Sunday, February 15, 2009

जाने क्यों, साफ कहते डरते हैं

मैंने अपनी चिट्ठी 'जाने क्यों लोग, ज़हर, ज़िन्दगी में भरते हैं' पर वेलेंटाईन दिवस पर होनी वाली अभद्रता पर आपत्ति दर्ज की थी। उसी चिट्ठी के अन्त में लिखा कि मुझे भारतीय संस्कृति-सभ्यता के नाम पर मैंगलोर के एक पब में किये गये बर्ताव पर भी आपत्ति है और इसके बारे में शीघ्र ही लिखूंगा। आज उसी के बारे में कुछ विचार।


मैंने वेलेंटाइन दिवस पर किये गये व्यवहार के बारे में जो भी लिखा या आज लिखने जा रहा हूं उससे अधिकतर पुरुष चिट्ठाकार सहमत नहीं हैं। इस पर बहुत कुछ कटु शब्दों में व्यक्त किया गया है। आशा करता हूं कि इन विचारों को स्वस्थ बहस के रूप में, सकारात्मक चर्चा की तरह से, लिया जायगा।


कुछ दिन पहले मैंगलोर के एक पब (public house) में कुछ युवतियों के द्वारा शराब पीने पर, उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया। मैं इस पर भी शर्मिन्दा हूं।


मैंने अपनी चिट्ठी 'यहां सेक्स पर बात करना वर्जित है' पर लिखा था कि १९६० का दशक मेरी किशोरावस्था का समय था। यह वह दशक था जिसमें हेर संगीत नाटक का मंचन हुआ। इसका जिक्र मैंने 'ज्योतिष, अंक विद्या, हस्तरेखा विद्या, और टोने-टुटके' की श्रंखला में किया है। इसी दशक पर हिप्पी आंदोलन अपनी चरम सीमा पर था। हम लोगों के बीच होने वाली पार्टियों में युवतियां भी रहती थीं। इन पार्टियों में न केवल सिग्रेट और शराब, पर चरस और गांजा भी चलता था। हममे से कुछ उस आनन्द की प्राप्ति भी करते थे जो यौन संबन्धों से मिलता है। लेकिन मैं इन सब का हिस्सा नहीं था। मैंने आज तक इन पदार्थों का एक बार भी सेवन नहीं किया। मेरे बेटे और बिटिया रानी भी इससे दूर रहते हैं।


मेरे विचार से न केवल चरस और गांजा पर शराब का सेवन अनुचित है। लेकिन यदि कोई शराब का सेवन करता है तो क्या मैंगलोर पर किया गया व्यवहार उचित है? क्या हमारी संस्कृति इतनी संकीर्ण है कि हम अपनी बात समझाने के बजाय, लाठी के जोर पर स्वीकार करवाते हैं? कट्टरवादिता तो हमारी संस्कृति-सभ्यता का हिस्सा नहीं रही; हम तो कभी भी इसके साथ नहीं रहे; हमारी सभ्यता लाठी के बल पर बात मनवाने पर विशवास नहीं करती - फिर आज क्या हो गया है कि हम समझा कर, बातचीत कर, अपनी बात नहीं कहना चाहते।


मेरे विचार से शराब, चरस गांजा का सेवन इसलिये अनुचित है क्योंकि यह स्वास्थ के लिये हानिकारक है। यह पुरुषों के लिये भी उतना ही हानिकारक है जितनी महिलाओं के लिये। फिर महिलाओं के खिलाफ इस तरह का व्यवहार क्यों? क्या यह इसलिये कि वे कमज़ोर हैं? क्या फिर इसलिये की वे पुरुषों से लड़ नहीं सकती और उन्हें इसका जवाब मारपीट के द्वारा नहीं दे सकती थीं? क्या इसलिये कि पुरुष इसका जवाब उसी भाषा में, मारपीट करके, दे सकते थे।

एक अच्छे अंत को पाने के लिए, खराब साधन को ठीक नहीं कहा जा सकता है।

महात्मा गाँधी ने एक बार कहा था,
'Means are more important than the end: it is only with the right means that the desired end will follow.'
साधन अंत से ज्यादा महत्वपूर्ण है। यदि साधन ठीक होगें तो ही वांछित अंत मिल सकता है।


