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Monday, October 20, 2014

हम एक दूसरे के लिये प्रेरणादायक हैं

हम सब एक दूसरे को प्रेरित करते हैं। इस चिट्ठी में, इसी दर्शन को, बताने का प्रयत्न किया गया है।
 



Saturday, December 03, 2011

पापा, नुकसान उनका है तुम्हारा नहीं

इस चिट्ठी में, बेटे के साथ बिताये कुछ पल, उससे मिली सीख, का वर्णन है। 

Thursday, October 06, 2011

दूसरे की गलती से सीखने वाले, बुद्धिमान होते हैं

यह चिट्ठी ई-पाती श्रंखला की कड़ी है। यह श्रंखला, नयी पीढ़ी की जीवन शैली समझने, उनके साथ दूरी कम करने, और उन्हें जीवन मूल्यों को समझाने का प्रयत्न है। सच में बुद्धिमान वह हैं जो दूसरी की गलती से ही सीख ले लेते हैं।


मैंने कुछ दिन पहले 'जिया धड़क धड़क जाये' शीर्षक से चिट्ठी प्रकाशित की थी। इसमें वर्ष २००८ का लेखा जोखा लिखा था। कुछ लोगों को लगा कि मैं इस बात से दुखी हूं कि मुझे टिप्पणियां कम मिलती हैं।
  • मुझे इस बात का मलाल नहीं है कि मुझे टिप्पणियां कम मिलती हैं। टिप्पणियां न मिलने के कई कारण हैं। मैं उनसे वाकिफ हूं। मैंने उक्त चिट्ठी पर टिप्पणियों की बात, सांख्यिकी के तौर पर लिखी थी न कि शिकायत के कारण।
  • मुझे मालुम है कि मेरी चिट्ठियां पढ़ी जाती हैं। मुझे, वर्ष २००६ में लिखी चिट्ठियों पर, औसतन एक से भी कम टिप्पणियां मिलीं। फिर भी, हिन्दी चिट्टागजत ने, इसी साल के लिये तरकश द्वारा आयोजित चुनाव में रजत कलम दिया। अब जब समीर जी सामने हों तो किसी और को स्वर्ण कलम कैसे मिल सकता है :-)
  • मुझे यह भी लगता है कि कुछ लोग मेरा लेखन पसन्द करते हैं। शायद, इसीलिये इस वेबसाइट को शुरू किया होगा।


    कौन है यह शख़्स, क्यों शुरू की यह वेबसाइट - कुछ समझ में नहीं आता है। लगता है कि मैं अज्ञात में चिट्ठाकारी करता हूं इसलिये ईश्वर ने मुझे यह सजा दी कि तुम भी इसी सोच में परेशान रहो।

कई लोगों को मेरी यह चिट्ठी, अलग-अलग कारणों से पसन्द नहीं आयी पर मेरे परिवार वालों को यह चिट्ठी अच्छी लगी। मुन्ने की सात समुन्दर पार से लिखी ईमेल और उसे मेरा जवाब यह है।

Tuesday, February 08, 2011

मेरे शरीर में हनुमान जी आ गये थे

बच्चों के साथ समय बिताना जरूरी है।
इस चिट्ठी में, अपने बेटे के साथ बिताये, कुछ भावुक पलों की चर्चा है।

Friday, December 03, 2010

मन में है विश्वास, हम होंगे कामयाब एक दिन

यदि जान है, तो जहान है। यदि लगन है इच्छा है, विश्वास है, तब कामयाबी दूर नहीं। यह चिट्ठी मेरी ई-पाती श्रृंखला की एक चिट्ठी है।

Tuesday, March 09, 2010

आप, क्यों नहीं, इसके बाल खींच कर देखते

इस चिट्ठी में महिला सश्क्तिकरण और  परी से बातें।

यह चिट्ठी ई-पाती श्रंखला की कड़ी है। यह श्रंखला, नयी पीढ़ी की जीवन शैली समझने, उनके साथ दूरी कम करने, और उन्हें जीवन मूल्यों को समझाने का प्रयत्न है। महिलाओं को इसलिए काम करना चाहिए ताकि वह अपने पैरों पर खड़ी हो सके।


Thursday, December 03, 2009

सफलता हमेशा काम के बाद आती है

यह चिट्ठी ई-पाती श्रंखला की कड़ी है। यह श्रंखला, नयी पीढ़ी की जीवन शैली समझने, उनके साथ दूरी कम करने, और उन्हें जीवन मूल्यों को समझाने का प्रयत्न है। यदि लगन है, काम करने का ज़स्बा है तो सफलता कदम चूमेगी।

Saturday, August 22, 2009

बाप रे बाप, हिन्दुवों के इतने भगवान - उलझन नहीं होती?

