Saturday, August 29, 2009

यदि विकासवाद जीतता है तो इसाइयत बाहर हो जायगी

विकासवाद पढ़ाने के लिये बीसवीं शताब्दी में जीव विज्ञान के अध्यापक स्कोपस् पर मुकदमा चला। इस चिट्ठी में इसी की चर्चा है।

इस चिट्ठी को आप सुन भी सकते है। सुनने के लिये यहां चटका लगायें। यह ऑडियो फाइल ogg फॉरमैट में है। इस फॉरमैट की फाईलों को आप,
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डार्विन के विकासवाद का सिद्धांत,  मज़हबों में प्राणी उत्पत्ति के खिलाफ था पर इसका विरोध ईसाई देशों में, खासकर अमेरिका में सबसे अधिक हुआ। यह अभी तक चल रहा है। वहां के अधिकतर राज्यों में, डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत को  स्कूल में पढ़ाने के लिए वर्जित कर दिया गया था।

१९२५ में, अमेरिका के टेनेसी राज्य ने, लगभग सर्वसम्मति से (७५ के विरूद्ध ५ वोटों से) कानून पास किया कि स्कूलों में डार्विन का विकासवाद का सिद्धांत  नहीं पढ़ाया जायेगा। डेटन (Dayton),  टेनेसी राज्य का शहर है। यहां के लोगों ने सोचा कि उनके शहर को शोहरत दिलवाने का यह बहुत अच्छा मौका है।  क्यों न यहीं पर इस कानून को चुनौती दी जाए।

जॉन टी. स्कोपस्,  स्कूल में, जीव विज्ञान के अध्यापक थे। वे सरकारी स्कूल की नवीं कक्षा के विद्यार्थियों  को डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत पढ़ाने के लिए तैयार हो गये। डार्विन के विकास वाद के सिद्धांत को पढ़ाने के लिए स्कोपस् के विरूद्व बीसवीं शताब्दी में दाण्डिक मुकदमा चला। यह दुनिया के चर्चित मुकदमों में से एक है। इसे  मन्की ट्रायल (Monkey trial) भी कहा जाता है।
जॉन टी. स्कोपस् का चित्र विकिपीडिया से 

विलियम हेनिंगस ब्रायन (Williams Hennenigs Bryan) डेमोक्रेटिक पार्टी से तीन बार अमेरिका के राष्ट्रपति का चुनाव लड़ने के लिए नामित हो चुके थे। वे बाईबिल पर विश्वास करते थे। उन्हें अभियोजन पक्ष की ओर से वकील नामित किया गया।  उस समय क्लेरेंस डेरो (Clarence Darrow), अमेरिका के प्रसिद्घ वकीलों में से थे। वे नि:शुल्क बचाव पक्ष की तरफ से पैरवी करने आये। 

ब्रायन ने बहस शुरू करते समय कहा,
'The trial uncovers an attack on religion. If evolution wins, Christianity goes.'
यह परीक्षण मज़हब पर हमला है। यदि विकासवाद जीतता है तो इसाइयत बाहर हो जायेगी।'
डैरो ने उत्तर दिया,
'Scopes is not on trial, civilisation is on trial.'
यह मुकदमा स्कोपस्  पर नहीं, लेकिन सभ्यता पर चल रहा है।

लोगों की  सोच के मुताबिक, यह  चर्चित मुकदमा बन गया। अमेरिका और इंगलैंड से प्रेस संवाददाता डेटन पहुँचकर प्रतिदिन इस मुकदमे के बारे  में प्रेस विज्ञप्ति देने लग गये। यह मुकदमा अखबारों में छा गया।

प्रतिदिन इसे इतने लोग देखने आते थे जिससे लगा कि शायद कोर्ट की पहली मंज़िल का फर्श टूट जाये; भीड़ के कारण गर्मी और उमस भी बढ़ गयी। अन्त में मुकदमे की सुनवायी, न्यायालय के लॉन में स्थांतरित की गयी। जज़, जूरी, और वकीलों के लिये उठा हुआ प्लैटफॉर्म बनाया गया। उस पर उनके बैठने के लिये जगह थी। उसके नीचे अखबार, टेलीग्राफ और रेडिओ के लोगों के बैठने की जगह थी। प्रतिदिन लगभग पांच हज़ार लोग उसे देखने और सुनने आते थे। इस तरह के नज़ारे के साथ, मंकी ट्रायल, जो कि न्यूयॉर्क टाइम के अनुसार इतिहास के सबसे प्रसिद्ध  परीक्षण मुकदमा था,  सुना गया। 



यह पहला मुकदमा था जिसमे कि अभियोजन पक्ष के अधिवक्ता ने स्वयं अपने आपको गवाह के रूप में पेश किया।  उसने यह गवाही दी कि बाइबिल में प्राणियों की उत्पत्ति की कथा सही है पर डैरो की प्रतिपृच्छा (cross examination) में उसकी सारी गवाही बेकार साबित हो गयी।  लेकिन, अगले ही दिन , न्यायालय ने ब्रायन की सारी गवाही  रिकार्ड पर लेने से, यह कहते हुऐ कर  मना कर  दिया,
'यह सवाल प्रासंगिक नहीं है कि,डार्विन का सिद्वान्त सही है अथवा नहीं। न्यायालय के अनुसार उनका केवल यह देखना है कि,क्या स्कोपस ने डार्विन का सिद्वान्त  पढ़ाया अथवा नहीं।'
न्यायालय के लॉन में मुकदमा। चित्र में डैरो दाहिने तरफ खड़े और बायीं तरफ बैठे ब्रायन से क्रॉस इक्ज़ामिनेशन करते हुऐ। 
यह चित्र स्मिथसोनियन इंस्टिट्यूशन आर्काइव् के इस पेज से लिया गया है। वहां पर इस मुकदमें से सम्बन्धित कुछ और दुर्लभ चित्र हैं जिन्हें साइंस सर्विस के मैनेजिंग एडिटर वॉटसन डेवीस ने खींचा है।