उनका दर्शन, कानून का भी मूलभूत सिद्वांत है। लार्ड डैनिंग (Lord Denning) पिछले शताब्दी के सबसे प्रसिद्व न्यायाधीशों में से एक थे। उनका कहना है,
'But it is fundamental in our law that the means that are adopted... should be lawful means. A good end does not justify bad means.' RVS IRC Exparte Rossminster Ltd. 1979 ( 3) AllELR 385.
हमारी न्याय प्रणाली में यह महत्वपूर्ण है कि जो भी साधन प्रयोग में लाये जाएँ वे कानूनी हो। एक अच्छे अंत को पाने के लिए, खराब साधन को ठीक नहीं कहा जा सकता है।


शराब का सेवन न केवल महिलाओं के लिये पर पुरुषों के लिये भी अनुचित है। इसे रोकने यह तरीका नहीं है जो कि मैंगलोर पब में अपनाया गया। मेरे विचार से एक अच्छे अन्त पाने के लिये यह गलत साधन है। यह न केवल दर्शन, पर कानून की दृष्टि में भी गलत है।


इसका एक अन्य दृष्टिकोण भी है। सरकार शराब और सिग्रेट बेचने की एवं पीने की अनुमति देती है। सरकार ने इसके लिये लाइसेन्स भी दे रखे हैं। यदि कोई इस तरह की कानूनी जगह पर शराब का सेवन करता है और वह सेवन उसके व्यवहार को अशोभनीय नहीं बनाता तो किसी को आपत्ति करने का क्या अधिकार है। जो लोग इसके विरुद्ध हैं उन्हें चाहिये कि पहले उस कानून को बदलवायें जो इस तरह से शराब पीने की अनुमति देता है। कानून के अन्दर सेवन की गयी वस्तु का इस तरह लाठी, मारपीट, अभद्रता से विरोध करना अनुचित है।


लोगों को यह बात अपने आप स्वयं समझ में आनी चाहिये कि इसका सेवन ठीक नहीं पर आप यदि जबरदस्ती कर उनसे यह मनवाना चाहेंगे तो इसका असर उल्टा ही होगा।


बच्चों को सही दिशा देना हमारा, माता-पिता, समाज का काम है पर पुलिस नैतिकता से ठीक उसका उल्टा होता है। यह गलत है। यदि आप मुझसे पूछें कि मैं किस तरह का समाज चाहूंगा - जहां लोगों (जिसमें लड़कियां भी हैं) को पब में जाकर शराब पीने की स्वतंत्रता है, या जहां पुलिस नैतिकता है तो निःसन्देह मैं वह समाज चुनना चाहूंगा जहां पर लोगों को पब में जा कर शराब पीने की स्वतंत्रता है। क्योंकि इस तरह की स्वतंत्रता ही लोगों की समझ को प्रेरित कर सकती है कि यह गलत कार्य है। इतिहास गवाह है कि जब, जब और जहां जहां शराब पीना मना किया गया वहां अवैध तरीके से शराब बनाने और पीने का सिलसिला शुरू हो गया जो कि समाज के लिये ज्यादा हानिकारक है - पुलिस नैतिकता गलत है: कानून नैतिकता ही सही है।


मुझे इस घटना से संबन्धित कुछ अन्य बातों पर भी मुझे आपत्ति है।


कुछ महिलाओं ने मैंगलोर पब में हुए अनुचित व्यवहार पर, उन पुरुषों को जवाब उन्हीं की भाषा (मारपीट) में न देकर एक शान्तिपूर्ण तरीके से दिया। उन्होंने अनुचित व्यवहार करने वालों को गुलाबी.. भेजने की बात की। यह केवल ऐसे लोगों को शर्मिन्दा करने के लिये, उनका हास्य बनाने के लिये किया गया है। यह सच है कि गुलाबी.. का संबन्ध एक शरीर के प्राइवेट भाग से है। मैं स्वयं इस तरह से आपत्ति दर्ज नहीं करता पर यह तरीका शन्तिपूर्ण है - अनुचित नहीं है। इसमें कुछ भी गलत नहीं है।


