Wednesday, February 28, 2007

बनेंगे हम सुकरात या फिर हो जायेंगे नील कण्ठ

लक्षमी नरायन गुप्त जी ने मुझे यहां पुनः नामित कर पांच सवालों का जवाब देने के लिये कहा। इस सम्मान के लिये धन्यवाद।
यह चित्र मेरा नहीं है। अन्तरजाल पर, भगवान शिव से सम्बन्धित सारी वेबसाईटों पर है। इसीलिये यहां, बिना आभर प्रगट कियट डाल दिया है। पता चलते ही आभार प्रगट करना चाहूंगा।

उनके पहले दूसरे, चौथे, और पांचवें सवाल का जवाब रचना जी के सवालों का जवाब देते समय एक अनमोल तोहफ़ा की चिट्ठी पर दे चुका हूं बस तीसरे का जवाब देना नहीं हुआ है। मैं इसका जवाब जरूर देना चाहूंगा।

मैं किन विषयों पर लिखना पसंद/नापसंद करता हूं?

पहले पसन्द की बात करता हूं। जाहिर है, मैं उन विषयों पर लिखना पसन्द करता हूं जिसकी मुझे जानकारी है और जानकारी उन विषयों की है, जिसमें मेरी रुचि है। मुझे पसन्द हैंः पुस्तकें, विज्ञान, कानून, ओपेन सोर्स। इनकी थोड़ी बहुत जानकारी है, इन्ही पर लिखना पसन्द करता हूं।

मैं ओपेन सोर्स के दर्शन को पसन्द करता हूं, लगता है कि भविष्य इसी का है। मैं तकनीक से जुड़ा व्यक्ति नहीं हूं। मैं इसकी तकनीकी मदद नहीं कर सकता। ओपेन सोर्स को कम लोग जानते हैं। इसी लिये इसके बारे में लिख कर लोगों में जागरूरता फैलाने का प्रयत्न करता हूं।

मैं न ही सॉफ्टवेर चोरी करता हूं, न ही सॉफ्टवेर लिये एक भी टका खर्च करता हूं क्योंकि हमेशा ओपेन सोर्स प्रयोग करता हूं। हांलाकि इसके लिये मुझे मित्र बनाने पड़े, गुरु बनाने पड़े। उन्हीं की सहायता से काम चलाता हूं। कभी कभी गुरुवों और मित्रों को चौकलेट और आईसक्रीम खिलानी पड़ती है। मैं ओपेन सोर्स के बारे में जागरूरता फैला कर इसका प्रतिकर देता हूं।

ऐलिस इन वंडरलैण्ड पुस्तक में पान के राजा कहा कि,

'The horror of that moment I shall never, never forget'
पान की रानी ने जवाब दिया,
'You will though if you don't keep memorandum of it'
मैं दुख के समय को नहीं याद रखना चाहता हूं। इसलिये इसके बारे में नहीं लिखता हूं। पर जीवन में तो हर तरह के अनुभव होते हैं। मीठे अनुभव याद करना चाहता हूं कभी कभी इनके बारे में भी लिखता हूं। यहां कुछ शब्द ऐलिस इन वंडरलैण्ड के बारे में।

ऐलिस इन वंडरलैण्ड दुनिया की सबसे ज्यादा उद्धरित की जाने वाली पुस्तक है। लोग सोचते हैं कि यह बच्चों के लिये पुस्तक है पर यह सही नहीं है । यह बड़ों के लिये। विश्वास नहीं - मार्टिन गार्डनर की
The Annotated Alice in Wonderland पढ़ कर देखिये। इसकी बारीकी पता चलेगी।
मुझे क्या लिखना नापसन्द है।
मुझे राजनीति कम भाती है। इसके बारे में लिखना या बहस नहीं पसन्द करता हूं।

मैं भगवान पर विश्वास नहीं करता पर धर्म की कथायें सुनना पसन्द करता हूं। मुझे सुख सागर से वाल्मीकि रामायण चिट्ठे अच्छे लगते हैं। चाहता हूं कि कोई यदि कोई अन्य धर्म संबन्धित कथाओं को लिखे, तो मजा ही आ जाये।

