Thursday, August 16, 2007

डल झील पर जीवन

मैं १९७५ की गर्मी में कश्मीर आया था। यह मेरी दूसरी ट्रिप है और मेरी पत्नी की पहली। उस समय डल झील के बीचोबीच चार चिनार के पेड़ थे और प्लेटफार्म बनाकर एक रेस्ट्राँ चला करता था, इसमें कटी पतंग के एक गाने 'अच्छा तो हम चलते हैं' की शूटिंग हुयी थी। यह बहुत सुन्दर जगह थी। मुझे बताया गया कि अब यह बन्द हो गया है।

हमारी हाउसबोट के बगल एक पेड़ भा। उसमें चील दम्पत्ति ने अपना घोसला बना रखा था। उनके दो बच्चे भी थे। वे खाना लाकर उन्हें खिलाते थे। जब मैं उनकी फोटो ले रहा था तो वह चील मुझे घूर कर देख रही थी कि कहीं मैं उसके बच्चों को कुछ चोट न पहुंचा दूं।

मुझे यहां जहीर आलम मालिश करने वाला मिला। यह बीकानेर के रहने वाले हैं और इनकी शादी भोपाल में हुयी है वहीं पर घर जमा लिया है। वहां इनकी Face to face नाम की बाल काटने की दुकान पुराने भोपल में है। साल में ४ महीने भोपल में और ८ महीने कश्मीर में रहते हैं। मैंने उनसे मालिश करवायी। मैंने इसके पहले कभी नहीं करवायी थी। समझ में नहीं आया कि अच्छी थी कि नहीं, पर २०० रूपये जरूर जेब से निकल गये।


यहां पर हाउसबोट का नगर बसा है लगता है श्रीनगर में आने वाला पर्यटक यहीं रूकता है नाव वाले फेरी लगाते रहते हैं। कोई ठण्डा बेच रहा है कोई जूता। कोई आपको जैकेट बेचना चाहता है तो कोई आपको गहने। उसी के बीच जीवन चल रहा है। यह सब डल झील को बर्बाद भी कर रहा है। इस बारे में वहां क्या हो रहा है यह अगली बार



कश्मीर यात्रा
जन्नत कहीं है तो वह यहीं है, यहीं है, यहीं है।। बम्बई का फैशन और कश्मीर का मौसम – दोनो का कोई ठिकाना नहीं है।। मिथुन चक्रवर्ती ने अपने चौकीदार को क्यों निकाल दिया।। आप स्विटज़रलैण्ड में हैं।। हम तुम एक कमरे में बन्द हों।। Everything you desire – Five Point Someone।। गुलमर्ग में तारगाड़ी।। हेलगा कैटरीना और लीनुक्स।। डल झील पर जीवन।।

4 comments:

  1. डल झील की याद आपने ताजा करवा दी।हम ८३ मे गए थे और हमे तो बड़ा मजा आया था कि शिकारे से जो की एक तरह का बाजार है हर सामान खरीद सकते है।

    पर विवरण इतना छोटा क्यूँ?और फोटो भी नही है।

    और हाँ पिक्चर कटी पतंग नही आन मिलो सजना थी।

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  2. हाल ही में एक टेवि चैनल मेम सुना कि जमीन खरीदने पर रोक की वजह से किसी अँग्रेज ने डल झील के हाउस बोट बनवा कर रहना शुरु किया।इस तथ्य की पुष्टी हो सकती है?

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  3. काश हमारा भी डल झील का कोई दौरा हो पाता...

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  4. आपके यात्रा वृतांत को पढ़ने के बाद मुझे अपनी ही ग़ज़ल के कुछ शेर याद आ गाये अचानक, कि-
    इस शहर में इक नहर की बात हो,
    फिर वही पिछले पहर की बात हो.
    ये रात सन्नाटा बुनेगी इसलिए-
    कुछ सुबह, कुछ दोपहर की बात हो.
    कह रही कश्मीर की वादी प्रभात-
    अब नहीं ख़ौफो- ख़तर की बात हो.

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