Wednesday, February 28, 2007

बनेंगे हम सुकरात या फिर हो जायेंगे नील कण्ठ

लक्षमी नरायन गुप्त जी ने मुझे यहां पुनः नामित कर पांच सवालों का जवाब देने के लिये कहा। इस सम्मान के लिये धन्यवाद।
यह चित्र मेरा नहीं है। अन्तरजाल पर, भगवान शिव से सम्बन्धित सारी वेबसाईटों पर है। इसीलिये यहां, बिना आभर प्रगट कियट डाल दिया है। पता चलते ही आभार प्रगट करना चाहूंगा।

उनके पहले दूसरे, चौथे, और पांचवें सवाल का जवाब रचना जी के सवालों का जवाब देते समय एक अनमोल तोहफ़ा की चिट्ठी पर दे चुका हूं बस तीसरे का जवाब देना नहीं हुआ है। मैं इसका जवाब जरूर देना चाहूंगा।

मैं किन विषयों पर लिखना पसंद/नापसंद करता हूं?

Monday, February 26, 2007

चलत मुसाफिर मोह लिया रे ऽऽऽ, पिंजड़े ऽऽऽ वाली मुनिया

मुझे सुनील दीपक जी से ईर्ष्या होती है, उनका काम उन्हें दुनिया के कोने कोने में ले जाता है। एक हम हैं, बस अपने देश तक ही रह गये - कूप मंडूक। मुन्ने की मां ने कुछ साल तक अमेरिका और कैनाडा में पढ़ाया। वह छुट्टियों मैं भारत आ जाती थी पर एक बार नहीं आयी और मैं ही उसके पास चला गया। बस तब ही इन देशों को देख सका।

मेरा काम दीपक जी जैसा अच्छा तो नहीं पर इतना बुरा भी नहीं। यह कम से कम अपने देश में विभिन्न शहरों में ले जाता है। पिछले महीने मुझे एक दिन अर्ध कुम्भ मेले में संगम तट पर रहने का मौका मिला। कुम्भ मेले के बारे में कई कथायें हैं पर सच में यह खगोलशास्त्र के कारण १२ साल में एक बार आता है। अब आप कहेंगे - खगोलशास्त्र! जी हां, खगोलशास्त्र, आपने सही सुना।

बृहस्पति ग्रह, गुरु के नाम से भी जाना जाता है। इसका धार्मिक महत्व है। यह १२ साल में एक बार सूरज का चक्कर लगा लेता है। इसलिये कुम्भ मेला १२ साल में एक बार होता है। १२ साल बहुत लम्बा समय होता है इसीलिये कालांतर, ६ साल बाद अर्ध कुम्भ होने लगा और फिर हर साल माघ मेला।

कुम्भ मेले के समय यहां पर नज़ारा ही अलग होता है। कभी मौका मिले तो जरूर देखियेगा। मार्क टुल्ली जो बीबीसी के सम्वाददाता रहें हैं उन्होने एक पुस्तक
NO FULL STOPS IN INDIA नाम की लिखी है। इसमें एक लेख १९८९ के कुम्भ मेले के ऊपर है। यह पढ़ने योग्य है। इसमें कुम्भ मेले के बारे में काफी सामग्री है। १९८९ के कुम्भ मेले के बारे में, वे कहते हैं कि,
'No other country in the world could provide a spectacle like Kumbh Mela. It was a triumph for the much maligned Indian administrators, but it was a greater triumph for the people of India.'
अंग्रेजी मिडिया की १९८९ के कुम्भ मेले के बारे में रिपोर्ट अच्छी नहीं थी। मार्क उसकी आलोचना करते हैं, लिखते हैं कि,
'And how did English language press react to this triumph? Inevitably, with scorn. .... made no attempt to analyse or even to describe the piety of the millions who bathed at the Sangam'
मुझे लगता है अंग्रेज हमें ज्यादा अच्छी तरह से समझते थे और शायद अब भी। कोई कारण नहीं वे हम पर २०० साल से ज्यादा राज्य कर गये।

सर्दी के मौसम में, संगम पर, हर साल बाहर से चिड़ियाँं आती हैं - कुछ ऐसा नजारा रहता है ...

इस बार अर्ध कुम्भ मेले में बाबा रामदेव भी आये थे। इसकी काफी चर्चा थी पर मुझे तो वहां तो मुझे बाबा रामदेव नहीं मिले। मेरी मुलाकात तो हुई बाबा ....

लोग कहते हैं कि इस मौके पर वहां लाखों की तादात पर लोग आये पर उस सब भीड़ में तो मुझे यह मिले, एकदम अकेले ...

यह मत पूछियेगा कि मैंने उसे उठा कर चूमा कि नहीं। यह जवाब तो मुन्ने की मां ने टौमी, अरे वही हमारा प्यारा डौगी की चिट्ठी पर दिया है।

यहां किताबों की दुकान भी थी। मैंने कुछ समय उस दुकान पर भी बिताया। उसने बताया कि वह रोज लगभग १५०-२०० रुपये की पुस्तक/ पोस्टर बेच लेता है और पोस्टरों की
बिक्री, पुस्तकों से ज्यादा है। उसे दुकान लगाने के लिये उसे प्रशासन से लाईसेन्स लेना पड़ा था और लाईसेन्स फीस भी देनी पड़ी थी।

जमुना के एक तरफ यदि किलाघाट है तो दूसरी तरफ अरैल। कुम्भ मेले पर वहां पर लोग अक्सर नाव से एक तरफ से लोग दूसरी तरफ जाते हैं। किलाघाट में हनुमान जी का मन्दिर है, जहां पर हनुमान जी की एक लेटी हुई मूर्ती है। मैं नाव के द्वारा अरैल से किलाघाट पर आ रहा था। उस नाव में बहुत सारी ग्रामीण महिलायें वा लड़कियां थी। वे लेटे हुऐ हनुमान जी के दर्शन करने जा रहीं थी। उन महिलाओं ने मुझे नारंगी और लाल सिंदूर का अन्तर बताया। नारंगी सिंदूर का धार्मिक महत्व होता है। यह हमेशा देवी देवताओं को - खासतौर से हनुमान जी के ही - लगाया जाता है। मेरे पास उस समय कैमरा नहीं था इसलिये फोटो नहीं ले सका।

मुझे इन महिलाओं से बात कर अच्छा लगा। यह मुझसे ज्यादा प्रसन्न और जीवन से संतुष्ट लगीं। मैं भगवान पर विश्वास नहीं करता; न ही मन्दिर या मस्जिद या गिरिजाघर जाता हूं; न ही धर्म में दिलचस्पी रहती है। इन लोगों से बात कर लगा कि शायद मेरा दर्शन गलत है, मेरी जीवन शैली गलत है, मैं ही गलत रास्ते पर हूं।

