Saturday, September 09, 2006

हरिवंश राय बच्चन - इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय के अध्यापक

पहली पोस्ट: हरिवंश राय बच्चन – विवाद
दूसरी पोस्ट: हरिवंश राय बच्चन - क्या भूलूं क्या याद करूं
तीसरी पोस्ट: हरिवंश राय बच्चन – तेजी जी से मिलन
यह पोस्ट: हरिवंश राय बच्चन - इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय के अध्यापक

बीसवीं शताब्दी में इलाहाबाद विश्वविद्यालय Oxford of East के नाम से जाना जाता था - भारतवर्ष का सबसे अच्छा विश्‍वविद्यालय। इस विश्‍वविद्यालय एक फिलोसफी विभाग के अध्‍यापक के बारे में बच्चन जी ने ‘क्या भूलूं क्‍या याद करूं’ में लिखा था। इसका जिक्र भी मैंने इस विषय की दूसरी पोस्ट पर किया है। बच्चन जी इलाहाबाद विश्वविद्यालय में फिर से अंग्रेजी में पढ़ाई पूरी करने गये। 'नीड़ के निर्माण फिर' में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पुनः पढ़ाई वा उन्हें कैसे वहां नौकरी मिली की कथा बताते हैं। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग के दो प्रसिद्ध अध्यापक अमर नाथ झा और एम.सी. देव के बारे में बताते हैं।
‘पंडित अमरनाथ झा अंग्रेजी-साहित्‍य का इतिहास और शेक्सपियर पढ़ाते थे। साहित्य के इतिहास पर उनका एक व्याख्यान प्रति सप्ताह होता था और उसमें बी.ए. कें लड़के भी आकर बैठ सकते थे-विभाग के बीचोंबीच वाले सबसे बड़े हाल में, जिसमें अपराहन में ^ला’ के क्लास होते थे। शेक्सपियर वाला क्लास वे अपने कमरे में लेते थे। हाजिरी लेने में वे अपना वक्त नहीं खराब करते थे । लड़के उनके क्लास में पहुंचे, उन्होंने एक नजर सब पर दौड़ाई, रजिस्टर खोला और अनुपस्थित लड़कों के नाम के आगे बिन्दी धर दी। किसी प्रकार का नोट हाथ में लेकर पढ़ाते मैंने कभी न देखा था; प्रो.एस.सी. देब को भी यह कमाल हासिल था, पर दोनों में जमीन-आसमान का अन्तर था। झा साहब जब किसी विषय पर व्याख्यान देने लगते तो महसूस होता थ कि आप एक ऐसी नाव में बैठे हैं जिसकी पतवार ठीक दिशा में लगी हुई है और जिसका खेवनहार नाव को समगति से खेता आपको ४५ मिनट के निश्चित घाट पर उतार देगा। देब साहब की नाव में न पतवार होती थी न डांड़ । वह शब्दों के तूफान में डगमग डोलती कभी कभी दाएं-बाएं, कभी आगे, और कभी पीछे भी खिंचती, किसी भी जगह जाकर टकरा सकती थी।‘

एक साल गर्मियों में बच्‍चन जी तेजी जी के साथ झा साहब के साथ मसूरी में रहे। उसके अनुभव पर बच‍चन जी कहते हैं कि,
‘झा साहब के साथ कोई कितने ही दिन रहे, उनसे निकटता का अनुभव नहीं कर सकता था। वे अपने भीतर कहीं बहुत एकाकी, स्वकेन्द्रित और स्वयं-पर्याप्त थे। वे यह तो चाहते थे कि उनके आस-पास लोग रहें पर अपने निकट वे किसी को न आने देते थे। झा साहब में बहुत गुण थे, पर वे अच्छे मेजबान नहीं थे। धर्मशाला और घर रहने में कुछ अन्तर का अनुभव तो होना चाहिए। उनके घर में सब-कुछ ठंडा-ठंडा सा था ! हृदय की गर्माहट की प्रतीति कहीं नहीं होती थी।

