Sunday, February 18, 2007

एक अनमोल तोहफ़ा

मेरे लिये फरवरी का महीना महत्वपूर्ण है। मैंने पिछले साल इसी महीने में हिन्दी चिट्ठे जगत में कदम रखा था हांलाकि अभी एक साल पूरा नहीं हुआ है यह २७फरवरी को होगा उस दिन मैंने अपनी पहली चिट्ठी 'अभिनेता तथा गायक' नाम से पोस्ट की।

मैं सोच रहा कि एक साल पूरे होते ही कोई मुझे भी एक अनमोल उपहार देगा जैसा कि मान्या जी ने जीतेन्द्र जी को दिया। पर यह क्या, यहां उपहार की बात तो दूर रही, रचना जी ने तो मास्टरनी की तरह छड़ी हिलाते हुऐ एक काम बता दिया,
'इन पांच सवालों के जवाब बताओ और तुरन्त एक चिट्ठी पोस्ट करो'
सवाल भी इतने कठिन। बताईये यह भी कोई बात हुई। क्या करें अपना अपना नसीब :-(

कुछ ग्रुपिस्म के बारे में
जॉर्ज ऑरवेल अंग्रेजी प्रसिद्ध लेखक हैं पर पैदा, भारत में ही हुऐ थे। उनकी दो प्रसिद्ध पुस्तकें हैं,
  • Nineteen Eighty Four
  • Animal Farm
यह दोनो पुस्तके साम्यवाद पर व्यंग हैं और पढ़ने योग्य हैं। यदि आपने नहीं पढ़ा तो अवश्य पढ़िये।

Animal Farm में कुछ जानवर, जो मानवों के खेत में काम करते थे, विद्रोह कर देते हैं और खेतों पर कब्जा कर लेते हैं। सुअरों को खेतों का प्रबन्ध सौंपा जाता है। वे दस नियम बनाते हैं जिसके अनुसार काम होना है। धीरे धीरे यह नियम टूटते हैं, आगे क्या होता है, यही है इस पुस्तक में। इस पुस्तक में दसवां नियम था
'All animals are equal'
यानि कि सारे जानवार बाराबर हैं। किताब का अन्त ऐसा होता है कि एक दिन बाकी जानवर देखते हैं कि सुअर भी मानव की तरह कपड़े पहन कर उसी तरह से उत्सव कर रहें हैं पर बाकी जानवरों को कोई भी नहीं पूछ रहा है। जब यह जानवर अपनी आपत्ति जताते हैं तो उनको नियम फिर से दिखाये जाते हैं। इसमें पुराने शब्दों के साथ यह भी लिखा हुआ था,
'some are more equal than others'
यानि कि सब जानवर बराबर हैं पर कुछ औरों से ज्यादा बराबर हैं। यही बात चिट्ठे जगत में भी लागू होती है।

सब चिट्ठेकार बराबर हैं सब चिट्ठियां बराबर हैं पर कुछ औरों से ज्यादा बराबर हैं। यह ज्यादा बराबर होने वाली बात हम सब के लिये अलग, अलग है।

हम सब एक तरह के कंप्यूटर हैं हमारी प्रोग्रामिंग हमारे माता पिता, हमारे दोस्त, हमारा समाज जहां हम बड़े हुऐ, करता है। हम जैसे होते हैं बस दूसरों में वैसा ही अपनापन ढूढ़ते हैं। किसी को कविता अच्छी लगती है, तो किसी को राजनीति, तो कसी को समाजिक बातें पसन्द हैं तो किसी को तकनीक की बातें। बस इसी के मुताबिक हम चिट्ठों को भी पढ़ते हैं टिप्पणियां भी देते हैं। यह स्वाभाविक है। यह हमारी आम जिन्दगी में भी होता है। इसका यह अर्थ नहीं कि जो चिट्ठे हम नहीं पढ़ते या टिप्पणी नहीं देते वे सार्थक या जरूरी नही हैं। वे भी हैं। चिट्ठों की विविधिता एवं भिन्नता ही हिन्दी चिट्ठेजगत को पूर्ण करती है अन्यथा यह अधूरा ही रहता। इसीलिये मैं किसी भी चिट्ठे का बहिष्कार ठीक नहीं मानता हूं।