यह महिलायें हनुमान जी की स्तुति करते हुऐ एक भजन गा रही थी। यह कर्ण प्रिय था। यह सुना-सुना सा लगा पर समझ नहीं पाया। लगता था कि किसी प्रिय गाने की धुन पर है पर यह समझ में नहीं आ रहा था कि किस गाने की धुन पर है। बात चीत के साथ, भजन का भी आनन्द चलता रहा और किला घाट आ गया। हम सब उतर गये पर दिमाग से भजन नहीं उतरा।

थोड़ी देर पैदल चलने बाद याद आया कि यह भजन तीसरी कसम के एक गाने की धुन पर था। नहीं, नहीं - गलत कह गया। तीसरी कसम का गाना लोकगीत के धुन पर था। तीसरी कसम का संगीत लोकगीत पर आधारित है इसलिये संगीत लोकप्रिय हुआ। वह लोकगीत तो नहीं मालुम पर गाना सुनते आप धुन समझ सकते हैं। वह गाना है,
'चलत मुसाफिर मोह लिया रे ऽऽऽ, पिंजड़े ऽऽऽ वाली मुनिया'

मेले में घूमते, घूमते, मेरे मन में यही विचार आता रहा,

चलत मुसाफिर मोह लिया रे ऽऽऽ,
धरम वाल भजनवा
उड़ उड़ बैठ भजनवा मनवा
जीवन में सब रस घोल दिया रेऽऽऽ,
धरम वाल भजनवा


२६ फरवरी २००७ को, इसी चिट्ठी के साथ मैंने पूरे किये हिन्दी चिट्ठे जगत के रंग, रस, और प्रेम में एक साल। मेरी उपलब्धि, इस उन्मुक्त चिट्ठे पर१३७, छुटपुट पर ५२, लेख पर १० चिट्ठियां, (कुल १९९ चिट्ठियां) बकबक पर १५ पॉडकास्ट, और ... टिप्पिणियां (बताने शर्म आती है)। मैं हिन्दी विकीपीडिया का सदस्य हूं और वहां पर यथा संभव सहयोग करता हूं जो यहां है। अब मैं उभरता हुआ चिट्ठेकार नहीं रहाः अब हो गया हूं - वरिष्ट चिट्ठेकार :-)

'चलत मुसाफिर मोह लिया रे ऽऽऽ, पिंजड़े ऽऽऽ वाली मुनिया' गीत का यहां आनन्द लीजिये

Sunday, February 25, 2007

School Reunuion

मुझे कुछ साल पहले, अभिवावक होने के नाते, आईआईटी कानपुर के दीक्षांत समारोह पर रहने का मौका मिला। मुख्य अतिथि का भाषण बहुत अच्छा था। उन्होने ने पुरुस्कार पाने वालों को बधाई दी और न पाने वालों को सांत्वना दी। मुझे उनका एक वाक्य बहुत अच्छा लगा,
'It is not important as to what you were in the school but important is, what you are at the school reunion.'
आईआईटी हर बैच के विद्यार्थियों को २५ साल बाद पुरातन छात्र सघं सम्मेलन में बुलाती हैं और जो व्यक्ति जीवन में सबसे अच्छा करता है उसे पुरुस्कार देती हैं। दीक्षांत समारोह पर आईआईटी एक बुकलेट भी प्रकाशित करती है। इसमें हर २५ साल पुराने बैच में के तीन विद्यार्थियों के नाम होते हैं
  • जिसने प्रवेश परीक्षा में सबसे अच्छे नम्बर पाये हों,
  • उसी बैच में पास होते समय, जिस विद्यार्थी को राष्ट्रपति का मेडल मिला हो, और फिर
  • उसी बैच के उस विद्यार्थी का नाम जिसे २५ साल बाद पुरातन छात्र संघ सम्मेलन में पुरुस्कार मिला हो।
मैंने इस बुकलेट को देखा इसमें कभी भी तीनो नाम एक से नहीं थे, हमेशा अलग थे। स्कूल की दौड़ पर आगे रहना महत्वपूर्ण नहीं जितना की जीवन की दौड़ में। अधिकतर यह रोल उलट जाते हैं। अक्सर लोग जीवन में लक्षय को छोड़, बेकार की बातों में पड़ जाते हैं। यह बात अकसर आंदोलनो के साथ भी हो जाती है और वे भटक जाते हैं।

मेरा नाम कभी भी पहले दो कॉलमों में नहीं था। मुझे विद्यालय से पास हुऐ २५ से कहीं अधिक साल हो चुके हैं पर मेरे विद्यालय में २५ साल के बाद पुरुस्कार देने का कोई कार्यक्रम नहीं होता है। यदि होता तो भी कोई अन्तर नहीं था मैं जानता हूं हमारे बीच वह किसके नाम है। मेरे मुन्ने का नाम पहले दो कॉलम में नहीं है पर अभी उसके २५ साल पूरे नहीं हुऐ हैं।
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Sunday, February 18, 2007

एक अनमोल तोहफ़ा

मेरे लिये फरवरी का महीना महत्वपूर्ण है। मैंने पिछले साल इसी महीने में हिन्दी चिट्ठे जगत में कदम रखा था हांलाकि अभी एक साल पूरा नहीं हुआ है यह २७फरवरी को होगा उस दिन मैंने अपनी पहली चिट्ठी 'अभिनेता तथा गायक' नाम से पोस्ट की।

मैं सोच रहा कि एक साल पूरे होते ही कोई मुझे भी एक अनमोल उपहार देगा जैसा कि मान्या जी ने जीतेन्द्र जी को दिया। पर यह क्या, यहां उपहार की बात तो दूर रही, रचना जी ने तो मास्टरनी की तरह छड़ी हिलाते हुऐ एक काम बता दिया,
'इन पांच सवालों के जवाब बताओ और तुरन्त एक चिट्ठी पोस्ट करो'
सवाल भी इतने कठिन। बताईये यह भी कोई बात हुई। क्या करें अपना अपना नसीब :-(

कुछ ग्रुपिस्म के बारे में
जॉर्ज ऑरवेल अंग्रेजी प्रसिद्ध लेखक हैं पर पैदा, भारत में ही हुऐ थे। उनकी दो प्रसिद्ध पुस्तकें हैं,
  • Nineteen Eighty Four
  • Animal Farm
यह दोनो पुस्तके साम्यवाद पर व्यंग हैं और पढ़ने योग्य हैं। यदि आपने नहीं पढ़ा तो अवश्य पढ़िये।

Animal Farm में कुछ जानवर, जो मानवों के खेत में काम करते थे, विद्रोह कर देते हैं और खेतों पर कब्जा कर लेते हैं। सुअरों को खेतों का प्रबन्ध सौंपा जाता है। वे दस नियम बनाते हैं जिसके अनुसार काम होना है। धीरे धीरे यह नियम टूटते हैं, आगे क्या होता है, यही है इस पुस्तक में। इस पुस्तक में दसवां नियम था
'All animals are equal'
यानि कि सारे जानवार बाराबर हैं। किताब का अन्त ऐसा होता है कि एक दिन बाकी जानवर देखते हैं कि सुअर भी मानव की तरह कपड़े पहन कर उसी तरह से उत्सव कर रहें हैं पर बाकी जानवरों को कोई भी नहीं पूछ रहा है। जब यह जानवर अपनी आपत्ति जताते हैं तो उनको नियम फिर से दिखाये जाते हैं। इसमें पुराने शब्दों के साथ यह भी लिखा हुआ था,
'some are more equal than others'
यानि कि सब जानवर बराबर हैं पर कुछ औरों से ज्यादा बराबर हैं। यही बात चिट्ठे जगत में भी लागू होती है।

