Thursday, August 30, 2007

अस्सी दिन में दुनिया की सैर

अस्सी दिन में दुनिया की सैर (Around The World in 80 days), जुले वर्न की सबसे प्रसिद्घ पुस्तक है। यह १८७३ में प्रकाशित हुयी थी। यह आज तक का लिखा गया सबसे प्रसिद्घ और सबसे ज्यादा अनुवाद किया हुआ यात्रा विवरण है। यह काल्पनिक है और इस तरह की कोई यात्रा नहीं हुयी थी। इस पुस्तक पर आधारित कई फिल्में भी बनी और सबसे प्रसिद्ध फिल्म, १९५६ में बनी थी। इसे ५ ऑस्कर पुरस्कार भी मिले।

इस उपन्यास के हीरो विलियम फॉग नाम के एक अंग्रेज है। एक दिन फॉग क्लब में मित्रों के साथ बैठे थे। उस दिन डेली टेलीग्राफ में खबर छपी थी कि बम्बई और कलकत्ता के बीच में रेलवे लाइन बिछ गयी है और पूरी दुनिया ८० दिन में घूमी जा सकती है। फॉग समझता है कि ऎसा किया जा सकता है और उसके मित्र कहते हैं कि ऎसा नहीं किया जा सकता है। इस बात पर उन लोगों के बीच २० हजार पौण्ड की शर्त लग जाती है और फॉग, अपने फ्रांसीसी नौकर के साथ उसे पूरा करने के लिए २ अक्टूबर १८७२ को रात ८-४५ बजे लंदन से चल देता है।
उसे शर्त जीतने के लिये, ८ दिसम्बर १८७२ तक क्लब में वापस आना है। उनका मार्ग इस प्रकार है,


लंदन से स्वेज

ट्रेन व स्टीमर द्वारा

७ दिन

स्वेज से बम्बई

स्टीमर द्वारा

१३ दिन

बम्बई से कलकत्ता

ट्रेन द्वारा

३ दिन

कलकत्ता से हांगकांग

स्टीमर द्वारा

१३ दिन

हांगकांग से याकोहामा

स्टीमर द्वारा

६ दिन

हांगकांग से सैनफ्रांसिस्को

स्टीमर द्वारा

२२ दिन

सैनफ्रांसिस्को से न्यूयार्क

ट्रेन द्वारा

७ दिन

न्यूयार्क से लंदन

स्टीमर द्वारा

९ दिन


कुल योग

८० दिन



उन्हीं दिनों, एक बैंक में डकैती हो जाती है और स्काटलैण्ड यार्ड का जासूस फिक्स भी उसकी तलाश में है। फॉग की शक्ल उस डकैत के विवरण से मेल खाती है और फिक्स समझता है कि फॉग बैंक डकैत है। फिक्स स्वेज से उनके साथ हो लेता है और फॉग के नौकर से अपने बारे में बिना बताये, उससे दोस्ती कर लेता है।

इस पुस्तक पर बनी फिल्म का पोस्टर

फॉग बम्बई से कलकत्ता के लिये चलता है। इलाहाबाद में ५० मील पहले उन्हें पता चलता है कि रेलवे लाइन पूरी नहीं बनी है, इसलिए इलाहाबाद तक की दूरी किसी और तरीके से करनी होगी। वह इसके लिए, एक हाथी, २००० पॉउण्ड में खरीदता है। इलाहाबाद से १२ मील रह जाने पर उन्हें एक कारवां मिलता है। हाथी का महावत बताता है कि,
'बुन्देलखन्ड की ऑउरा नाम की रानी को सती करने के लिये ले जाया जा रहा है। ऑउरा एक पारसी महिला है जो बम्बई के अमीर व्यापारी की लड़की है। उसकी शिक्षा अंग्रेजी में हुयी है पर उसके अनाथ हो जाने के कारण उसकी शादी, बुन्देलखन्ड के वृद्घ राजा, से कर दी गयी थी। रानी अपने मन से सती नहीं होना चाहती है। उसे गांजा चरस पिलायी गयी है ताकि वह विरोध न कर सके।'
उस समय बुंदेलखन्ड में सती प्रथा थी। अंग्रेजी की पुस्तक में रानी का नाम Aouda लिखा गया है। हिन्दी में अनुवाद की गयी पुस्तक में उसे अबदा कहा गया है पर मेरे पारसी मित्रों के अनुसार पारसियों में ऑउदा या ऑउडा या अबदा नाम नहीं होता पर ऑउरा होता है। इसीलिये मैंने यह प्रयोग किया है।

फिल्म का एक दृश्य

फॉग, ऑउरा को बचाने की तरकीब करता है। फॉग का नौकर, उसके पति की जगह लेता है और चिता के जलते समय, वह उठ खड़ा होता है। लोगों को लगता है कि कोई भूत आ गया है और यह लोग ऑउरा को लेकर भाग चलते हैं। इलाहाबाद से वे पुन: कलकत्ता के लिये ट्रेन पकड़ते हैं।

फिक्स, फॉग को कलकत्ता में गिरफतार करवा देता है। लेकिन फॉग जमानत ले कर हांगकांग भाग जाता है। ऑउरा को, हांगकांग में, अपने रिश्तेदार के पास रह जाना था। वहां पता चलता है कि ऑउरा के रिश्तेदार यूरोप चले गये हैं। इसलिये फॉग, ऑउरा को साथ लेकर आगे चलता है। उसका एक स्टीमर भी छूट जाता है पर वह दूसरा स्टीमर लेकर याकोहामा पहुंचता है। वहां से सैनफ्रांन्सिस्को और फिर ट्रेन से न्यूयार्क पहुंचता है। रास्ते में ट्रेन पर हमला हो जाता है और फॉग के नौकर को बंधक बना लिया जाता है। इन सब मुश्किलों के बीच, वह लिवरपूल पहुंचता है।

