Friday, October 29, 2010

ऐसा कोई कंप्यूटर नहीं, जिसे हैक न किया जा सकता हो

इस चिट्ठी में, फिल्म इंडिपैंडेंटस डे (Independence day) और इसका साईबर अपराध से संबन्ध की चर्चा है।
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Friday, October 22, 2010

नग्गर में, रोरिख संग्रहालय

इस चिट्ठी में, नग्गर में स्थित,  रोरिक संग्रहालय की चर्चा है।
रोरिक परिवार सहित नग्गर में - चित्र विकिपीडिया से

Sunday, October 17, 2010

अभी तक इसका पैसा नहीं निकल पाया है

कुल्लू में राफटिंग होती है। इस चिट्ठी में उसी की चर्चा है।
मैंने काशमीर यात्रा के दौरान पहलगांव में राफ्टिंग की थी। इसी लिये कुल्लू में भी राफ्टिंग की बात सोची। इसी लिये हम लोग, मणिर्कण से वापस आते समय, कुल्लू होते हुए आये।
कुल्लू में हमें, कोई भी व्यक्ति राफटिंग करते हुए नहीं दिखायी पड़ा। ऎसा लगा कि शायद उस दिन राफटिंग नहीं हो रही है। यह सच नहीं था। राफटिंग तो हो रही थी लेकिन बहुत कम लोग राफटिंग कर रहे थे। इसलिए नहीं दिखायी पड़ रहे थे।
 
रास्ते में, हमें  डेमन ऎडवंचर का लगा बोर्ड दिखा। इसके मालिक का नाम विनीत था। उन्होंने बताया कि राफटिंग सब लोग नहीं करवा सकते है। इसके लिए सरकार से लाइसेंस लेना पड़ता है। उनके पास ३  या ७ किलो-मीटर राफ्टिंग करवाने का लाइसेंस था। इससे ज्यादा दूरी की भी राफटिंग होती है पर उसके लिए उनके पास लाइसेंस नहीं था। 

विनीत के साथ चार नेपाली लोग थे। वे  वेतन पर काम कर रहे थे। यह लोग हिमांचल प्रदेश के पर्यटन विभाग  के द्वारा प्रमाणित थे। विनीत ने इसी साल अपना व्यापार शुरू किया है। उसने बताया,
'मैंने दो रैफ्ट, ऋषीकेश से सवा तीन लाख रूपये में खरीदे हैं। लेकिन अभी तक इसका पैसा नहीं निकल पाया है।'
राफटिंग बरसात में नही होती है और ठंढक के दिनों मे भी नही होती है। क्योंकि, उन दिनों में बर्फ जम जाती है और नदी में पानी कम रहता है। यह लगभग अप्रैल के महीने से, सितम्बर के अन्त तक चलता है। बीच में, एक महीने बरसात में यह बंद हो जाता है।


मैने जब राफ्टिंग की तब मेरे साथ टैक्सी चालक पवन भी थे। हमने तीन किलो-मीटर राफटिंग की। उसके  बाद यह लोग गाड़ी से हमें पुन: वापस वहीं  पर ले आये जहां से हमने रैफ्टिंग शुरू की थी। रैफ्ट को भी गाड़ी में रखकर लाया गया। 


हम लोग पूरी तरह से भीग गये थे। लेकिन इसके लिए हम तैयार थे। हम अपने साथ अतिरिक्त कपड़ा ले गये थे। वहां पर कपड़े बदलने के लिए कमरा था। वहां पर हमने कपड़े बदले। हम लोग को ठंड लग रही थी। इसलिए बगल में गर्म चाय भी पी। 


हिमाचल का प्रसिद्घ व्यंजन सीटू है। कहते है कि पूर्व प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी जी को भी यह व्यंजन बहुत पसंद है। वे जब भी हिमाचल प्रदेश जाते हैं तो इसे अवश्य खाते हैं। यह चावल से बनाया जाता है और इसे चटनी और घी के साथ खाया जाता है । मैंने भी इसे खाया पर मुझे  स्वाद नहीं लगा क्योंकि मैंने इसे बिना चटनी के खाया था।