धर्म से जुड़ी कहानी पसन्द करने का यह अर्थ नहीं है कि मुझे धर्म के नाम पर बहस भी अच्छी लगती हो। मैं इस पर तरह की बहस के बारे न तो लिखना, न ही पढ़ना पसन्द करता हूं। ऐसे व्यक्ति केवल भावनाओं को उभार कर अपना उल्लू सीधा करते हैं।

अब देखिये अपने हिन्दी चिट्ठेजगत में क्या हो रहा हैः कोहराम मचा है। अरे, दुखी कर दिया। मैंने तो कई चिट्ठे पर जाना छोड़ दिया। यदि लगता है कि कोई चिट्ठी इससे संबन्धित है तो उस पर क्लिक भी नहीं करता। ईसा ने सूली पर चढ़ते समय कहा कि

'पिता परमेश्वर इन्हे माफ करना, यह नहीं जानते कि यह क्या कर रहें हैं।'
पर यहां तो किसी एक को नहीं, यह लोग तो हिन्दी चिट्ठेकारी को ही सूली पर चढ़ा रहें हैं।

मैं किसी भी चिट्ठी या चिट्ठेकार का बहिष्कार करने के खिलाफ हूं पर यदि किसी का करना चाहिये तो इन नासमझ चिट्ठियों का। मेरे पास जादू की छड़ी होती तो इन सब चिट्ठियों कि अदृश्य कर देता।

मैंने जब School Reunuion की चिट्ठी लिखनी शुरु की तो सोचा इसी पर लिखूंगा पर हिम्मत नहीं पड़ी। लगा कि यह चिट्ठेकार लोग अभी नहीं समझेंगे , भावनाओं में बह रहें हैं यह चिट्ठी बीच में छोड़ दी। रचना जी ने और मिश्र जी ने टिप्पणी देकर प्यार भरा उलहना दिया,

'लगता है कि यह चिट्ठी पहले भी...'
इनकी यह टिप्पणी पढ़ कर बहुत अच्छा लगा। मुझे नहीं मालुम था कि यह लोग कितने ध्यान से मेरा चिट्ठा पढ़ते हैं। इनको कितने महीने पुरानी बात याद है। मैंने जवाब दिया कि,
'मैंने आईआईटी में दीक्षांत समारोह में रहने की बात तो लिखी थी पर इस उद्धरण का जिक्र नहीं किया था। सच तो यह है कि इस बहाने कुछ और लिखने के लिये शुरू यह चिट्ठी शुरु की थी पर लगता है कि हिम्मत नहीं पड़ी। शायद बहुत विवादास्पद हो जाती - बस इसी लिये यहीं इस रूप में छोड़ दिया।'
यदि आप देखें तो पायेंगे कि मैने इस चिट्ठी में कुछ ऐसा लिखा,
'अक्सर लोग जीवन में लक्षय को छोड़, बेकार की बातों में पड़ जाते हैं। यह बात अकसर आंदोलनो के साथ भी हो जाती है और वे भटक जाते हैं।'
यह कुछ इसी संदर्भ में है।

मिश्र जी ने पुनः टिप्पणी कर मेरा साहस बढ़ाया कि मैं इस बारे में लिखूं । मुझे इस टिप्पणी को प्रकाशित करने में भी हिचक रही। यह अकेली ऐसी टिप्पणी है जो मैंने प्रकाशित नहीं की है। अब जब गुप्त जी ने मुझे टैग कर मेरी नापसन्दगी पूछी, तो लगा कि मुझे लिखना चाहिये।

रचना जी आपका धन्यवाद आपने मुझे एक अनमोल तोहफ़ा दिया। गुप्त जी आपका धन्यवाद कि आपने वह बात कहने का बहाना दिया जो हम सबको दुखी कर रही है।

मुझे एक कहानी याद आती है। एक संकरा पुल था। उससे एक ही रथ जा सकता था। एक दिन दो राजा अपने रथ लेकर आमने समने खड़े हो गये। सवाल था कि कौन पीछे हटे। एक राजा ने कहा कि,

'मैं अविवेकशील व्यक्तियों के लिये पीछे नहीं हटता हूं।'
दूसरे ने कहा कि
'पर मैं हट जाता हूं।'
यह हमारे ऊपर है कि हम कौन से राजा बनना चाहते हैं पहले वाले या दूसरे वाले।