यह बात  तो स्वीकृत थी कि स्कोपस्  ने डार्विन के विकासवाद के सिद्वान्त को पढ़ाया था।  न्यायालय की इस आज्ञा के कारण स्कोपस् को तो सजा होनी थी।  उसे सजा में, सौ डालर का दण्ड  दे दिया गया। यह दण्ड जूरी ने न तय कर जज ने किया।

स्कोपस्  ने, टेनेसी सुप्रीम कोर्ट में अपील दाखिल की। सुप्रीम कोर्ट में इसकी सुनवायी पांच न्यायधीशों ने की। फैसला आने में साल भर लगा तब तक एक न्यायाधीश की मृत्यु हो गयी। सबने सर्वसम्मति से यह फैसला इसलिये उलट दिया कि दण्ड जूरी को तय करना चाहिये था न कि जज को। आश्चर्य इस बात का है कि केवल एक न्यायाधीश ने कहा कि यह कानून असंवैधानिक है। दो अन्य न्यायाधीशों ने कानून को वैध माना। चौथे न्यायाधीश ने कानून को तो वैध माना पर कहा कि यह न यह विकासवाद के सिद्धांत को पढ़ाने से मना करता है और न ही स्कोपस् पर लागू होता है। स्कोपस् पर यह  मुकदमा फिर से चलना चाहिए था पर न्यायाधीशों ने इसे फिर से चलाने पर मनाही कर दी। यही कारण था कि  यह मुकदमा अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट में नहीं गया। 

इस मुकदमे  में जुड़े कुछ लोगों के बारे में भी कुछ बातें बताना उचित होगा।
  • परीक्षण न्यायलय के सजा करने के एक दिन बाद, ब्रायन की मृत्यु हो गयी। लोगों का कहना था कि डैरो के प्रतिपृच्छा के कारण वह टूट गया था। 
  • अमेरिका में निचले अदालतों का चयन, चुनाव से होता है। निचली अदालत के जज ने अगली फिर जज बनने के लिये चुनाव में खड़े होना चाहा तो इस चुनाव के लिये उसका नाम भी प्रस्तावित न हो पाया।
  • स्कूल का सुप्रीटेंडेन्ट, जिसने स्कोपस् पर मुकदमा चलवाया था, जब फिर से चुनाव लड़ने के लिये खड़ा हुआ तो उसने अपने चिन्ह पर लिखवाया, 'स्कोपस् पर मुकदमा चलवाने वाला' उसका नाम भी पद के लिये प्रस्तावित नहीं हो पाया।
  • डैरो अमेरिका के प्रसिद्ध वकीलों में से था। लेकिन इस मुकदमे ने उसे सबसे प्रसिद्ध वकील बना दिया।

इस श्रंखला की अगली कड़ी में, हम बात करेंगे उस मुकदमें की जिसने अमेरिकी न्यायालय के इस शर्म को दूर किया यानि कि, जिसमें विकासवाद के सिद्वान्त को स्कूल में न पढ़ाये  जाने वाले कानून को अवैध घोषित कर दिया गया।
 

डैरो का जीवन  शिक्षा-प्रद है, प्रेणना देना वाला है। मैंने उनकी आत्मकथा द स्टोरी ऑफ माइ लाइफ (The Story of My Life) और इर्विंग स्टोन (Irving Stone) की क्लेरेंस डैरो फॉर डिफेंस (Clarence Darrow For Defense) पढ़ी है। मुझे क्लेरेंस डैरो फॉर डिफेंस बहुत अच्छी लगी। 

'क्लेरेंस डैरो फॉर डिफेंस' पुस्तक पढ़ने योग्य है। बहुत से लोग वकीलों के बारे में अच्छी राय नहीं रखते। यह पुस्तक उन्हें इस बारे में फिर से सोचने पर मज़बूर करेगी। शायद इससे आप अन्दाजा लगा सकें कि समाज में वकील का कितना अधिक योगदान है।  

डार्विन, विकासवाद, और मज़हबी रोड़े
भूमिका।। डार्विन की समुद्र यात्रा।। डार्विन का विश्वास, बाईबिल से, क्यों डगमगाया।। सेब, गेहूं खाने की सजा।। भगवान, हमारे सपने हैं।। ब्रह्मा के दो भाग: आधे से पुरूष और आधे से स्त्री।। सृष्टि के कर्ता-धर्ता को भी नहीं मालुम इसकी शुरुवात का रहस्य।। मुझे फिर कभी ग़ुलाम देश में न जाना पड़े।। ऐसे व्यक्ति की जगह, बन्दरों से रिश्ता बेहतर है।। विकासवाद उष्मागति के दूसरे नियम का उल्लंघन करता है।। समय की चाल - व्यवस्था से, अव्यवस्था की ओर।। मैंने उसे थूकते हुऐ देखा है।। यदि विकासवाद जीतता है तो इसाइयत बाहर हो जायगी। 


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Scopes was tried for teaching Evolution in his class. This post talks about the same. It is in Hindi (Devanagari script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.



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Wednesday, August 26, 2009

कुमाराकॉम पक्षीशाला में

कुमाराकॉम में, एक पक्षीशाला है। इस चिट्ठी में इसी की चर्चा है। 
 

Saturday, August 22, 2009

बाप रे बाप, हिन्दुवों के इतने भगवान - उलझन नहीं होती?

लीसा से मेरी मुलाकात वियाना में कॉन्वेंट में हुई थी। मैंने वायदा किया था कि उसके और मेरे बीच बीच ई-मेल की चर्चा करूंगा। यह चिट्ठी उसमें से एक है।

हिन्दू धर्म जीने का तरीका है और उन्हीं तरीकों को आसानी से समझने के लिये कथायें और देवी देवाताओं को रचा गया है। यही बात इस चिट्ठी में समझायी गयी है।


Wednesday, August 19, 2009

पति, बिल्लियों की देख-भाल कर रहे हैं

 ताज गार्डन रिट्रीट, कुमाराकॉम में मेरी मुलाकात कई लोगों से हुई। इस चिट्ठी में ऑस्ट्रेलियायी महिलाओं से मुलाकात और महिला सशक्तिकरण के एक दूसरे रुप की चर्चा है।
 

कुमाराकॉम में भी अप्रवाही जल है। शाम के समय हमने वहां पर नाव से सैर की और सूर्यास्त का नज़ारा लिया।