कैसे अनासक्त भाव से रहता था वह शख्स! सुबह से शाम तक सारे काम बिना किसी घबराहट के, थकावट के, बिना किसी शिकवा-शिकायत के, कर्तव्य की गरिमा से करते जाना रोज-ब-रोज, माह-ब-माह, साल-ब-साल। इतना जब्त करने वाला, इतना अपने को जाब्ते में रखने वाला मैंने दूसरा आदमी नहीं जाना।‘

अगला सप्ताह हिन्दी सप्ताह है - १४ सितम्बर हिन्दी दिवस है तब बात करेंगे हरिवंश राय बच्चन के अंग्रेजी भाषा के विचारों के बारे में।

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Thursday, September 07, 2006

२.२ पेटेंट और कंप्यूटर प्रोग्राम: अमेरिका में

भाग-१: पेटेंट
पहली पोस्ट: भूमिका
दूसरी पोस्ट: ट्रिप्स (TRIPS)
तीसरी पोस्ट: इतिहास की दृष्टि में
चौथी पोस्ट: पेटेंट प्राप्त करने की प्रक्रिया का सरलीकरण
पांचवीं पोस्ट: आविष्कार
छटी पोस्ट: पेटेंटी के अधिकार एवं दायित्व

भाग-२: पेटेंट और कंप्यूटर प्रोग्राम
पहली पोस्ट: भूमिका
यह पोस्ट: पेटेंट और कंप्यूटर प्रोग्राम: अमेरिका में
अगली पोस्ट: पेटेंट और कंप्यूटर प्रोग्राम: अमेरिका में औद्योगिक प्रक्रिया के साथ

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Friday, September 01, 2006

हरिवंश राय बच्चन - तेजी जी से मिलन

नीड़ का निर्माण फिर बच्चन जी की जीवनी का दूसरा भाग है, यह भाग उनकी पहली पत्नी श्यामा की मृत्यु से शुरू होकर इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पुनः दाखिले, इलाहाबाद विश्वविद्यालय में नियुक्ति, तेजी जी से मिलन, अमिताभ एवं अजिताभ पुत्र रत्न की प्राप्ति, और उनके शिखर पर पहुंचने की कथा है। इस दौरान उन्होने अपने बसेरे का निर्माण किया शायद इसलिये इस भाग का नाम उन्होंने ‘नीड़ का निर्माण फिर’ रखा।

बच्चन जी के जीवन में आइरिस नाम की एक लड़की आयी पर उसने उनका प्रेम निवेदन स्वीकार नहीं किया। वे अकेले हो गये और जीवन में नारी को ढूढ़ने लगे। वे अपने मित्र प्रकाश के पास बरेली थे वहां पर उनकी मुलाकात तेजी जी से हुई जो कि लाहौर में साइकोलोजी पढ़ाती थीं। प्रथम मुलाकात के अनुभव को बच्चन जी इस प्रकार से वर्णित करते हैं।
'आज प्रेमा ने अपनी सहेली का परिचय मुझसे कराया है, और बारह वर्ष पहले लिखी अपनी एक तुकबन्दी मेरे कानों में बार-बार गूँजती रही -
इसीलिये सौन्दर्य देखकर
शंका यह उठती तत्काल,
कहीं फँसाने को तो मेरे
नहीं बिछाया जाता जाल
पर अदृश‍य देख रहा था कि जाल बिछ चुका था और करूणा अवसाद के जाल में फँस चुकी थी या अवसाद ने करूणा को अपने पाश-अपने बाहुपाश- में बाँध लिया था ! यह तो मैं दूसरे दिन कह सकता था, लेकिन उस दिन मैं उस सौन्दर्य से असंपृक्त, उदासीन, दूर, डरा-डरा रहा- ‘भय बिनु होइ न प्रीति’ का क्या कोई रहस्यपूर्ण अर्थ है?'