मुझे व्यक्तिगत तौर पर महिलाओं के द्वारा गुलाबी.. भेजने पर कोई बात अनुचित नहीं लगती पर यदि यह किसी को अनुचित लगती है तो क्या उन महिलाओं पर व्यक्तिगत आक्षेप या गाली गलौज, डन्डा चलाना उचित है। मेरे विचार से यह गलत है।


कुछ पुरुषों ने, महिलाओं के द्वारा गुलाबी.. भेजने पर, उन्हें गुलाबी-- भेजने की बात कही गयी है। गुलाबी-- का भी संबन्ध एक शरीर के प्राइवेट भाग से है। मैं इस तरह से भी आपत्ति दर्ज नहीं करता पर यह तरीका भी शन्तिपूर्ण है। यदि आप किसी बात से सहमत नहीं हैं तो उसका जवाब शन्तिपूर्ण तरीके से दीजिये - लाठी, डन्डे के जोर पर या व्यक्तिगत आक्षेप, या गाली गलौज करके न दीजिये।


मेरे लिये तो इन दोनो तरीकों का प्रयोग करना दूर है - मैं तो इनका नाम भी अपने चिट्ठे पर लिखने से हिचकिचा रहा हूं। मैं स्वयं इन तरीकों का कभी प्रयोग नहीं करता पर यदि कोई इन तरीकों को अपनाता है तो मुझे इस पर कोई आपत्ति नहीं है क्योंकि यह शान्तिपूर्ण तरीके हैं। यह अपनी बात कहने के उन तरीकों से कहीं अच्छे हैं जैसा कि मैंगलोर पब में अपनाये गये। मैं अपनी आपत्ति उसी तरह से दर्ज करता जैसा कि मैं यहां पर कर रहा हूं या फिर किसी अन्य शान्तपूर्वक तरीके, जैसे जलूस इत्यादि निकाल कर, लेकिन उस तरह से कभी नहीं जैसा कि मैंगलोर में हुआ - यह कायरता, शर्मिन्दगी का तरीका है।


'उन्मुक्त जी, आपका पक्ष तो समझ में आया पर आपकी इस चिट्ठी का शीर्षक समझ में नहीं आया। इसका इस चिट्ठी से क्या मतलब?'
कुछ चिट्ठाकारों (अधिकतर महिलाओं) ने, इस प्रकरण पर चिट्ठियां लिखते या टिप्पणी करते समय, इस तरह का आभास दिया कि इस घटना पर बहुत से हिन्दी चिट्ठाकार (अधिकतर पुरुष) चुप हैं, वे इस पर बोलने से घबराते हैं, इसकी मौन स्वीकृति देते हैं। यह बात सच नहीं है। हममें से कई यह भिन्न कारणों से ऐसा करते हैं। जब मैंने इस विषय पर लिखने की बात सोची तो लगा कि वे शब्द जो इन चिट्टाकारों के आभास को व्यक्त कर सकें, वही इस चिट्ठी का सही शीर्षक होगा।


मैंने वेलेंटाइन दिवस पर हुऐ बर्ताव पर क्षोभ प्रगट करते हुऐ एक चिट्ठी 'जाने क्यों लोग, ज़हर, ज़िन्दगी में भरते हैं' लिखी है। इस चिट्ठी में 'दिल चाहता है' फिल्म के एक गाने 'जाने क्यों लोग, प्यार करते हैं' का जिक्र किया है। इस गाने की एक पंक्ति इस आभास को व्यक्त करती है इसी लिये उसे ही इस चिट्ठी का शीर्षक दे दिया।