प्रोफेसर निकोलस रोरिक  दार्शिनक, लेखक, तथा पेंटर थे।
वे जीवन के अन्तिम समय हिमाचल में रहे। अगली बार, रोरिक मेमोरियल ट्रस्ट घूमने चलेंगे।  

देव भूमि, हिमाचल की यात्रा
वह सफेद चमकीला कुर्ता और चूड़ीदार पहने थी।। यह तो धोखा देने की बात हुई।। पाडंवों ने अज्ञातवास पिंजौर में बिताया।। अखबारों में लेख निकले, उसके बाद सरकार जागी।। जहां हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के बंटवारे की बात हुई हो, वहां मीटिंग नहीं करेंगे।। बात करनी होगी और चित्र खिंचवाना होगा - अजीब शर्त है।। हनुमान जी ने दी मजाक बनाने की सजा।। छोटे बांध बनाना, बड़े बांध बनाने से ज्यादा अच्छा है।। लगता है कि विंडोज़ पर काम करना सीख ही लूं।। गाड़ी से आंटा लेते आना, रोटी बनानी है।। बच्चों का दिमाग, कितनी ऊर्जा, कितनी सोचने की शक्ति।। यह माईक की सबसे बडी भूल थी।। भारत में आधारभूत संरचना है ही नहीं।। सुनते तो हो नहीं, जो करना हो सो करो।। रानी मुकर्जी हों साथ, जगह तो सुन्दर ही लगेगी।। उसकी यह अदा भा गयी।। यह बौद्व मंदिर है न कि हिन्दू मंदिर।। रास्ता तो एक ही है, भाग कर जायेंगे कैसे।। वह कुछ असमंजस में पड़ गयी।। हमने भगवान शिव को याद किया और आप मिल गये।। अपनी टूर दी फ्रांस - हिमाचल की साइकिल रेस।। और वह शर्मा गयी।। पता नहीं हलुवा घी में,  या घी हलुवे में तैर रहा था।। अभी तक इसका पैसा नहीं निकल पाया है।। आप, क्यों नहीं, इसके बाल खींच कर देखते।।
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This post talks about rafting in Kullu. It is in Hindi (Devnagri script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.

सांकेतिक शब्द
Himachal Pradesh, Kullu, rafting, 
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Hindi, हिन्दी,
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Sunday, October 10, 2010

आज, मुझसे शादी करोगी

इस चिट्ठी में डगलस ऐडम्स् की पुस्तक 'द हिचहाइकरस् गाइड टू द गैलैक्सी' की चर्चा के साथ आज की तारीख का सम्बन्ध बताया गया है।

Friday, October 08, 2010

पता नहीं हलुवा घी में, या घी हलुवे में तैर रहा था

इस चिट्ठी में, मणिकर्ण में स्थित राम मन्दिर और गुरुद्वारा की चर्चा है।

मणिकर्ण में राम मन्दिर है। इसकी कथा कुछ इस प्रकार है।

सोलहवी शताब्दी में कुल्लू प्रदेश पर राजा जगत सिंह का राज्य था। एक बार किसी ने राजा जगत सिंह के पास झूठी शिकायत कर दी कि टिपरी गांव (मणिकर्ण से २५ कि.मी.) के एक ब्राहम्ण के पास अनमोल मोती हैं, यह तो राजा के पास होने चाहिए।

राजा जब अगली बार मणिकर्ण आये तब ब्राहम्ण को बुलवा कर आदेश दिया कि राजकीय खजाने में जमा मोती  कर दो। लेकिन ब्राहाम्ण के पास मोती नहीं थे। वह जमा कैसे करता। 
 

राजा गांव में मोती लेने पहुँचा। ब्राहाम्ण ने डर के मारे अपने आपको परिवार सहित घर में बंद कर आत्मदाह कर लिया।