नाव पर मेरी मुलाकात,आस्ट्रेलिया से आयी दो महिलाओं से भी हुई। हम लोग कुमाराकॉम से त्रिवेन्द्रम  जाने वाले थे जब कि वे लोग त्रिवेन्द्रम से आ रही थीं और इसके बाद कोचीन जाने वाली थीं। वहां से वे ऊटी जा रही थीं।

शाम को गर्मी और उमस थी। मैं नेकर पहने था। उस महिला ने कहा कि वह भी नेकर पहनना चाहती थी पर उनसे बताया गया था कि वे भारत में ऐसे कपड़े न पहने। मैंने बताया,
‘भारत में पुरूष लोग नेकर पहन लेते हैं पर महिलाएं नहीं। हांलाकि इस होटल में नेकर पहन कर या नहाने की ड्रेस पहन कर घूमने में कोई एतराज़ नहीं करेगा।‘
उसने कहा,
‘तब तो मैं भी कल नेकर ही पहनूगी।‘
यह दोनो महिलाएं निरोषध चिकित्सक (Physiotherapist) थीं। उनके मुताबिक ऑस्ट्रेलिया में इस पेशे में पैसा बहुत कम है शायद आने वाले समय में इसमें पैसा मिले।

इन दोनों ऑस्ट्रेलियाई महिलाओं के पति  साथ में नहीं थे न ही उनके बच्चे साथ थे। मैंने पूछा, कि क्या आपके पति ऑस्ट्रेलिया  में बच्चों की देखभाल करने के लिए रूक गये हैं। उसने कहा, नहीं। हमारे बच्चे  बहुत बड़े हो गये हैं। उनकी शादी भी हो गयी है। वे लोग अलग रहते है। उसके बाद बताया,
‘हमने कई बिल्लियां पाल रखी हैं। हमारे पति ऑस्ट्रेलिया में रहकर  बिल्लियों की देखभाल कर रहे हैं और हम दोनों भारत में मस्ती मारने आयें हुए हैं।‘

यह भी महिला सशक्तिकरण का एक अलग रूप है। पति ऑस्ट्रेलिया में बिल्लियां देखें और पत्नियां भारत घूमे।

रात्रि भोज पर, मेरी मुलाकात फिर से इन महिलाओं से हुयी। शाम को नाव की सैर करते समय वे नेकर तो नहीं पहने थी पर  अनौपचारिक परिधान पहने थीं। रात के भोजन पर वे एकदम औपचारिक परिधान पहन कर आयीं थीं। मैंने उनकी तारीफ की वे बोली,
'रात्रि का भोजन तो खास होता है। इसलिए ये खास परिधान।‘
रात्रि भोज पर कुछ युवतियां केरल के पारम्परिक नृत्य कर रही थी। केरल में, परम्परागत परिधान में  सफेद या हल्के पीले रंग की साड़ी पहनी जाती है। जिसमें सुनहरा किनारा होता है। वे इसी तरह की साड़ी पहने थीं। नृत्य के पहले वे मलयालम में उस नृत्य के बारे में बताती थी। यह  हमारे या वहां पर भोजन कर रहे किसी के समझ में नहीं आ रहा था। मैं इनकी मुख्य नृतकी के पास गया और उससे कहा कि वह अंग्रेजी में हमें इसके बारे में बताये ताकि हम उसे ठीक से समझ सके। अगले नृत्य के पहले उसने ऎसा ही किया पर उसकी अंग्रेजी बहुत अच्छी नहीं थी । मै इतना ही समझ पाया कि वह नृत्य शिव वंदना से जुड़ा है।

कुमाराकॉम में, एक पक्षीशाला है। इस श्रंखला की अगली कड़ी में वहीं घूमने चलेंगे।

कोचीन-कुमाराकॉम-त्रिवेन्दम यात्रा
 क्या कहा, महिलायें वोट नहीं दे सकती थीं।। मैडम, दरवाजा जोर से नहीं बंद किया जाता।। हिन्दी चिट्ठकारों का तो खास ख्याल रखना होता है।। आप जितनी सुन्दर हैं उतनी ही सुन्दर आपके पैरों में लगी मेंहदी।। साइकलें, ठहरने वाले मेहमानो के लिये हैं।। पुरुष बच्चों को देखे - महिलाएं मौज मस्ती करें।। भारतीय महिलाएं, साड़ी पहनकर छोटे-छोटे कदम लेती हैं।। पति, बिल्लियों की देख-भाल कर रहे हैं।।


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At  Taj Garden Retreat at Kumarakom, we met a two ladies from Australia. This post talks about them and a different shade of women empowerment. It is in Hindi (Devanagari script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.

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Friday, August 14, 2009

मैंने उसे थूकते हुऐ देखा है

विकासवाद का क्या सबूत है, मिसिंग लिंक कहां है - इस चिट्ठी में इसी की चर्चा है।

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सृजनवादियों की मुख्य आपत्ति है, 
  • यदि कभी मानव और बन्दर  के पूर्वज एक थे तो उसका कोई सबूत होना चाहिये।  
  • इस तरह का कोई सबूत नहीं है। 
इसलिए विकासवाद के सिद्धांत पर विश्वास नहीं  किया जा सकता है।


लेकिन सच तो यह है कि यह लोग सबूत देखना नहीं चाहते है। इन लोगों ने अपनी आंखों में पट्टी बांध रखी है। विकास करोड़ो साल में होता है उसे एक जीवन में देख पाना नामुमकिन है पर यदि आप किसी वस्तु को देख नहीं सकते तो क्या वह सच नहीं हो सकती। किसने देखा है कि पृथ्वी सूरज के चारों तरफ घूमती है। इसका मतलब यह नही कि यह सच नहीं है। 


अलग-अलग जगह पाये गये जीवाश्म (fossils), विकासवाद के सबूत हैं। यह सबूत पुरा-जीवाश्म संग्रहालय में देखे जा सकते है। यह स्पष्ट रूप से बताते हैं कि किस तरह से सारे प्राणी जुड़े है। डीएनए टेस्टिंग से भी पता चलता है कि प्राणि-जगत आपस में जुड़ा है।