क्या जरूरत है हर चिट्ठी के जवाब देने की। एक .... कर रहा है। चुप रहो, हीरो जी अपने आप जीरो हो जायेंगे। मेरे विचार से यह इरफान ऐपिसोड समाप्त होना चाहिये। हमारे पास
लिखने के लिये, इसके अलावा और बहुत कुछ है - बहुत कुछ है बांटने के लिये। बांटना है तो प्रेम बांटो, घृणा नहीं।

मैं चिट्ठोंकार के नाम पहले ही नामित कर चुका हूं पर चूंकि मुझे पुनः लिखने के लिये अवसर दिया गया तो मैं तीन चिट्ठेकार लोगो को नामित करना चाहुंगा।

राम चन्द्र मिश्र जीः आपने मुझे साहस दिया कि मैं वह बात लिख सकूं जो मुझे नापसन्द है और जिसे लिखने में मैं हिचकिचा रहा था। आपकी इस हौसला अफ़जाई का मैं हमेशा शुक्रगुजार रहूंगा।

मै राजधानी एक्स‍प्रेस उर्फ़ बिखरते किरचे सपनों के... और सेक्स क्या के लेखकों को भी नामित करना चाहूंगा। यह इसलिये कि इनके चिट्ठे नारद से हटा दिये गयें हैं। मुझे यह ठीक नहीं लगता है। मैं इसके बारे में, अपने विचार रखूंगा। पर इनसे इन्हीं के बारे में जानना अच्छा रहेगा। हमें जरूरत है कि हम इनका पहलू भी समझें।

मैं चाहूंगा कि नारद जी कम से कम इनके जवाब वाली चिट्ठयों प्रकाशित करें। यदि वह नहीं भी करते हैं तो आप इनकी चिट्ठियों को हिन्दी चिट्ठे एवं पॉडकास्ट पर हमेशा देख सकते हैं वहां इनकी चिट्टियां आती हैं। इनके लिये सवाल वही पुराने हैं,

  1. आपकी सबसे प्रिय पुस्तक और पिक्चर कौन सी है?
  2. आपकी सबसे प्रिय पोस्ट कौन सी है?
  3. आप किस तरह के चिट्ठे पढ़ना पसन्द करते हैं?
  4. क्या हिन्दी चिट्ठेकारी ने आपके व्यक्तिव में कुछ परिवर्तन या निखार किया?
  5. यदि भगवान आपको भारतवर्ष की एक बात बदल देने का वरदान दें तो आप क्या बदलना चाहेंगे?
मैं एक और व्यक्ति को भी नामित करना चाहता था पर जानता हूं खाने की टेबल पर क्या मिलेगा ..., इसलिये नहीं करता हूं।

मैंने चलत मुसाफिर मोह लिया रे ऽऽऽ, पिंजड़े ऽऽऽ वाली मुनिया चिट्ठी लिखते समय तीसरी कसम के गानों की सीडी खरीदी। इसके गाने बहुत प्यारे हैं। मैं इसे कई बार सुन चुका हूं। इसमें एक गाना 'दुनिया बनाने वाले' करके है। इसे भी कई बार सुना। इसकी धुन तो समझ में आ रही है पर शब्द नहीं पल्ले पड़ रहे हैं, बस घुमड़ घुमड कर, यही शब्द मन में उभरते हैं,

अन्तरजाल बनाने वाले, क्या तेरे मन में समाई,
काहे को चिट्ठेकारी बनाई।
काहे बनाए तूने चिट्ठेकार,
लिखते हैं जो यह हिन्दी के चिट्ठे, मुखड़े हैं उजले।

काहे बनाया तूने चिट्ठेकारी का खेला,
जिसमे लगाया धर्म का मेला।
गुपचुप तमाशा देखे, वाह रे तेरी खुदाई,
काहे को चिट्ठेकारी बनाई।

तू भी तो तड़पा होगा इसको बनाकर,
तूफां ये धर्म का चिट्ठेकारी में डालकर।
कोई कमी तो होगी आंखो में तेरी,
आंसू भी छलके होंगे पलकों से तेरी।
बोल क्या सूझी तुझको, काहे को प्रीत जगाई,
तूने काहे को चिट्ठेकारी बनाई।

