां तो मैं पहली बार गया था। मैंने उसे पैसे कम करने के लिये भी नहीं कहा था उसने फिर भी कर दिया। मुझे आश्चर्य हुआ। मैंने उसे धन्यवाद दिया तो उसने मुस्कुराते हुऐ कहा,
'इस बात के लिये तो हम दिल्ली के दुकान पुस्तक के मालिकों के बीच बदनाम हैं।'
उसने यह भी बताया,
'हमारी एक अन्य दुकान इसी नाम से २०, ऑरोबिन्दो प्लेस् हॉज़ खास नयी दिल्ली में और न्यू बुक लैण्ड नाम से इंडियन ऑयल भवन जनपथ नयी दिल्ली में भी है। आप को वहां भी कम दाम में पुस्तक मिलेगी।'
दिल्ली में मुझे, मिडलैण्ड बुक शॉप के रूप में, अच्छी पुस्तक की दुकान मिल गयी है। यदि आप कभी इस दुकान पर जायें और वहां किसी ग्राहक को दुकानदार या वहां खरीदने वालों से बात करते देखें तो समझ लीजियेगा कि वह कौन व्यक्ति है।
'उन्मुक्त जी यह तो बताईये कि साउथ एक्सटेंशन में कोई साइबर कैफ़े मिला? क्या आप अन्तरजाल पर जा पाये?'
हां जा तो पाया पर नानी याद आ गयी। उसके बारे में फिर कभी।
मैंने दस साल पहले जरूर कोई अच्छा काम किया होगा क्योंकि तभी ईश्वर ने मुझे मेरे जीवन का सबसे अच्छा उपहार दिया।
टॉमी का जन्म अप्रैल १९९९ में हुआ था। वह हमारे पास जून १९९९ में आया। हम उसे दिल्ली के एक डॉग केनल से ले कर आये थे। उसने न केवल हमारे जीवन में खुशियां भरी पर उन बहुत से लोगों के जीवन में भी जो हमारे अपने हैं हमसे करीब हैं और बहुत से अजनबी लोगों के भी। उसके पिल्ले जो कि अब स्वयं बड़े हो गये हैं, उनके जीवन में खुशियां बिखेर रहें हैं।
मैंने अपने जीवन में बहुत से नस्ल के कुत्ते पाले हैं देसी, एलसेशियन, लेब्रॉडर, पॉम, डोबरमैन, बॉक्सर पर टॉमी गोल्डन रिट्रीवर था, उसकी बात ही अलग थी। वह इन सबसे अलग क्लास में था। शायद इसलिये गोल्डन रिट्रीवर न केवल दुनिया में सबसे लोकप्रिय पारिवारिक कुत्ते माने जाते हैं पर रजिस्ट्रेशन के मुताबिक हैं भी। मालुम नहीं, मेरे किस जीवन का दोस्त था जो इतने दिन बाद मिला।
मेरे घर के सामने से अनगिनत कारें निकलती हैं पर मजाल कि वह उठे भी पर मेरी कार जब २०० मीटर दूर भी हो तो उसकी पूंछ का हिलना और भौंकना देखने काबिल होता था। अक्सर पहली बार हमारे घर में आये लोगों को अजीब लगता था कि एकदम से उसे क्या हो गया पर कुछ देर बाद समझ में आता था जब मेरी कार गेट के अन्दर आती थी।
मैं जब भी घर के अन्दर आता, वह हमेशा गेट पर पूंछ हिलाते और भौंकते ही मिलता था। लगता था कि वह दिन भर मेरे इंतजार में ही बैठा रहता था। शुभ्रा को हमेशा मुझसे जलन होती थी उसके आने पर पूंछ तो हिलाता था पर गेट पर पहुंच कर भौंकता नहीं था।
मैं कभी कभी शुभ्रा की कार लेकर भी बाहर जाता था पर वह न केवल कार की आवाज ही समझता था पर यह भी कि उसमें कौन है। यदि मैं उसमें हूं तो उसका बर्ताव वही होता था जो कि मेरी कार के लिये। शायद इसीलिये शुभ्रा को लगता था कि वह मेरे तीन प्रेमों में से एक था और इसीलिये क्रिकेट की नेटवेस्ट की सिरीस् जीतने के बाद वह भी हमारे साथ आइसक्रीम खाने गया था।