किसी भी चीज की उम्र का वैज्ञानिक पता लगाने का तरीका कार्बन डेटिंग  कहलाता है। यह बताता है कि पाये गये जीवाश्म उस समय से कहीं पुराने है जैसा कि कई मज़हबो में बताया जाता है।

आप मेरी बात पर विश्वास नहीं करते। देखिये जाने माने जीव विज्ञानी रिचार्ड डॉकिंगस् और वेन्डी राइट ईसाई धर्म की महिला प्रचारक के बीच बातचीत। इसी विडियो के ऑडियो का कुछ भाग मैंने अपने पॉडकास्ट में जोड़ा है।

 

इस विडियो में डॉकिंगस् बता रहे हैं कि व्हेल, डॉलफिन‌, और दरियायी घोड़ा किस तरह से जुड़े हैं और उनके बीच के क्या सबूत हैं।


स्टीव मिर्स्की (Steve Mirsky) ने, जून २००९ की साईंफिक अमेरिकन (Scientific American) में, एक लेख Are Dog Breeds Actually Different Species? नाम से लिखा है। वे कुत्तों की प्रजातियों का संदर्भ देते हुऐ मनमौजी तरीके से विकासवाद की बात करते हैं।  सृजनवादियों की इस आपत्ति की तुलना एक मुकदमें से करते हुऐ लिखते हैं,


यह चित्र  साईंफिक अमेरिकन के उसी लेख से है

'The claim makes me think of the trial where a man was charged with biting off another man’s ear in a bar fight. An eyewitness to the fracas took the stand. The defense attorney asked,
“Did you actually see with your own eyes my client bite off the ear in question?”
The witness said, “No.”
The attorney pounced:
“So how can you be so sure that the defendant actually bit off the ear?”
To which the witness replied,
“I saw him spit it out.”
We have the fossils, the intermediate forms, the comparative anatomy, the genomic homologies—we’ve seen what evolution spits out.'
एक बार एक व्यक्ति पर शराब खाने में हुई लड़ाई में दूसरे व्यक्ति के कान काटने के जुर्म पर मुकदमा चल रहा था। जब चश्मदीद गवाह ने गवाही देना शुरू किया तब बचाव पक्ष के वकील ने पूछा,
"क्या तुमने मेरे मुव्वकिल को कान काटते देखा?"
चश्मदीद गवाह ने इसका उत्तर नहीं में दिया। इस पर बचाव पक्ष के वकील ने पूछ फिर तुम कैसे कह सकते हो कि मेरे मुव्विकल ने कान काटे हैं। चश्मदीद गवाह ने उत्तर दिया,
"मैंने उसे कान को थूकते हुऐ देखा है।"
हमारे पास जीवाश्म हैं, जीवों की बीच की कड़ियां हैं,  तुलनात्मक दैहिक गठन संबंधी शारीरिक  रचनाऐं हैं, वन्शाणुवीय  साम्यताएं हैं - यह वह है जो विकासवाद ही हमें बता सकती है, यही उसका प्रमाण हैं।'
हांलाकि इसका अंग्रेजी का ही तर्जुमा ठीक बैठता है हिन्दी अनुवाद नहीं।

Creationism Pictures, Images and Photos

इस श्रंखला की अगली कड़ी मे हम बात करेंगे, बीसवीं शताब्दी के सबसे प्रसिद्ध मुकदमें की। यह अमेरिकी इतिहास के शर्मनाक मुकदमें की तरह भी जाना जाता है। हम चर्चा करेंगे कि क्या हुआ था उसमें, क्या था उसमें।

यह कार्टून मेरा बनाया नहीं है। फ्लोरिडा सिटिज़न फॉर साइंस (Florida Citizen for Science) ने लोगों के बीच विज्ञान को लोकप्रिय बनाने, उसे आसानी से समझाने के लिये स्टिक साइंस कंटेस्ट (Stick Science Contest) किया। मैंने यह वहीं से लिया है। इस कार्टून को प्रथम पुरुस्कार मिला है। चित्र को बड़ा करने के लिये उस पर चटका लगायें।

डार्विन, विकासवाद, और मज़हबी रोड़े
भूमिका।। डार्विन की समुद्र यात्रा।। डार्विन का विश्वास, बाईबिल से, क्यों डगमगाया।। सेब, गेहूं खाने की सजा।। भगवान, हमारे सपने हैं।। ब्रह्मा के दो भाग: आधे से पुरूष और आधे से स्त्री।। सृष्टि के कर्ता-धर्ता को भी नहीं मालुम इसकी शुरुवात का रहस्य।। मुझे फिर कभी ग़ुलाम देश में न जाना पड़े।। ऐसे व्यक्ति की जगह, बन्दरों से रिश्ता बेहतर है।। विकासवाद उष्मागति के दूसरे नियम का उल्लंघन करता है।। समय की चाल - व्यवस्था से, अव्यवस्था की ओर।। मैंने उसे थूकते हुऐ देखा है।।








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This post talks about evidence in favour of evolution - the missing link. It is in Hindi (Devanagari script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.



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Sunday, August 02, 2009

अंकल, क्या आप मुझे इसका पप दे सकते हैं

मैंने दस साल पहले जरूर कोई अच्छा काम किया होगा क्योंकि तभी ईश्वर ने मुझे मेरे जीवन का सबसे अच्छा उपहार दिया।

टॉमी का जन्म अप्रैल १९९९ में हुआ था। वह हमारे पास जून १९९९ में आया। हम उसे दिल्ली के एक डॉग केनल से ले कर आये थे। उसने न केवल हमारे जीवन में खुशियां भरी पर उन बहुत से लोगों के जीवन में भी जो हमारे अपने हैं हमसे करीब हैं और बहुत से अजनबी लोगों के भी। उसके पिल्ले जो कि अब स्वयं बड़े हो गये हैं, उनके जीवन में खुशियां बिखेर रहें हैं।