सब चिट्ठेकार बराबर हैं सब चिट्ठियां बराबर हैं पर कुछ औरों से ज्यादा बराबर हैं। यह ज्यादा बराबर होने वाली बात हम सब के लिये अलग, अलग है।

हम सब एक तरह के कंप्यूटर हैं हमारी प्रोग्रामिंग हमारे माता पिता, हमारे दोस्त, हमारा समाज जहां हम बड़े हुऐ, करता है। हम जैसे होते हैं बस दूसरों में वैसा ही अपनापन ढूढ़ते हैं। किसी को कविता अच्छी लगती है, तो किसी को राजनीति, तो कसी को समाजिक बातें पसन्द हैं तो किसी को तकनीक की बातें। बस इसी के मुताबिक हम चिट्ठों को भी पढ़ते हैं टिप्पणियां भी देते हैं। यह स्वाभाविक है। यह हमारी आम जिन्दगी में भी होता है। इसका यह अर्थ नहीं कि जो चिट्ठे हम नहीं पढ़ते या टिप्पणी नहीं देते वे सार्थक या जरूरी नही हैं। वे भी हैं। चिट्ठों की विविधिता एवं भिन्नता ही हिन्दी चिट्ठेजगत को पूर्ण करती है अन्यथा यह अधूरा ही रहता। इसीलिये मैं किसी भी चिट्ठे का बहिष्कार ठीक नहीं मानता हूं।

हिन्दी चिट्ठेजगत में यदि कुछ ग्रुपिस्म है तो वह यही है। अब चलते हैं सवालों की तरफ, पर जवाब देते समय इनका क्रम बदल जायगा।

सवाल - जवाब
पहला और तीसरा प्रश्नः आपके लिये चिट्ठाकारी के क्या मायने हैं? क्या आप यह मानते हैं कि चिट्ठाकारी करने से व्यक्तित्व में किसी तरह का कोई बदलाव आता है?
उत्तरः मैं स्वभाव से शर्मीला हूं, लोंगो से कम मिलता हूं। बहुत सी ऐसी बातों में रुचि रखता हूं जिसमें कम लोग रुचि रखते हैं या कम मित्र मिलते हैं। जिस बात पर सधारणतया लोग रुचि रखते हैं उस पर मेरी रुचि कम रहती है। इसलिये अक्सर मनोरंजन या फिर बाहर घूमना या काम अकेले या फिर केवल परिवार के साथ करता हूं। यदि आपने Issac Asimov की The Nacked Sun पढ़ी हो तो मुझे समझ सकते हैं।

वास्तविक जीवन में लोगों से मिलने में शायद कुछ घबराहट होती है। अन्तरजाल पर हिन्दी में चिट्ठे लिखने के कारण, लोगों करीब पहुंचा। यह अच्छा लगता है। यदि हिन्दी चिट्ठकारी न करता तो यह संभव नहीं था।

हिन्दी चिट्ठकारी के कारण मेरे व्यक्तितव में निखार आया। मैं चिट्ठे जगत में बेहिचक, बेशर्म, बेफिक्र, लोगों से चिट्ठियां या टिप्पणियां पोस्ट कर बात कर लेता हूं। कईयों से मेरी अक्सर ईमेल पर बात होती है। मालुम नहीं क्यों,
यह सब मैं अपने वास्तविक जीवन में नहीं कर पाता हूं, कहीं हिचक जाता हूं। मैं सोचता हूं कि शायद यह मैं अपने वास्तव के जीवन में भी कर पाऊं।

हिन्दी चिट्ठाजगत हम सब कितना पास ला रहा है इस संदर्भ में, मैं पिछली जून का किस्सा बताना चाहूंगा। पिछली जून हम लोग छुट्टी पर बाहर जा रहे थे इसलिये चिट्ठेकारी बन्द होनी थी। मुन्ने की मां ने इसे सीधी तरह से न बता कर यह कह कर बतायी कि वह मुझे चिट्ठकारी करने से रोक रही है। यह सब उसने अपने चिट्ठे मुन्ने के बापू पर तीन चिट्ठियां अभियान ट्यूरिंग, अभियान ट्यूरिंग – प्रगति, अभियान ट्यूरिंग – सफल नाम से पोस्ट कर बतायीं। इस पर कुछ लोगो ने समझा कि शायद मैं हिन्दी चिट्ठा जगत से विदा ले रहा हूं। कुछ लोगों (राजीव जी और नितिन जी, रमन जी, और संजय जी) ने इन चिट्ठियों पर टिप्पणी देकर मुन्ने की मां को यह न करने को कहा। राजीव जी और नितिन जी ने मुझे व्यक्तिगत तौर पर ईमेल करके यह सलाह दी कि मैं कैसे इस स्थिति से निपटूं और आगे मैं कितनी चिट्ठियां पोस्ट किया करूं, कितना समय हिन्दी चिट्टेकारी में लगाऊं। हालांकि मैंने उस समय मैंने इन्हें कुछ नहीं बताया कि यह सब एक प्लान है। इनकी ईमेल तब तक आती रही जब तक मैंने पुनः चिट्ठियां पोस्ट नहीं शुरु कर दिया। मैं इनको जानता नहीं, कभी मिला नहीं, पर कैसे हिन्दी चिट्ठे जगत ने, केवल चिट्ठियों के कारण हमें एक दूसरे के करीब पहुंचा दिया। यह भी आश्चर्य और प्रसन्नता की बात है। यह घटना मुझे कभी नहीं भूलती।

दूसरा प्रश्नः यदि आप किसी साथी चिट्ठाकार से प्रत्यक्ष में मिलना चाहते हैं तो वो कौन है?
उत्तरः शायद
किसी से नहीं, शायद कुछ खास लोगों से, शायद सबसे। लगता है कि अभी किसी से मिलना न हो पायेगा। कुछ समय लगेगा।

चौथा प्रश्नः आपकी अपने चिट्ठे की सबसे पसँदीदा पोस्ट और किसी साथी की लिखी हुई पसँदीदा पोस्ट कौन सी है?
उत्तरः मुझे कवितायें पसन्द नहीं, कम समझ में आती हैं। मैंने एक ही पोस्ट कविता में की है। यह अनुगूंज के लिये 'मेरे जीवन में धर्म का महत्व' नाम से थी। यह मेरी सबसे प्रिय है। यही मेरे जीवन का दर्शन है।