टॉमी का पहला काम था प्रतिदिन सुबह गेट से अखबार, पत्रिकायें लाना। वह पत्र, निमत्रंण कार्ड भी लाता था। अक्सर मैं डाकियों से कहता कि पत्र टॉमी को दे दें। वे उसे आश्चर्य से देखते फिर और भी आश्चर्य में डूबते जब वह चिट्ठी मुझे ला कर देता। हां उसे इसके लिये हमेशा एक बिस्किट मिलता।
मुझे याद है कि कुछ साल पहले हमारे कस्बे में लिओनिडस् उल्कापात (leonidsmeteor shower) सबसे अधिक था। हम रात को ढाई बजे नदी के किनारे इसे देखने गये थे। टॉमी भी हमारे साथ था। उसे साथ रखने में, मुझे विश्वास रहता था कि वह मुझे कुछ भी गड़बड़ी से बचा लेगा।
पिछले कुछ सालों को छोड़ कर, कस्बे में हुऐ सारे डॉग शो में, उसने भाग लिया। वह शो राष्ट्रीय स्तर का, या राज्य स्तर का, या फिर जिले स्तर का, उसे प्रत्येक में कोई न कोई पुरुस्कार मिला।
डॉग शो में, वह बच्चों के बीच वह सबसे लोकप्रिय होता था। बच्चे अक्सर मुझसे पूछते कि क्या वे उसे छू सकते हैं। मेरे जवाब होता कि न केवल वे उसे छू सकते हैं पर चूम भी सकते हैं। शायद ही कोई बच्चा होगा जिसने इसके गले में हाथ डाल कर इसे प्यार न किया हो। वे हमेशा मुझसे कहते,
'अंकल, क्या आप मुझे इसका पप दे सकते हैं।'
मेरा जवाब होता जरूर पर पहले तुम्हारी मां को उसके सेवा करने की जिम्मेवारी लेनी होगी। बहुत कम मांएं यह काम अपने हाथ में लेने के तैयार होती।
कुछ लोग, कुत्तों की मेटिंग पसन्द नहीं करते हैं। वे इसके लिये मना करते हैं। मुझे यह ठीक नहीं लगता। मेरे विचार से यह प्राकृतिक है। इसकी अनुमति देनी चाही।
टॉमी के पास, न केवल मेरे कस्बे से, पर दूर दूर की जगहों से लोग मेटिंग के लिये कुत्तियां ले कर आते थे। आप चाहें तो इसके लिये पैसा ले लें या फिर अपनी पसन्द का पिल्ला। हमें पैसे की जरूरत नहीं। ईश्वर ने हमें बहुत दिया। हमने हमेशा पप ही लिया। उसे, उन्हें उपहार में दिया जो हमारे दिल के पास हैं। इसी तरह से टॉमी उनके जीवन में वह खुशियां दे पाया जिसकी उन्हें आशा भी न थी।
टॉमी को गेंद लाना पसन्द था। आप गेंद फेंकते फेंकते थक जायेंगे पर वह गेंद लाते नहीं। कुछ साल पहले मुन्ना अमेरिका से उसके लिये एक गेंद फेंकने वाला लाया। इसमें गेंद को हाथ से छूना नहीं पड़ता गेंद उसमें फंसायी जा सकती है और आसानी से फेंकी जा सकती है। जब से वह आया तब से कुछ राहत आयी।
जिन कुत्तों के पूंछ में बाल होते हैं उनका पिछला भाग बहुत साफ नहीं रह पाता है। उसे खास तरह से साफ करना होता है क्योंकि बाल के कारण कुछ गन्दगी फंसी रह जाती है जिससे बिमारी हो जाती है। हम यह सफाई करते थे पर शायद ठीक प्रकार से नहीं। शायद यही कारण था कि उसके पिछले भाग में एक ट्यूमर हो गया था। हमने उसका ऑपरेशन करवाया था पर यह कुछ मुश्किल करता था। लेकिन वह ठीक था।