मैंने अपने जीवन में बहुत से नस्ल के कुत्ते पाले हैं देसी, एलसेशियन, लेब्रॉडर, पॉम, डोबरमैन, बॉक्सर पर टॉमी गोल्डन रिट्रीवर था, उसकी बात ही अलग थी। वह इन सबसे अलग क्लास में था। शायद इसलिये गोल्डन रिट्रीवर न केवल दुनिया में सबसे लोकप्रिय पारिवारिक कुत्ते माने जाते हैं पर रजिस्ट्रेशन के मुताबिक हैं भी। मालुम नहीं, मेरे किस जीवन का दोस्त था जो इतने दिन बाद मिला।



मेरे घर के सामने से अनगिनत कारें निकलती हैं पर मजाल कि वह उठे भी पर मेरी कार जब २०० मीटर दूर भी हो तो उसकी पूंछ का हिलना और भौंकना देखने काबिल होता था। अक्सर पहली बार हमारे घर में आये लोगों को अजीब लगता था कि एकदम से उसे क्या हो गया पर कुछ देर बाद समझ में आता था जब मेरी कार गेट के अन्दर आती थी।


मैं जब भी घर के अन्दर आता, वह हमेशा गेट पर पूंछ हिलाते और भौंकते ही मिलता था। लगता था कि वह दिन भर मेरे इंतजार में ही बैठा रहता था। शुभ्रा को हमेशा मुझसे जलन होती थी उसके आने पर पूंछ तो हिलाता था पर गेट पर पहुंच कर भौंकता नहीं था।

मैं कभी कभी शुभ्रा की कार लेकर भी बाहर जाता था पर वह न केवल कार की आवाज ही समझता था पर यह भी कि उसमें कौन है। यदि मैं उसमें हूं तो उसका बर्ताव वही होता था जो कि मेरी कार के लिये। शायद इसीलिये शुभ्रा को लगता था कि वह मेरे तीन प्रेमों में से एक था और इसीलिये क्रिकेट की नेटवेस्ट की सिरीस् जीतने के बाद वह भी हमारे साथ आइसक्रीम खाने गया था।

टॉमी का पहला काम था प्रतिदिन सुबह गेट से अखबार, पत्रिकायें लाना। वह पत्र, निमत्रंण कार्ड भी लाता था। अक्सर मैं डाकियों से कहता कि पत्र टॉमी को दे दें। वे उसे आश्चर्य से देखते फिर और भी आश्चर्य में डूबते जब वह चिट्ठी मुझे ला कर देता। हां उसे इसके लिये हमेशा एक बिस्किट मिलता।

मुझे याद है कि कुछ साल पहले हमारे कस्बे में लिओनिडस् उल्कापात (leonids meteor shower) सबसे अधिक था। हम रात को ढाई बजे नदी के किनारे इसे देखने गये थे। टॉमी भी हमारे साथ था। उसे साथ रखने में, मुझे विश्वास रहता था कि वह मुझे कुछ भी गड़बड़ी से बचा लेगा।


पिछले कुछ सालों को छोड़ कर, कस्बे में हुऐ सारे डॉग शो में, उसने भाग लिया। वह शो राष्ट्रीय स्तर का, या राज्य स्तर का, या फिर जिले स्तर का, उसे प्रत्येक में कोई न कोई पुरुस्कार मिला।

डॉग शो में, वह बच्चों के बीच वह सबसे लोकप्रिय होता था। बच्चे अक्सर मुझसे पूछते कि क्या वे उसे छू सकते हैं। मेरे जवाब होता कि न केवल वे उसे छू सकते हैं पर चूम भी सकते हैं। शायद ही कोई बच्चा होगा जिसने इसके गले में हाथ डाल कर इसे प्यार न किया हो। वे हमेशा मुझसे कहते,
'अंकल, क्या आप मुझे इसका पप दे सकते हैं।'
मेरा जवाब होता जरूर पर पहले तुम्हारी मां को उसके सेवा करने की जिम्मेवारी लेनी होगी। बहुत कम मांएं यह काम अपने हाथ में लेने के तैयार होती।

कुछ लोग, कुत्तों की मेटिंग पसन्द नहीं करते हैं। वे इसके लिये मना करते हैं। मुझे यह ठीक नहीं लगता। मेरे विचार से यह प्राकृतिक है। इसकी अनुमति देनी चाही।

टॉमी के पास, न केवल मेरे कस्बे से, पर दूर दूर की जगहों से लोग मेटिंग के लिये कुत्तियां ले कर आते थे। आप चाहें तो इसके लिये पैसा ले लें या फिर अपनी पसन्द का पिल्ला। हमें पैसे की जरूरत नहीं। ईश्वर ने हमें बहुत दिया। हमने हमेशा पप ही लिया। उसे, उन्हें उपहार में दिया जो हमारे दिल के पास हैं। इसी तरह से टॉमी उनके जीवन में वह खुशियां दे पाया जिसकी उन्हें आशा भी न थी।

टॉमी को गेंद लाना पसन्द था। आप गेंद फेंकते फेंकते थक जायेंगे पर वह गेंद लाते नहीं। कुछ साल पहले मुन्ना अमेरिका से उसके लिये एक गेंद फेंकने वाला लाया। इसमें गेंद को हाथ से छूना नहीं पड़ता गेंद उसमें फंसायी जा सकती है और आसानी से फेंकी जा सकती है। जब से वह आया तब से कुछ राहत आयी।


जिन कुत्तों के पूंछ में बाल होते हैं उनका पिछला भाग बहुत साफ नहीं रह पाता है। उसे खास तरह से साफ करना होता है क्योंकि बाल के कारण कुछ गन्दगी फंसी रह जाती है जिससे बिमारी हो जाती है। हम यह सफाई करते थे पर शायद ठीक प्रकार से नहीं। शायद यही कारण था कि उसके पिछले भाग में एक ट्यूमर हो गया था। हमने उसका ऑपरेशन करवाया था पर यह कुछ मुश्किल करता था। लेकिन वह ठीक था।

छः दिन पहले मुझे लगा कि उसे खड़े होने पर मुश्किल हो रही है। अगले दिन वह खड़ा नहीं हो पा रहा था। उसे मुश्किल होने लगी। हम उसे सुबह और शाम डाक्टर के पास ड्रिप लगवाने के लिये ले जाते थे। कल जब वह ड्रिप लगवा कर वापस आया तो तकलीफ में था। हमें लगा कि ड्रिप से उसे तकलीफ होती है और फिर ड्रिप न लगवाने की सोची।

