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‘Are You a Normal Judge? On Law and Other Things’ की पांडुलिपि अब प्रकाशक ‘Law & Justice Publication Co., New Delhi’ के पास छपने के लिए चली गई है।
जीवन के ७५वें वर्ष में, कानूनी दुनिया में पांच दशकों से भी अधिक की यात्रा को —एक वकील, एक जज और एक शिक्षक के रूप में देखने पर, लगता है कि कुछ गलतियां हुईं; अगर जीवन फिर से जीने का मौका मिलता, तो कुछ चीजें ऐसी हैं जिन्हें निश्चित रूप से अलग तरीके से करता।
इस दौरान, कानूनी प्रणाली में कुछ कमियां भी दिखाई दीं।
लेकिन, साथ ही, भाग्यशाली भी रहा कि कई अनमोल रत्न मिले—ऐसी अंतर्दृष्टियाँ, अनुभव और सबक मिले, जिन्होंने कानून और जीवन के प्रति समझ को आकार देने में मदद की।
इन वर्षों के दौरान, मैंने इनमें से कई विचारों को अपने इसी चिट्ठे पर साझा भी किया।
दोस्तों ने सुझाया कि ये विचार एक बड़े पाठक वर्ग तक पहुँचने के हकदार हैं और इन्हें एक पुस्तक के रूप में एक साथ लाया जाना चाहिए। यह पुस्तक उसी प्रोत्साहन का परिणाम है। इसमें वे विचार, साथ ही कई नए निबंध शामिल हैं।
इसका शीर्षक एक ऐसे प्रश्न से लिया गया है जो एक बार, एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में, पूछा गया था। सम्मेलन समाप्त होने के काफी समय बाद तक वह प्रश्न मन में बना रहा और अंततः वही इस किताब का शीर्षक बन गया।
उम्मीद है कि पाठकों को ये पृष्ठ दिलचस्प, विचारोत्तेजक और, कभी-कभी, मनोरंजक लगेंगे। जल्द ही यह किताब आपके साथ साझा करूंगा।


वाह। बधाई। किताब छपने की शुभकामनाएँ।
ReplyDeleteवाह! शुभकामनाएं उन्मुक्त जी।
ReplyDeleteसर नई किताब की बधाई-शुभकामनाएं
ReplyDeleteआपको इस उपलब्धि के लिए बहुत-बहुत शुभकामनाएँ। पाँच दशकों के अनुभव को पुस्तक के रूप में संजोना अपने आप में बड़ी बात है। सबसे अच्छी बात यह लगी कि आपने केवल कानून की बातें नहीं कीं, बल्कि अपनी सीख, गलतियों और अनुभवों को भी ईमानदारी से साझा किया। बहरहाल, मेरा यहाँ आने का एक कारण और भी है। हम लोग मुंशी प्रेमचंद जी की आगामी पुण्यतिथी ३१ जुलाई २०२६ के अवसर पर प्रेमचंद महोत्सव के अंतर्गत "५० दिनों में ५० कहानियाँ" बनाने, सुनाने (और जुटाने की भी!) की ओर प्रयासरत है. अगर आपकी रूचि हो तो इस अभियान में आपका सहर्ष स्वागत है.
ReplyDeleteअधिक जानकारी आपको यहाँ मिल जाएगी - HindiDiscussionForum dot com
धन्यवाद!
Congratulations. Can't wait to read your book. Aaj aapka naam bhi pata chala :)
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