रात्रि में कविता पाठ पर उनका तेजी जी से भावात्मक - और उसका वर्णन इस प्रकार है,
'न जाने मेरे स्वर में कहाँ की वेदना भर गयी कि पहले पद पर ही सब लोग बहुत गम्भीर हो गए। जैसे ही मैंने यह पंक्ति पूरी की
उस नयन में बह सकी कब
इस नयन की अश्रुधरा
कि देखता हूँ कि मिस [तेजी] सूरी की ऑंखें डबडबाती हैं और टप-टप उनके ऑँसू की बूँदें प्रकाश के कंधे पर गिर रही हैं, और यह देखकर मेरा कंठ भर आता है—मेरा गला रूंध जाता है—मेरे भी आँसू नहीं रूक रहे हैं। --- और अब मिस सूरी की आँखों से गंगा -जमुना बह चली है --- मेरी आँखों से जैसे सरस्वती --- कुछ पता नहीं कब प्रकाश, प्रेमा, आदित्य और उमा कमरे से निकल गये र्हैं और हम दोनों एक-दूसरे से लिपटकर रो रहे हैं और आँसुओं के उस संगम से हमने एक-दूसरे से कितना कह डाला है, एक-दूसरे को कितना सुन लिया है, उन आँसुओं से कितने कूल-किनारे टूट-गिर गए हैं, कितने बांध ढह-बह गए हैं, हम दोनों के कितने शाप-ताप घुल गए हैं, कितना हम बरस-बरस कर हल्के हुए हैं, कितना भीग-भीगकर भारी कोई प्रेमी ही इस विरोध को समझेगा – कितना हमने एक-दूसरे को पा लिया है, कितना हम एक-दूसरे में खो गए हैं। हम क्या थे और हम आँसुओं के जादुई चश्मों में नहाकर क्या हो गए हैं। हम पहले से बिल्‍कुल बदल गए हैं पर हम एक-दूसरे को पहले से कहीं ज्यादा पहचान रहे हैं-क्योंकि एक-दूसरे के सामने हम अपने असली रूप में हैं। चौबीस घंटे पहले हमने इस कमरे में अजनबी की तरह प्रवेश किया था, और चौबीस घंटे बाद हम उसी कमरे से जीवन-साथी (पति-पत्नी नहीं) बनकर निकल रहे हैं- यह नए वर्ष का नव प्रभात है जिसका स्वागत करने को हम बाहर आए हैं।'
शादी का प्रण लिया, सगाई वहीं हुई। कुछ दिनो बाद शादी इलाहाबाद में।

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Thursday, August 31, 2006

पेटेंट और कंप्यूटर प्रोग्राम – भूमिका

भाग-१: पेटेंट
पहली पोस्ट: भूमिका
दूसरी पोस्ट: ट्रिप्स (TRIPS)
तीसरी पोस्ट: इतिहास की दृष्टि में
चौथी पोस्ट: पेटेंट प्राप्त करने की प्रक्रिया का सरलीकरण
पांचवीं पोस्ट: आविष्कार
छटी पोस्ट: पेटेंटी के अधिकार एवं दायित्व

भाग-२: पेटेंट और कंप्यूटर प्रोग्राम
यह पोस्ट: भूमिका
अगली पोस्ट: अमेरिका में पेटेंट का कानून

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Sunday, August 20, 2006

हरिवंश राय बच्चन - क्या भूलूं क्या याद करूं

पिछली पोस्ट: हरिवंश राय बच्चन – विवाद यहां देखें
यह पोस्ट: बच्चन जी की आत्मकथा का पहला भाग -क्या भूलूं क्या याद करूं