ब्राहम्ण हत्या के कारण राजा बीमार हो गया और किसी उपचार से ठीक नहीं हो सका। एक महात्मा ने, राजा को सलाह दी अयोध्या से भगवान रामचन्द्र जी की  मूर्ति मंगवा कर मणिकर्ण के मन्दिर में स्थापित कर राज पाठ भगवान रघुनाथ जी को अर्पण कर दें। तब बीमारी दूर हो सकती है। राजा ने ऎसा ही किया। उसके बाद राज्य  का काम भगवान रघुनाथ जी के दास के रूप में किया। उनके जीवन के अन्तिम २६ वर्ष यहीं बीते। 

 
कुल्लू के दशहरा मेला विश्व प्रसिद्व है। राजा जगतसिंह के समय से ही, इसका आरम्भ मणिकर्ण से होना शुरू हुआ था। तभी से , यह प्रथा आज भी चल रही है।

हम भगवान राम  के इस मंदिर को देखने गये। यहां लंगर चलता रहता है। हम लोगों ने दोपहर का खाना वहीं पर खाया। खाने में मोटा चावल, राजमां और कढ़ी थी। कढ़ी स्वाद में  मीठी  थी।  हम  लोगों ने भोजन किया।  इसके लिए पैसा नहीं देना पड़ता था पर जब मैं बाहर निकलने लगा तो देखा कि वहां पर एक पेटी रखी हुई है और उसमें लिखा हुआ था कि आप जो चाहे दान दे सकतें है। मुझे लगा कि हम लोगों ने खाना खाया है। इसलिए  कि कुछ न कुछ अवश्य  दान देना चाहिये मैंने सौ रूपये  पेटी में डाले।
 

हम लोगों को खाना खिलाते समय, एक बहुत सुन्दर नवयुवक रीबॉक का ट्रैक सूट पहने हुए खाना खिला रहा था । वह बाहर  मिला। मैंने उससे कहा,
'खाना बहुत अच्छा बना था क्या तुम खाना बनाने वाले को हमारी ओर से धन्यवाद दे सकते हो।'
उसने अपना नाम  चमन लाल बताया और कहा,
'आज खाना बनाने वाला नहीं आया था। इसलिए  आज का खाना मैंने बनाया है।'
यह भी कितने आश्चर्य की बात है कि  भगवान राम के मंदिर में, रीबॉक के ट्रैक सूट के साथ, खाना बनाने वाले बवर्ची के हाथों, हमने प्रसाद के रूप में भोजन खाया।

यहां पर एक गुरूद्वारा भी है। हम लोग गुरूद्वारे में भी गये। वहां पर भजन, कीर्तिन हो रहा था और प्रसाद में हलुवा मिल रहा था। मैंने इसे ग्रहण किया। पता नहीं लगता था कि हलुवा घी में,  या घी हलुवे में तैर रहा था। लेकिन हलुवे में अच्छी बात यह थी कि वह गर्म था और कम मीठा था। हलुवा खाने के बाद हाथ में लगे घी को  अपने बदन में लगा लिया।



देव भूमि, हिमाचल की यात्रा
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Saturday, October 02, 2010

और वह शर्मा गयी

इस चिट्ठी में तीर्थ मणिकर्ण के नामकरण और वहां के गर्म चश्में की कथा की चर्चा है।
मनाली से हम लोग सुबह नाशता कर मणिकर्ण के लिये निकले। काफी देर तक व्यास नदी के किनारे चलते रहे और उसके बाद बायें मुड़कर मणिकर्ण के लिए मुड़े तब हम लोगों के साथ रास्ते भर पार्वती नदी रही। यदि हम पुल से बायें न मुड़ते और सीधे चलते रहते तब कुछ ही दूर इन दोनों नदियों का संगम है। बायें मुड़ कर चलने पर कुछ देर बाद हमें मनाला हाई रोड इलेक्टिक प्रोजेक्ट  का  बिजली घर दिखाई पड़ा।
मनाला गांव में पानी इक्ट्ठा होता है। वहीं से पाइप के द्वारा एक सुरंग के जरिए  पहाड़ को पार करते हुए  नीचे जाता है। ताकि बिजली पैदा की जा सके। इससे लगभग ८६ मेगावाट बिजली तैयार की जाती है। वहां पर हमें कुछ विदेशी, इस प्रोजेक्ट के अन्दर जाने की इच्छुक लगे। हमारे साथ वहां के स्थानीय व्यक्ति जसवंत भी थे। मैंने उनसे पूछा, 
'क्या यह लोग प्रोजेक्ट देखने जा रहे हैं?'
जसवन्त ने बताया,
'नहीं, यह लोग नदी पार कर मनाला गांव में जायेंगे। वहां भांग पैदा होती है। वहां के लोग भांग का व्यापार करते है। यहां पर रहने वाले, ज्यादातर विदेशी  भांग खाते हैं। यह विदेशी भी भांग लेने मनाला गांव जा रहे है। मनाला में पहले केवल भांग का व्यापार के अलावा कुछ नहीं होता था। लेकिन सड़क बन जाने के बाद कुछ लोग पढ़ने लगें है।'
मणिकर्ण में एक गर्म पानी का फौव्वारा है। इसकी कथा कुछ इस प्रकार है।
 

