Sunday, September 23, 2007

एकान्तता और निष्कर्ष: आज की दुर्गा

(इस बार चर्चा का विषय है एकान्तता और इस श्रंखला का निष्कर्ष। इसे आप सुन भी सकते हैं। सुनने के लिये ► चिन्ह पर और बन्द करने के लिये ।। चिन्ह पर चटका लगायें।)

privacy right wome...


हमारे संविधान का कोई भी अनुच्छेद, स्पष्ट रूप से एकान्तता की बात नहीं करता है। अनुच्छेद २१ स्वतंत्रता एवं जीवन के अधिकार की बात करता है पर एकान्तता की नहीं। १९९२ में मुकदमे Neera Mathur Vs. Life Insurance Corporation में उच्चत्तम न्यायालय ने एकान्तता के अधिकार को, अनुच्छेद २१ के अन्दर, स्वतंत्रता एवं जीवन के अधिकार का हिस्सा माना।

नीरा माथुर, जीवन बीमा निगम में प्रशिक्षु थीं। अपने प्रशिक्षण के दौरान उसने अवकाश लिया पर जब वह वापस आयीं तो उनकी सेवायें समाप्त कर दी गयी। उन्होने दिल्ली उच्च न्यायालय में गुहार लगायी। निगम ने न्यायालय को बताया कि, उसे नौकरी से इसलिये हटा दिया गया क्योंकि उसने नौकरी पाने के समय झूठा घोषणा पत्र दिया था।

निगम में सेवा प्राप्त करने से पहले एक घोषणा पत्र देना होता है। महिलाओं को इसमें कुछ खास सूचनायें बतानी पड़ती थीं, जैसे कि,

  • रजोधर्म की आखिरी तिथि क्या है?
  • क्या वे गर्भवती हैं?
  • उनका कभी गर्भपात हुआ है कि नहीं, इत्यादि।
अवकाश के दौरान नीरा को बिटिया हुयी थी और जीवन बीमा निगम के अनुसार उसने घोषणा पत्र में जो रजोधर्म की आखिरी तारीख लिखी थी यदि वह सही है तो उसे यह बिटिया नहीं पैदा हो सकती थी। इसलिये वे इस घोषणा पत्र को झूठा बता रहे थे।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने नीरा माथुर की याचिका खारिज कर दी पर उच्चतम न्यायालय ने उसकी अपील स्वीकार कर, उसे सेवा में वापस कर दिया। उनके मुताबिक यह सूचना किसी महिला की एकान्तता से सम्बन्धित है। न्यायालय ने कहा कि,

'The particulars to be furnished under columns (iii) to (viii) in the declaration are indeed embarrassing if not humiliating.'
इस तरह की सूचना मांगना यदि अपमानजनक नहीं है तो कम से कम शर्मिन्दा करने वाली है।

निष्कर्ष
हम लोग इस समय २१वीं सदी में पहुंच रहे हैं। लैंगिक न्याय की दिशा में बहुत कुछ किया जा चुका है पर बहुत कुछ करना बाकी भी है। क्या भविष्य में महिलाओ को लैंगिक न्याय मिल सकेगा। इसका जवाब तो भविष्य ही दे सकेगा पर लगभग ३० साल पहले रॉबर्ट केनेडी ने कहा था,

'Some men see the things as they are and say why, I dream things that never were and say why not?'

केवल कानून के बारे में बात कर लेने से महिला सशक्तिकरण नहीं हो सकता है। इसके लिये समाजिक सोच में परिवर्तन होना पड़ेगा। फिर भी, यदि हम लैंगिक न्याय के बारे में सोचते हैं, इसके बारे में सपने देखते हैं - तब, आज नहीं तो कल, हम उसे अवश्य प्राप्त कर सकेंगे।

आज की दुर्गा
महिला दिवस|| लैंगिक न्याय - Gender Justice|| संविधान, कानूनी प्राविधान और अंतरराष्ट्रीय दस्तावेज।। 'व्यक्ति' शब्द पर ६० साल का विवाद – भूमिका।। इंगलैंड में व्यक्ति शब्द पर इंगलैंड में कुछ निर्णय।। अमेरिका तथा अन्य देशों के निर्णय – विवाद का अन्त।। व्यक्ति शब्द पर भारतीय निर्णय और क्रॉर्नीलिआ सोरबजी।। स्वीय विधि (Personal Law)।। महिलाओं को भरण-पोषण भत्ता।। Alimony और Patrimony।। अपने देश में Patrimony - घरेलू हिंसा अधिनियम।। विवाह सम्बन्धी अपराधों के विषय में।। यौन अपराध।। बलात्कार परीक्षण - साक्ष्य, प्रक्रिया।। दहेज संबन्धित कानून।। काम करने की जगह पर महिलाओं के साथ छेड़छाड़।। समानता - समान काम, समान वेतन।। स्वतंत्रता।। एकान्तता और निष्कर्ष।।

12 comments:

  1. thank you for such an thought provoking article . i distinctly rember some thing similar was for the woman officers in IAS cadre . its ridiculous to have such rules and more ridiculous that they exist in govt cadres .