लीसा से मेरी मुलाकात वियाना में कॉन्वेंट में हुई थी। मैंने वायदा किया था कि उसके और मेरे बीच बीच ई-मेल की चर्चा करूंगा। यह चिट्ठी उसमें से एक है।

हिन्दू धर्म जीने का तरीका है और उन्हीं तरीकों को आसानी से समझने के लिये कथायें और देवी देवाताओं को रचा गया है। यही बात इस चिट्ठी में समझायी गयी है।


Sunday, June 21, 2009

बच्चे व्यवहार से सीखते हैं, न कि उपदेश से

यह चिट्ठी ई-पाती श्रंखला की कड़ी है। यह श्रंखला, नयी पीढ़ी की जीवन शैली समझने, उनके साथ दूरी कम करने, और उन्हें जीवन मूल्यों को समझाने का प्रयत्न है। हमें घर में वह व्यवहार करना चाहिये जो हम अपने बच्चों में देखना चाहते हैं।


Monday, March 09, 2009

अगले जनम मोहे बिटिया दीजो

यह चिट्ठी ई-पाती श्रंखला की कड़ी है। यह श्रंखला, नयी पीढ़ी की जीवन शैली समझने, उनके साथ अपनी दूरी कम करने, और उन्हें जीवन के मूल्यों को समझाने का प्रयत्न है।

१९७६ में एक फिल्म, 'कभी-कभी' आयी थी। इसका निर्देशन यश चोपड़ा ने किया था। इसके मुख्य कलाकार अमिताभ बच्चन, शशी कपूर, रिशी कपूर, राखी, वहीदा रहमान और नीतू सिंह थे। यह एक बेहतरीन फिल्म थी। इसका एक और कारण उसका संगीत भी था जिसे खय्याम ने दिया था। इसके गाने मन भावन हैं।

Monday, February 09, 2009

स्वीट डिश इस प्रकार से बांटी जाय

यह चिट्ठी ई-पाती श्रंखला की कड़ी है। यह श्रंखला, नयी पीढ़ी के साथ जीवन शैली को समझने, और उसके एवं अपने बीच दूरी कम करने का प्रयत्न है।

लीसा ऑस्ट्रिया के लिंज़ शहर की रहने वाली है। उस से मेरी मुलाकात वियाना में कॉन्वेंट में हुई थी। उसने एक ई-मेल पर बड़े दिन की पूर्व संध्या पर मित्रों के साथ पार्टी करने का जिक्र किया था। मैंने उससे अपने बचपन की पार्टियों की चर्चा करते हुऐ उस पहेली का जिक्र किया था जो मैं अक्सर ऐसी पार्टियों में पूछा करता था।

यह पहेली संक्षिप्त में इस प्रकार है कि १५ लोगों के बीच, बिना तराजू के, स्वीट डिश कैसे बांटी जाय ताकि सब संतुष्ट रहें।

इस श्रंखला कि पिछली कड़ी में, मैंने उसकी ई-मेल का जिक्र किया था जिसमें उसने वा उसके मित्रों ने इस पहेली का हल निकाल पाने में अपनी असमर्थता बतायी थी और लीसा ने मुझे चुनौती दी थी कि क्या मैं उसे टाइपिंग टेस्ट पर हरा सकता हूं।

इस कड़ी में उसे भेजा गया मेरा जवाब है और उस पहेली का हल भी है।

Saturday, January 24, 2009

मौलिकता हमेशा दूसरे की नकल होती है

यह चिट्ठी ई-पाती श्रंखला की कड़ी है। यह श्रंखला, नयी पीढ़ी के साथ जीवन शैली को समझने, और उसके एवं अपने बीच दूरी कम करने का प्रयत्न है।