किसी साथी की सबसे प्रिय पोस्ट बताना तो बहुत मुश्किल काम है। एक साल में अनगिनत पोस्टें पढ़ीं, कई अच्छी लगीं पर इस वक्त उसे ढूढ कर बता पाना मुश्किल है। यदि पिछले हफ्ते की पूछतीं तो शायद बता पाता।

इसके अतिरिक्त मुन्ने की मां बगल के कंप्यूटर पर बैठी है। वह अभिनय कर रही है कि कंप्यूटर पर काम कर रही है पर वास्तव में कनखियों से देख रही है कि मैं किसका नाम लिख रहां हूं। अब तो खैर नहीं है उसके नाम के अलावा किसी और का नाम देना तो खतरे से खाली नही है। वह मेरे पर अपना एकक्षत्र राज्य समझती है।

मुझे मुन्ने की मां की 'भारतीय भाषाओं के चिट्ठे जगत की सैर' नामक पोस्ट सबसे अच्छी लगती है। इस को पसन्द करने का कुछ और भी कारण हैं। यदि मुन्ने की मां, मेरी सबसे बड़ी प्रशंसक है तो सबसे बड़ी आलोचक भी। इस पोस्ट में वह यह बताती है कि मैं उसकी नजर में कैसा हूं। हांलाकि मैं अपने आपको वैसा नहीं समझता जैसा कि वह लिख रही है पर फिर भी अपने बारे में सुनना अच्छा लगता है।

पांचवां प्रश्न: आपकी पसँद की कोई दो पुस्तकें जो आप बार बार पढते हैं।
उत्तरः यह सवाल वास्तव में मुश्किल है। पुस्तकें मेरी सबसे प्रिय मित्र हैं। मैं सबसे ज्यादा समय पुस्तकों या फिर पुस्तकों की दूकान पर गुजारता हूं। मेरा सबसे पसंदीदा शौक नये नये शहरों में पुस्तकों की दुकान पर समय बिताना है। मैंने इस बारे में दो पोस्टें 'मार्टिन गार्डनर की पुस्तकें', और 'आप किस बात पर, सबसे ज्यादा झुंझलाते हैं' लिखी हैं। अब केवल दो पुस्तक का चयन करना तो टेढ़ी खीर है। फिर भी, कोशिश करता हूं।
  1. BRIGHTER THAN A THOUSAND SUNS – A personal History of the Atomic Scientists by Robert jungk (Penguin): इस पुस्तक में परमाणु विज्ञान का २०वीं शताब्दी से शुरु होकर इसी शताब्दी के मध्य समय तक का इतिहास है। यह अलग अलग वैज्ञानिकों के बारे में और उनके जीवन के बारे में है। आज से ४० साल पहले मैंने जब इसे पढ़ा तो मैं भी वैज्ञानिक बनने का सपना संजोने लगा। पर सपने तो सपने होते हैं। यह सपना ही रह गया, पूरा नहीं हुआ। मैं तो फाईलें पलटने वाला ही रह गया। यह प्रेणना दायक पुस्तक है।
  2. Jonathan Livingston Seagull by Richard Bach यह पुस्तक एक सीगल चिड़िया की कहानी है जो केवल कीड़े, मकोड़े खा कर नहीं जीना चाहती। वह बाज और चील ऐसे तेज उड़ना चाहती है। यह एक दर्शन है जो बताता है कि जीवन को किस तरह से जियो। मुझे यह दर्शन बेहद पसन्द है। मैं इस पुस्तक को अक्सर लोगों को उपहार देता हूं। यदि यह आपको किसी के घर में दिखायी पड़े और उसे उपहार में मिली हो, तो समझ लीजयेगा कि वह मेरे द्वारा ही दी गयी होगी।
मैं किन पांच को फांस रहा हूं
अब मुझे पांच लोगों को फांसना है। किसको फांसू, किसको फांसू... फांसना तो सबको चाहता हूं पर क्या करूं केवल पाचं को ही फांसना है। चलिये मैं कारण के सहित बताता हूं कि मैं इनको क्यों फांस रहा हूं।
  1. कालीचरण जीः मेरे चिट्ठे पर बहुत कम टिप्पणियां रहती हैं मुझे पहले नही मालुम नही था कि कैसे मालुम करूं कि कोई मेरे चिट्ठे को पढ़ता है भी नहीं। मेरे चिट्ठे पर शुरु में कुछ टिप्पणियां आयी वे मेरी सहायता करना चाते थे। कुछ कमियों को दूर कर रहे थे। पर पता नहीं चलता था कि वे मेरे चिट्ठे को पसन्द करते हैं कि नहीं। मेरी '६. ओपेन सोर्स सौफ्टवेर – कौपीराइट एवं ट्रेड सीक्रेट' की चिट्टी पर एक अज्ञात टिप्पणी आयी। इसको पढ़ कर लगा कि कुछ लोग ऐसे भी हैं जो मेरे चिट्ठे को पसन्द करते हैं। मेरे लेख चिट्ठे पर यह टिप्पणी किसने की है पता लगाने के लिये मैंने 'पल भर के कोई हमें प्यार कर ले' नाम की चिठ्ठी पोस्ट की। पता लगने के बाद मैंने 'लोगों को बोर कर रहे हो' नाम की चिट्टी पोस्ट की। यह टिप्पणी क्या थी, कैसे पता लगा यह तो आपको पोस्ट पर जा कर ही मालुम होगा। पर यह टिप्पणी थी I am STILL god की - यानि काली चरण जी की। मुझे इस टिप्पणी के बाद लगा कि लोग मेरे चिट्ठे को पसन्द करता हूं और मैं लिखना जारी रखूं। इसके बाद मैंने कई सीरियस विषयों पर चिट्ठियां लिखीं फिर एक ही विषय की चिट्ठियों को संकलित कर एक पूरा लेख बनाया। यह सब आप मेरे लेख चिट्ठे पर पढ़ सकते हैं।
  2. राजीव टंडन जीः मैं एक कैमरा खरीदना चाहता था इसलिये एक चिट्ठी 'एक कैमरा हो प्यारा सा' पोस्ट की। इस पर इन्होंने टिप्पणी कर, कैमरा खरीदने में मेरी सहायता की। इसके बाद ईमेल से अक्सर बात होने लगी। एक बार इन्होने तारों के एक प्रोग्राम की चर्चा की। इस पर मैंने एक चिट्टी 'Oh Be A Fine Girl Kiss Me' नाम से लिखी। यह मेरी सबसे ज्यादा देखी जाने वाली चिट्टियों में से एक है। इस पर आज भी हर हफ्ते सर्च इंजिन से सर्च कर तीन चार लोग आते हैं ऐसा और चिट्ठियों के साथ आमतौर से नहीं होता। यदि आप तारों में रुचि रखते हैं तो इसे पढ़ कर देखिये।
  3. नितिन व्यास जीः आपने मुझे एक बार मुझे गणित की एक विसंगति जिसमें चार बराबर पांच सिद्ध किया था, लिख कर भेजी और मुझसे इस पर कुछ लिखने को कहा। इस पर मेंने दो पोस्ट 'चार बराबर पांच, पांच बराबर चार, चार…' और 'आईने, आईने, यह तो बता - दुनिया मे सबसे सुन्दर कौन' लिखीं। यह चिट्ठियां भी मेरी सबसे ज्यादा देखी जाने वाली चिट्टियों में से हैं। इस पर आज भी हर हफ्ते सर्च इंजिन से सर्च कर तीन चार लोग आते हैं ऐसा और चिट्ठियों के साथ आमतौर से नहीं होता। यह चिट्ठियां अपने में बहुत मुश्किल थी, दुविधा वाली थीं। मैं बहुत दिन तक असमंजस में था कि पोस्ट करूं कि नहीं। फिर हिम्मत कर पोस्ट कर दी। क्या दुविधा थी? क्या असमंजस था? यह आप स्वयं पढ़ कर देख लें।
  4. रवी रतलाम जीः आपका न केवल तकनीक का ज्ञान, पर हिन्दी का ज्ञान तारीफे काबिल है। मैं लिनेक्स पर काम तो करता हूं पर तकनीक से जुड़ा नहीं हूं। मेरी चिट्ठियां पढ़ कर लोग अक्सर तकनीक से जुड़े सवाल पूछने लग जाते हैं जो मेरी समझ से बाहर होते हैं। इस समय आप ही मेरी सहायता के लिये आते हैं। मेरी प्रार्थना पर आपने कई बार तकनीक की मुश्किल बातों को आसानी से समझाया है।
  5. शुऐब जीः आप जहां रहते हैं, आपका जो मजहब है उसके बाद भी उसकी कमी बताने में कभी पीछे नहीं रहते। मुझे यह साहसी व्यक्ति लगते हैं।
इनके लिये क्या पांच सवाल हैं
मैं इन लोगों के लिये प्रश्न बदल देता हूं। आशा करूंगा कि यह लोग कारण सहित इसका जवाब बतायेंगे। इनके लिये पांच प्रश्न यह हैं।
  1. आपकी सबसे प्रिय पुस्तक और पिक्चर कौन सी है?
  2. आपकी अपनी सबसे प्रिय चिट्ठी कौन सी है?
  3. आप किस तरह के चिट्ठे पढ़ना पसन्द करते हैं?
  4. क्या हिन्दी चिट्ठेकारी ने आपके व्यक्तिव में कुछ परिवर्तन या निखार किया?
  5. यदि भगवान आपको भारतवर्ष की एक बात बदल देने का वरदान दें, तो आप क्या बदलना चाहेंगे?
क्या शीर्षक ठीक है
अब आप तो यह सोच रहें होंगे कि,
'जीतेन्द्र जी ने तो ठीक ही अपनी चिट्ठी का नाम एक अनमोल उपहार रखा पर रचना जी ने उन्मुक्त जी को क्या उपहार दे दिया जो कि चिट्ठी का नाम एक अनमोल तोहफ़ा रख दिया। इन्होने तो केवल हुक्म सुना दिया था।
तुरन्त बदलिये अपने चिट्ठे का शीर्षक। इसका शीर्षक कर दीजये "एक विद्यार्थी का टीचर जी को जवाब" या कुछ और जो भी आपके कम भेजे में घुस सके'
शायद आपकी यह सोच वाजिब हो, पर है एकदम गलत।