हिन्दी चिट्ठेजगत में यदि कुछ ग्रुपिस्म है तो वह यही है। अब चलते हैं सवालों की तरफ, पर जवाब देते समय इनका क्रम बदल जायगा।

सवाल - जवाब
पहला और तीसरा प्रश्नः आपके लिये चिट्ठाकारी के क्या मायने हैं? क्या आप यह मानते हैं कि चिट्ठाकारी करने से व्यक्तित्व में किसी तरह का कोई बदलाव आता है?
उत्तरः मैं स्वभाव से शर्मीला हूं, लोंगो से कम मिलता हूं। बहुत सी ऐसी बातों में रुचि रखता हूं जिसमें कम लोग रुचि रखते हैं या कम मित्र मिलते हैं। जिस बात पर सधारणतया लोग रुचि रखते हैं उस पर मेरी रुचि कम रहती है। इसलिये अक्सर मनोरंजन या फिर बाहर घूमना या काम अकेले या फिर केवल परिवार के साथ करता हूं। यदि आपने Issac Asimov की The Nacked Sun पढ़ी हो तो मुझे समझ सकते हैं।

वास्तविक जीवन में लोगों से मिलने में शायद कुछ घबराहट होती है। अन्तरजाल पर हिन्दी में चिट्ठे लिखने के कारण, लोगों करीब पहुंचा। यह अच्छा लगता है। यदि हिन्दी चिट्ठकारी न करता तो यह संभव नहीं था।

हिन्दी चिट्ठकारी के कारण मेरे व्यक्तितव में निखार आया। मैं चिट्ठे जगत में बेहिचक, बेशर्म, बेफिक्र, लोगों से चिट्ठियां या टिप्पणियां पोस्ट कर बात कर लेता हूं। कईयों से मेरी अक्सर ईमेल पर बात होती है। मालुम नहीं क्यों,
यह सब मैं अपने वास्तविक जीवन में नहीं कर पाता हूं, कहीं हिचक जाता हूं। मैं सोचता हूं कि शायद यह मैं अपने वास्तव के जीवन में भी कर पाऊं।

हिन्दी चिट्ठाजगत हम सब कितना पास ला रहा है इस संदर्भ में, मैं पिछली जून का किस्सा बताना चाहूंगा। पिछली जून हम लोग छुट्टी पर बाहर जा रहे थे इसलिये चिट्ठेकारी बन्द होनी थी। मुन्ने की मां ने इसे सीधी तरह से न बता कर यह कह कर बतायी कि वह मुझे चिट्ठकारी करने से रोक रही है। यह सब उसने अपने चिट्ठे मुन्ने के बापू पर तीन चिट्ठियां अभियान ट्यूरिंग, अभियान ट्यूरिंग – प्रगति, अभियान ट्यूरिंग – सफल नाम से पोस्ट कर बतायीं। इस पर कुछ लोगो ने समझा कि शायद मैं हिन्दी चिट्ठा जगत से विदा ले रहा हूं। कुछ लोगों (राजीव जी और नितिन जी, रमन जी, और संजय जी) ने इन चिट्ठियों पर टिप्पणी देकर मुन्ने की मां को यह न करने को कहा। राजीव जी और नितिन जी ने मुझे व्यक्तिगत तौर पर ईमेल करके यह सलाह दी कि मैं कैसे इस स्थिति से निपटूं और आगे मैं कितनी चिट्ठियां पोस्ट किया करूं, कितना समय हिन्दी चिट्टेकारी में लगाऊं। हालांकि मैंने उस समय मैंने इन्हें कुछ नहीं बताया कि यह सब एक प्लान है। इनकी ईमेल तब तक आती रही जब तक मैंने पुनः चिट्ठियां पोस्ट नहीं शुरु कर दिया। मैं इनको जानता नहीं, कभी मिला नहीं, पर कैसे हिन्दी चिट्ठे जगत ने, केवल चिट्ठियों के कारण हमें एक दूसरे के करीब पहुंचा दिया। यह भी आश्चर्य और प्रसन्नता की बात है। यह घटना मुझे कभी नहीं भूलती।

