तीन दिन: ख़ुदा के वत़न में - पहला दिन
होली भाई-चारे एवं समानता का त्योहार है पर उत्तर भारत के बहुत से शहरो में इसका स्वरुप बदल गया है। वहां यह शोर-शराबे, बत्तमीजी, दूसरों के अधिकारों के साथ खिलवाड़ करने का दिन बन गया है। हसीं मज़ाक अच्छा है और जीवन में जरूरी भी, पर लोग यह नहीं समझ पाते या समझना नहीं चाहते कि कुछ लोगों को रगों से एलर्जी हो सकती है तथा रगं, अबीर ऐसे लोगों का पूरा हफ्ता बरबाद कर देते है। सामुहिक मिलन अच्छी बात है पर अपने देश में अलग से मिलने का ऐसा मर्ज़ है कि अक्सर कुछ ज्यादा ही हो जाता है। बहुत से लोग इसी कारण होली में उत्तर भारत से भागते हैं, मै भी उनमे से एक हूं और मैं होली पर केरल की सैर पर चला गया।
प्लेन कालीकट (नया नाम कोज़ीकोड) देर से पहुंचा, सुबह कोहरा था इसीलिये उड़ने में देर हुई। प्रकति में सब रगं हैं पर उसके सबसे प्यारे रगं हैं: हरा तथा नीला। इसी लिये पेड़ों को उसने हरा तथा आकाश एवं समुद्र को नीला रगं दिया। केरल में उतरते सब जगह पेड़ पौध हरे रगं में दिखे, उसके पीछे नीला आसमान और नीला समुद्र। दृश्य देख कर एक पुराना पिक्चर का गाना याद आया,
पर नीला, नीला यह गगन।
दिशायें देखो रगं भरी
चमक रही उमगं भरी।
वह कौन चित्रकार है,
वह कौऽऽऽन चित्रकार है।
एक ठेलेवाला चाय बेच रहा था केरल में चाय, चाय की पत्ती से नही, पर चाय के बुरादे से बनती है, थोड़ी अजीब सी लगी। कुछ और लोग भी चाय पी रहे थे मैने उनसे बात करने के लिये कहा कि वास्को डिगामा यहां उतरा था यह ऐतिहासिक समुद्र-बीच है केवल समुद्र-बीच के पहिले एक टूटे-फूटे पत्थर पर यह लिखा है यह तो टूरिस्ट स्पौट है कुछ अच्छा बना कर लिखना चाहिये था। उसने कहा कि वासको डि-गामा बहुत क्रूर व्यक्ती था उसके बारे में क्यों लिखा जाय। मैने बहस को बड़ाने के लिये कहा कि फिर भी यह इतिहास की बात है कि योरप से सबसे पहिले उसी ने भारत का रास्ता खोजा था इसलिये इस जगह को इतिहासिक जगह के रूप में देखें तथा यदी वह क्रूर था तो उस बात को भी लिखें। उसने कहा हमलोग कुछ नहीं सुनना चाहते यदि वास्को डि-गामा कि यहां मूर्ती बनायी जायगी या कुछ लिखा जायगा तो हम उसे तोड़ देंगे नष्ट कर देगें। मुज्ञे लगा कि उसका पारा गरम हो रहा है, इसके पहिले कोई अप्रिय घटना हो जाय मेने विषय बदलना ही ठीक समझा। बी.बी.सी. की वेब-साईट पर वास्को डि-गामा का ईतिहास देखें तो इन लोगों का गुस्सा समझा जा सकता है।
समुद्र पर दूर रोशनी दिखायी पड़ रही थी मैने पूछा यह रोशनी कैसे है। उसने कहा कि यह मछुहारों के नाव की रोशनी है जो बैटरी से जल रही है उसने यह भी बतया कि मछुहारों के पास मोबाईल फोन रहता है और वे मछली पकड़ने के बाद मोबाईल फोन से व्यापारियों से बात करते रहते हैं जो सबसे अच्छा पैसा देने की बात करता है वहीं सौदा पक्का कर लेते हैं मोबाइल क्रान्ती का एक और फायदा। रात हो रही थी हम लोग वापस लौट आये। दूसरे दिन हमें पश्चिम की ओर वायनाड ज़िले में वायनाड वाईल्ड लाईफ सैक्चुंरी देखने जाना था। दूसरे दिन का किस्सा अगली बार।
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1 टिप्पणियाँ:
कलर एलर्जी के लिये सही कहा है, केरल के बारे में बहुत सुना है एक दिन जरूर जाऊंगा वहाँ।
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