Thursday, May 11, 2006

पहेली बाज ज़ज

मैने मार्टिन गार्डनर की पोस्ट पर पहेली बाज ज़ज के बारे मे बात की थी उनका किस्सा यह रहा है|

डैन ब्राउन ने 'द विन्सी कोड' (Da Vinci code)१ नाम की पुस्तक लिखी है तथा इसे रैन्डम हाउस ने छापी है| यह काल्पनिक कहानी है| लेखक के शब्दों में यह यहां है|

इसकी कहानी कुछ इस तरह की है कि यीशू मसीह ने शादी की थी तथा उनके वंशज भी हैं यह बात वेटिकन ने छिपा कर रखी है| एक संग्रहाध्यक्ष को यह मालुम था जिसका खून हो जाता है वह मरते समय लियोनार्दो द विन्सी के एक चित्र की आकृति बनाते हुये, फिबोनाकी सिरीस२ के नम्बरो के साथ संकेत के रूप में छोड़ जाता है| आगे क्या होता है यह जानने के लिये तो किताब पढ़नी पड़ेगी पर रैन्डम हाऊस के उपर इस किताब के पीछे एक मुकदमा दायर हो गया और हमें तो इसके फैसले से मतलब है|

कुछ साल एक और किताब 'द होली ब्लड ऐन्ड होली ग्रेल' तीन लेखकों ने छापी थी उसमें से दो ने रैन्डम हाउस के उपर एक मुकदमा यह कहते हुऐ दायर किया कि द विन्सी कोड की पुस्तक में उनकी किताब कि ने उनका सार ले लिया है इससे उनके बौधिक सम्पदा अधिकारों का हनन हुआ है| यह मुकदमा इंगलैंड मैं चला तथा न्यायमूर्ती पीटर स्मिथ ने इसे ७ अप्रैल २००६ को खारिज कर दिया| यह फैसला इस जगह पर है| इस मुकदमे मे कुछ शब्दों का एक अक्षर तिरछे (italics) में टाईप है| यह कुछ अजीब बात है| फैसले मे पूरे पूरे शब्द तो अकसर तिरछे में रहते हैं पर शब्दों का एक अक्षर तिरछे में - कभी नहीं| पहले तो लोगों ने यह समझा कि यह गलती है पर बाद मे यह लगा कि इसमे भी कोई रहस्य हो|

पहले नौ तिरछे अक्षरों को देखें तो वे smithcode हैं या इन्हे ठीक से रखें तो यह हो जाता है Smith code| जज़ साहब का नाम भी Smith है, इससे लगा कि कि वह भी 'द विन्सी कोड' (Da Vinci code) की तरह रहस्यमयी बात कहना चाहते हैं| लेकिन बाद के तिरछे अक्षरों का कोई मतलब नहीं निकल रहा था| जज़ साहब ने पहले तो अपने फैसले के बारे में कोई टिप्पणी करने से मना कर दिया पर बाद में ईमेल से पुष्टि की कोई पहेली है फिर उन्होने किताब के उस पेज पर इशारा किया जहां पर फिबोनाकी सिरीस के नम्बर के नम्बर का जिक्र है३ और इन नम्बरों की सहायता से तिरछे अक्षरों का रहस्य४ खुला|५ वे सौ साल पहले नेवी के एडमिरल जैकी फिशर के बारे मे लोगों का ध्यान आर्कषित करना चाह रहे थे|

मैने अपने विश्वविद्यालय के सहपाठी ईकबाल, जो कि वकील है, से पूछा कि क्या कभी इतिहास मे पहले कभी किसी जज़ ने इस तरह से अपने फैसले मे पहेली बूझी है? उसका जवाब था कि शायद नहीं यह पहली बार हुआ है पर वह इस पर देख कर बतायेगा| उसने कहा कि वह इस समय अनूप के मुकदमे मे व्यस्त है|

अनूप भी मेरा विश्वविद्यालय का सहपाठी है और भारत सरकार की राजकीय सेवा में है| वह अपने समय का लड़कियों के बीच मे सबसे लोकप्रिय| हम सब उससे जलते थे क्योंकि विश्वविद्यालय मे सब लड़कियां उसी पर मरती थीं| वह किस मुकदमे मे फंस गया, यह अगली बार|

१गूगल मे द विन्सी कोड क्वेस्ट जिस किताब के बारे में बात है तथा मिश्रा जी जिसकी बात यहां कर रहे हैं वह यही किताब है|