'उन्मुक्त जी, यहां सब कहने की स्वतंत्रता है फिर लोग क्यों अपनी बात नहीं कहते हैं?'
बहुत से चिट्ठाकार, कुछ व्यक्तिगत विवशता के कारण, ऐसे विषय पर लिखना वा टिप्पणी करना नहीं पसन्द करते हैं। कई विवाद में नहीं पड़ना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि इस पर विवाद बेकार में तूल पकड़ेगा, बढ़ेगा। चुप रहने पर जल्द ही समाप्त हो जायगा और चिट्ठाकार पुनः उन विषयों पर लिखने लगेंगे जिसकी हिन्दी चिट्ठाजगत को आवश्यकता है। लेकिन इस घटना पर, लिखने और टिप्पणी, न करने का यह अर्थ बिलकुल न लगाया जाय कि सब मैंगलोर पर महिलाओं के साथ हुऐ बर्ताव को उचित मानते हैं या फिर महिलाओं के द्वारा शुरू किये गुलाबी.. भेजने के विरोद्ध में लिखी गयी बातों से सहमत हैं।


'उन्मुक्त जी, फिर आपने इस विषय पर क्यों लिख दिया? आप भी तो विवादों नहीं पड़ना चाहते।'
मुझे कुछ चिट्ठाकारों की टिप्णियों, चिट्ठियों पर आश्चर्य हुआ; दुख लगा कि इतने सुलझे लोगों कि सोच इस तरह से हो सकती है। इस प्रकरण पर बहुत कुछ व्यक्तिगत आक्षेप होने लगे, अपशब्द भी हो गये। इसलिये यह चिट्ठी लिखी कि यदि कोई हिन्दी चिट्ठाकार इस विषय पर मौन हैं तो इसका अर्थ यह नहीं है कि वे मैंगलोर काण्ड से या महिलाओं के द्वारा गुलाबी.. भेजने की बात पर व्यक्तिगत आक्षेप वा अपशब्द कहने वाले विचारों से सहमत हैं। बहुत से पुरुष इसको एकदम गलत मानते हैं। मैं नहीं बता सकता कि मेरे अतिरिक्त इस तरह के विचार रखने वाला और कौन अन्य चिट्ठाकार हैं पर मैं इस तरह के विचार रखने वालों में से एक हूं।


'उन्मुक्त जी, आप को इन गुलाबी तरीकों से असहमति प्रकट करने वाले तरीकों पर व्यक्तिगत आपत्ति है क्या गुलाबी रंग से परहेज है या फिर गुलाबी तरीकों को पसन्द नहीं करते?'
नहीं मुझे गुलाबी रंग पसन्द है। यह तो रुमानी रंग है - प्रेम का प्रतीक है। मुझे बांदा की यह गुलाबी महिलायेंं, उनका मकसद, उनका ऐतराज पसन्द आता है।



इस चिट्ठी के चित्र बीबीसी के इस पेज पर के विडियो और इस पेज से है।

इस प्रकरण पर कई चिट्ठियों का जिक्र चिट्ठाचर्चा की इस चिट्ठी में है। हांलाकि इसमें सन्दर्भित चिट्ठियों के अतिरिक्त भी कुछ अन्य चिट्ठियां भी हैं और इसके बाद भी कई चिट्ठियां इस घटना पर लिखी गयी हैं।
कुछ अन्य विषयों पर एतराज प्रगट करती मेरी चिट्ठियां
  1. धार्मिक उन्माद
  2. वेलेंटाईन दिन और इसका स्पष्टिकरण डैनिश व्यंगकार - कार्टून
  3. Trans-gendered – सेक्स परिवर्तित पुरुष या स्त्री
  4. डकैती, चोरी या जोश या केवल नादानी
  5. बनेंगे हम सुकरात या फिर हो जायेंगे नील कण्ठ
  6. जाने क्यों लोग, ज़हर, ज़िन्दगी में भरते हैं
  7. जाने क्यों, साफ कहते डरते हैं

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is post per manglore ke pub mein huee ghtna ke dvara apnee snskrit kee charchaa hai. yeh hindi (devnagree) mein hai. ise aap roman ya kisee aur bhaarateey lipi me padh sakate hain. isake liye daahine taraf, oopar ke widget ko dekhen.

This post talks about our culture in connection of the incident in the Mangalore pub. It is in Hindi (Devnaagaree script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.