बच्चन जी अपनी आत्मकथा के पहले भाग 'क्या भूलूं क्या याद करूं' की शुरुवात अपने पुरखों के इलाहाबाद में बसने आने की कथा से शुरू करते हैं। इसमें उनके प्रारम्भिक संघर्ष की कहानी, उनकी श्यामा के साथ पहली शादी, और श्यामा की मृत्यु तक का वर्णन है। वे इसमें वे अन्य महिलाओं के साथ अपने उन सम्बन्धों का भी इशारा भी करते हैं जो हमारे समाज में अनुचित माने जाते हैं। इन सम्बन्धों की चर्चा का उनका ढंग भी अनूठा है। वे इसे न कहते हुऐ भी, सारी बात कह जाते हैं। वे कायस्थ थे और कायस्थों के बारे में कहते हैं कि,
'कायस्थ के वाक-चातुर्य और बुद्धि-कौशल के भी किस्से कहे जाते हैं। हमारे एक अध्यापक पंडित जी कहा करते थे कि कायस्थ की मुई खोपड़ी भी बोलती है। उन्हीं से मैंने सुना था कि एक बार किसी ने देवी की बड़ी आराधना की। देवी ने प्रसन्न होकर एक वरदान देने को कहा। इधर मां अं‍धी, पत्नी की कोख सूनी, घर में गरीबी। बडे असमंजस में पड़ा-मां के लिए आंख मांगे, कि पत्नी के लिए पुत्र, कि परिवार के लिए धन। जब सोच-सोचकर हार गया तो एक कायस्थ महोदय के पास पहूंचा। उन्होंने कहा,“इसमें परेशान होने की क्या बात है, तुम कहो कि मैं यह मॉगता हूं कि मेरी मां अपने पोते को रोज सोने की कटोरी में दूध-भात खाते देखें !'

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में स्नातक की कक्षा में बच्चन जी के पास हिन्दी अंग्रेजी और फिलॉसफी के विषय थे। फिलॉसफी विषय के अध्यापकों के बारे में बताते हैं कि,
'मेटाफिजिक्स हमें मिस्टर ए. सी. मुकर्जी और माडर्ल एथिक्स मिस्टर एन. सी. मुकर्जी ने पढ़ाया था। ए. सी. मुकर्जी अपनी फ़िलॉसफ़री ख़ब्तुलहवासी के लिए प्रसिद्ध थे। हम लोग क्लास में पहुंचे हैं और उन्होंने धाराप्रवाह बोलना आरम्भ कर दिया है। हमारी समझ में कुछ नहीं आता, सब सिर के ऊपर से तेज हवा-सा गुजरा जा रहा है। किसी को उठकर उनसे कुछ पूछने की हिम्मत नहीं होती; बीच में कोई सवाल वे ही पूछते हैं। कोई उत्तर नहीं दे पाता। अरे, फलां कहां है, क्लास का सबसे तेज लड़का। वह तो नहीं है - इस नाम का कोई लड़का इस क्लास में नहीं है। कुछ घबराकर पूछते हैं-व्हाट क्लास इज दिस? - यह कौन क्लास है? कोई उत्तर देता है, बी. ए. फर्स्ट इयर। प्रोफेसर साहब अपने दोनों हाथ अपने माथे से लगाते हैं-माई गॉड, आई थॉट इट वाज़ एम. ए. फाइनल! - मैंने समझा एम. ए. फाइनल का दर्जा है। और वे बी. ए. फर्स्ट इयर वाला लेक्चर शुरू कर देते हैं।'

बच्चन जी कभी मेरे घर नहीं आते क्योंकि मेरे घर का सबसे महत्वपूर्ण सदस्य टौमी है जिसके बारे में शुभा यहां बता रहीं हैं। टौमी का काम, सबसे पहले पूंछ हिला कर मेहमान का स्वागत करना है फिर उनको सूंघना है यदि यह न करने दिया तो फिर शामत ही समझिये - बैठना मुश्किल। यह न करने देने पर वह इतनी जोर से भौंकना शुरू कर देता है कि बात करना असम्भव है। पर कुत्तों के बारे में बच्चन जी के विचार यह हैं,
'देसी कुत्ते गांव भर में घूमते थे जो किसी अजनबी के गांव में घुसने पर भूकना शुरू कर देते थे। मुझे कुत्तों का घर भर में जगह-जगह लेटे-बैठे रहना बहुत बुरा लगता और मैं रहठे की सोंठी से उन्हें मार-मार कर भगाता रहता। मेरे बहनोई कहते, जब से मेरे साले साहब आए हैं घर में कहीं कुत्ते नहीं दिखलाई देते।'

यह किताब इलाहाबाद की यादों से भरपूर है इसमें इलाहाबाद के मुहल्लों, शहर और विशवविद्यालय का वर्णन है। यदि आपका इलाहाबाद से कुछ भी सम्बन्ध है तो आपको बहुत कुछ अपना लगेगा। किताब अच्छी है पर बच्चन जी अपने पूर्वजों का वर्णन इतने विस्तार से न करते तो अच्छा रहता।