२फिबोनाकी सिरीस १ नम्बर से शुरू होती है बाद के नम्बर पिछले दो नम्बर का जोड़ होते हैं| यानि कि सिरीस में नम्बर १, (०+१) =१, (१+१)=२, (१+२)=३, (२+३)=५, (३+५)=८, इत्यादि होते हैं| इनका प्रकृति से अपना सम्बन्ध है इसके बारे मे जानने के लिये यहां देखें|

३यह सब आप कुछ विस्तारसे पढ़ना चाहें तो यह सब न्यू यौर्क टाईम्स के इस लेख में यहां है|

४यदि आप इस पहेली का हल कुछ विस्तारसे पढ़ना चाहें तो न्यू यौर्क टाईम्स का यह लेख देखें|

५डैन टेन्च वकील हैं तथा गार्जियन नाम के आखबार के लिये लिखते हैं उन्होने इसका हल निकाला और यदि आप उनही की भाषा में इसका हल पढ़ना चाहें तो वह यहां पर है|

यह क्या है?



इन्तज़ार करें इसके बारे मे पोस्ट का|

ऐसे यह तो है The Solution
क्या यह है Solutionकिसी पहेली का|
क्लिक कर के खुद ही देखे लीजये|

Wednesday, May 10, 2006

ओपेन सोर्स सौफ्टवेयर – बी.बी.सी. सिरीस

बी.बी.सी. 'द कोड ब्रेकरस' (The Code Breakers) के नाम से एक ओपेन सोर्स सौफ्टवेयर पर सिरीस १० मई २००६ से शुरू कर रही है| यह बी.बी.सी. की सिरीस है, अच्छी होनी चाहिये| इसके बारे मे यहां पर विस्तृत मे चर्चा है | भारतवर्ष में पहली बार १०-११ कि रात १ बजे - फिर कई दिन पुन: - दिखायी जायगी| आप इसका समय अपने देश के लिये बी.बी.सी. की वेब-साईट पर यहां देख सकते हैं|

Monday, May 08, 2006

अनुगूँज १९ - संस्कृतियाँ दो और आदमी एक

Akshargram Anugunj,

किसी व्यक्ति के लिये दूसरी जगह, दूसरी संस्कृति में,
  • जीवन यापन के लिये जाना; या
  • उन लोगों से उन बातों की महारत हासिल करने के लिये जाना जिसमे वे दक्ष हों; या
  • बेहतर जीवन के लिये जाना; या
  • अपनी संस्कृति का दूसरी जगह प्रचार करने के लिये जाना;
एक बात है|

पर किसी भी व्यक्ति का दो अलग अलग संस्कृतियों को अपने आप मे आत्मसात कर लेना आसान नहीं है| यह कुछ बिरले ही कर पाते हैं| ऐसे लोगों के, क्या गुण होते हैं; क्या खासियत है - शायद वही बता सके जिसने दो अलग अलग संस्कृतियों में जीवन जिया है मेरे जैसा नहीं जो एक ही जगह एक ही संस्कृति में रहा हो| फिर भी कल्पना के घोड़े दौड़ाने में तो कोई मनाही नहीं है| मेरे विचार से ऐसे व्यक्ति को,
  • दूसरे कि बात सुनने तथा समझने की क्षमता होनी चाहिये|
  • इस बात को स्वीकारने का बड़प्पन होना चाहिये कि हो सकता है कि उसकी संस्कृति में कुछ कमी है जो दूसरी संस्कृति में नहीं है|
  • यदि दूसरी संस्कृति में कुछ अच्छाई है तो उसे अपनाने की शक्ति होनी चाहिये|



यह कौन है


यह हैं daredevill
जो होते हैं succeed
जायें वे जहां
क्लिक करके देखें न|

Sunday, May 07, 2006

१. लिनेक्स: शुरुवात - यूनिक्स से

ओपेन सोर्स सौफ्टवेयर की चर्चा पहली कड़ी ओपेन सोर्स सौफ्टवेर से शुरू होकर पंद्रवीं कड़ी लिनूस टोरवाल्डस एवं बिल गेट्स के विचार पर समाप्त हो गयी। इस चर्चा के दौरान जिक्र हुआ था कि लिनेक्स तथा उसके बारे मे चल रहे मुकदमे की भी चर्चा करना ठीक रहेगा। चलिये यह चर्चा शुरू की जाय।