टॉमी की हालत बिगड़ रही थी। वह उठ नहीं पाता था, इसलिये गन्दा भी हो गया और बदबू भी करता था। मैंने कल शाम को उसे पाउडर लगाया, ब्रश किया। वह महकने लगा, जंच रहा था, बिलकुल हीरो की तरह।

मैंने उसे, शाम को ही बाहर लॉन में लिटा दिया। रात को अन्दर किया। उस समय वह जीवित था। कुछ देर बाद, मैं उसे दूध पिलाने के लिये गया। उसके मुंह के चारो तरफ खून था। वह वहां चला गया था जहां से कोई वापस नहीं आता।

मैंने उसे पुनः साफ किया। रात में ही, हम ने उसे, घर में सामने की ओर, लॉन के बगल में, चूने और नमक के साथ गाड़ दिया। उसकी आखें फाटक और घर की तरफ - हमारी चौकीदारी करते हुऐ। वह हमेशा इसी तरह से बैठता था - एक नजर मुझ पर दूसरी नजर बाकी सारी जगह पर - कहीं कोई मुझ पर हमला न कर दे। मैं जब घर में होता, वह मेरा पीछा, साये की तरह करता।

कितनी यादें हैं कितने सुनहरे पल हैं, कितनी खुशियां है। मेरे लिये सब लिखना संभव नहीं।

हे ईश्वर, तुम्हें धन्यवाद कि तुमने मुझे ऐसा उपहार दिया।

अलविदा मेरे मित्र, मित्रता दिवस पर तुम्हें सलाम। तुम हमेशा मेरे जहन में, मेरी यादों में रहोगे। मेरे साथ इतने सुनहरे पल बिताने का शुक्रिया।

पुनः हमने टॉमी की याद में, उसकी कब्र के दो तरफ, बेला और काजू का पेड़ लगाया है ताकि आने वाले समय में, उसकी महक और याद, हमेशा रहे।

Friday, July 31, 2009

समय की चाल - व्यवस्था से, अव्यवस्था की ओर

इस चिट्ठी में उष्मागति के दूसरे नियम की चर्चा जैव विज्ञान और विकासवाद के संदर्भ में की गयी है।



मेरी श्रंखला 'डार्विन, विकासवाद, और मज़हबी रोड़े' की चिट्ठी 'विकासवाद उष्मागति के दूसरे नियम का उल्लंघन करता है' पर कुछ टिप्पणियां सवाल पूछते हुए आयी हैं। इस चिट्ठी की सुविधानुसार, मैं उनका सम्पादन कर नीचे पेश कर रहा हूं। मूल रूप पर की गयी टिप्पणी को आप उसी चिट्ठी में पढ़ सकते हैं।


एंट्रॉपी के जनक - रुडोल्फ क्लॉसिअस (Rudolf Clausius) २.१.१८२२-२४.८.१८८8 - चित्र विकिपीडिया से

अनुनाद जी कहते हैं,
"सृजनवादियों का कहना है कि विकासवाद में प्राणि जगत जीवन के निचले भाग में ऊँचे भाग की तरफ (from lower life form to higher life form) जा रहा है। अर्थात एंट्रॉपी घट रही है।"
'क्या प्राणिजगत का निचले स्तर से ऊंचे स्तर पर जाने का अर्थ यह है कि एण्ट्रापी बढ़ रही है?

यदि ऐसा है तो सब जगह एन्ट्रापी बढ़ रही है - मानव जब बच्चा होता है तो हर दृष्टि से सरल होता है; पहले के औजार सरल थे, अब जटिल औजार बनाये गये हैं; पहले की इन्टीग्रेटेड सर्किटों (आई सी) में कम ट्रान्जिस्टर हुआ करते थे; अब कई मिलियन ट्रान्जिस्टर होते हैं।'

अरविन्द जी का कहना है,
'मुझे लगता है जैवीय मामलों में entropy का सिद्धांत लागू नहीं होता - बीज की संरचनात्मक जटिलता अधिक होती है मगर वह ज्यो ज्यों वृक्ष बनता जाता है सरलीकरण होता है। मगर मैं कुछ निश्चित तौर पर कुछ नहीं कह सकता।'
निशान्त जी कहते हैं,
'इसे समझना सरल नहीं है। Entropy के बारे में मैंने हॉकिंग की किताब में पढ़ा है। यह परिकल्पना दुरूह है। इसे कुछ सरल रूप में प्रस्तुत करें।'
जीवन के निचले भाग में ऊँचे भाग की तरफ (from lower life form to higher life form) जाने से एंट्रॉपी घट रही है। अनुनाद जी, ने जो उदाहरण दिये हैं उनमें भी एंट्रॉपी घट रही है। लेकिन यह वातावरण या सूर्य से ऊर्जा के कारण हो रहा है। जिसके कारण वहां एंट्रॉपी बढ़ रही है और दोनो को जोड़ बढ़ रहा है।

अरविन्द जी, मेरे विचार से जैवीय मामलों में भी एंट्रॉपी का सिद्धांत लगता है।

निशान्त जी, यह सच है कि एंट्रॉपी एक मुश्किल विषय है। मैंने इस विषय को ४० साल से भी पहले पढ़ा था। उस समय भी यह विषय मुश्किल लगता था। फिर भी, मैं इसे बताने बताने का प्रयत्न करता हूं।

मैंने उसी समय जॉर्ज गैमव (George Gamov) की 'वन, टू, थ्री ... इन्फिनिटी' (One, Two, Three ...Infinity) और आइज़ेक एसीमोव (Isaac Asimov) की 'एसिमोव ऑन फिज़िक्स' (Asimov on Physics) पढ़ी थी। उसके बाद यह विषय कुछ समझ में आया था। यह दोनो बेहतरीन पुस्तकें हैं यदि आप विज्ञान में रुचि रखते हैं और आपने नहीं पढ़ी हैं तो अवश्य पढ़े। यदि आपके मुन्ने, मुन्नी विज्ञान में रुचि रखते हैं तो उन्हें उपहार में दें।

