Friday, April 21, 2006

मुन्ने की मां को गुस्सा क्यों आया

मैने पिछली बार कहा था कि मुन्ने की मां हमेशा नही हंसती है कभी कभी गुस्सा हो जाती है आज ऐसे ही एक दिन के बारे में।

एक दिन औफिस से घर पहुंचा तो महौल कुछ तना, तना सा लगा। मुन्ने की मां चाय बड़े बेमन से रख कर चली गयी मैने चुप रहने में ही खैर समझी। चाय चुपचाप पी, फिर नहाने चला गया। नहाया, कपड़े बदले और कमप्यूटर पर। थोड़ी देर बाद लगा कि पीछे से कोई घूर रहा है - आज तो शामत है। मैने चुप रहने मे ही भलायी समझी।


इतने में मुन्ने की मां की तन्नाई हुई अवाज़ सुनायी पड़ी, 'यह क्या है'।

मैंने तिरछी नज़र से देखा: कुछ पिकनिक की फोटो थीं। मैने कहा कि मुन्ना से पूछो कहीं पिकनिक पर गये होंगे वंही की फोटो होंगी।
'यह ब्लैक एन्ड वाईट हैं और आजकल रंगीन फोटो होती हैं और न तो मुन्ना दिखायी पड़ रहा है न ही उसके कोई दोस्त। फिर यह फोटो तुम्हारे बक्से में क्या कर रहीं थी।'
लगा कि जैसे कोई गुर्रा रहा हो। अब तो ठीक से देखना लाजमी हो गया।

देखा तो कई पुरानी यादें ताजी हो गयी। विश्यविद्यालय के समय में हम लोग पिकनिक में गये थे तभी की फोटो थीं मैं कुछ भावुक हो कर उसे पिकनिक के बारें में बताने लगा। इकबाल, जो अब वकील हो गया है; अनूप जो बड़ा सरकारी अफसर हो गया; दिनेश जो कि जाना माना वैज्ञानिक है।

'मुझे इन सब में कोई दिलच्सपी नहीं है पर यह लड़की कौन जिसकी तुमने इतनी फोटूवें खींच रखी हैं और क्यों इतना सहेज कर रखे हो, आज तक बताया क्यों नही'
मुझे एक पतली सी चीखती हुई आवाज़ सुनायी पड़ी। सारा गुस्सा समझ में आ गया।


यह लड़की उर्मिला थी। वह हम लोगों के साथ पढ़ती थी, अच्छा स्वभाव था, बुद्धिमान भी थी। वह सब लड़कों से बात करती थी और अक्सर क्लास में, बेन्च खाली रहने के बावजूद भी, लड़कों के साथ बेन्च में बैठ जाती थी। वह इस बात का ख्याल रखती थी कि वह सबसे बात करे तथा सब के साथ बैठे। हम सब उसे पसन्द करते थे। पर वह हम से किसी को खास पसन्द करती हो ऐसा उसने किसी को पता नही लगने दिया।

'कहां रहती है' फिर वही तन्नाती हुई आवाज़।
'विश्वविद्यालय में साथ पढ़ती थी। मुझे मालुम नहीं कि वह आजकल कहां है, शायद नहीं रही।'
'तुम्हे कैसे मालुम कि वह नही रही'
'विश्वविद्यालय के बाद वह मुझसे कभी नही मिली पर इकबाल से मुकदमे के सिलसिले में मिली थी। उसी ने बताया था।'

इकबाल मेरा विश्वविद्यालय का दोस्त है और इस समय वकील है उसके बारे में फिर कभी - पर अभी केवल इतना कि मुन्ने की मां उसकी बात का विश्वास करती है।

'इकबाल भाई उर्मिला के बारे मे क्या बता रहे थे'
आवाज से लगा कि उसका गुस्सा कुछ कम हो चला था - उर्मिला की कहानी अगली बार।


उर्मिला की कहानी
मुन्ने की मां को गुस्सा क्यों आया।। मुकदमे की दास्तान।। अदालत का फैसला।। घटना की सच्चाई

6 comments:

  1. मजेदार पोस्ट । आगे का इंतजार है।

    ReplyDelete
  2. बहुत बढ़िया लिखा है। मुन्ने की माँ को भी यह पढ़ाते हो या नहीं?

    ReplyDelete
  3. बस किसी तरह भी बच निकलो, यही मार्केटिंग है...
    समीर लाल

    ReplyDelete
  4. Anonymous10:06 am

    रमन भाई साहब
    नमस्ते
    अाप ने कम से कम मेरे बारे में पूंछा तो, कद्र तो की| मुन्ने के बापू तो बस मुझे घर की मुर्गी साग बराबर समझते है|ं न तो कुछ पढ़ाते हैं और न ही बताते हैं| शारुख खान की पिक्चर भी दिखाने नही ले जाते हैं मुझे अपनी सहेलियों के साथ जाना पढ़ता है| मेरा तो जीवन मुन्ना, मुन्नी, खाना बनाना, इनकी चाय बनाना और कपड़े धोने तक ही रह गया है|
    मुन्ने के बापू को आप कुछ समझाइये|
    मैं हूं दुखयारी
    मुन्ने की मां

    ReplyDelete
  5. असल प्रविष्टी से भाभीजी की टिप्पणी ज्यादा मजेदार हैं. भाई उन्मुक्त आप कि जगह अब भाभीजी को लिखने दो (हम देवरों के लिए) ;).

    ReplyDelete

आपके विचारों का स्वागत है।