पापा
आपकी तबियत ठीक नहीं है और आप आजकल आराम कर रहे हैं। मैं आपके पास एक मग, कुछ संगीत की सीडियां, मग, और कुछ पुस्तकें भेज रही हूं ताकि न केवल आपका मनोरंजन हो पर आपका समय भी अच्छी तरह से बीते। यह सारे उपहार मेरे और मुन्ने के बीच हुऐ अनगिनत फोनों पर, आपकी पसन्द के बारे में हुई बात-चीत का नतीज़ा है।

Tuesday, December 30, 2008

स्वीट डिश कैसे बांटी जाय

लीसा, ऑस्ट्रिया के लिंज़ शहर की रहने वाली है। उस से मेरी मुलाकात वियाना में कॉन्वेंट में हुई थी। मैंने आपसे उसका परिचय, अपनी चिट्ठी 'एक प्यारी सी लड़की - लीसा' पर करवाया था और वायदा किया था कि उसके और मेरे बीच बीच ई-मेल की चर्चा करूंगा।

एक बार मैंने उससे ई-मेल पर यह पहेली पूछी थी कि किसी स्वीट डिश को बहुत लोगों के बीच कैसे बराबर में बांटा जाय। ई-पाती की इस श्रंखला में उसी की चर्चा है। यह हिन्दी (देवनागरी लिपि) में है। इसे आप रोमन या किसी और भारतीय लिपि में पढ़ सकते हैं। इसके लिये दाहिने तरफ ऊपर के विज़िट को देखें।

Thursday, June 12, 2008

लीसा, अपने मन की बात सुनो: ई-पाती

लीसा से मेरी मुलाकात वियाना में कॉन्वेंट में हुई थी। मैंने उसकी आप सब से मुलाकात, अपनी चिट्ठी 'एक प्यारी सी लड़की - लीसा' पर करवायी थी और वायदा किया था कि उसके और मेरे बीच बीच ई-मेल की चर्चा करूंगा। यह चिट्ठी उसमें से एक है।

Sunday, March 09, 2008

जब एक घन्टा, एक मिनट लगता है: ई-पाती

पापा
कुछ दिन पहले हमारे यहां एक वैज्ञानिक आये थे। वे कह रह थे कि विषय पर कितनी प्रगति हुई है उससे उस विषय के महत्व का पता चलता है। उनके विचार से, कुछ विषय दूसरे विषयों से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। मुझे तो वह बड़बोले लगे।

अरस्तू, ग्रीक दार्शनिक (३८४ ईसा पूर्व - ३२२ ईसा पूर्व)

उन्हें अरस्तु के दर्शन (Aristotle's philosophy) और श्यूबर्ट के संगीत (Schubert's music) का
अच्छा ज्ञान था। यदि ऐसा नहीं होता तो मैं उन्हें कूप-मंडूक ही समझती।

श्यूबर्ट, ऑस्ट्रियन संगीतकार (१३.१.१७९७ - १९.११.१८२८)

उनसे लोगों ने कुछ खास सवाल नहीं पूछे पर मुझसे नहीं रहा गया। मैंने उनसे पूछा,
'जिस विषय पर आप काम कर रहे हैं, उस पर पिछले बीस साल में कोई प्रगति नहीं हुई है तो क्या वह विषय महत्वपूर्ण नहीं है?'
उन्होने इस सवाल का जवाब नहीं दिया, बस मुस्करा कर रह गये।

मुझे आश्चर्य हुआ कि वे भाषण के बाद मेरे पास आये और बहुत देर तक मुझसे अपने भाषण के बारे में बात करते रहे। उन्हें शक था कि श्रोता, उन्हें समझ पाये कि नहीं। उन्होने मुझसे बहुत अच्छी तरह से बात की।

यह ई-मेल बहुत लम्बी हो गयी। आपको बहुत बोर किया। अब समाप्त करती हूं।

अपना और मम्मा का ख्याल रखियेगा।

Friday, January 18, 2008

बिटिया रानी, जैसी दुनिया चाहो, वैसा स्वयं बनो

पापा
मैं कुछ दिन पहले आपके चिट्ठे पर गयी थी। वहां पहुंच कर अपनी ई-मेल और आपका जवाब पढ़ कर, सुखद आश्चर्य हुआ।