दूसरा प्रश्नः यदि आप किसी साथी चिट्ठाकार से प्रत्यक्ष में मिलना चाहते हैं तो वो कौन है?
उत्तरः शायद
किसी से नहीं, शायद कुछ खास लोगों से, शायद सबसे। लगता है कि अभी किसी से मिलना न हो पायेगा। कुछ समय लगेगा।

चौथा प्रश्नः आपकी अपने चिट्ठे की सबसे पसँदीदा पोस्ट और किसी साथी की लिखी हुई पसँदीदा पोस्ट कौन सी है?
उत्तरः मुझे कवितायें पसन्द नहीं, कम समझ में आती हैं। मैंने एक ही पोस्ट कविता में की है। यह अनुगूंज के लिये 'मेरे जीवन में धर्म का महत्व' नाम से थी। यह मेरी सबसे प्रिय है। यही मेरे जीवन का दर्शन है।

किसी साथी की सबसे प्रिय पोस्ट बताना तो बहुत मुश्किल काम है। एक साल में अनगिनत पोस्टें पढ़ीं, कई अच्छी लगीं पर इस वक्त उसे ढूढ कर बता पाना मुश्किल है। यदि पिछले हफ्ते की पूछतीं तो शायद बता पाता।

इसके अतिरिक्त मुन्ने की मां बगल के कंप्यूटर पर बैठी है। वह अभिनय कर रही है कि कंप्यूटर पर काम कर रही है पर वास्तव में कनखियों से देख रही है कि मैं किसका नाम लिख रहां हूं। अब तो खैर नहीं है उसके नाम के अलावा किसी और का नाम देना तो खतरे से खाली नही है। वह मेरे पर अपना एकक्षत्र राज्य समझती है।

मुझे मुन्ने की मां की 'भारतीय भाषाओं के चिट्ठे जगत की सैर' नामक पोस्ट सबसे अच्छी लगती है। इस को पसन्द करने का कुछ और भी कारण हैं। यदि मुन्ने की मां, मेरी सबसे बड़ी प्रशंसक है तो सबसे बड़ी आलोचक भी। इस पोस्ट में वह यह बताती है कि मैं उसकी नजर में कैसा हूं। हांलाकि मैं अपने आपको वैसा नहीं समझता जैसा कि वह लिख रही है पर फिर भी अपने बारे में सुनना अच्छा लगता है।