लिनेक्स१, ओपेन सोर्स सौफ्टवेयर का सबसे कामयाब तथा सबसे लोकप्रिय सौफ्टवेयर है। यह जीपीएल्ड है और यूनिक्स से बनाया गया है। यूनिक्स का विकास, 1960 के दशक में ऐ.टी.&टी. की बेल प्रयोगशाला के द्वारा किया गया। उस समय ऐ.टी.&टी. कम्पनी एक नियंत्रित इजारेदारी (Regulated monopoly) थी इसलिये वह कमप्यूटर का सौफ्टवेयर नही बेंच सकती थी। उसने इसे, सोर्स कोड के साथ, बिना शर्त, सरकार तथा विश्वविद्यालयों को दे दिया: वे चाहे तो उसमें फेरबदल कर सकते हैं। 1980 के दशक के आते आते यूनिक्स सबसे लोकप्रिय, शक्ति शाली, एवं स्थिर औपरेटिंग सिस्टम बन गया हालांकि उस समय तक उसके कई रूपान्तर आ चुके थे।

यूनिक्स में एक कमी थी इसको समझना तथा चलाना मुश्किल है। एन्डी टेनेबौम, ऐमस्टरडैम में कमप्यूटर विज्ञान के प्रोफेसर हैं। उन्होंने इसकी सहायता के लिये मिनिक्स नाम का प्रोग्राम लिखा। इसमें भी कुछ कमियां थीं। लिनूस टोरवाल्ड फिनलैण्ड के हेलसिन्की विश्‍वविद्यालय में कमप्यूटर विज्ञान के छात्र थे। उन्होंने मिनिक्स की कमी को दूर करने के लिये एक प्रोग्राम लिखा जो कि बाद 'लिनूस का यूनिक्स' या छोटे में लिनेक्स कहलाया । इसका सबसे पहला कोर या करनल (Kernel) उन्होने 1991 में इन्टरनेट में पोस्ट किया। तब तक, रिचर्ड स्‍टालमेन का घन्यू ( GNU) प्रोजेक्ट शुरू हो चुका था। लिनूस टोरवाल्ड ने इससे बहुत सारे प्रोग्राम अपने लिनेक्स में लिये। इसलिये रिचार्ड स्टालमेन का कहना है कि इसे घन्यू-लिनेक्स कहना चाहिये। पर यह नाम, शायद लम्बा रहने के कारण चल नहीं पाया। पर इसका अर्थ यह नहीं हैं कि लिनेक्स की सफलता में घन्यू प्रोजेक्ट का हाथ नहीं है। घन्यू प्रोजेक्ट के बिना लिनेक्स सम्भव नहीं था।

1991 में शुरू हुआ यह औपरेटिंग सिस्टम आज विन्डोस के बराबर तो लोकप्रिय नहीं है पर बहुत तेजी से उंचाईयों को छू रहा है और पांच दस साल बाद बात उल्ट भी हो सकती है। अगली बार इसके करनल, डेस्कटौप, डिस्ट्रीब्यूशन, के बारे मे बात करेंगे।

१- लिन्कस के बारे में मजाक यहां देखें।|

यह क्या है? इन्तज़ार करें - इसके बारे मे पोस्ट का|

इन्तज़ार नही करना चाहते, तो देरी किस बात की है - क्लिक कीजये और खुद देखे लीजये।
ईन्टरनेट पर तो तरह तरह की वेब साईट हैं मुन्ने की मां से उसका इतिहास कैसे छिपाया जाय, इसका राज है, हांऽ.ऽ..ऽ..ऽ
:-) :-) :-)

Saturday, May 06, 2006

ब्लागर डाट काम में परेशानी

उड़नतश्तरी ने कुछ दिन पहले ब्लागर डाट काम के नखरे- कुछ शरमाता है नाम की पोस्ट की थी| इसमे उन्होने ब्लागर डाट काम मे हो रही परेशानी का जिक्र किया था| मुझे भी कुछ परेशानी हो रही थी जिसकी मैने टिप्पणी भी की| इधर लगता है कि परेशानी ज्यादा बढ़ गयी इसके कारण कुछ पोस्टें दो तीन बार करनी पड़ गयीं| मेरा भी समय बरबाद हुआ| और आप सब को बहुत असुविधा - उसके लिये मैं माफी चाहूंगा|