पिछली चिट्ठी लिखने के पहले मैंने इन्हें पुनः पढ़ा था। आइज़ेक एसीमोव की पुस्तक में एक अध्याय 'ऑर्डर ऑर्डर!' (Order Order!) नाम से है। इसमें वे लिखते हैं (इसे अनुनाद जी के प्रश्न के परिपेक्ष में देखें),

'It is, of course, easy to cite cases of entropy decrease as long as we consider only parts of a system and not all of it. For instance, we see manking extract metals from ores and device engines of flendish complexity out of metal ingots. We see elevators moving upwards and automobiles driving uphill, and soldiers getting into marching formation and cards placed in order. All these and a very large number of other operations involve decrease in entropy brought about by the action of life. Consequently, the feeling arises that life can "reverse entropy".
...
In fact, in considering entropy changes on earth, it is unfair to consider the earth alone, since our planet is gaining energy constantly from the sun. This influx of energy from the sun powers all those processes on earth that represent local decreases in entropy: the formation of coal and oil from plant life, the circulation of atmosphere and ocean, the raising of water in the form of vapor, and so on. It is for that reason we can continue to extract energy by burning oil and coal, by making use of power from wind, river currents, waterfalls, and so forth. It is all at the expense, indirectly, of the sun.


The entropy increase represented by the sun's large-scale conversion of mass to energy simply swamps the comparatively tiny entropy decreases on earth. The net entropy change of the solar system as a whole is that of a continuing huge increase with time.'


जॉर्ज गैमव की पुस्तक में अध्याय 'द लॉ ऑफ डिस्ऑर्डर' (The Law of Disorder) है। इसमें वे लिखते हैं (इसे आप अरविन्द जी की टिप्पणी के परिपेक्ष में देखें),
'One seeming contradiction to the law of increasing entropy is presented by living organisms. In fact, a growing plant takes in simple molecules of carbon dioxide (from the air) and water (form the ground) and builds them up into the complex organic molecules of which the plant is composed. Transformation from simple to complex molecules implies the decrease of entropy; in fact, the normal process in which entropy does increase is the burning of wood and decomposition of its molecules into carbon dioxide and water vapor. Do plants really contradict the law of increasing entropy, being aided in their growth by some mysterious vis vitalis (life force) advocated by old-time philosophers?

The analysis of this question indicates that no contradiction exists, since along with carbon dioxide, water, and certain salts, plants need for their growth abundant sunlight. Apart from energy, which is stored in the material of growing plants and may be liberated again when the plant burns, the rays of the sun carry with them the so-called "negative entropy", (low-level entropy), which disappears when the light is absorbed by the green leaves. Thus the photosynthesis taking place in the leaves of plants involves two related processes:
  • Transformation of the light energy of the sun's rays into chemical energy of complex organic molecules;
  • The use of low-level entropy of the sun's rays for lowering the entropy associated with the building up of simple molecules into complex ones.
In term of "order versus disorder." one may say that, when absorbed by green leaves, the sun's radiation is robbed of the internal order with which it arrives on the earth, and this order is communicated to the molecules, permitting them to be built up into more complex, more orderly, configurations. Whereas plants build their bodies from inorganic compounds, getting their negative entropy (order) from the sun's rays, animals have to eat plants (or each other) for the supply of that negative entropy, being, so to speak, second-hand users of it.'
समय की रफ्तार - व्यवस्था से
अव्यवस्था की तरफ
यह चित्र मेरा नहीं है। मैंने इसे यहां से लिये है।
वहां पर कुछ प्यारी सी लड़कियों ने एंट्रॉपी को सरल भाषा में समझाया है।

मैंने हॉकिंग (Stephen W. Hawking) की पुस्तक 'अ ब्रीफ हिस्टरी ऑफ टाइम' (A Brief History of Time: From Big Bang to Black Holes) बहुत पहले पढ़ी थी। मुझे यह पुस्तक दर्शन से संबन्धित ज्यादा लगती है और विज्ञान से कम। मेरे विचार से यह पुस्तक ज्यादा चर्चित है फिर भी निशांत जी की टिप्पणी के बाद मैंने इसे पढ़ा। इसमें एक अध्याय 'द ऐरॉ ऑफ टाइम' (The Arrow of Time) नाम से है। इसमें वे कहते हैं,
'The progress of the human race in understanding the universe has established a small corner of order in an increasingly disordered universe. If you remember every word in this book, your memory will have recorded about two million pieces of information:the order in your brain will have increased by about two million units. However, while you have been reading the book, you will have converted at least a thousand calories of ordered energy, in the form of food, into disordered energy, in the form of heat that you lose to the air around by convection and sweat. This will increase the disorder of the universe by about twenty million million million million units - or about ten million million million times the increase in order in your brain - and that's if you remember everything in this book.'


मेरे विचार से उष्मागति का दूसरा नियम विज्ञान का नियम है। यह प्रकृति में हर जगह, हर समय लगना चाहिये अन्यथा यह नियम सही नहीं होगा। लेकिन हॉकिंग अपनी पुस्तक के अध्याय 'ब्लैक होलस् आंट सो ब्लैक' (Black Holes Ain't So Black) में लिखते हैं,
'The second law of thermodynamics has a rather different status than that of other laws of science, such as Newton's law of gravity, for example, because it does not hold always, just in the vast majority of cases.'
लेकिन वे अपनी पुस्तक में, यह बताते हुए कि यह कब नहीं लगेगा, लिखते हैं,

  • इस समय ब्रह्माण्ड फैल रहा है। जब वह सिकुड़ना शुरू करेगा (यदि ऐसा हुआ तो) तब यह नियम सत्य नहीं होगा। लेकिन उस समय प्रकृति के सारे नियम उलट जायेंगे।
  • हो सकता है कि ब्लैक होल के अन्दर यह नियम सच न हो।
लेकिन यह दोनो बातें संभावनायें ही हैं। क्या मालुम ठीक हों या न हों।


पिछली चिट्ठी के अन्त में कुछ लेखों का लिंक 'Related articles by Zemanta' करके बॉर्डर के अन्दर बताये थे। वे भी इसी विषय के बारे में हैं। वे लिंक हैं,

मैंने पिछली चिट्ठी लिखते समय इन सब को देखा था और इन पुस्तकों एवं उपर दिये लिंक का निचोड़ ही अपने शब्दों में पिछली चिट्ठी में लिखा था। शायद मेरे लिये, उससे सरल भाषा में लिखना संभव नहीं है।



अगली बार हम लोग मिलेंगे तब बात करेंगे सृजनवादियों की दूसरी और उनकी मुख्य आपत्ति पर - यानि कि पूर्वजों के बारे में क्या सबूत हैं? कहां है मिसिंग लिंक (missing link)?