इस चिट्ठी को लिखने के लिये, मुझे कुछ अपनी तथा कुछ मुन्ने की मां की पुरानी पोस्टों को फिर से देखना पड़ा। इसने, उन बातों की याद दिलायी जो मुझे प्रिय हैं, चिट्ठे जगत में दोस्तों की याद दिलायी जिनके कारण मैंने कुछ अच्छी चिट्ठियां लिखी। कुछ उन बातों की याद दिलायी कि हम बिना मिले कितना एक दूसरे के पास पहुंच गये हैं। कुछ मुन्ने की मां से चुहुलबाजी की याद दिलायी जो मैंने इन चिट्ठियों को लिखते समय की। यह चिट्टी पोस्ट करने से मुझे जितना मज़ा आया उतना किसी और चिट्ठी पोस्ट करने में नहीं आया। यह अनमोल न हुआ तो और क्या हुआ।

रचना जी, इस तोहफ़े के लिये धन्यवाद। मैं जरूर हिम्मत जुटाऊंगा कि आपसे कभी मिल सकूं। क्या मालुम नासिक में कभी कोई अजनबी दम्पति आपके यहां पहुंच कर हलुवा खाने के लिये कहने लगे।
यदि ऐसा होता है तो घर से बाहर मत निकाल दीजयेगा, समझ जाईयेगा कि वे कौन हैंं। हलुवा तो आप किसी समय, यहां तक आधी रात को भी बनाती हैं।

अन्य लोगों के द्वारा दिये गये विषय पर लिखी गयीं चिट्ठियां, मेरी सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली चिट्ठियां हैं। यह चिट्ठी भी दूसरे के द्वारा दिये गये विषय पर है। क्या मालुम यह भी सबसे ज्यादा देखी जानी वाली चिट्ठी बन जाये। अन्त में, एक सवाल रचना जी के लिये।
'क्या आपको अपने सब सवालों के जवाब मिल गये - हां या नहीं?'

सांकेतिक शब्द
book, book, books, Books, books, book review, book review, book review, Hindi, kitaab, pustak, Review, Reviews, किताबखाना, किताबखाना, किताबनामा, किताबमाला, किताब कोना, किताबी कोना, किताबी दुनिया, किताबें, किताबें, पुस्तक, पुस्तक चर्चा, पुस्तकमाला, पुस्तक समीक्षा, समीक्षा,

Thursday, February 15, 2007

जाने क्यों लोग मोहब्बत किया करते हैं

कुछ दिन पहले मैंने अपने छुट-पुट चिट्ठे पर एक चिट्ठी लिनेक्स बनाम वीस्टा एवं मैकिन्टॉश नाम से पोस्ट की। इसमें बीबीसी के एक लेख की चर्चा है। इसमें इन तीनो ऑपरेटिंग सिस्टम की तुलना है। इस पर एक टिप्पणी,
'पता नहीं क्यों हर आदमी माइक्रोसौफ्ट को कोसने में लगा रहता है। सच कहूँ, मुझे तो Windows [से प्यार] ... है। ...
मैक पर [हिन्दी में काम करने के लिये] ... एक गन्दे से की-बोर्ड ले-आउट के अलावा कुछ भी नहीं है। ...
जो लोग लिनक्स का गुण-गान करते हैं… उनका तो अल्लाह ही मालिक है.... कंसोल में काम करना है तो ठीक है,
KDE/ Gnome तो अभी भी कचरा हालत में हैं।'
अच्छा सवाल है।