पांचवां प्रश्न: आपकी पसँद की कोई दो पुस्तकें जो आप बार बार पढते हैं।
उत्तरः यह सवाल वास्तव में मुश्किल है। पुस्तकें मेरी सबसे प्रिय मित्र हैं। मैं सबसे ज्यादा समय पुस्तकों या फिर पुस्तकों की दूकान पर गुजारता हूं। मेरा सबसे पसंदीदा शौक नये नये शहरों में पुस्तकों की दुकान पर समय बिताना है। मैंने इस बारे में दो पोस्टें 'मार्टिन गार्डनर की पुस्तकें', और 'आप किस बात पर, सबसे ज्यादा झुंझलाते हैं' लिखी हैं। अब केवल दो पुस्तक का चयन करना तो टेढ़ी खीर है। फिर भी, कोशिश करता हूं।
  1. BRIGHTER THAN A THOUSAND SUNS – A personal History of the Atomic Scientists by Robert jungk (Penguin): इस पुस्तक में परमाणु विज्ञान का २०वीं शताब्दी से शुरु होकर इसी शताब्दी के मध्य समय तक का इतिहास है। यह अलग अलग वैज्ञानिकों के बारे में और उनके जीवन के बारे में है। आज से ४० साल पहले मैंने जब इसे पढ़ा तो मैं भी वैज्ञानिक बनने का सपना संजोने लगा। पर सपने तो सपने होते हैं। यह सपना ही रह गया, पूरा नहीं हुआ। मैं तो फाईलें पलटने वाला ही रह गया। यह प्रेणना दायक पुस्तक है।
  2. Jonathan Livingston Seagull by Richard Bach यह पुस्तक एक सीगल चिड़िया की कहानी है जो केवल कीड़े, मकोड़े खा कर नहीं जीना चाहती। वह बाज और चील ऐसे तेज उड़ना चाहती है। यह एक दर्शन है जो बताता है कि जीवन को किस तरह से जियो। मुझे यह दर्शन बेहद पसन्द है। मैं इस पुस्तक को अक्सर लोगों को उपहार देता हूं। यदि यह आपको किसी के घर में दिखायी पड़े और उसे उपहार में मिली हो, तो समझ लीजयेगा कि वह मेरे द्वारा ही दी गयी होगी।
मैं किन पांच को फांस रहा हूं
अब मुझे पांच लोगों को फांसना है। किसको फांसू, किसको फांसू... फांसना तो सबको चाहता हूं पर क्या करूं केवल पाचं को ही फांसना है। चलिये मैं कारण के सहित बताता हूं कि मैं इनको क्यों फांस रहा हूं।
  1. कालीचरण जीः मेरे चिट्ठे पर बहुत कम टिप्पणियां रहती हैं मुझे पहले नही मालुम नही था कि कैसे मालुम करूं कि कोई मेरे चिट्ठे को पढ़ता है भी नहीं। मेरे चिट्ठे पर शुरु में कुछ टिप्पणियां आयी वे मेरी सहायता करना चाते थे। कुछ कमियों को दूर कर रहे थे। पर पता नहीं चलता था कि वे मेरे चिट्ठे को पसन्द करते हैं कि नहीं। मेरी '६. ओपेन सोर्स सौफ्टवेर – कौपीराइट एवं ट्रेड सीक्रेट' की चिट्टी पर एक अज्ञात टिप्पणी आयी। इसको पढ़ कर लगा कि कुछ लोग ऐसे भी हैं जो मेरे चिट्ठे को पसन्द करते हैं। मेरे लेख चिट्ठे पर यह टिप्पणी किसने की है पता लगाने के लिये मैंने 'पल भर के कोई हमें प्यार कर ले' नाम की चिठ्ठी पोस्ट की। पता लगने के बाद मैंने 'लोगों को बोर कर रहे हो' नाम की चिट्टी पोस्ट की। यह टिप्पणी क्या थी, कैसे पता लगा यह तो आपको पोस्ट पर जा कर ही मालुम होगा। पर यह टिप्पणी थी I am STILL god की - यानि काली चरण जी की। मुझे इस टिप्पणी के बाद लगा कि लोग मेरे चिट्ठे को पसन्द करता हूं और मैं लिखना जारी रखूं। इसके बाद मैंने कई सीरियस विषयों पर चिट्ठियां लिखीं फिर एक ही विषय की चिट्ठियों को संकलित कर एक पूरा लेख बनाया। यह सब आप मेरे लेख चिट्ठे पर पढ़ सकते हैं।
  2. राजीव टंडन जीः मैं एक कैमरा खरीदना चाहता था इसलिये एक चिट्ठी 'एक कैमरा हो प्यारा सा' पोस्ट की। इस पर इन्होंने टिप्पणी कर, कैमरा खरीदने में मेरी सहायता की। इसके बाद ईमेल से अक्सर बात होने लगी। एक बार इन्होने तारों के एक प्रोग्राम की चर्चा की। इस पर मैंने एक चिट्टी 'Oh Be A Fine Girl Kiss Me' नाम से लिखी। यह मेरी सबसे ज्यादा देखी जाने वाली चिट्टियों में से एक है। इस पर आज भी हर हफ्ते सर्च इंजिन से सर्च कर तीन चार लोग आते हैं ऐसा और चिट्ठियों के साथ आमतौर से नहीं होता। यदि आप तारों में रुचि रखते हैं तो इसे पढ़ कर देखिये।
  3. नितिन व्यास जीः आपने मुझे एक बार मुझे गणित की एक विसंगति जिसमें चार बराबर पांच सिद्ध किया था, लिख कर भेजी और मुझसे इस पर कुछ लिखने को कहा। इस पर मेंने दो पोस्ट 'चार बराबर पांच, पांच बराबर चार, चार…' और 'आईने, आईने, यह तो बता - दुनिया मे सबसे सुन्दर कौन' लिखीं। यह चिट्ठियां भी मेरी सबसे ज्यादा देखी जाने वाली चिट्टियों में से हैं। इस पर आज भी हर हफ्ते सर्च इंजिन से सर्च कर तीन चार लोग आते हैं ऐसा और चिट्ठियों के साथ आमतौर से नहीं होता। यह चिट्ठियां अपने में बहुत मुश्किल थी, दुविधा वाली थीं। मैं बहुत दिन तक असमंजस में था कि पोस्ट करूं कि नहीं। फिर हिम्मत कर पोस्ट कर दी। क्या दुविधा थी? क्या असमंजस था? यह आप स्वयं पढ़ कर देख लें।
  4. रवी रतलाम जीः आपका न केवल तकनीक का ज्ञान, पर हिन्दी का ज्ञान तारीफे काबिल है। मैं लिनेक्स पर काम तो करता हूं पर तकनीक से जुड़ा नहीं हूं। मेरी चिट्ठियां पढ़ कर लोग अक्सर तकनीक से जुड़े सवाल पूछने लग जाते हैं जो मेरी समझ से बाहर होते हैं। इस समय आप ही मेरी सहायता के लिये आते हैं। मेरी प्रार्थना पर आपने कई बार तकनीक की मुश्किल बातों को आसानी से समझाया है।
  5. शुऐब जीः आप जहां रहते हैं, आपका जो मजहब है उसके बाद भी उसकी कमी बताने में कभी पीछे नहीं रहते। मुझे यह साहसी व्यक्ति लगते हैं।
इनके लिये क्या पांच सवाल हैं
मैं इन लोगों के लिये प्रश्न बदल देता हूं। आशा करूंगा कि यह लोग कारण सहित इसका जवाब बतायेंगे। इनके लिये पांच प्रश्न यह हैं।
  1. आपकी सबसे प्रिय पुस्तक और पिक्चर कौन सी है?
  2. आपकी अपनी सबसे प्रिय चिट्ठी कौन सी है?
  3. आप किस तरह के चिट्ठे पढ़ना पसन्द करते हैं?
  4. क्या हिन्दी चिट्ठेकारी ने आपके व्यक्तिव में कुछ परिवर्तन या निखार किया?
  5. यदि भगवान आपको भारतवर्ष की एक बात बदल देने का वरदान दें, तो आप क्या बदलना चाहेंगे?
क्या शीर्षक ठीक है
अब आप तो यह सोच रहें होंगे कि,
'जीतेन्द्र जी ने तो ठीक ही अपनी चिट्ठी का नाम एक अनमोल उपहार रखा पर रचना जी ने उन्मुक्त जी को क्या उपहार दे दिया जो कि चिट्ठी का नाम एक अनमोल तोहफ़ा रख दिया। इन्होने तो केवल हुक्म सुना दिया था।
तुरन्त बदलिये अपने चिट्ठे का शीर्षक। इसका शीर्षक कर दीजये "एक विद्यार्थी का टीचर जी को जवाब" या कुछ और जो भी आपके कम भेजे में घुस सके'
शायद आपकी यह सोच वाजिब हो, पर है एकदम गलत।