छः दिन पहले मुझे लगा कि उसे खड़े होने पर मुश्किल हो रही है। अगले दिन वह खड़ा नहीं हो पा रहा था। उसे मुश्किल होने लगी। हम उसे सुबह और शाम डाक्टर के पास ड्रिप लगवाने के लिये ले जाते थे। कल जब वह ड्रिप लगवा कर वापस आया तो तकलीफ में था। हमें लगा कि ड्रिप से उसे तकलीफ होती है और फिर ड्रिप न लगवाने की सोची।
टॉमी की हालत बिगड़ रही थी। वह उठ नहीं पाता था, इसलिये गन्दा भी हो गया और बदबू भी करता था। मैंने कल शाम को उसे पाउडर लगाया, ब्रश किया। वह महकने लगा, जंच रहा था, बिलकुल हीरो की तरह।
मैंने उसे, शाम को ही बाहर लॉन में लिटा दिया। रात को अन्दर किया। उस समय वह जीवित था। कुछ देर बाद, मैं उसे दूध पिलाने के लिये गया। उसके मुंह के चारो तरफ खून था। वह वहां चला गया था जहां से कोई वापस नहीं आता।
मैंने उसे पुनः साफ किया। रात में ही, हम ने उसे, घर में सामने की ओर, लॉन के बगल में, चूने और नमक के साथ गाड़ दिया। उसकी आखें फाटक और घर की तरफ - हमारी चौकीदारी करते हुऐ। वह हमेशा इसी तरह से बैठता था - एक नजर मुझ पर दूसरी नजर बाकी सारी जगह पर - कहीं कोई मुझ पर हमला न कर दे। मैं जब घर में होता, वह मेरा पीछा, साये की तरह करता।
कितनी यादें हैं कितने सुनहरे पल हैं, कितनी खुशियां है। मेरे लिये सब लिखना संभव नहीं।
हे ईश्वर, तुम्हें धन्यवाद कि तुमने मुझे ऐसा उपहार दिया।
अलविदा मेरे मित्र, मित्रता दिवस पर तुम्हें सलाम। तुम हमेशा मेरे जहन में, मेरी यादों में रहोगे। मेरे साथ इतने सुनहरे पल बिताने का शुक्रिया।
पुनः हमने टॉमी की याद में, उसकी कब्र के दो तरफ, बेला और काजू का पेड़ लगाया है ताकि आने वाले समय में, उसकी महक और याद, हमेशा रहे।
केरल यात्रा के दौरान हम कोचीन में ताज मालाबार होटेल में रुके थे। इस चिट्ठी में उसी की चर्चा है।
कोचीन में, हम लोग ताज मालाबार होटल में रूके थे। होटल में पहुंचते समय अभिलाष, स्वागत कक्ष पर थे। उन्होंने मुस्कुरा कर हम लोगों का स्वागत किया और कहा कि उसने हमें अपग्रेड दे दिया है और हेल्टज रूम में रहने की सुविधा प्रदान की है। मेरे पूछने पर कि उसने ऎसा क्यों किया। उसने कहा, इसकें दो कारण बताये,
'पहला, हमें पहले पता चल गया था कि हिन्दी चिट्ठाकार उन्मुक्त सपत्नीक आ रहें हैं। हिन्दी चिट्ठाकारों को तो खास कमरा देना ही होता है।'
वाह, हिन्दी चिट्टकारी का यह फायदा तो मुझे मालुम ही न था :-)
स्वगत कक्ष पर अभिलाष,
अभिलाष जी, अन्य हिन्दी चिट्ठकारों का भी ख्याल करना।
'दूसरा, इस समय होटेल में, अच्छे कमरे खाली हैं। आप जब वापस जाएं तो अपने मित्रों को इस होटल के बारे में बतायें और उन्हें यह ठहरने के लिये कहें।'
होटेल के बाहर का दृश्य
