Friday, October 21, 2011

जहाँपनाह, मूर्ति-स्थल नापाक है - वहां मस्जिद न बनायें

इस चिट्ठी में, मथुरा में, कृष्ण जन्मभूमि की चर्चा है।
कृष्ण जन्म भूमि पर मन्दिर और बगल में मस्जिद

हम लोग सुबह  मथुरा पहुंचे। नाश्ता करके, सबसे पहले  श्री कृष्ण जन्म-स्थान मंदिर देखने के लिए गये। जन्म स्थान पर, प्राचीन काल से मन्दिर था, जो कि कई बार तोड़ा और फिर से बनाया गया। पुराने जन्म-स्थान परिसर के कुछ भाग में, एक मंदिर और कुछ भाग में मस्जिद बनी है। 


कहा जाता है कि मन्दिर को आखरी बार १६६९ ईस्वी में, ६वें मुगल बादशाह औरंगजेब ने, तुड़वा कर, मस्जिद बनवायी थी।  लेकिन मस्जिद, मन्दिर गर्भगृह या कृष्ण-जन्मस्थान के ऊपर न हो कर, मन्दिर के सभामण्डप पर बनी थी। लोगों का कहना है कि यह औरंगजेब के एक हिन्दू सिपहसालार के कारण हो सका। 

औरंगजेब - चित्र विकिपीडिया से
हिन्दू सिपहसालार औरंगजेब को सलाह दी,
'जहाँपनाह, कृष्ण जन्मस्थल और मन्दिर में मूर्ती थी। इसलिये मुसलमानो के लिये वह जगह नापाक है। वहां मस्जिद जैसी पवित्र इमारत न बनवायी जाय।'
इसलिये मन्दिर के सभागृह पर मस्जिद बनायी गयी। मन्दिर का गर्भ-गृह और कृष्ण-जन्मस्थान, मन्दिर के मलबे में दब गया।

मैं नहीं जानता कि इसमें कितनी सच्चाई है और कितना झूट। यह इतिहास की बात है विज्ञान की बात नहीं। इतिहास व्यक्तिपरक होता है। यह इसी तरह से लिखा या याद किया जाता है जैसा इसे लिखने वाला अपने चश्में से देखता है या देखना पसन्द करता है। 

वहां पर लोगों ने बताया कि मस्जिद, मंदिर को तोड़ कर बनी थी। लेकिन मस्जिद को पुराने मन्दिर के तल वा उससे कुछ ऊंचा बनाया गया था। लेकिन इस समय का मंदिर का भवन, मस्जिद के बाद बना है। मंदिर बनाते समय इस बात का ध्यान रखा गया कि वह मस्जिद से ऊंचा रहे।  

अजीब बात है भगवान तो एक ही है। हम सोचते हैं कि हमारे भगवान अलग है और उनका महत्व पूजा स्थान की ऊंचाई से होता है। भगवान तो सब जगह है क्या ऊंचा और क्या नीचा।


मंदिर को देखने के बाद मैंने मस्जिद में जाने की बात की। उस समय पता चला कि मंदिर से, मस्जिद में नहीं जाया जा सकता। दोनों जगह जाने के लिए बाहर से, अलग-अलग रास्ते हैं।

इस मंदिर और मस्जिद दोनों का अपना इतिहास है, दोनों के रास्ते अलग-अलग हैं। क्या अच्छा होता कि दोनों के बीच का रास्ता भी होता ताकि एक तरफ से दूसरी तरफ जाया जा सकता हो। पहले बीच में रास्ता था। लेकिन अब प्रशासन की दृष्टि से सुविधाजनक न होने के कारण बंद कर दिया गया।

श्रीकृष्ण जन्म स्थान व मस्जिद में बहुत अधिक सीआरपीएफ लगी हुई थी। मैंने वहां पर गार्ड से कुछ बात की। उसका कहना था,

'१९९१ में जब बाबरी मस्जिद और राम जन्म भूमि का विवाद उठा था, उस समय कुछ लोगों ने वहां पर मस्जिद की तरफ की जमीन पर यज्ञ करने की बात की थी। इसलिए वहां पर दोनो तरफ बैरीकेटिंग कर दी गयी और मंदिर से मस्जिद के बीच का रास्ता बंद कर दिया गया, ताकि विवाद न बढ़ जाए।  सीआरपीएफ भी तभी से तैनात है।'
मेरे पूछने पर कि क्या यहां पर कोई अप्रिय घटना हुई है। उनका कहना था
'यहां पर अभी तक तो कोई अप्रिय घटना नही हुई है और न ही ऎसा कुछ होने का अंदेशा है। यहां पर जितनी शांति है शायद और कहीं नही।'
मंदिर में बहुत भीड़ थी। लेकिन मस्जिद में नहीं। मेरे पूछने पर कि क्या मस्जिद में कोई नहीं आता? तब बताया गया, 
'जुम्मे के रोज़ या किसी महीने के खास दिन नमाज़ पढ़ने के लिए काफी लोग एकत्र होते हैं'।
मंदिर और मस्जिद में एक खास अन्तर भी लगा। 

मंदिर की ज्यादातर ज़मीन पक्की है और नंगे पाँव चलना अपने आप में एक मुश्किल बात थी। लेकिन मस्जिद में जो ज़मीन थी उसमें एक बहुत सुन्दर लॉन था। शायद उसमें नंगे पांव चलना सुविधाजनक होगा। लॉन देखने में बहुत सुन्दर लग रहा था। शायद, मंदिर में ज्यादा लोग आते है । इसलिए यहां पर उस तरह का लॉन रख पाना अपने आप में मुश्किल होता होगा।

अगली बार हम लोग मन्दिर के इतिहास की बारे में बात करेंगे।

 उन्मुक्त की पुस्तकों के बारे में यहां पढ़ें।

इस चिट्ठी के दोनो चित्र विकिपीडिया से।

मथुरा में एक दिन, पूरे बनारसी जीवन पर भारी - मथुरा यात्रा
रस्किन बॉन्ड।। कन्हैया के मुख में, मक्खन नहीं, ब्रह्माण्ड दिखा।। जहाँपनाह, मूर्ति-स्थल नापाक है - वहां मस्जिद न बनायें।। 

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सांकेतिक शब्द
Mathura, Krishna, Aurangzeb,

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4 comments:

  1. यह तो मंदिर मस्जिद की बात है ठीक वैसी ही जैसे काशी और अयोध्या में है ......इस पर कुछ कहने से फिलहाल न कहना ही बेहतर है ..ईशनिंदा का मामला बनने लग जाता है कुछ लोगों की निगाह में !

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  2. अगली कड़ी का इंतज़ार रहेगा.

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  3. पता नहीं कितनी सचाई है, पर बहुत पहले मथुरा यात्रा के दौरान ऐसा सुना था कि मथुरा के हिन्दू-मुसलमानों के बीच यह समझौता था कि मस्ज़िद की इमारत की मरम्मत कभी नहीं कराई जायेगी।

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  4. हम भी घूम चुके हैं वहाँ पर।

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