सांकेतिक शब्द
culture, Family, life, Life, जीवन शैली, समाज, कैसे जियें, जीवन दर्शन, जी भर कर जियो, पसन्द-नापसन्द,




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15 comments:

  1. intezaar tha aap kab likhaegae , aap ki chuppi akhar rahee thee , par sab apne samay sae hii likh paatey haen . log reaction ko galta mantey haen action ko nahin aur har reaction kae liyae stri / naari ko dosh daetey haen .

    sharab sigret buri haen sab kae liyae , band honii hi chahiyae par kewal stri kae liyae purae samaj kae liyae
    vyaktigat swantantrtaa ki baat purusho tak hi nahin , stri kae liyae bhi hae

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  2. अच्छा विश्लेषण इस अहम और सामयिक विषय पर. आभार.

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  3. कट्टरवादिता किसी भी स्तर पर और किसी के भी द्वारा ग्राह्य नहीं है.

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  4. आपकी पोस्ट सारे मुद्दे पर संतुलित ढंग से विचार करती है। बहुत अच्छा लगा इसे पढ़कर!

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  5. उन्मुक्तजी, आपने बड़े अच्छे तरीके से इस विषय पर लेख लिखा...आप समझते हैं कि ऐसे विषयों पर मौन रहने वाले किसी न किसी कारण अपना मत रख पाने में अपने आपको असमर्थ पाते हैं..शायद जड़ से हो जाते हैं...21वीं सदी में जब पूरी दुनिया सिमट कर एक परिवार बन रहा है वहीं ऐसी घटनाएँ हैरान परेशान कर देती हैं.

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  6. मैं हूँ आपके विचारों से 100 प्रतिशत सहमत. मैंने अपने चिट्ठे पर व्यंग्यात्मक लहजे में ठीक यही बात कही है जो आपने कही है.

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  7. मेरे और अरविन्द मिश्र जी के बीच हुई ई-मेल का आदान प्रदान:

    उन्मुक्त जी, आपके ब्लॉग पर यह पोस्ट दिख नही रही -जरा देखें - अरविन्द

    अरविन्द जी, मेरे कंप्यूटर पर तो दिखायी पड़ रही है - उन्मुक्त

    मेरे कंप्यूटर पर अब भी दिखायी नहीं पड़ रही है। मेरी टिप्पणी निम्न है। हो सके तो वहीं टंकित कर दें।
    'बहुत संतुलित आलेख जिसके किसी भी पहलू से असहमत नही हुआ जा सकता! अरविन्द मिश्र'

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  8. क्या यह सब प्रचार पाने का सस्ता तरीका नहीं।

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  9. यह विषय इतना महत्वपूर्ण नहीं कि इसे इतना विस्तार दिया जाय.

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  10. मैने भी वही लिखा था, जो आपने लिखा है. गुलाबी...समयाभाव के चलते लिख नहीं पाया, वैसे गुलाबी... भेजना मेरी नजर में बकवास सोच है.

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  11. इस विषय पर अब तक की सबसे संयमित और संतुलित पोस्ट है जिसमें दोनों पक्ष को रखा है आपने. आपका बहुत धन्यवाद उन्मुक्त जी. कुछ ऐसी विषयों पर अक्सर इतना गली गलोज हो चुका रहता है कि आगे कुछ लिखते डर लगता है...लोग व्यक्तिगत आक्षेप भी लगाने लगते हैं. इन सबसे बचने के लिए भी कई बार खामोश रहना ही उचित लगता है...आपने लिख कर जैसे कई लोगों कि बात कह दी है.
    यही नहीं जिस बारे में आप बात कर रहे हैं वहां पिंक...का इस्तेमाल आपके गाम्भीर्य को दर्शाता है. आपकी गुलाबी महिलाओं वाली पोस्ट भी पढ़ी थी पहले. आपके कार्य कि सराहना के लिए शब्द नहीं हैं.

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  12. ये दोनो ही पक्ष - भगवा और पिंक, साइकोटिक हैं!

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  13. चलिए इसी बहाने महिलाओं ने मोर्चा तो संभाला।

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  14. आपने लिंक दिया तो यहाँ तक पहुंचना हो पाया। बहुत अच्छा आलेख है आभार। आपकी टिप्पणी पढ़ी , उसके लिए भी आभार।

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आपके विचारों का स्वागत है।