मैने अभी पुन: उड़नतश्तरी की इसी पोस्ट पर गया पर कोई हल नहीं दिखायी पड़ा| पर इसका क्या कोई हल है? क्या कोई जानता है?
१५. ओपेन सोर्स सौफ्टवेयर: लिनूस टोरवाल्डस एवं बिल गेट्स के विचार
पिछली पोस्ट: ओपेन सोर्स सौफ्टवेयर – महत्व|

लिनूस टोरवालल्डस, जो लिनेक्स के जन्मदाता हैं, ने अपनी जीवनी डेविड डाईमन्ड के साथ लिखी है| इसका नाम है 'Just for Fun: the Story of an Accidental Revolutionary’| यह बहुत अच्छी किताब है तथा इसे पढने से जीवन में आगे बढने की प्रेरणा मिलती है वे, इसमें ओपेन सोर्स सौफटवेयर के बारे में कहते हैं,
‘The GPL and open source model allows for the creation of the best technology. … It also prevents the hoarding of technology and ensures that anyone with interest won’t be excluded from its development.
…
So open source would rather use the legal weapon of copyright as an invitation to join in the fun, rather than as a weapon against others. It’s still the same old mantra: Make Love, Not War, except on a slightly more abstract level.
…
Imagine an intellectual property law that actually took other people’s rights into account, too. Imagine IP laws that encouraged openness and sharing. Laws that say sure, you can still have your secrets, whether they be technological or religious, but that doesn’t mandate legal protection for such secrecy.’

जब हम लोग बात ओपेन सौफटवेयर में कुछ फायदे के बारे में कर रहे है तो बहुत अच्छा होगा कि कुछ दूसरा पक्ष भी देखें| बिल गेट्स, विन्डोज़ के जन्‍मदाता हैं| उन्होंने ‘The Road Ahead’ किताब लिखी है| यह किताब भी बहुत अच्छी है| अपने नाम के मुताबिक यह बताती है कि सूचना प्रद्योगिकी भविष्य में किस तरफ जायेगी| इसमें कई मुश्किल सवालों को बहुत आसानी से समझाया गया है| इसमें वे फ्री सौफटवेयर की कमियों को इस तरह से वर्णन करते हैं,
'In addition to free information, there's a lot of free software on the Internet today, some of it quite useful. Sometimes it's commercial software given away as part of a marketing campaign. Other times the software has been written as a graduate student project or at a government-funded lab. But I think consumer desire for quality, support, and comprehensiveness in important software applications means that the demand for commercial software will continue to grow. Already many of the students and faculty members who wrote free software at their universities are busy writing business plans for start-up companies that will provide commercial versions of their software with more features, not to mention customer support and maintenance.'

यह तो कहना मुश्किल है कि सौफटवेयर उद्योग किस तरफ जायेगा परन्तु दुनिया के बहुत सारे देश तथा व्यापार घराने ओपेन सोर्स सौफटवेयर को अपना हिस्सा बना रहे हैं क्योंकि इसमें व्यय कम है तथा इसे वह अपने मुताबिक ढाल भी सकते हैं| देखिये अगले ५ सालों में यह नाव किस तरफ जाती है|

Friday, May 05, 2006

मार्टिन गार्डनर की पुस्तकें

मैने मार्टिन गार्डनर की पोस्ट पर उनके द्वारा लिखी पुस्तकों का जिक्र किया था| इस पर Raviratlami जी की टिप्पणी
इन नायाब किताबों के प्रकाशक तथा ये कहाँ से मिलेंगे इनके आईएसबीएन नं इत्यादि भी दे सकें तो मेहरबानी होगी, ताकि यहाँ दूर स्थस्थानों में भी हम जैसे-तैसे मंगवा तो सकें!

मैं पहले सोचा कि वहीं परइसका जवाब दे दूं फिर लगा कि शायद और लोग भी यह सूचना जानने मे उत्सुक हों इसलिये यह चिठ्ठी|

मैने यह पुस्तकें पिछले ४० सालों में पढ़ी हैं इस बीच इन सब के प्रकाशक बदल गये और कईयों के नाम भी| इसलिये महत्वपूण यह है कि इस समय इसका क्या नाम है तथा कौन प्रकाशक है| यह पता करने का सबसे अच्छा तरीका है www.amazon.com पर जा कर किताबों के मेनू पर martin Gardner लिख कर पता करना| मैने कई किताबें यहां से अपने अमेरिकी दोस्तों से मंगवायी है पर यह मंहगी पड़ती हैं| इसलिये यह तरीका ठीक नहीं|