मेरा एक मित्र विंडोस़ प्रेमी है। मुझसे अक्सर कहता है कि मैं लिनेक्स छोड़ कर विंडोस़ अपना लूं। कल ही मेरे इसी मित्र ने एक ईमेल भेजी जो शायद अन्तरजाल में घूम रही है। यह हिन्दी में इस प्रकार है,
  • 'बिल गेटस् प्रति सेकेण्ड २५० यू०एस० डालर अर्जित करते हैं जो कि लगभग 2 करोड़ यू०एस० डालर प्रतिदिन और ७३ अरब यू०एस०डालर प्रति वर्ष होता है।
  • यदि उनसे १००० डालर गिर जाता हैं तो उसे उठाने के लिये वे कष्ट नहीं उठायेंगे क्योंकि सेकेण्ड में वे उसे उठायेंगे और इतने समय में १००० डालर अर्जित कर लेंगे।
  • अमेरिका का राष्ट्रीय कर्ज ५.६२ खरब है, यदि बिल गेटस् को यह ऋण स्वयं चुकता करना हो तो वह इसे १० वर्ष से कम समय में कर देगे।
  • वह पृथ्वी पर प्रति व्यक्ति १५ यू०एस० डालर दान करते हैं तब भी उनके पास जेब खर्च के लिए ५० लाख डालर शेष रह जायेगा।
  • माइकल जार्डन अमेरिका में सबसे अधिक धन अर्जित करने वाले खिलाड़ी हैं। उनकी सम्पूर्ण वार्षिक आय ३०० लाख डालर है। यदि वे खान-पान पर खर्च न करें तो उन्हें बिल गेटस् के बराबर धनी होने में २७७ वर्ष तक इन्तजार करना पड़ेगा।
  • यदि बिल गेटस् एक देश होते तो वे पृथ्वी पर सबसे धनी देश होते।
  • यदि आप बिल गेटस् के सभी धन को एक डालर के नोट में बदलें तो आप धरती से चन्द्रमा तक की दूरी से १४ गुनी लम्बी आने जाने वाली सड़क तैयार कर सकते हैं। किन्तु आपको इस सड़क को बिना रूके १४०० वर्षों में बनाना होगा और ७१३ बोइंग ७४७ जहाज सभी धन के आवागमन के लिये प्रयोग करना होगा।
  • यदि हम कल्पना करें कि बिल गेटस् अगले ३५ वर्षों तक जीवित रहते हैं और यदि वे ६.७८ लाख डालर प्रतिदिन खर्च करें केवल तभी स्वर्ग जाने के पहले वे अपनी सारी सम्पत्ति समाप्त कर पायेंगे।'
मुझे यह तो मालुम था कि विंडोस़ दुनिया का सबसे लोकप्रिय ऑपरेटिंग सिस्टम है तथा बिल गेटस् दुनिया के सबसे सफल एवं अमीर व्यक्ति हैं पर यह नहीं मालुम था कि वे इतने अमीर व्यक्ति हैं। मुझे लगता है कि लोग तो जलते हैं बस इसलिये कोसते हैं।

इस ईमेल के समाप्ति पर कुछ और भी स्माईली के साथ लिखा था।
'अंत में भी बताना उचित होगा कि यदि माइक्रोसाफ्ट विन्डोस के प्रयोगकर्ता को कम्प्यूटर के हर बार अवरोध (हैन्ग) होने पर उसे एक डालर का हर्जान दिया जाय तो बिल गेटस् ३ साल में ही दिवालिया हो जायेंगे।'

लोग लिनेक्स क्यों पसन्द करते हैं इस बारे में सुश्री एन्ड्रिया कॉर्डिंगली के विचार मैंने यहां लिखे हैं। मैं तो लिनेक्स पर इसलिये काम करता हूं क्योंकि मुझे इसका दर्शन अच्छा लगता है, यह कुछ भाईचारे की बात लगती है, और इस पर बौद्धिक सम्पदा की झंझट नहीं है। पर,
जाने क्यों लोग मोहब्बत किया करते हैं?
शायद अल्लाह के पास पहुंचने के लिये, या फिर
... होने के लिये करते हैं।

Tuesday, February 13, 2007

नीम पर कड़ुवाहट: पेटेंट पौधों की किस्में एवं जैविक भिन्नता

पहला भाग: पेटेंट
दूसरा भाग: पेटेंट और कंप्यूटर प्रोग्राम
तीसरा भाग: पेटेंट पौधों की किस्में एवं जैविक भिन्नता
पहली पोस्ट: प्रस्तावना
दूसरी पोस्ट: बासमती चावल का झगड़ा
तीसरी पोस्ट: गेहूं और हल्दी का लफड़ा
यह पोस्ट: नीम पर कड़ुवाहट

नीम (Azadirachta Indica) सर्व रोग निर्वारणी है। बहुत सारी कम्‍पनियों को नीम के गुण का प्रयोग करने वाले उत्पादों पर पेटेंट दिया गया है। इनमें से कई भारतीय कम्पनियां भी हैं। इनमें से केवल एक पेटेंट को रद्द किया गया है। यह पेटेट डब्‍लू.आर. ग्रेस तथा यू.एस. कृषि विभाग को नीम तेल के जीवन (Self life) बढाने के लिए मंजूर किया गया था।

नीम के तेल की शेल्फ लाइफ (Shelf life) को बढ़ाने के लिये इसे एप्रॉटिक सालवेन्ट (aprotic solvent) में कुचला जाता है। मोटे तौर एप्रॉटिक सालवेन्ट, अपने में घुले पदार्थो के साथ हाइड्रोजन आयन (प्रोटान) का आदान-प्रदान नहीं करते हैं। वे हाइड्रोजन बौन्ड (bond) बनाने में भाग नहीं लेते हैं, उदाहरणार्थ ईथर, कीटोन्स, बेन्जीन। प्रॉटिक सालवेन्टस ( Protic Solvents) में हाइड्रोजन दूसरे परमाणु के ऋणात्मक परमाणु के साथ जुड़े होते हैं और हाईड्रोजन बौन्डिंग में भाग लेते है, उदाहरणार्थ, पानी और अल्कोहल।

पर्यावरण ग्रुप के एक संघ ने नीम की शेल्फ लाइफ बढ़ाने वाले पेटेंट को चुनौती दी। यूरोपियन पेटेंट आफिस ने इसी आधार पर 10-5-1999 को यह कहते हुये रदद कर दिया कि यह आविष्कार नवीन नहीं था और वह भारतवर्ष में सार्वजनिक रूप में प्रयोग किया जाता था।

निष्कर्ष
अभी तक कुछ ही पेटेंट रद्द किये गये हैं। इस तरह के अनेकों पेटेट हैं जो कि गलत रूप से दे दिये गये हैं, यह इन पेटेंटों में ईसपगोल, सौंफ, धनिया, जीरा, सूरजमुखी, मूंगफली, अरंडी, रेड़ी, करेला, जामुन, बैंगन पर के गुणों को प्रयोग कर प्राप्त किये गए हैं। यह सारे हमारे आयुर्वेद का हिस्सा रहे और पूर्व कला के रूप में जाने जाते थे। इन्हें भी रद्द करवाना चाहिए। पेटेंट रद्द करवा पाना बहुत महंगा तरीका है। हमें अपनी परम्परागत सूचना इंटरनेट पर डालनी चाहिये ताकि यह पूर्व कला के तौर पर जानी जाय और कोई अन्य इस पर पेटेंट न प्राप्त कर सके।