हम सब क्रिसमस की छुट्ठियां में मुन्ने के पास कैलीफोर्निया में थे - काफी धमा-चौकड़ी रही। हम लोग कई जगह घूमने भी गये। एक बार हमारी मुलाकात कुछ युवकों से हुई जो अफ्रीका में शिक्षा के लिये पैसा इक्ट्ठा कर थे। उनके साथ बैनर पर महात्मा गांधी का यह उद्धरण लिखा था,

'You must be the change, you want to see in the World.'
जो परिवर्तन दुनिया में चाहो, वैसा स्वयं बनो।

हमें यह पढ़ कर अच्छा लगा। हमने उनसे बात भी की और चन्दा भी दिया।

आपकी
परी
 

Friday, November 09, 2007

पापा, क्या आप उलझन में हैं

यह पोस्ट ओपन सोर्स और ओपेन फॉर्मैट के महत्व को बताती है। यह हिन्दी (देवनागरी लिपि) में है। इसे आप रोमन या किसी और भारतीय लिपि में पढ़ सकते हैं। इसके लिये दाहिने तरफ ऊपर के विज़िट को देखें।

इसे आप नीचे चलाने के चिन्ह ► पर चटका लगा कर सुन सकते हैं।
बकबक पर सुनने के लिये प्ले करने वाले चिन्ह यहां पर चटका लगायें। यह ऑडियो फाइल ogg फॉरमैट में है। इस फॉरमैट की फाईलों को आप,

  • Windows पर कम से कम Audacity, MPlayer, VLC media player, एवं Winamp में;
  • Mac-OX पर कम से कम Audacity, Mplayer एवं VLC में; और
  • Linux पर सभी प्रोग्रामो में,
सुन सकते हैं। ऑडियो फाइल पर चटका लगायें फिर या तो डाउनलोड कर ऊपर बताये प्रोग्राम में सुने या इन प्रोग्रामों मे से किसी एक को अपने कंप्यूटर में डिफॉल्ट में कर ले। डाउनलोड करने के लिये पेज पर पहुंच कर जहां Download फिर अंग्रेजी में फाइल का नाम लिखा है, वहां चटका लगायें।

Friday, October 05, 2007

ओपेन सोर्स की पाती - बिटिया के नाम

पापा,उत्तरी पश्चिमी कॅनाडा से दक्षिणी मध्य अमेरिका की यात्रा तो सुखद थी पर दोनो जगह के मौसम में अन्तर है। इसलिये ठीक तरह से व्यवस्थित होने में कुछ समय लगेगा।

यहां मुझे एक बढ़िया लैपटाप मिला है । मैने इसमें लिनक्स फेडोरा और विन्डोज एस.पी. दोनो डाले हैं पर मैं काम फिडोरा में ही करती हूं। विंडोज तो इसलिए डाला है कि यदि कभी जरूरत पड़े तो इसका प्रयोग कर सकूं। मुझे मालुम है कि आपको यह पढ़ कर अच्छा लगेगा,
इसलिये मैंने यह ई-मेल में लिखा है।

मेरा समय ज्यादातर काम में लग जाता है और मुझे अपना काम पसन्द है लेकिन मैं उपन्यास के लिये समय निकालना चाहती हूं। मैं सोने जाने से पहले हमेशा थोड़ा पढ़ती हूं - कुछ साहित्य से सम्बन्धित।

मैंने अभी दास्तोवेस्की (Dostoevsky) की क्राइम एण्ड पनिशमेंट (Crime and Punishment) पढ़ी है। मैं सोचती हूं
कि यह रोचक उपन्यास है। क्या आपने इसे पढ़ा है? यदि नहीं, तो पढ़ें - यह आपको पसन्द आयेगी। उसमें एक जगह लेखक, अपराध और अपराधी का वर्णन करता है और मेरे विचार से यह पुस्तक का सबसे अच्छा भाग है।

मां ने आपको, मेरी जर्मन सहेली के बारे में बताया होगा। वह मेरे साथ कॅनाडा में थी और अब वापस म्यूनिख चली गयी है। वह भारत में है और मैंने उसे आपका फोन और पता दे दिया है। शायद, उसे कभी आपकी जरूरत पड़े।

आप और मम्मी अच्छे होंगे। अपना ख्याल रखियेगा।
आपकी परी