पहाड़ में समान भेजने का तरीका
ब्रहम्माण्ड पुराण  के अनुसार एक बार शिव जी पार्वती जी के साथ मणिकर्ण आये। यहां की  सुन्दरता के कारण, यहीं रूक ११,००० वर्षों तक तपस्या में लीन रहे।

एक बार जलक्रीडा करते हुए पार्वती जी के कान के आभूषण की एक मणि जल में गिर कर पताल लोक में चली गई। खोई हुई मणि को ढूंढने के लिए भगवान शंकर ने अपने गणों को आदेश दिया। लेकिन मणि न मिली। 

शेषनाग पातालाधिपति तथा माणियों के स्वामी हैं। उन्हें, पार्वती जी के आभूषण  के बारे में पता चला। इस पर उन्होंने जोर से फुंकारा।  जिससे इस स्थान पर पृथ्वी में गर्म जल का फौव्वारा  प्रकट हो गयी।  इस फौव्वारे  से, पार्वती जी की मणि निकल आयी। 

कहा जाता है कि सन् १९०५ से पहले गर्म जल चश्मे से ११  से १४ फुट ऊंचा फुहारा बड़े वेग से निकलता तथा जिसमें से कभी-कभी मणियाँ (रंग बिरंगे पत्थर) निकलती थी। इसी से इस स्थान का नाम मणिकर्ण पड़ा। 
यहां पार्वती जी तपस्या करने के  कारण, पुराणों में इस स्थान को 'अर्द्घ नारी क्षेत्र' भी कहा गया है। भगवान शंकर को यह स्थान इतना प्रिय  है कि काशी में भी उनके स्थान का नाम 'मणिकर्णिका घाट' है।

महाभारत काल में देवराज इन्द्र द्वारा अर्जुन को दिए गए पाशुपतास्त्र चलाने के लिए अर्जुन की परीक्षा लेने के लिए भगवान शंकर जी ने किरात (भील) रूप धारण करके इस स्थान पर अर्जुन से युद्व करके अर्जुन को वरदान दिया था। 
मणिकर्ण के गर्म जल के विभिन्न चश्मों का तापमान ६४ सी से ८८ सेलसियस है।  चश्मों में गन्धक नहीं है। कहा जाता है यहाँ के कुण्डों में स्नान करने से गठिया इत्यादि रोग दूर हो जाते है।

हम लोग जब इस गर्म पानी के चश्में को देखने गये, उस समय एक प्यारी सी नवयुवती वहां पर गठरी लेकर आयी थी। उसने बताया,
'मैं गठरी में आलू लाई हूं। आलू के पराठे बनाने के लिये इसे उबाल रही हूं। बाद में, अचार के साथ खायेंगे।'
मैंने पूछा
'क्या हम लोग भी उसके साथ यह खाना खा सकते हैं'
वह शर्मा गयी और कोई जवाब नहीं दिया।                                                        
 

मणिकर्ण में, एक राम मन्दिर भी है। हम लोगो ने खाना वहीं खाया। बस इसी कारण आलू के पराठे न खा सके। इसकी कथा अगली बार। 
देव भूमि, हिमाचल की यात्रा
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This post is naming of Manikaran and hot spring there. It is in Hindi (Devnagri script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.
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