इस किताब में उनके और सुमित्रा नन्दन पन्त के उस विवाद का जिक्र नहीं है जिसको जानने के लिये मैंने इसे पढ़ना शुरू किया। चलिये देखते हैं कि उनकी आत्मकथा के दूसरे भाग 'नीड़ का निर्माण फिर' में क्या उसका वर्णन है अथवा नहीं। यह अगली बार।

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Wednesday, August 16, 2006

पेटेंटी के अधिकार एवं दायित्व

भाग-१: पेटेंट
पहली पोस्ट: भूमिका
दूसरी पोस्ट: ट्रिप्स (TRIPS)
तीसरी पोस्ट: इतिहास की दृष्टि में
चौथी पोस्ट: पेटेंट प्राप्त करने की प्रक्रिया का सरलीकरण
पांचवीं पोस्ट: आविष्कार
यह पोस्ट: पेटेंटी के अधिकार एवं दायित्व

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Windows पर कम से कम Audacity एवं Winamp में;
Linux पर लगभग सभी प्रोग्रामो में; और
Mac-OX पर कम से कम Audacity में,
सुन सकते हैं।

Monday, August 14, 2006

हरिवंश राय बच्चन - विवाद

कुछ समय पहले हिन्दी चिट्ठे जगत में इस बात की चर्चा रही कि किसी को लिखी गयी व्यक्तिगत ईमेल बिना लिखने वाले की अनुमति के सार्वजनिक रूप से प्रकाशित करना उचित है कि नहीं - इसके लिये यहां, यहां, और यहां देखें। इस विषय पर अनूप शुक्ला जी की चिट्ठी पर मैंने टिप्पणी की थी कि
'किसी कि private ई-मेल या पत्र, लेखक का कौपी-राईट है और बिना लिखने वाले की अनुमति के प्रकाशित करना अनुचित है। जहां तक मुझे याद पड़ता है कि हरिवंश राय बच्चन और एक अन्य साहित्यकार के बीच इस बारे मे काफी विवाद हो चुका है।'


मुझे उस समय दूसरे साहित्यकार का नाम याद नहीं आ रहा था इसलिये नहीं लिखा था। कुछ दिन पहले हवाई अड्डे पर अमिताभ बच्चन और जया भादुड़ी दिख गये। मैं भी उन कड़ोड़ो लोगों मे हूं जो कि उनके दिवाने हैं। मैं उनसे बात करने का यह सुनहरा मौका नहीं छोड़ने वाला था - बस लस लिया उनके साथ। अब यदि आप विख्यात हों तो मेरे जैसे कईयों को तो झेलना पड़ेगा ही - विख्यात होने का कुछ न कुछ तो मूल्य चुकाना होगा। जब मैनें उनसे पत्र लिखने के विवाद के बारे में पूछा तब उन्होने बताया कि यह सुमित्रा नन्दन पन्त के साथ हुआ था। उन्होने कहा,
'यह बाबूजी कि आत्मकथा में मिलेगा। उनकी चौथी किताब भी आ गयी है।'

मैंने इन लोगों से कोई ३-४ मिनट बात की होगी - बहुत अच्छी तरह से बात की
पर एक बात का दुख रहा उन दोनो का प्रयत्न था कि वे अंग्रेजी में बात करें। वहां स्टाफ से भी उन्होने अंग्रजी में बात की। मैने इस बारे मे अपनी शुरू की चिट्ठी में यहां लिखा था, आज देख भी लिया। ऐसी जगहों पर मेरा हमेशा प्रयत्न रहता है कि मैं हिन्दी में बात करूं - चलिये हर को अपना अन्दाज मुबारक।

बच्चन जी ने अपनी आत्मकथा चार खन्डो में लिखी है। यह हैं,
  • क्या भूलूं क्या याद करूं
  • नीड़ का निर्माण
  • बसेरे से दूर
  • दशद्वार से सोपान तक
मैने वापस आ कर चारो खन्ड खरीद लिये हैं। आने वाली चिट्ठियों में कुछ इन किताबों के बारे में और कुछ उस विवाद के बारे में।