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  2. बहुत ही सुन्दरता से आपने अपनी बात कही, आभार इस आलेख के लिये.

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  3. उन्मुक्त जी, इस लेख को पढ कर मैं हैरान रह गया. क्या बात है, रजोधर्म की तारीख. शायद कल उनको यह भी लिख कर देना पडेगा कि वे पति के साथा क्या क्या कार्य कब कब करती है. परसों ऐसे कार्यों के लिये शायद बॉस की अनुमति लेनी पडेगी.

    इस देश की जनता को नियमकानूनों द्वारा गुलाम बनाये रखने की जो प्रवृत्ति अंग्रेजों ने शुरू की थी वह कम से कम अब बदल जाना चाहिये!


    विनीत

    शास्त्री जे सी फिलिप

    हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है

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  4. एक और शर्मनाक घटना...

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  5. unmukt ji,

    You have bought up attention on a very serious issue.

    After reading your article, I am left with questions and more questions, to which I have no answers..

    Its a BIG shame for the whole society, that such declarations and forms exist and that women who joined service, including Neera Mathur had to fill up such forms. The society can never apologise to such women now.

    Its really a big question, as to why all the men and women who knew about it, accepted it, till Neera Mathur case came along??? Why there were no changes before - why was there acceptance to such nonsense???

    I really wonder why the high court did not take the case?? (याचिका खारिज कर दी means the court did not take case or did they take and gave an unfavourable decision - i am not sure on this but in either case its quite a shame)

    Its a shame on the whole society, that the form came into contention, only when Neera Mathur was UNFAIRLY removed from services.

    Thankfully she at least took it up and did not accept this nonsense quietly.

    I hope LIC has made amends now and others too have woken up from their sleep.

    I tried to search for this case details but I couldnt find them - can you please share any URL about it because I want to know, if the honourable supreme court punished the managers who "ABUSED" the form as an excuse, instead of trying to change things for the better??
    and what about those in the HR deptt, who were responsible for this form??

    Those people dont deserve to be in any postion of responsibilty.

    can you please share this info OR the link to this case.

    Women or for that matter men (why to distinguish on gender) must speak up at all times on such issues.

    The "it does not matter to me" attitude is very dangerous and unhealthy.

    Regards to you for highlighting this issue.

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  6. शर्मनाक है इस तरह की सूचना मांगना। हाई कोर्ट भी अजीब है। आपको शुक्रिया इसे पेश करने के लिये।

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  7. i am shocked to read !! are we living in new era.....or still in stone age!

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  8. शर्मनाक तो है ही यह, पर उससे भी अधिक नियम बनाने के लिये उत्तरदायी संस्थाओं के मानसिक दिवालियेपन का सशक्त प्रमाण है यह। यदि अभी भी यह लागू है तो इसका प्रतिवाद होना ही चाहिये।

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  9. मुझे तो विश्‍वास नहीं होता, क्‍या इन सब बातों का घोषणापत्र भी मांगा जा सकता है। आपका बहुत बहुत धन्‍यवाद कि आप इन महत्‍वपूर्ण मुद्दों पर लिख रहे हैं। - आनंद

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  10. उन्मुक्त जी आज शास्त्री जी के चिट्ठे से यहाँ पहुंची हूँ वाकई आपने बहुत अच्छा सवाल उठाया है कब मिलेगा महिलाओं को न्याय मगर न्यायालय में ही न्याय नही तो कहाँ उम्मीद की जा सकती है...

    सुनीता(शानू)

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  11. बहुत ही आभार, इस लेख के लिए। सरकारी और गैर-सरकारी सेवाओं में महिलाओं के कार्य करने की परिस्थितियां और शर्तें अब भी अत्यंत प्रतिकूल हैं। खासकर उन सेवाओं में जहां रात्रिकालीन ड्यूटी करनी होती है और जहां बहुत से पुरुषों के बीच एक-दो महिलाओं को काम करना होता है।

    ये महिलाएं हर वक्त एक प्रकार की आशंका की मानसिकता के साथ काम करती हैं। चाहे सरकारी सेवा हो या गैर-सरकारी सेवा, प्रबंधन इस मामले में पर्याप्त संवेदनशील नहीं हो पाया है। इन महिलाओं को होने वाली असुविधाओं की परवाह नहीं की जाती है।

    ऐसे बहुत कम ही मामले होते हैं जिनमें मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच पाता है। जो महिलाएं नीरा माथुर की तरह अंत तक लड़ाई जारी नहीं रख पातीं उन्हें अन्याय का शिकार होना पड़ता है।

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  12. ऐसा लेख लिखने व जानकारी देने के लिए धन्यवाद । क्या सच में किसी को कोई शक है इस तरह की जानकारी माँगने के पीछे छिपे इरादों पर ? सीधी सी बात है यह स्त्री को हतोत्साहित, मजबूर व लाचार महसूस करवाने के लिए किये जाते हैं ।
    घुघूती बासूती

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