Friday, July 02, 2010

नाई, महिला है

टाइम पत्रिक का शताब्दी अंक
इस चिट्ठी में, 'नाई की दाढ़ी को कौन बनाता है' सवाल का जवाब और गर्डल के गणित की अपूर्णनता सिद्धान्त की चर्चा है। 
इस चिट्ठी को, सुनने के लिये यहां चटका लगायें। यह पॉडकास्ट ogg फॉरमैट में है। यदि सुनने में मुश्किल हो तो दाहिने तरफ का विज़िट,
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मैंने पिछली बार बताया था कि बट्रेंड रसेल (Bertrand Russell) ने ऍपीमेनेडीज़ या लाएरस् विरोधाभास को नयी तरह से रखा। उन्होंने कहा,
'एक गांव में केवल एक ही नाई था। उसका कहना था कि वह उन लोगों की दाढ़ी बनाता है जो स्वयं अपनी दाढ़ी नहीं बनाते हैं।'
सवाल यह था कि
'नाई की दाढ़ी को कौन बनाता है?'
रसेल और व्हाइटहैड (Whitehad) के मुताबिक उन्होंने इस विराधाभास का हल,  प्रिंसिपिया मैथमैटिका (Principia Mathematica) (१९१३) में निकाल लिया था। उनका हल, कुछ इस तरह से समझा जा सकता है  कि नाई महिला है। इस दशा में तो उसे दाढ़ी बनाने की आवश्यकता नहीं है।

इस हल में वे पुरूषों के स्तर से ऊपर निकल कर व्यक्तियों के स्तर में चले जाते हैं जिसमें पुरूष और महिलायें दोनों रह सकती है।  लेकिन वे भूल गये कि व्यक्तियों के स्तर में अलग तरह  का विरोधाभास  है। जिस पर उन्होंने विचार नहीं किया।

२०वीं शताब्दी के समाप्त होते समय, टाइम पत्रिका ने एक विशेष अंक निकाला था। इसमें उन्होंने बीसवीं शताब्दी के सौ महानतम  लोगों के बारे में लिखा था। इन सौ लोगों में एक ऑस्ट्रियन गणितज्ञ कोर्ट  गर्डल  भी थे।  उन्हें आज तक का सबसे महानतम तर्क शास्त्री माना जाता है। 

गर्डल ने १९३१ में एक पेपर जर्मन भाषा में लिखा। इसके शीर्षिक का अंग्रेजी में अनुवाद है,
'On formally Undecidable Proposition of Principia Mathematica and Related Systems. 
इसमें  उन्होंने सिद्व किया, 
'Proof of arithmetic consistency is not possible―every mathematical system is incomplete'.
आप किसी भी मूलभूत सिद्वान्तों को लेकर चलें, उनमें कुछ इस तरह के कथन अवश्य निकल आयेगें  जो न कि सही साबित किये जा सकते है न गलत। सुसंगत गणित सम्भव नहीं है ... प्रत्येक व्यवस्था अपूर्ण है।
गर्डल ने हिलर्ब्ट के द्वारा १९०० और १९२८ की आईसीएम में रखे गये प्रश्न का जवाब ढूंढ  लिया। लेकिन यह वह जवाब नहीं था जो डेविड हिल्बर्ट चाहते थे। वे तो चाहते थे कि गणितीय तर्क का ऐसा संसार हो, जहां सारे कथन सही अथवा गलत सिद्घ किये जा सकें। गर्डल ने इसका उल्टा ही सिद्ध कर दिया। इससे हिल्बर्ट को परेशान हुई। लेकिन वे कुछ कर न सके - गर्डल के शोद्ध पत्र में आजतक कोई गलती नहीं निकाली जा सकी है। वे मन मनोस कर रह गये।

अगली बार हम लोग गर्डल और उसके अपूर्णता सिद्धान्त के बारे में लिखी कुछ  रोचक पुस्तकों के बारे में चर्चा करेंगे। 

कुछ समय पहले बीबीसी ने डेंजरस् नॉलेज (Dangerous Knowledge) नामक श्रृंखला प्रसारित की थी। यह श्रृंखला चार विलक्षण प्रतिभा के व्यक्ति, जिसमें तीन गणितज्ञ - जॉर्ज कैंटर (Georg Cantor), कोर्ट गर्डल (Kurt Gödel) और ऐलन ट्यूरिंग (Alan Turing) - और एक भौतिक शास्त्री लुडविंग बॉल्टज़मैन (Ludwig Boltzmann) पर थी। यह बेहतरीन श्रृंखला है और यदि इसे आपने नहीं देखा है तो यूट्यूब में देख सकते हैं। हांलाकि इस श्रंखला में, इनकी जीवनी के बारे में कुछ सूचनायें सही नहीं हैं। इसमें गर्डल के जीवन के शुरू का भाग यहां देखिये।