इस चिट्ठी को लिखने के लिये, मुझे कुछ अपनी तथा कुछ मुन्ने की मां की पुरानी पोस्टों को फिर से देखना पड़ा। इसने, उन बातों की याद दिलायी जो मुझे प्रिय हैं, चिट्ठे जगत में दोस्तों की याद दिलायी जिनके कारण मैंने कुछ अच्छी चिट्ठियां लिखी। कुछ उन बातों की याद दिलायी कि हम बिना मिले कितना एक दूसरे के पास पहुंच गये हैं। कुछ मुन्ने की मां से चुहुलबाजी की याद दिलायी जो मैंने इन चिट्ठियों को लिखते समय की। यह चिट्टी पोस्ट करने से मुझे जितना मज़ा आया उतना किसी और चिट्ठी पोस्ट करने में नहीं आया। यह अनमोल न हुआ तो और क्या हुआ।

रचना जी, इस तोहफ़े के लिये धन्यवाद। मैं जरूर हिम्मत जुटाऊंगा कि आपसे कभी मिल सकूं। क्या मालुम नासिक में कभी कोई अजनबी दम्पति आपके यहां पहुंच कर हलुवा खाने के लिये कहने लगे।
यदि ऐसा होता है तो घर से बाहर मत निकाल दीजयेगा, समझ जाईयेगा कि वे कौन हैंं। हलुवा तो आप किसी समय, यहां तक आधी रात को भी बनाती हैं।

अन्य लोगों के द्वारा दिये गये विषय पर लिखी गयीं चिट्ठियां, मेरी सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली चिट्ठियां हैं। यह चिट्ठी भी दूसरे के द्वारा दिये गये विषय पर है। क्या मालुम यह भी सबसे ज्यादा देखी जानी वाली चिट्ठी बन जाये। अन्त में, एक सवाल रचना जी के लिये।
'क्या आपको अपने सब सवालों के जवाब मिल गये - हां या नहीं?'