आजकल ईंटरनेट पर बहुत सारी किताबों के स्टोर अपने देश में भी खुल गये हैं जो अच्छे हैं मैं इनमे से एक http://www.firstandsecond.com/ से किताबें मंगवाता हूं यह अच्छा है और भरोसे मन्द भी| आप कहीं भी हों किताब इनसे मंगवाये कोई मुशकिल नहीं है| यहां भी आप सर्च कर सकते हैं|

मार्टिन गार्डनर या विज्ञान से सम्बंधित किताबें न तो हर किताबों कि दुकानो पर मिलती हैं न ही हर दुकान वालों को इन किताबों का ज्ञान होता है हांलाकि कुछ बड़ी किताबों की चेन (जैसे क्रौसर्वड, लैन्डमार्क) खुल गयी हैं वंहा मिल जाती हैं| मैं दिल्ली-गुड़गांव, अहेमदाबाद, बम्बई कि क्रौसर्वड पर तथा चेन्नाई एवं बैंगलोर की लैन्डमार्क पर गया हूं कभी मौका मिले तो जरूर जाइये|

दिल्ली में इस तरह की किताबों सबसे अच्छी दुकान कनौट प्लेस मे बुक-वर्म है| यह छोटी दुकान है पर इस तरह कि किताबों के लिये अच्छी| इसके मालिक को जितना अच्छा ज्ञान इस तरह किताबों के बारे में है शायद उतना किसी और किताब-दुकान के मालिक को नहीं| कभी लखनऊ जाने का मौका मिले, तो कपूरथला में युनिर्वसल की पहली मंजिल पर की दुकान पर जाना न भूलें|

जहां तक साईंटिफिक अमेरिकन पत्रिका की बात है उसके बारे मे आप यहां से जानकारी प्राप्त कर सकते हैं |
Scientific American India
201, Competent House
F-14 Middle Circle,
Connaught Place
New Delhi-110001
email: editor@sciam.co.in

ओह मैं भूल ही गया| नितिन बागला जी का जवाब पहेलियों के बारे में सही है|

१०. ओपेन सोर्स सौफ्टवेर - फ्री तथा जीपीएल्ड (GPLed) सौफ्टवेर की शर्तें



पिछली पोस्ट- फ्री सौफ़टवेर: इतिहास|

फ्री या कापीलेफटेड साफटवेयर में निम्न बातें मुख्य हैं -
  • इसमें सोर्स कोड हमेशा प्रकाशित किया जाता है
  • इस तरह के सौफटवेयर के लिये कोई पैसा या रौयल्टी नहीं देनी पडती है पर यदि उसके सम्बन्ध में यदि आप कोई सर्विस दे रहें है तो सर्विस देने का पैसा ले सकते हैं|
  • इस तरह के सौफटवेयर को कोई भी संशोधित कर सकता है
  • इस तरह के सौफटवेयर को संशोधन करने के बाद प्रकाशित करने या बाटंने की कोई आवश्यक्ता नही है| आप उसे बिना प्रकाशित या बाटें अपने संगठन में प्रयोग कर सकते हैं|
पर यदि इस तरह के सौफटवेयर को बिना संशोधन किये या संशोधित करने के बाद बांटा जाता है तो उसमें वही शर्तें रहेंगीं जो कि पहले थीं यानी कि
  • सोर्सकोड प्रकाशित करना पडेगा;
  • अन्य लोगों को संशोधन करने की स्वतंत्रता देनी होगी; तथा
  • सौफटवेयर के लिये कोई पैसा या रौयल्टी नहीं ली जा सकती है|

स्टालमेन ने कुछ वकीलों की मदद से जनरल पब्लिक लाइसेंस (General Public License) (GPL) लिखा, जिसमें इस तरह की घोषणा एवं शर्त है जो किसी भी साफटवेयर को कौपीलेफट करता है| इसलिये इस तरह के सौफ्टवेर को गीपीएल्ड (GPLed) सौफ्टवेर भी कहा जता है| यानि कि फ्री सौफ्टवेर या कौपीलेफ्टेड सौफ्टवेर या गीपीएल्ड सौफ्टवेर एक ही तरह के सौफ्टवेर के पर्यायवाची शब्द हैं|

क्या ओपेन सोर्स सौफ्टवेर इन सौफ्टवेर से अलग होता है? क्या होता है ओपेन सोर्स सौफ्टवेर? अगली बार - इसी के बारे में चर्चा करेंगे|