Saturday, February 03, 2007

डकैती, चोरी या जोश या केवल नादानी

मैं मैथली गुप्त जी को नहीं जानता, न ही उनसे कोई परिचय है, न ही यह पोस्ट उनके कहने पर लिख रहा हूं। यहां मैं कुछ अपने विचार रख रहा हूं।

अक्षरग्राम पर संजय जी की एक चिट्ठी से, मुझे कैफे हिन्दी के बारे में पता चला। मैं जब कौतूहल वश वहां गया तो देखा कि मेरे भी कुछ लेख वहां हैं। मुझे तो अच्छा लगा, कोई तो है जो मेरे विचारों की कद्र करता है और इतना सम्मान दिया कि अपने चिट्ठे पर मेरे लेख रखे। कुछ समय बाद, मेरे एक लेख पर मैथली जी की टिप्पणी आयी,

'श्री उन्मुक्त जी;
हम समाचारों से परे, हिन्दी रचनाओं की एक वेबसाईट (www.cafehindi.com) बना रहें हैं. इस वेबसाईट का उद्देश्य कोई भी लाभ कमाना नहीं है.
यह दिखाने के लिये कि इस वेबसाईट का स्वरूप कैसा होगा, हमने प्रायोगिक रूप से आपके कुछ लेख इस वेबसाईट पर डाले हैं. यह वेबसाईट मार्च के दूसरे सप्ताह में विधिवत शुरू हो जायेगी. आपका ई-मेल पता मेरे पास न होने के कारण में कमेंट के माध्यम से ये संदेश आपको भेज रहा हूं.
क्या हम आपके ब्लोग रचनायें लेख के रूप मे. इस वेबसाईट पर उपयोग कर सकते हैं? आपने लिखा है कि आपके हर चिठ्ठे की तरह इस लेख की सारी चिठ्ठियां भी कौपी-लेफ्टेड हैं. लेकिन फ़िर भी हम आपकी विधिवत अनुमति एवं सुझावों के इन्तजार में हैं.
आपका
मैथिली गुप्त'

मेरा जवाब था,
'प्रिय गुप्त जी
मेरी चिट्ठियां कौपीलेफ्टेड हैं आपका स्वागत है। आप इन्हें प्रयोग कर सकते हैं।
उन्मुक्त'।
मैं अक्षरग्राम की चिट्ठी पर टिप्पणी देकर अपने विचार कह चुका हूं पर इसके कुछ और भी पहलू हैं जो मैं आपके सामने रखना चाहता हूं।

कानून की नजर में
हालांकि कॉपीराईट का कानून बौद्धिक अधिकारों में सबसे सरल है फिर भी अधिकतर लोग इसे ठीक से नहीं समझते हैं, यहां तक की कानून के जानकार भी। कुछ लोगों ने मेरी बच्चन जी की पोस्ट पर शंका जतायी थी कि कानून का उल्लघंन हो सकता है। मैंने यहां स्पष्ट किया कि यदि किसी कॉपीराइट कार्य का कुछ अंश लेकर उसकी समीक्षा की जाती हैं या उसके बारे में बताया जाता है तो वह कॉपीराईट का उल्लघंन नहीं है। इसी तर्क पर न तो बच्चन जी की पोस्ट पर कानून का उल्लघंन है न ही नारद या हिन्दी चिट्ठे एवं पॉडकास्ट या Hindiblog.com, या चिट्ठा चर्चा की किसी पोस्ट पर। इस तरह का कार्य बिना लेखक की अनुमति से हो सकता है पर यदि आप पूरी पोस्ट ही छाप देते हैं तो बात दूसरी है। इस दशा में, यदि आप स्रोत भी बतायें तब भी वह कॉपीराईट का उल्लघंन है। मैथली जी के द्वारा किया गया कार्य कानूनी तौर पर अनुचित था। पर क्या इसे इसी नजरिया से देखना चाहिये? मेरे विचार से हमें, न केवल उन्हें, पर उन सब लोग को इस तरह की अनुमति देनी चाहिये, यदि वह स्रोत दे कर वे हमारी चिट्ठियां छापते हैं।

हम क्या चाहते हैं
मेरे विचार ही, मेरा परिचय हैं। मैं अपने विचारों को लोगो के समाने लाना चाहता हूं। इसलिये मैं इसमें नही पड़ता कि इसका श्रेय मुझे मिले या नहीं। इसलिये मेरी चिट्ठियां कॉपीलेफ्टेड हैं।

मैं यह भी चाहता हूं कि मेरे विचार अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचे। यह तभी संभव है जब हिन्दी का अधिक से अधिक अंतरजाल पर पर प्रचलन हो; अधिक से अधिक लोग अंतरजाल पर हिन्दी पढ़े। इसलिये मेरा प्रयत्न रहता है कि मैं उन सब वेबसाईट के लिय कुछ न कुछ कर सकूं जो इस कार्य में सक्रिय हैं। इसलिये कुछ दिन पहले जब मेरे एक लेख छापने पर कुछ ने पारिश्रमिक देने की बात की या तरकश पर रजत पदक मिलने पर कुछ पुरुस्कार देने की बात उठी तो मैंने उसका पैसा नारद को देने की बात की।

मुझे यदि कभी कोई और पुरुस्कार मिला या मैं कभी अपने चिट्ठों से कोई पैसा कमा पांऊगा तो मैं हमेशा चाहूंगा कि वह सब इसी तरह की वेबसाईट को दिया जाय। क्योंकि यदि इस कार्य में पैसा न भी लगे तब भी समय लगता है - नारद के बीमार पड़ते समय, Hindi Podcasts and blogs वेबसाईट को बनाने में जितना समय लगा, वह मैं ही जानता हूं। (ऐसे इस समय यह वेबसाईट बेकार है और इसे मैं मिटाने की बात सोच रहा हूं। मैंने इसे अब मिटा भी दिया है।)

आप अपने हिन्दी के चिट्ठे से क्या चाहते हैं। क्या आप इससे पैसा कमाना चाहते हैं? इस पर पैसा कमाना, इस समय सम्भव नहीं है। अंतरजाल पर न तो हिन्दी का इतना प्रचलन है न ही इतने हिन्दी के चिट्ठें हैं। कुछ दिन पहले नारद जी से सुना था कि ४०० चिट्ठे हो गये हैं पर इसमें कई सुप्त हैं तथा कई लोग एक से ज्यादा चिट्ठा लिखते हैं। मैं स्वयं तीन चिट्ठे लिखता हूंः यह उन्मुक्त चिट्ठा , छुटपुट, और लेख। कुल मिला के लगभग २०० लोग ही, हिन्दी में सक्रिय चिट्ठा लिखने वाले होंगे।