ताज मालाबार होटल दो भागों में बना हुआ है पहला भाग पुराना है। इसे १९३६ में अंग्रेजों ने बनवायया था। उस समय यह नाविकों के आराम गृह की तरह प्रयोग किया जाता था। बाद में, ताज होटल ने, इसे खरीद लिया। इसमें एक नई बिल्डिंग बनवायी गयी है जो उसके बगल में बहुमंजिली इमारत है। शायद, हम लोगों का आरक्षण बहुमंजिली कमरे में था। अभिलाष ने हमें, हेल्टज रूम में यानी १९३६ में बने कमरे में भेज दिया। अभिलाष ने मुझसे पूछा,
'इस कमरे में दोनो विस्तर अलग-अलग हैं। यदि आप चाहें तो हम आपको दूसरा कमरा दे सकते हैं जिसमें दोनो बिस्तर साथ साथ हो।'
मैंने जवाब दिया,
'इस उम्र में हमें इसकी कोई जरूरत नहीं है। यह कमरा चलेगा।'
हम लोग जब कमरे में पहुंचे तो मुझे लगा कि हमारा रात में कोचीन में रूकने का निर्णय सही था। यह होटल भी बहुत अच्छा है और उसका कमरा भी। इस कमरे का भी फर्नीचर और समान, उसी समय की स्टाइल में था। इस कमरे के बाहर देखने पर अप्रवाही जल (Back water) और समुद्र का सुन्दर दृश्य दिखायी पड़ता था।
होटेल से बाहर अप्रवाही जल
कुछ साल पहले जब मै एक सम्मेलन में भाग लेने कोचीन आया था तब यहाँ पर 'ला मेरिडियन' होटल में ठहरा था। वह होटल भी एक बेहतरीन होटल है पर ताज मालाबार किसी मायने में उससे कम नहीं है।
सुबह मेरी मुलाकात होटेल के दरबान, ऑगस्टीन से हूई। मैं उसका चित्र नहीं ले पाया पर उसने बताया कि वह काम चलाऊ १८ भाषायें बोल सकता है। मैंने जब उससे पूछा कि उसने यह कैसे सीखा तो उसने बताया,
'कोचीन में विदेशी पर्यटक आते हैं। बस उन्ही से बात करते करते उनकी भाषा सीख ली।'
मैंने ऑगस्टीन से काफी देर बात की। वह मुझे हंसमुख और मिलनसार व्यक्ति लगा। हम लोग कुमाराकॉम जाने के पहले, कोचीन के दर्शनीय स्थल भी देखने गये थे। उस श्रंखला की अगली चिट्ठी, उसी के बारे में।
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मैंने अपनी पिछली चिट्ठी 'भगवान की दुनिया - तभी दिखायी देगी जब खिड़की साफ हो' पर भेड़ाघाट-धुआंधार का सुन्दर चित्र लगाया था। वह मेरे द्वारा नहीं खींचा गया था । उसे मैंने कहीं से चुराया था। मेरा वायदा था कि मैं उसके बारे में, अगली चिट्ठी में लिखूंगा - यह चिट्ठी उसी चोरी के बारे में है।
'लेकिन उन्मुक्त जी, आप भेड़ाघाट-धुआंधार चित्र ...?'
हां, हां उसी चित्र के बारे में बता रहा हूं। इतने उतावले क्यों हो रहे हैं।
मैंने भेड़ाघाट-धुंआंधार का चित्र नितिन जी के चिट्ठे 'पहला पन्ना' से लिया था। इस चिट्ठे पर कुछ बेहतरीन चित्र हैं। इस चिट्ठी में सारे चित्र उसी चिट्ठे से ही लिये गये हैं।
बसन्त ऋतु में पेड़ों की सुन्दरता
मैं जब पहली बार उनके चिट्ठे पर पहुंचा तो मुझे लगा कि वे किसी व्यावसायिक छविकार से कम नहीं हैं। मैं नहीं जानता वे क्या करते हैं पर शायद कंप्यूटर इंजीनियर हैं। यह मैं उनके अपने बारे में लिखे परिचय के आधार पर कह रहा हूं। वे लिखते हैं कि वे तकनीक से जुड़े हैं और उनका व्यवसाय - माथा पच्ची है। वे, अपने बारे में लिखते हैं
'अमेरिका के एक गाँव में एक भारतीय...'