  तू डाल डाल, मैं पात पात
भूमिका।। नाई की दाढ़ी को कौन बनाता है।। नाई, महिला है।। गर्डल और अपूर्णता सिद्धान्त पर  पुस्तकें।।








About this post in Hindi-Roman and Englishyeh chitthi cyber apradh ki shrakhlaa kee kari hai. is chitthi mein charcha hai ki kya 'principia mathmatica mein Epimenides' ya liar's virodhabhas ka hl nikal gaya tha ya naheen. yeh chitthi {devanaagaree script (lipi)} me hai. ise aap roman ya kisee aur bhaarateey lipi me padh sakate hain. isake liye daahine taraf, oopar ke widget ko dekhen.

This post is part of series on Cyber crimes. It talks about whether Epimenides' or liar's paradox was sorted out in Pricipia Mathematica or not. It is in Hindi (Devnagri script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.

सांकेतिक शब्द
Hindi, पॉडकास्ट, podcast,
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13 comments:

  1. फिर एक रोचक दृष्टांत -दरअसल अंतिम सत्य का तो पता लग ही नहीं सकता शायद !सापेक्षता ने सबको दबोच रखा है!

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  2. अगर यह सब हिंदी प्रिंट में आ पाता...कितना अच्छा होता..साधारण भारतीय की पहुँच नेट तक कहाँ है ..

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  3. लवली जी, काश मेरी इतनी जान पहचान होती कि अपने लेख हिन्दी प्रिंट में छपवा सकता। यही कारण है कि मैंने चिट्ठा लिखना शुरू किया। इसमें कोई भी जान पहचान की जरूरत नहीं है।

    लेकिन मेरे सारे लेखों में कोई भी कॉपीराईट नहीं है। हर को कुछ भी छापने का अधिकार है। क्या मालुम कोई हिन्दी प्रिन्ट वाला आपकी तरह सोचता हो और वह छाप दे :-)

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  4. सही विचार.

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  5. सही उत्तर है । यह तो दिमाग में धँसा ही नहीं ।

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  6. रोचक पोस्ट है धन्यवाद।

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  7. उत्तर सही है पर सटीक नहीं...अरविन्द जी की बात सही है. पर सापेक्षता नहीं संभाविता होना चाहिए. यदि हर बात का उत्तर एकदम सही या गलत दिया जा सकता तो संभाविता या प्रोबेबिलिटी का इतना बोलबाला नहीं होता.

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  8. आपका ब्लॉग मुझे बेहद पसंद आया उन्मुक्त जी ,वैसे भी वैज्ञानिकता के परिप्रेक्ष्य के लेख मेरी पहली पसंद होते हैं किन्तु आप तो वास्तविकता को उजागर कर रहे हैं अन्यथा लोग साइंस के नाम पर उल-जलूल चीजें परोस देते हैं ,गर्दल को मैं जल्दी ही पढूंगी और आपकी पत्नी का ब्लॉग भी

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  9. वाह! बड़ा अच्छा लगा आपकी यह पोस्ट पढ़कर। लवली की बात को मैं फ़िर से दोहराऊंगा। आपके लेखों का संकलन छपना चाहिये। आप सोचिये ,रास्ते निकलेंगे।

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  10. हम जहाँ भी देखते हैं सर्वत्र अस्तव्यस्तता पाते हैं। लेकिन जब खोजने निकलते हैं तो हर चीज अपने ठिकाने पर पाते हैं, उस की तमाम वजहें पाते हैं। समूचा विश्व नियमों से बंधा और व्यवस्थित है। बस नियम ही इतने हैं कि उन का कोई छोर नहीं।

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  11. वैज्ञानिक सिद्धांत निरूपण संबंधी यह चर्चा बड़ी
    प्रासांगिक और रोचक लगी। आपको
    जानकारी देता हूँ। "नाई" शब्द
    "न्यायी" का अपभ्रंश रूप है। नैयायिकों
    का एक काम था; "बाल की खाल
    निकालना" न कि "खाल के बाल
    निकालना।"
    सद्भावी -डॉ० डंडा लखनवी

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  12. Shweta11:08 pm

    अच्छा लेख है . इसी से मिलता जुलता प्रकार का १ मत Physics के टोपिक Thermodynamics में भी मिलता है जिसके अनुसार " Perfectly black body doesn't exist " .ie: There is no such body in universe that can absorb heat totally . ब्रह्मांड में कोई ऐसी वस्तु विधमान नहीं है जो ताप को पोर अवशोषित करले .

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आपके विचारों का स्वागत है।