प्रीत बना के तूने जीना सिखाया,
हंसना सिखाया, रोना सिखाया।
हिन्दी चिट्ठेकारी के पथ पर मीत मिलाये,
मीत मिलाके तूने सपने जगाये,
सपने जगा के तूने, काहे को दे दी गहराई,

जब दी है प्रीत और गहराई,
तो खाना पड़ेगा जहर भी।
खाया तो जहर सुकरात ने, और नील कण्ठ ने,
चिट्ठेकारी करेंगे, तो खायेंगे, जहर हम भी।
बनेगे हम सुकरात या फिर ,
हो जायेंगे हम नील कण्ठ।


सुकरात और नील कण्ठ दोनो ने अमरत्व प्राप्त किया। बस एक ने मृत्यु वरण कर और दूसरे ने जीते जी। देखिये हिन्दी चिट्ठेकारी क्या बनती हैः सुकरात या नीलकण्ठ।

तीसरी कसम का गीत 'दुनिया बनाने वाले' सुनिये।

7 comments:

  1. उन्मुक्त जी व्यथित मत होइए, बल्कि खुशियाँ मनाइए. यह हिन्दी चिट्ठाकारी के प्रसिद्ध होने और फैलने के दिन आ रहे हैं उसी का संकेत है.

    नीलिमा ने कहा था कि हिन्दी चिट्ठाकारी में रंगत नहीं दीखती - यानी कि चटपटी, गलीज सामग्री. अब जब हिन्दी चिट्ठाकारी लोकप्रिय हो रही है, चहुँओर फैल रही है तो ये सब भी आएंगे. और जैसा कि आपने किया, वही सब भले जन करेंगे - ऐसी सामग्रियों का सिरे से बहिष्कार!

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  2. अनूप शुक्ला11:43 pm

    आपकी पिछली पोस्ट हमें याद थी। इस बार जब आपने लिखा था तब यह भी अन्दाजा लगा कि आपको २५ वें साल में सम्मानित किया गया। उसके बारे में बताया जाये। बाकी आपकी ये वाली पोस्ट अच्छी लगी!

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  3. उन्मुक्त जी आपने अपने विचारों से हम सबको अवगत कराया, अच्छा लगा।

    मै प्रयास करूँगा, आपके सवालों के उत्तर देने का, अभी याद आया 'पं. श्रीश' और 'श्रीमान रोहित'('कुछ सच्चे मोती' वाले) ने भी Tag किया है मुझे, आशा करता हूँ जल्दी लिख सकूंगा।

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  4. अनूप जी मेरे विद्यलाय में २५ साल बाद पुरुस्कृत करने की प्रथा नहीं है। यदि होती तो भी मैं वह व्यक्ति नहीं होता, कोई और ही होता। हम सब सहपाठी उसे, उस पुरुस्कार प्राप्त करने की बाट जोहते हैं जो स्वतंत्र भारत में किसी भारतीय नागरिक को नहीं मिला।
    राजीव जी धन्यवाद आपके शब्द का चयन अच्छा है। मैंने उसी अनुसार शब्द बदल दिया।
    मिश्रा जी मुझे माफ करें, मुझे नहीं मालुम था कि आपको इतने लोगों ने टैग किया है। यदि समय का आभाव हो तो मेरा टैग किया रहन दें।

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  5. उन्मुक्त जी,
    हिन्दी चिठ्ठाजगत निलकण्ठ ही बनेगा ऐसा मेरा विश्वास है। रहा सवाल चिठ्ठाजगत की सामग्री का, वो तो ऐसा है कि ये तो अब शुरूवात है। अच्छी चिजो के साथ बूरी चिजे तो आयेंगी ही। यह तो हम पर निर्भर करेगा कि किसे बढावा दें।

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  6. आपके विचारों को पढना अच्छा लगा ।

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  7. उन्मुक्त जी,
    आपके जवाब भी आखिरकार पढ़ ही लिए…
    थोड़ा रोश थोड़ी पहल करने की इच्छा…
    जज्बा बनाया हुआ है…।
    कुछ विरोधाभासों को भी समेटा है आपने जो
    मुझे अत्यंत सुलझा लगा…।बधाई!!

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आपके विचारों का स्वागत है।