सांकेतिक शब्द
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14 comments:

  1. manya8:23 pm

    आपने शुरु से अन्त तक बान्धे रखा , रचना जी को जवब तो दिये ही साथ काफ़ी जानकरियां भी दी.. पुस्तकों और चिट्ठों के बारे कुछ मैने पढ भी लिये कुछ बाद में पढूंगी.. इन सबके साथ जॊ हास्य रस का प्रवाह है वो भी बहुत उम्दा है..

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  2. उम्मीद है टिप्पणियों की चिंता किए बिना आप आगे भी इसी उत्साह से लिखते रहेंगे. आप हिंदी के गंभीर ब्लॉगरों में से हैं, और इसी रूप में बने रहें. ब्लॉगिंग में शान से एक साल पूरा करने पर बहुत-बहुत बधाई!

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  3. उन्मुक्त जी आपका लेख बहुत अच्छा लगा. विशेषकर
    ग्रुपिस्म के बारे में जिस सहजता व सरलता से आपने जो विचार दिए वो बहुत अच्छा लगा.बधाई के साथ,
    रजनी

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  4. बहुत खुब. अच्छा बखान रहा. पाँच लोग भी ढ़ूंढ कर लाये हैं, शायद इसी बहाने भगवान के दर्शन हो जायें. I am still GOD जी के. :)

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  5. *मै अन्त से शुरु करती हूँ-
    //क्या आपको अपने सब सवालों के जवाब मिल गये - हां या नहीं?//

    हाँ! मुझे जवाब मिले.
    *आपने अच्छी बात सबसे आखिर मे लिखी, शुरुआत देखकर मै निराश हुई थी! लेकिन अन्त भला तो सब भला!

    * और मै नही मानती कि मेरे सवाल कठिन थे, लेकिन आप जैसे पढाकू किस्म के लोग ( माफ करें लेकिन आपने खुद ऐसा कहा है!) सरल बातों को भी कठिन बना लेते हैं! और आपने हमारे लिये कितनी कठिनाई पैदा कर दी है! "ग्रुपिज़्म" समझने के लिये दो किताबें पढें, फिर आप को समझने के लिये दो किताबें पढें, फिर आपकी पसँद की दो किताबें पढें, फिर ये तमाम लिन्क पर जाकर आपकी पोस्ट पढें!!!!उफ्फ अगला एक हफ्ता तो इसी सबके लिये समर्पित करना पडेगा!

    * मै, मेरा घर और हलुआ सब आपका (और आपके द्वारा दी जाने वाली पुस्तक का भी!)इन्तजार करेंगे!

    बहुत बहुत धन्यवाद इस रोचक पोस्ट के लिये.

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  6. उन्मुक्त जी,
    आपका शीर्षक सर्वथा उचित है। आपके बताये हुए कारणों के अतिरिक्त भी, इस आग्रह के अनुपालन होने पर हम आशा कर सकते हैं कि वरिष्ठ चिठ्ठाकारों के आत्म-निरीक्षण के परिणाम स्वरूप प्रस्तुत किये गये उत्तरों से, हम पाठकों को कई अन्यान्य रुचिकर पहलुओं की जानकारी होगी। तो हुआ न यह एक अनमोल उपहार!