अरे, इतना छोटा परिचय जो अपने बारे में कुछ न बताये। क्या आपको नहीं लगता कि वे बेहद शर्मीले हैं? मुझे तो वे शर्मीले व्यक्तित्व के लगते हैं।
मेरी उनसे मित्रता उनकी उनकी एक चिट्ठी पर टिप्पणी करने के बाद शुरू हुई। यह आज भी बरकरार है। इसके लिये मैं अपने को खुशकिस्मत और भाग्यशाली मानता हूं। वे मेरी चिट्ठियों पर अक्सर टिप्पणियां करते हैं हांलाकि मैं उनके चिट्ठे पर टिप्पणी करने से चूक जाता हूं। गलत बात है न। लेकिन यह उनके व्यक्तित्व का बड़प्पन दिखाता है कि वे दूसरे के चिट्ठे पर टिप्पणियां अपने चिट्ठे पर टिप्पणियां पाने के लिये नहीं करते। यह, टिप्पणियों के विश्लेषण में लिखी गयी, बहुत सी चिट्ठियों को नकारता है।
लगभग तीन साल पहले, उन्होंने मुझे एक पहेली भेजी जिसमें में ४=५ सिद्ध किया गया था। मैंने जब उनके पास पहेली का हल भेजा तब उन्होंने मुझे इस पर कुछ लिखने का आग्रह किया। मैंने इस पेहली को 'चार बराबर पांच, पांच बराबर चार, चार…' नामक चिट्ठी में लिखा। मैंने इसका हल नहीं लिखा क्योंकि इसका हल कुछ चिट्ठाकार बन्धुवों ने उसी चिट्ठी पर टिप्पणियों द्वारा दे दिया था।
'एक अनमोल तोहफ़ा' चिट्ठी में, सवालों के जवाब देने के लिये, उन्हें भी नामित किया गया था। सवालों का जवाब उन्होंने अपनी चिट्ठी 'खेल खेल में' लिखा है। सवाल, 'क्या हिन्दी चिट्ठेकारी ने आपके व्यक्तिव में कुछ परिवर्तन या निखार किया?' का वे जवाब देते हुऐ लिखते हैं,
'यहां पर लिखने और पढने से मेरे विचार भी बदले हैं और आम जीवन में होने वाली घटनाओं का विश्लेषण करने का तरीका भी । उदाहरण के तौर पर मेरी लिखी ४=५ वाली ईमेल और उसका इतना गंभीर मतलब! शायद मैं ऐसा कभी ना सोच पाता।'
प्रेम की अभिव्यक्ति शायद इससे बेहतर ब्यान नहीं हो सकती
यह सच है कि उनके द्वारा भेजी गयी पहेली की व्याख्या करते समय असमंजस में था। कई बार लगा कि मैं उस व्याख्या को भूल जाऊं। फिर हिम्मत कर, उसे प्रकाशित किया। यह ठीक किया क्योंकि यह मेरी अधिक पढ़ी जाने वाली चिट्ठियों में से एक है। इस पर आज भी लोग सर्च कर पढ़ने आते हैं।
'लेकिन उन्मुक्त जी, आप भेड़ाघाट-धुआंधार चित्र की बात कर रहे हैं ...?'
ओफ हो, पहले क्यों नहीं बताया कि आप धुआंधार के चित्र को फिर से देखना चाहते हैं। मैं उसे फिर से दिखा देता हूं। इसमें क्या मुश्किल है।
हैं न कितना सुन्दर।
'उन्मुक्त जी, यदि आपने अपनी बकबक बन्द नहीं की तो मैं यहां से चला जाउंगा और कसम आपकी, मैं यहां फिर कभी नहीं आउंगा। आप भी न, बस, बिना सवाल सुने बहकने लगते हैं। मैं यह जानना चाहता हूं कि आप भेड़ाघाट-धुआंधार चित्र की बात कर रहे हैं पर पहला चित्र हाथी का क्यों लगा रखा है? क्या आपको सवाल समझ में आया या फिर से बताऊं।'
अरे भाई, अरे बहना, यह पहले क्यों नहीं बताया। इसका जवाब तो बहुत आसान है। यह चित्र नितिन जी ने अपने परिचय में अपने चित्र की जगह लगाया है। वहीं से मैंने लिंक दी है।
'उन्मुक्त जी, उन्होंने हाथी का चित्र क्यों लगया है क्या वे हाथी की तरह भारी-भरकम हैं?'
अब मैं तो यह कह नहीं सकता। मैं न तो उनसे मिला हूं न ही उनका चित्र देखा है। इसका सही उत्तर तो वही दे सकते हैं। ऐसे मैं कुछ अनुमान लगा सकता हूं।
लोग गलत समझते हैं कि जंगल का राजा शेर होता है। शायद यह इसलिये कहा जाता कि वह मांसभक्षी है। वास्तव में, हाथी शाकाहारी होने बावजूद भी, जंगल का राजा है क्योंकि वह सबसे शक्तिशाली जानवर है। शेर भी उसके रास्ते में नहीं आता है। हाथी जिस रास्ते से जाता है शेर उसके लिये वह रास्ता छोड़ देता है। शायद वास्तविक जीवन में, नितिन जी हाथी जैसे शक्तिशाली व्यक्तित्व के धनी हैं। ऐसे अन्तरजाल के काल्पनिक संसार में तो वे ऐसे ही लगते हैं।
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यदि आप यह सोचते हैं कि मैं मैक्डॉनल्ड के विज्ञापन के बारे में बात करने जा रहा हूं तो आप गलतफ़हमी में हैं। न तो मुझे फास्ट फूड अच्छा लगता है और न ही मैं मैक्डॉनल्ड जाता हूं। मैं तो आपसे आज एक खास दिन (२० सितम्बर) और एक खास सॉफ्टवेयर {युबुन्टू (Ubuntu)} के बारे में बात करना चाहता हूं।
'उन्मुक्त जी, २० सितम्बर को क्या खास है, लगता है कि आपका जन्मदिन है?'