इस बीच फिक्स और फॉग में छुपा छिपी चलती रहती है। फिक्स उसे फिर से पकड़वा देता है, लेकिन तभी पता चलता है कि बैंक डकैत पहले ही पकड़ लिया गया है। फॉग को छोड़ दिया जाता है। फॉग किसी तरह लंदन पहुंचता है। फॉग हर दिन की गणना कर रहा था। गणना के कारण उसे लगता है कि उससे एक दिन की देरी हो गयी और वह शर्त हार गया है। उसका पैसा खतम हो गया था, वह गरीब हो गया। वह ऑउरा से माफी मांगता है कि वह उसे गरीबी में रख रहा है। ऑउरा कहती है कि वह उससे प्रेम करती है और शादी करना चाहती है। फॉग भी उससे प्रेम करने लगा था। वे शादी करना तय कर लेते हैं। फॉग के अनुसार वह दिन इतवार है पर पादरी बताता है कि आज शनिवार है न कि इतवार है। तब फॉग की समझ में आता है कि उसने दुनिया की यात्रा पूरब से पश्चिम की थी और उसे एक दिन का फायदा हुआ और वह शर्त नहीं हारा है। वह तुरन्त क्लब जाता है और शर्त जीत लेता है।

इस पुस्तक में दुनिया भर के जगहों का विवरण है। जूले स्वयं यूरोप से बाहर कभी नहीं गये थे फिर भी जगहों के विवरण एकदम सही हैं। यह पुस्तक को विश्वसनीय बनाते हैं। उस समय, इस पुस्तक के अंश भी अखबारों में इस तरह से छप रहे थे जैसे कि फॉग उन्हें अलग-अलग जगहों से लिखकर भेज रहा हो। यह वर्णन वास्तविकता के इतना करीब था कि लोग यह समझने लगे कि यह सच्ची कहानी है। लोगों ने इस पर अनगिनत पैसों का सट्टा लगाया कि फॉग यह शर्त जीत पायेगा कि नहीं। इसका अपना रोमांच है, उत्सुकता है भौगोलिक प्रमाणिकता है - यही कारण है कि यह आज ही मनपसन्द और पढ़ने योग्य पुस्तक है।

हिन्दी में अनुवाद की गयी पुस्तक

बीते कुछ सालों में लिखी गयी यात्रा संस्मरण की सबसे चर्चित पुस्तक, न तो यात्रा पर्यटन जगहों के बारे में है, न ही वह यात्रा अनूठी तरह से की गयी है। वह कौन सी पुस्तक है; कौन उसका लेखक है? ज्लदी क्या है - इंतजार करिये अगली बार का।

सैर सपाटा - विश्वसनीयता, उत्सुकता, और रोमांच
भूमिका।। विज्ञान कहानियों के जनक जुले वर्न।। अस्सी दिन में दुनिया की सैर

सांकेतिक शब्द
book, book, books, Books, books, book review, book review, book review, Hindi, kitaab, pustak, Review, Reviews, किताबखाना, किताबखाना, किताबनामा, किताबमाला, किताब कोना, किताबी कोना, किताबी दुनिया, किताबें, किताबें, पुस्तक, पुस्तक चर्चा, पुस्तकमाला, पुस्तक समीक्षा, समीक्षा,

7 comments:

  1. बहुत अच्छा लगा यह विवरण। अगले का इंतजार है।:)

    ReplyDelete
  2. मज़ा आ गया उन्मुकत जी,आपने जुले वरने की इस कृति की बहुत बढ़िया प्रस्तुति की है.बधाई!
    नारलीकर ने इसे साइंस फ़िक्सन माना है क्यों क़ि इसमे समय के ह्रास क़ि जानकारी सहज ही हो जाती है.और हाँ,बुँडेलखांड मे सती प्रथा तो आज भी है.
    अरविंद

    ReplyDelete
  3. आपके जरिये हमने भी कर ली दुनिया की सैर अस्सी दिन मे मतलब पढ़ लिया । :)
    और अगले विवरण का इंतज़ार रहेगा।

    ReplyDelete
  4. बहुत अच्छी प्रस्तुति है

    ReplyDelete
  5. बहुत बढ़िया विवरण रहा-यह पुस्तक Around The World in 80 days तो हमारे कोर्स में थी. आगे इन्तजार कर रहे है.

    ReplyDelete
  6. सामने सब के स्वीकार करता हूँ
    हिन्दी से कितना प्यार करता हूँ
    कलम है मेरी टूटी फूटी
    थोड़ी सुखी थोड़ी रुखी
    हर हिन्दी लिखने वाले का
    प्रकट आभार करता हूँ
    आप लिखते रहिए
    मैं इन्तज़ार करता हूँ ।
    NishikantWorld

    ReplyDelete
  7. बिमल श्रीवास्तव7:42 pm

    सच. बहुत अच्छा लगा. जुले वर्न (जिसे मैं जूल्स वेर्ने समझता था.) की कहानियां पढ़ कर हम परी लोक में पंहुच जाते है. उन्मुक्त जी को बहुत बहुत धन्यवाद.
    बिमल श्रीवास्तव

    ReplyDelete

आपके विचारों का स्वागत है।