डार्विन, विकासवाद, और मज़हबी रोड़े
भूमिका।। डार्विन की समुद्र यात्रा।। डार्विन का विश्वास, बाईबिल से, क्यों डगमगाया।। सेब, गेहूं खाने की सजा।। भगवान, हमारे सपने हैं।। ब्रह्मा के दो भाग: आधे से पुरूष और आधे से स्त्री।। सृष्टि के कर्ता-धर्ता को भी नहीं मालुम इसकी शुरुवात का रहस्य।। मुझे फिर कभी ग़ुलाम देश में न जाना पड़े।। ऐसे व्यक्ति की जगह, बन्दरों से रिश्ता बेहतर है।। विकासवाद उष्मागति के दूसरे नियम का उल्लंघन करता है।। समय की चाल - व्यवस्था से, अव्यवस्था की ओर।।

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In this post second law of Thermodynamics entropy is explained in context of evolution. This post explains it. It is in Hindi (Devanagari script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.



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Saturday, July 25, 2009

विकासवाद उष्मागति के दूसरे नियम का उल्लंघन करता है

सृजनवादियों के अनुसार, विकासवाद उष्मागति के दूसरे नियम का उल्लंघन करता है। इस चिट्ठी इसी की चर्चा है।

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सृजनवाद सारे मज़हबों में है। शायद यह इसलिए कि पुराने समय में प्राणियों की उत्पत्ति समझाने के लिए यह सबसे आसान तरीका था। सृजनवाद के अनुसार मनुष्यों की उत्पत्ति किसी विकासवाद से नहीं, पर किसी अदृश्य शक्ति के द्वारा सृजन किये जाने पर हुई है। लेकिन यदि डार्विन का विकासवाद का सिद्धांत सही है तब इसमें ईश्वर की, अदृश्य शक्ति की जरूरत नहीं है। यही दोनो में मतभेद है, विरोध है।


डार्विन के सिद्धांत पर मज़हबी लोगों की दो आपत्तियां हैं
  • पहली, यह उष्मागति के दूसरे नियम का उल्लंघन करता है।
  • दूसरी, यदि किसी समय, बन्दर और मनुष्य के पूर्वज एक ही थे तब इस समय वह पूर्वज कहां है, उसके बारे में क्या सबूत है? यह उनकी मुख्य आपत्ति है।
चलिए पहले उनकी आसान यानि की पहली आपत्ति के बारे में बात करें। यह आपत्ति उष्मागति - विज्ञान के दूसरे नियम से संबन्धित है। यह नियम बताता है कि,
'In any closed system, entropy always increases'
किसी भी बन्द सिस्टम में एंट्रॉपी (उत्क्रम माप) बढ़ती है।
इसका मोटे तौर पर अर्थ यह है;
'In a closed system, things go from order to disorder'
कोई भी बन्द सिस्टम व्यवस्था से अव्यवस्था की तरफ बढ़ता है।

यह चित्र मेरा नहीं है। मैंने इसे यहां से लिया है।

सृजनवादियों का कहना है कि विकासवाद में प्राणि जगत जीवन के निचले भाग में ऊँचे भाग की तरफ (from lower life form to higher life form) जा रहा है। अर्थात एंट्रॉपी घट रही है। यह नहीं हो सकता है।


सच तो यह है कि यह आपत्ति इस नियम को न समझने की भूल करती है। यह नियम किसी बन्द सिस्टम में ही लागू होता है। यदि कहीं एंट्रोपी घट रही है तो उस सिस्टम में कहीं पर बढ़ रही होगी ताकि पूरे सिस्टम में दोनो का जोड़ बढ़े।

हम सब जानते हैं कि जीवन की उत्पत्ति, इसके विकासवाद, में सूरज के प्रकाश और उष्मा का खास महत्व है। यदि सूरज न होता तो यह जीवन भी नहीं होता। सूरज से प्रकाश और उष्मा, पदार्थ की संहति (mass) का ऊर्जा में बदलने के कारण हो रहा है। इस कारण, वहां एंट्रोपी बढ़ रही है। यह पृथ्वी पर एंट्रोपी में आयी कमी से कहीं अधिक है। इन दोनो का जोड़, उष्मागति के दूसरे सिद्धांत का किसी प्रकार उल्लंघन नहीं करता है।



यह कार्टून मेरा बनाया नहीं है। फ्लोरिडा सिटिज़न फॉर साइंस (Florida Citizen for Science) ने लोगों के बीच विज्ञान को लोकप्रिय बनाने, उसे आसानी से समझाने के लिये स्टिक साइंस कंटेस्ट (Stick Science Contest) किया। यह उसके बेहतरीन दस कार्टूनो में से एक है। मैंने यह वहीं से लिया है।



अगली बार मिलेंगे तब बात करेंगे सृजनवादियों की दूसरी और उनकी मुख्य आपत्ति पर।

डार्विन, विकासवाद, और मज़हबी रोड़े
भूमिका।। डार्विन की समुद्र यात्रा।। डार्विन का विश्वास, बाईबिल से, क्यों डगमगाया।। सेब, गेहूं खाने की सजा।। भगवान, हमारे सपने हैं।। ब्रह्मा के दो भाग: आधे से पुरूष और आधे से स्त्री।। सृष्टि के कर्ता-धर्ता को भी नहीं मालुम इसकी शुरुवात का रहस्य।। मुझे फिर कभी ग़ुलाम देश में न जाना पड़े।। ऐसे व्यक्ति की जगह, बन्दरों से रिश्ता बेहतर है।। विकासवाद उष्मागति के दूसरे नियम का उल्लंघन करता है।।

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According to creationist, evolution violates the second law of Thermodynamics. This post explains it. It is in Hindi (Devanagari script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.



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