अरे नहीं। यह मेरा जन्मदिन नहीं है पर बहुतों के लिये वैलेंटाइन डे से कम नहीं है।
मुक्त सॉफ्टवेयर प्रेमी लोग साल में एक दिन मुक्तसॉफ्टवेयर दिवस मनाते हैं। इस दिन वे मुक्त सॉफ्टवेयर के बारे में सम्मेलन कर, लोगों को इसके महत्व के बारे में बताते हैं और उन्हें जागरूक करने का प्रयत्न करते हैं। इस साल, यह २० सितम्बर को मनाया जायगा। इसके बारे में मैंने पिछले साल भी लिखा था। इस साल के बारे में आप यहां विस्तार से पढ़ सकते हैं और कहां कहां मनाया जा रहा है देख सकते हैं।
अभी तक भारत में मानाये जाने का जगहों का नक्शा
उत्तर, पश्चिम, और मध्य भारत में यह कम जगह मनाया जा रहा है। मुझे आश्चर्य है कि यह दिल्ली में नहीं मनाया जा रहा है - कम से कम अभी तक वहां के लोगों ने अपने को रजिस्टर नहीं कराया है। पूर्वी भारत में यह केवल कलकत्ता में मनाया जा रहा है। दक्षिण भारत में तो यह जगह जगह मानाया जा रहा है। इससे आप देश भर में सूचना प्रद्योगिकी की प्रगति का अन्दाज कर सकते हैं।
कैनोनिकल लिमिटेड (Canonical Ltd), इस साल मुक्त सॉफ्टवेयर दिवस के प्रायोजक में से एक हैं। वे इसके उपलक्ष में सीडी भेंट कर रहे हैं। अभी देरी नहीं हुई है यदि यह आपके शहर में नहीं मनाया जा रह है तो अपने को रजिस्टर करवायें और कुछ प्रोग्राम करें। ख्याल रहे, १४ सितम्बर को हिन्दी दिवस भी है जो कि २० कि बिलकुल पहले है - उस दिन हिन्दी में बात करना है।
'उन्मुक्त जी, यदि हम इसका आयोजन अपने शहर में करें तो आप आयेंगे न!'
इस साल तो नहीं, फिर कभी। इस साल तो मेरी तो बुकिंग हो चुकी है शायद आपके ही शहर में हो। इसलिये यदि कोई सम्मेलन हो जाइयेगा अवश्य, हो सकता है वहीं हमारी मुलाकात हो जाय :-)
'उन्मुक्त जी, कैनोनिकल लिमिटेड कंपनी क्या करती है? उसका मुक्त सॉफ्टवेयर से क्या सम्बन्ध है?'