Thursday, August 10, 2006

पेटेंट आविष्कार

भाग-१: पेटेंट
पहली पोस्ट: भूमिका
दूसरी पोस्ट: ट्रिप्स (TRIPS)
तीसरी पोस्ट: इतिहास की दृष्टि में
चौथी पोस्ट: पेटेंट प्राप्त करने की प्रक्रिया का सरलीकरण
यह पोस्ट: आविष्कार
अगली पोस्ट: पेटेंटी के अधिकार एवं दायित्व

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  • Windows पर कम से कम Audacity एवं Winamp में;
  • Linux पर लगभग सभी प्रोग्रामो में; और
  • Mac-OX पर कम से कम Audacity में,
सुन सकते हैं। मैने इसे ogg फॉरमैट क्यों रखा है यह जानने के लिये आप मेरी शून्य, जीरो, और बूरबाकी की चिट्ठी पर पढ़ सकते हैं। अब चलते हैं इस चिट्ठी पर।

पेटेंट आविष्कारों के लिए दिया जाता है । ‘आविष्कार’ का अर्थ उस प्रक्रिया या उत्पाद से है जो कि औद्योगिक उपयोजन ( Industrial application) के योग्य है । अविष्कार नवीन एवं उपयोगी होना चाहिये तथा इसको उस समय की तकनीक की जानकारी में अगला कदम होना चाहिए। यह आविष्कार उस कला में कुशल व्यक्ति के लिए स्पष्ट (Obvious) भी नहीं होना चाहिये।

आविष्कार को पेटेंट अधिनियम की धारा 3 के प्रकाश में भी देखा जाना चाहिये । यह धारा परिभाषित करती है कि क्या आविष्कार नहीं होते हैं।

किसी बात को आविष्कार तब तक नहीं कहा जा सकता है जब तक वह नवीन न हो। यदि किसी बात का पूर्वानुमान किसी प्रकाशित दस्तावेज के द्वारा किया जा सकता था या पेटेंट आवेदन के प्रस्तुत करने के पूर्व विश्व में और कहीं प्रयोग किया जा सकता था तो इसे नवीन नहीं कहा जा सकता। यदि कोई बात सार्वजनिक क्षेत्र में है या पूर्व कला के भाग की तरह उपलब्ध है तो उसे भी आविष्कार नहीं कहा जा सकता। हमारे देश में परमाणु उर्जा से सम्बन्धित आविष्कारों का पेटें‍ट नहीं कराया जा सकता है।

मेरा प्रयत्न रहेगा कि इस सिरीस की चिट्ठियां और इनकी ऑडियो क्लिपें, भारतीय समय के अनुसार हर बृहस्पतिवार की रात्रि को पोस्ट होंं। तो फिर मिलेंगे अगले बृहस्पतिवार १७ अगस्त को।

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Thursday, August 03, 2006

पेटेंट प्राप्त करने की प्रक्रिया का सरलीकरण

भाग-१: पेटेंट
पहली पोस्ट: भूमिका
दूसरी पोस्ट: ट्रिप्स (TRIPS)
तीसरी पोस्ट: इतिहास की दृष्टि में
यह पोस्ट: पेटेंट प्राप्त करने की प्रक्रिया का सरलीकरण
अगली पोस्ट: आविष्कार

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यदि आप, इस चिट्ठी को आप मेरे पहले पॉडकास्ट 'बकबक' पर यहां क्लिक करके सुन सकते हैं। यह ऑडियो क्लिप, ogg फॉरमैट में है। इस फॉरमैट की फाईलों को आप,
  • Windows पर कम से कम Audacity एवं Winamp में;
  • Linux पर लगभग सभी प्रोग्रामो में; और
  • Mac-OX पर कम से कम Audacity में,
सुन सकते हैं। मैने इसे ogg फॉरमैट क्यों रखा है यह जानने के लिये आप मेरी शून्य, जीरो, और बूरबाकी की चिट्ठी पर पढ़ सकते हैं। अब चलते हैं इस चिट्ठी पर।