मैं केवल राजीव टंडन जी को जानता हूं जो कि हिन्दी के चिट्ठे पढ़ते तो हैं पर स्वयं चिट्ठा नहीं लिखते हैं। मैं नहीं कह सकता कि इनके अलावा भी कोई ऐसा व्यक्ति है जो हिन्दी में चिट्ठा पढ़ता हो पर लिखता न हो। यह नम्बर थोड़ा बहुत गलत हो सकता है पर ज्यादा नहीं।

हिन्दी चिट्ठे जगत से इतने कम लोग जुड़े है कि हिन्दी चिट्ठों पर विज्ञापन द्वारा पैसा कमा पाना मुश्किल है। यह तभी संभव है जब अंतरजाल पर हिन्दी बढ़े और अधिक लोग हिन्दी में चिट्ठें पढ़ें एवं लिखें। मेरे विचार से इस समय हमारा उद्देश्य होना चाहिये कि किस तरह से अंतरजाल पर हिन्दी बढ़े, हिन्दी के पाठक बढ़ें।

चिट्ठों की लोकप्रियता
मैथली जी चाहें अपने चिट्ठे को बाद में व्यवसायिक बनाये या न बनायें पर यह सत्य कि उन्होंने हिन्दी में एक प्रयत्न तो किया, आगे तो आये। उनके भी अपने मित्र होंगे, परिवार के सदस्य होंगे। मैथली जी उन्हें बतायेंगे, कुछ और लोग उनके कारण इन लेखों को पढ़ेंगे और पाठकों की संख्या बढ़ेगी। हो सकता है कि इसी बहाने कुछ और लोग हिन्दी चिट्ठे जगत से जुड़ें। इसके अतिरिक्त, मैं इतना अवश्य जानता हूं कि मैथली जी के मित्र, उनके परिवार के लोग कम से कम मुझे या उन लोगो को अवश्य जान गये होंगे जिनके चिट्ठे हिन्दी कैफे में हैं। हम सब की लोकप्रियता, कम से कम, कुछ तो बढ़ी।

इस विषय पर एक और पहलू अनूप जी ने चिट्ठाचर्चा यहां इस तरह से रखा,

'लेकिन हो सके तो लिंक दे दो काहे से जिस दिन किसी कारणवश चोरी न कर पाये उस दिन चोरी का माल पढ़ने वाले हमारे यहां आकर ही कुछ पढ़ लेंगे।'
अनूप जी की यह बात सच है। हिन्दी वीकिपीडिया में मेरे लेखों का संदर्भ है। मेरे चिट्ठे पर में बहुत से लोग वहीं से आते हैं। वे एक बार आते हैं तो वे एक चिट्ठी ही नहीं पढ़ते हैं पर बहुत सारी चिट्ठियों को पढ़ते हैं। हिन्दी वीकिपीडिया में लेख डालने के कारण, मेरे चिट्ठे की लोकप्रियता बढ़ी ही है, कम नहीं हुई। मेरे कुछ मित्रों के लेखों का संदर्भ अंग्रेजी वीकिपीडिया पर है वह भी इस बात को कहते हैं। इसके अतिरिक्त जिस चिट्ठे पर जितनी ज्यादा लिंक होती है सर्च इंजिन में (कम से कम गूगल में तो) उसका उतना ही महत्व बढ़ता है।

इसका एक दूसरा पहलू रवी जी ने बहुत अच्छी तरह से अक्षरग्राम की चिट्ठी पर अपनी टिप्पणी में कहा है। यह उन्हीं के शब्दों में,
'अंततः मुझे लगता है कि चिट्ठाकार साथियों को कुछ चीजें साफ हो गईं. चोरी करना और साभार सहित, रचनाकार के नाम सहित, कड़ी सहित रचना छापने में कुछ तो अंतर है.
मैंने पहले भी कहा था और अब भी कहूंगा कि कैफ़े हिन्दी जैसा आयोजन "मानव-द्वारा संपादित नारद का एक बढ़िया और असरकारी पूरक रूप" हो सकता है (विकल्प की बात नहीं की जा रही) जिसमें कुछ चुनिंदा चिट्ठों को पूरा का पूरा पुनः प्रकाशित किया जाए (पूर्वानुमति से ही सही). अभी तो 400 चिट्ठे हैं. जब 4000 या चार लाख होंगे तो आप हिन्दी के एक पाठक से उम्मीद नहीं कर सकते कि वह सबको और सभी को खोज खोज कर पढ़ेगा. ऐसे में चर्चित, चुनिंदा चिट्ठों को कैफ़े हिन्दी द्वारा पढ़ा जा सकेगा. चिट्ठा चर्चा का स्वरूप दूसरा है, वह न तो नारद का न कैफ़े हिन्दी जैसे किसी आयोजन का विकल्प हो सकता है.'
नारद जी कुछ दिन पहले बीमार हो गये थे, अब भी बीच-बीच में उनकी तबियत खराब हो जाती है। उनकी दवा के लिये पैसे की भी जरूरत है। क्या मालुम जब हिन्दी के चिट्ठे लाख में पहुंचेगे तो क्या होगा। इसलिये जितने विकल्प हों उतना ही अच्छा।

समीर जी का पहलू तो अपने में अनोखा है, कुछ व्यंग है, तो कुछ कटाक्ष है, पर है धुर सत्य। उनकी बात पर आप बिना मुस्कराये नहीं रह सकते हैं। मैं क्या कहूं, आप स्वयं ही पढ़ लीजये।

इस विषय पर चिट्ठेकार बन्धुवों के विचार पढ़ते समय कुछ लोग के विचार इस तरह के थे,
'हिन्दी के अन्य चिट्ठाकार जो भी निर्णय लेंगे उस अनुसार मुझे भी चलना होगा।'

किसी भी विषय पर बहस आवश्यक है। यह जरूरी है कि अलग अलग विचार समझे जाय पर यह विषय ऐसा नहीं है जिस पर सामूहिक निर्णय की जरूरत है। आप सबके विचार पढ़ें। मेरे विचार तो इस चिट्ठी में हैं। जीतू जी के यहां, अफ्लातून जी के यहां, जगदीश जी के यहां, श्रीश जी के यहां, नारायन जी के यहां, और अनूप जी के चिट्ठाचर्चा के अतिरिक्त यहां भी हैं। संजय जी के विचार तो उनकी अक्षरग्राम की चिट्ठी पर ही हैं। बहुत से अन्य लोगों के भी विचार वहीं पर टिप्पणियों द्वारा के द्वारा हैं। आप सबको पढ़ें। इसके बाद अपने विवेक, अपने तर्क से निर्णय लीजये कि क्या होना चाहिये। यह न सोचे कि और लोग क्या निर्णय ले रहे हैं। यह मैं नहीं फाइनमेन साहब कहते हैं।

मैथली जी आपको पुनः धन्यवाद, आपने सम्मान दिया और मेरी कई चिट्ठियों को पुनः चिट्ठेजगत के सामने पेश किया।