Friday, December 23, 2011

कोहिनूर हीरा -पुरषों की लिये विपदा

इस चिट्ठी में कोहिनूर हीरे की चर्चा है।
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इंगलैन्ड के राजमुकुट में जड़ा, कोहिनूर हीरा - चित्र फोटोबकेट से

काकातीया राजवंश के क्षेत्र में, गुंटूर क्षेत्र भी था। कृष्णा नदी के किनारे का यह क्षेत्र, अपनी हीरों की खदानों के लिए प्रसिद्व था। यहीं पर  कोहिनूर,  दरियायी नूर, और नूर उल ऎन हीरे जैसे विश्व प्रसिद्व हीरे मिले थे। इसी लिये गोलकोण्डा खदानों के हीरे, बेहतरीन हीरों के रूप में जाने जाते थे। १७३० ई. में ब्राजील में भी हीरे मिले, तब तक दुनिया में केवल यही जगह, हीरों के लिए प्रसिद्व थी।

कोहिनूर सफेद हीरा है और यह दुनिया का सबसे बड़ा हीरा था पर कटने के बाद यह १०५ कैरेट (२१.६ ग्राम) का हो गया। इस समय, यह इंग्लैंड की महारानी के मुकुट में जड़ा है।

कोहिनूर हीरा, काकातीया राजवंश के समय, कोला खदान में मिला था। इसलिये यह इनकी सम्पत्ति था। इन्होंने इसे देवी के आंख के रूप में मंदिर में स्थापित कर दिया। तुगलक शाह-१ जब दिल्ली का राजा बना तब उसने अपनी सेना को काकतीया राजवंश को हराने के लिए १३२३ ई. में भेजा। पहली बार, उसकी हार हुई पर दूसरी बार वह जीत गया। उसके बाद हुई लूटपाट में, कोहिनूर हीरा दिल्ली  पहुंचा। उसके बाद, इस हीरे ने, दिल्ली सल्तनत की शान बढ़ायी।

शाहजहां ने इसे अपने तख्ते-ताउस - सिंहासन (Peacock throne) पर जड़वाया। १७३९ ई. पर नादिर शाह ने आक्रमण किया और अपने साथ तख्ते ताउस और कोहिनूर हीरों को पर्शिया ले गया। उसने इस हीरे का नाम कोहिनूर रखा।

१७४७ ई. में नादिरशाह की हत्या हो गयी और कोहिनूर हीरा अफ़गानिस्तान शांहशाह के पास पहुंच गया। १८०९ ई. में मो. शाह ने उसको अपदस्त कर दिया। १८३० ई.  में, अफ़गानिस्तान के अपदस्त शांहशाह शाह शूजा कोहीनूर हीरे के साथ भाग कर लाहौर पहुंचा। उसने  कोहिनूर हीरे को पंजाब के राजा रंजीत सिंह को दिया एवं इसके एवज में राजा रंजीत सिंह ने,  शाह शूजा को  अफ़गानिस्तान का राज-सिंहासन वापस दिलवाया।

रंजीत सिंह ने कोहिनूर हीरे को जगन्नाथ मंदिर को वसीयत कर दिया। लेकिन अंग्रेज हकूमत ने उनकी वसीयत नहीं माना और लाहौर संधि के अन्दर, कोहिनूर हीरा इंग्लैंड की महारानी को दे दिया गया।

कहा जाता है कि कोहिनूर हीरे के साथ श्राप है। यह पुरूषों के लिये विपत्ति लाता है पर महिलाओं के लिए नहीं। यह जिन-जिन राजाओं के साथ रहा उन पर विपदायें ही आयीं। उनकी सल्तनत चली गयी। केवल महिलायें ही, इसके श्राप से बचीं हैं।

इस समय यह महरानी एलिजाबेथ के पास है उनके बाद तो शायद कोई पुरूष राजा बने।  तब पता चलेगा कि यह मिथक सच है अथवा नहीं।


विष्णु पुराण और भागवत में, स्यमन्तक मणि का उल्लेख मिलता है। इस मणि को सूर्यदेव ने, सत्राजित की तपस्या से प्रसन्न हो कर, उसे दिया था। बाद में,  भगवान कृष्ण पर, चौथ का चन्द्रमा देखने के कारण, इसकी चोरी का लांछन लगा था। कहा जाता है कि यह मणि, कालान्तर में कोहिनूर हीरे के रूप में जानी गयी। लेकिन यह मिथक ही है।

अगली बार हम लोग दरियाये नूर और नूर उल ऎन हीरे की चर्चा करेंगे।


गोलककोण्डा किला और विश्वप्रसिद्ध हीरे

भूमिका।। गड़ेरिया की पहाड़ी यानि गोलकोण्डा।।  कोहिनूर हीरा -पुरषों की लिये विपदा।।


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सांकेतिक शब्द
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