प्रत्येक देश का अपना पेटेंट कानून है । साधारण तौर पर आविष्कारको को प्रत्येक देश में पेटैंट के लिए आवेदन देना आवश्यक है जहां वे अपने आविष्कारों का प्रयोग करना चाहते हैं। हर देश में अलग अलग आवेदन पत्र देना कठिन कार्य है। इस प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए निम्न अन्तर्राष्ट्रीय प्रयास किये गये हैं।

  1. देशों में पेटेंट संबंधी अन्तरों को कम करने का पहला प्रयास International Convention for the protection of Industrial Property था। इसे पेरिस में 1883 में अंगीकार किया गया है। इसे अनेक बार संशोधित किया गया। इसने आविष्कारकों को किसी एक सदस्य देश में आवेदन पत्र प्रस्तुत करने की प्रथम तारीख का लाभ अन्य सदस्य राज्यों में आवेदन पत्र दाखिल करने की तिथि के लिये दिया।
  2. Patent Cooperation Treaty 1970 (P.C.T. या पी. सी. टी.) पेटेंट के लिये आवेदन पत्र प्रस्तुत करने की प्रक्रिया में सुविधा प्रदान करती है। यह पेटेंट के लिये आवेदन पत्र का मानकीकृत फारमेट बताती है और इसके साथ उन्हे दाखिल करने की केन्द्रीयकृत सुविधा देती है। हमने इसके अनुच्छेद 64 के उप अनुच्छेद 5 के अलावा‚ इसे7-12-98 को स्वीकार किया है।
  3. European patent Convention, 1977 में लागू हुआ। इसके द्वारा एक यूरोपियन पेटेंट कार्यालय की स्थापना हुई। इसके द्वारा दिया गया पेटेंट, आवेदक द्वारा नामित सदस्य देशों में पेटेंट का कार्य करता है।
  4. World Intellectual Property Organisation WIPO (वाईपो) ने Patent Law Treaty (PLT) ( पी.एल.टी. ) बनायी है। यह 1 जून 2000 को अंगीकार कर ली गयी है पर हमने इस पर अभी तक हस्ताक्षर नहीं किये हैं। पी.एल.टी., पी.सी.टी. के अधीन है और विभिन्न देशों में पेटेंटो को प्राप्त करने की प्रक्रिया को और सरल बनाती है । यह पेटेंट के Substantive Law को प्रभावित नहीं करती है।
  5. Substantive Patent Law को एक लय में लाने के लिए वाईपो, Substantive Patent Law Treaty (SPLT) (एस पी. एल. टी.) का आयोजन कर रही है । जहां तक मुझे मालुम है हम इसमें भाग नहीं ले रहे। हमें इसमें भाग लेकर अपनी बात कहनी चाहिये।
मेरा प्रयत्न रहेगा कि इस सिरीस की चिट्ठियां और इनकी ऑडियो क्लिपें, भारतीय समय के अनुसार हर बृहस्पतिवार की रात्रि को पोस्ट होंं। तो फिर मिलेंगे अगले बृहस्पतिवार १० अगस्त को।

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Thursday, July 20, 2006

१.३-४ पेटेंट - इतिहास

भाग-१: पेटेंट
पहली पोस्ट: भूमिका
दूसरी पोस्ट: ट्रिप्स (TRIPS)
यह पोस्ट: पेटेंट के इतिहास के बारे में

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  • Windows पर कम से कम Audacity एवं Winamp में;
  • Linux पर लगभग सभी प्रोग्रामो में; और
  • Mac-OX पर कम से कम Audacity में,
सुन सकते हैं।

मैने इसे ogg फॉरमैट क्यों रखा है यह जानने के लिये आप मेरी शून्य, जीरो, और बूरबाकी की चिट्ठी पर पढ़ सकते हैं। अब चलते हैं इस चिट्ठी पर।

‘पेटेंट’ का शब्द, लैटिन के शब्द Lilterae Patents से आया है । पेटेंट का अर्थ है ‘खुला’, और Lilterae Patents का शाब्दिक अर्थ है (Letters patents) या खुले पत्र। पुराने जमाने में शासको या सरकारों के द्वारा पदवी, हक, विशेष अधिकार पत्र के द्वारा दिया जाता था। यह शासकीय दस्तावेज होता था और इन्हे चूंकि सार्वजनिक रूप से दिया जाता था, इसलिए यह हमेशा ‘खुले’ रहते थे।