कैनोनिकल लिमिटेड (Canonical Ltd) एक साउथ अफ्रीकन कंपनी है। यह युबुन्टू (Ubuntu) नामक एक मुक्त एवं मुफ़्त ऑपरेटिंग सिस्टम निकालती है। यह डेबियन लिनेक्स पर आधारित है और सबसे पहले २० अक्टूबर २००४ को प्रकाशित किया गया था।
युबुन्टू, ज़ुलू (Zulu) भाषा के शब्द युबुन्टू से लिया गया है जिसका अर्थ है - मानवता। युबुन्टू का ध्येय है कि वह साधारण व्यक्ति - जिसे कंप्यूटर का कोई ज्ञान न हो उस - के लिये एक स्थायी और अच्छा ऑपरेटिंग सिस्टम बनाये। वे सॉफ्टवेयर के लिये पैसा तो नहीं ले सकते हैं इसलिये उसमें सेवाये दे कर पैसा कमाते हैं।
मेरे लैपटॉप में रेडहैट लिनेक्स एन्टरप्राइस-५ है पर मैं अपने डेस्कटॉप में लिनेक्स के अलग अलग डिस्ट्रीब्यूशन डालता रहता हूं। मैंने मैनड्रिवा (Mandriva), सुज़े (SuSe) पर काम किया है पर बहुत समय पर फिडोरा (Fedora) पर काम कर रहा था। दो महीने पहले मैंने डेस्कटॉप पर फिडोरा-९ डाला। उस समय इसमें कुछ मुश्किलें थीं और मुझे उसे हटाना पड़ रहा था। मेरे पास विकल्प था कि मैं वापस फिडोरा-८ पर चला जाऊं या फिर कुछ नया डिस्ट्रीब्यूशन डालूं। मेरे पास कुछ लोग युबुन्टू की समस्याओं के बारे में ई-मेल करते हैं मुझे लगा कि क्यों न मैं इसे ही डाल कर देखूं।
बस मैंने इसे अपने डेस्कटॉप पर डाला दिया और दो महीने से इसी पर काम करता हूं।
युबुन्टू में हिन्दी का अच्छा समर्थन है। इसमें हिन्दी के इन्सक्रिप्ट (Inscript) और फोनेटिक (phonetic) कीबोर्ड हैं पर रेमिंगटन कीबोर्ड नहीं है। दफ्तरों में हिन्दी टाइपिस्ट अधिकतर रेमिंगटन कीबोर्ड जानते हैं इसलिये शायद यह वहां न चल पाये पर मुझे कोई अन्तर नहीं पड़ता। मैं तो फोनेटिक कीबोर्ड का प्रयोग करता हूं।
आप आसानी से, युबुन्टू में अपनी तरफ से न तो कोई नया प्रोग्राम नहीं डाल सकते हैं न ही किसी प्रोग्राम को अपग्रेड नहीं कर सकते हैं। कम से कम मेरा जैसा व्यक्ति तो नहीं। शायद इसके लिये आपको कंप्यूटर विशेषज्ञ होना चाहिये। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है क्योंकि इसके बनाने वाले सारे प्रोग्रामों के अपग्रेड को स्वयं टेस्ट करते हैं और जब उन्हें स्थायी पाते हैं तो फिर आपको अपग्रेड करने की सुविधा देते हैं। वे लोग यह काम, शायद इसलिये करते हैं कि वे आपको स्थायी ऑपरेटिंग सिस्टम देना चाहते हैं। इसलिये जब तक प्रोग्रामों की टेस्टिंग पूरी नहीं हो जाती है वे आपको आसानी से अपग्रेड नहीं करने देते हैं। इसका नया वर्ज़न भी लगभग छः महीने के अन्तराल पर आता है।
'उन्मुक्त जी यह सब तो ठीक है पर यह बताइये कि इन सब का इस शीर्षक से क्या सम्बन्ध है।'
उंह हूं - मैं भी कैसा भुलक्कड़ हूं। यह तो बताना मैं भूल ही गया,
I'm loving it :-)
लोग कहते हैं कि साउथ अफ्रीका सुन्दर जगह है। हो सकता है कि निकट भविष्य में मैं आपको अफ्रीकन जंगल सफारी पर ले चलूं।
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(सुनने के लिये चिन्ह शीर्षक के बाद लगे चिन्ह ► पर चटका लगायें यह आपको इस फाइल के पेज पर ले जायगा। उसके बाद जहां Download और उसके बाद फाइल का नाम अंग्रेजी में लिखा है वहां चटका लगायें।: Click on the symbol ► after the heading. This will take you to the page where file is. Click where 'Download' and there after name of the file is written.)
Mac-OX पर कम से कम Audacity, Mplayer एवं VLC में; और
Linux पर सभी प्रोग्रामो में - सुन सकते हैं।
बताये गये चिन्ह पर चटका लगायें या फिर डाउनलोड कर ऊपर बताये प्रोग्राम में सुने या इन प्रोग्रामों मे से किसी एक को अपने कंप्यूटर में डिफॉल्ट में कर ले।
is post per software freedom day ke baare mein bataaya gaya hai. yeh hindi (devnagree) mein hai. ise aap roman ya kisee aur bhaarateey lipi me padh sakate hain. isake liye daahine taraf, oopar ke widget ko dekhen.
This post talks about freedom software day. It is in Hindi (Devnaagaree script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.