    आप की इस चिठ्ठी में अपने को नामित देख बड़ी दुविधा में फंस गया हूं और किंकर्तव्यविमूढ़ हूँ परंतु कदाचित प्रयास करूंगा कि अपने उत्तर दे सकूँ। पर कुछ अन्य स्पष्टीकरण चाहूँगा।
    1. इसके उत्तर क्या चिठ्ठोँ पर पोस्ट के माध्यम से देना अनिवार्य अथवा श्रेयस्कर होगा?
    2. उत्तर के लिये क्या समय सीमा निर्धारित है?
    3. क्या प्रश्नों अथवा उनकी संख्या में परिवर्तन किया जा सकता है / उचित है?
    4. उत्तर के पश्चात उत्तरदाता को भी अन्य पाँच(?) चिठ्ठाकारों को नामित करना (टैग करना) है, ऐसी परम्परा है। क्या उन चिठ्ठाकारों को, जो पहले ही नामित हैं - अन्यान्य शाखाओं द्वारा, बदले हुए प्रश्नों के साथ (उपरिवर्णित सं. 3 के अनुसार) नामित करना उचित होगा? जैसे किसी कवि सम्मेलन में श्रोताओं को अधिकार होता है, कवि के कविता-पाठ के पश्चात, उनसे पुनर्पाठ का आग्रह करने का! मेरे विचार में कुछ नाम आयें जो शायद मेरे उत्तर तक नामित हो चुके हों और उनसे कुछ और भी की अपेक्षा हो!

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  7. आपसब को यह चिट्ठी अच्छी लगी, पढ़ कर प्रसन्नता लगी।
    रचना जी मैं तो किताब तभी भिजवा पांऊगा यदि मुझे पता मालुम हो।
    राजीव जी मैं इसके नियम से वाकिफ नहीं हूं बस रचना जी की पोस्ट देख कर लिख दिया पर,
    १. इन प्रश्नों के जवाब चिट्ठे पर सार्वजनिक तौर पर ही होना चाहिये।
    २. उत्तर के लिये समय की कोई सीमा नहीं है जब समय मिले तब सुविधानुसार करेंं।
    ३. यह तो आपके ऊपर है पर पांच प्रश्न ठीक हैं। इससे ज्यादा होने पर जवाब बहुत लम्बा हो जायगा। समय भी ज्यादा लगेगा। इससे कम तो बहुत कम हो जायेंगे।
    ४. अच्छा रहे कि ऐसे लोग नामित हों जो पहले नामित न हो चुके हों। इससे सब को पोस्ट लिखने आग्रह रहेगा और सबकी बात सामने आयेगी। हम लोग एक दूसरे ज्यादा पास आयेंगे।

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  8. अनूप शुक्ला7:44 am

    उन्मुक्तजी, आपकी पोस्ट और इसके बाद की टिप्पणियां भी अच्छी लगीं।

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  9. उन्मुक्त जी,
    पढकर मजा आ गया, इतने अच्छे तरह से और विस्तार से आपने एक एक बात बतायी है मै तो कभी भी नही कर पाता। मुझे ग्रुपस्मि को लेकर लिखी गयी आपकी बात सबसे ज्यादा पसंद आयी।

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  10. उन्मुक्त जी,
    सच मे आपने बहुत सलीख़े और संजीदगी के साथ ये लेख लिखा है। हम तो शुरू से आपके विचारों के क़ायल हैं, आपके लेखों पर टिप्पणी तो नहीं दी मगर ख़ामोशी से आपको पढता रहा। मेरे चंद पसंदीदा लिखारियों मे आप भी शामिल है। हिन्दी चिट्ठाकारी मे एक वर्ष पूरा करने पर आपको बहुत बहुत बधाई आपका ख़लम और ज़ोर से चले यही मेरी तमन्ना है। आपके के लिए शुभकामनाएं

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  11. उन्मुक्त जी,
    सदा की तरह एक और बेहतरीन लेख । आप का आदेश सर आखों पर, बहुत ही जल्द एक पोस्ट कर के सवालों का जवाब देने का प्रयास करूंगा।

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  12. Hmm..
    Unmukt ji vicharo ke is manthan ka acha samavesh hai.

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  13. उन्मुक्त जी,
    मेरे ब्लॉग पर टिप्पणी के लिये धन्यवाद । मै हिन्दी ब्लॉगजगत मे नया हूं । आप लोगों से बहुत कुछ सीखना है । आपका मेल आइडी तो है नही मेरे पास, इसलिये यंहा ये टिप्पणी कर रहा हूं । आपसे सीधे सम्पर्क कैसे करूं ?

    अभिषेक पाण्डेय (itsabhishek4u at gmail)

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  14. अभिषेक जी
    मुझसे सम्पर्क का पता यह है।

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आपके विचारों का स्वागत है।