यूरोप में ६वीं शताब्दी में से इस तरह के पत्र दिये जाते थे। यह शासक की ओर से विदेशी भूमि की खोज तथा उस पर विजय के लिये जारी किये जाते थे। आजकल पेटेंट शब्द का प्रयोग आविष्कारों के संबंध में होता है। इस तरह का प्रयोग पहली बार १५वीं शताब्दी के आस-पास आया और सर्वप्रथम पेटेंट कानून जैसा इसे आज समझा जाता हैं, सबसे पहले १४ मार्च, १४७४ को वियाना सिनेट (Ventian Senate) के द्वारा को पारित किया गया।

पेटेंट आविष्कारकों को अनन्य (Exclusive) अधिकार देता है । यह बहुत जल्दी इटली से यूरोप के अन्य देशों तक फैल गया। जिन देशों के पास प्रौद्योगिकी नहीं थी, उन्होंने प्रौद्योगिकी को स्थापित करने के लिए विदेशी आविष्कारकों को पेटेंट देना शुरू कर दिया । इंगलैंड में पहले इसकी अवधि नहीं थी पर ब्रिटिश संसद ने १६२३ में नया कानून बनाकर इसे १४ वर्षो तक सीमित कर दिया।

अमेरिका के संविधान के अनुच्छेद १ अनुभाग ८ के अन्तर्गत अमेरिकी कॉग्रेस को विज्ञान और कलाओं की प्रगति के लिये कानून बनाने का अधिकार है । इस परिप्रेक्ष्य में कांग्रेस ने १७९० में पहला पेटेंट कानून पारित किया । फ्रान्स ने इसके अगले वर्ष पेटेंट कानून बनाया। १९वीं शताब्दी के अंत तक अनेक देशों ने अपना (जिसमें भारतवर्ष भी सम्मिलित है) पेटेंट कानून बनाया ।

भारतवर्ष में पेटेंट कानून का इतिहास
भारतवर्ष में पहला पेटेंट सम्बन्धित कानून, १८५६ मे पारित अधिनियम था। इसे २५ फरवरी १८५६ को गवर्नर जनरल की अनुमति प्राप्त हो गयी थी पर यह कानून १८५७ में अधिनियम सं0 ९ के द्वारा इसलिये खारिज कर दिया गया कि इसे बनाने के पूर्व इंगलैंड की महारानी की मंजूरी नहीं प्राप्त की गयी थी।

नये अविष्कार के उत्पादकों को प्रोत्साहित करने के लिये अधिनियम सं0 १५ सन १८५९, को पारित किया। बाद में यह Inventions and Designs Act 1888 के द्वारा प्रतिस्थपित कर दिया गया। इसके बाद १९११ में Indian Patents and Designs Act १९११ आया। 1967 में भारत सरकार ने पार्लियामेंट में पेटैंट बिल पेश किया जो Patent Act १९७० (पेटेंट अधिनियम ) के रूप में पास हुआ। पेटेंट अधिनियम को तीन बार निम्न प्रकार से संशोधित किया गया है ।

  • संशोधन अधिनियम सं. १७, १९९९ (१९९९ संशोधन);
  • संशोधन अधिनियम सं. ३८,२००२ (२००२ का संशोधन);
  • संशोधन अधिनियम सं. १५, २००५ (२००५ का संशोधन)।
यह तीनों संशोधन महत्वपूर्ण हैं, इनके बारे में आगे चर्चा होगी।
मेरा प्रयत्न रहेगा कि इस सिरीस की चिट्ठियां और इनकी ऑडियो क्लिपें, भारतीय समय के अनुसार हर बृहस्पतिवार की रात्रि को पोस्ट होंं। अगले बृहस्पतिवार को हम लोग नहीं मिल पायेंगे अब मुलाकात होगी उसके बाद के बृहस्पतिवार यानी कि ३ अगस्त को।

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