Thursday, May 04, 2006

मार्टिन गार्डनर

यह चिठ्ठी पहेली-बाज को समर्पित है।

नवीन युग में गणित को लोकप्रिय बनाने में जितना काम मार्टिन गार्डनर ने किया शायद उतना किसी और ने नही किया। मैंने १९६० के दशक के अन्त में विश्विद्यालय में पैर रखा। उस समय अमेरिका में रहने वाले, मेरे एक चाचा ने मेरे लिये साईंटिफिक अमेरिकन1 नाम की पत्रिका भिजवानी शुरू की। मार्टिन गार्डनर उस समय इसमें मनोरंजनात्मक गणित पर एक स्तम्भ लिखा करते थे। उसी से मैं पहली बार उनसे आबरू हुआ। इनमे बहुत सारे लेख पहेलियों के बारे में होते थे। यह बहुत ज्ञानवर्धक और मनोरंजक थे। मार्टिन गार्डनर के लेख मुझे तब से पसन्द हैं| मार्टिन गार्डनर ने आगे चल कर कई पुस्तकें भी लिखीं जिसमें कई पहेलियों के बारे में थीं। उनमे से पहेलियों की मेरी मन पसन्द पुस्तकें निम्न हैं।
  • Mathematical puzzles and Diversions
  • More Mathematical puzzles and Diversions
  • Further Mathematical Diversions
  • Mathematical Carnival
  • Mathematics Magic and Mystery
  • Entertaining Mathematical Rules
  • Science Fiction, Puzzle Tales
  • Aha! Gotcha, Paradoxes to puzzle and delight

मार्टिन गार्डनर अपनी एक किताब की भूमिका लिखते हुऐ पहेलियों के महत्व को इस प्रकार से समझाया,
'In one of L. Frank Baum's funniest fantasies, The Emerald City of Oz, Dorothy (together with the Wizard and her uncle and aunt) visit the city of Fuddlecumjig in the Quadling section of Oz. Its remarkable inhabitants, the Fuddles, are made of pieces of painted wood cleverly fitted together like three dimensional jigsaw puzzles. As soon as an outsider approaches they scatter in a heap of disconnected pieces on the floor so that the visitor will have the pleasure of putting them together again. As Dorothy's party leaves the city, Aunt Em remarks:
“Those are certainly strange people, but I really can't see what use they are, at all”
“Why, they amused us for several hours,” replies the Wizard. “That is being of use to us, I am sure.”
“ I think they're more fun than playing solitaire or mumbletypeg,” Uncle Henry adds. “For my part, I'm glad we visited the Fuddles.”

मार्टिन गार्डनर ने न केवल पहेलियों के बारे में किताबें लिखीं पर विज्ञान के कुछ पहलुवों के बारे में भी लिखा। इनमे से कुछ किताबें अलग अलग नाम से प्रकाशित की गयीं मैं नही कह सकता कि ऐसा क्यों किया गया पर इसके कारण कुछ भ्रम अवश्य पैदा होता है। इनमे से कुछ किताबें निम्न हैं
  • The Ambidextrous Universe.
  • Science: Good, Bad, and Bogus यह Fads and Fallacies in the Name of Science नामक किताब का नया रूपान्तर है| इसमें ये ESP और UFO के अन्धविश्वास को दूरकरते हैं|
  • The Relativity Explosion यह Relativity for the Million नामक किताब का नया रूपान्तर है|

उपर लिखी सारी किताबें बहुत अच्छी हैं और मेरी मन पसन्द हैं। पढ़ कर देखिये और यदि आपके मुन्ने या मुन्नी नवी कक्षा या उसके उपर पढ़ते हों तो उन्हे अवश्य पढ़ने को दीजये। मार्टिन गार्डनर की पहेलियों पर तथा विज्ञान पर लिखीं पुस्तकें बहुत आसान भाषा में, सरल तरीके से लिखी गयी हैं और पढ़ने लायक हैं। पर उनकी कुछ और किताबें जो कि दर्शन पर लिखी गयीं हैं उनके बारे में यह नहीं कहा जा सकता है। इनमे से मैं कुछ पुस्तकों को समाप्त नही कर पाया, वे हैं
  • The Whys of a Philosophical Scrivener; तथा
  • The Night is large.

मेरे मन की इच्छा है कि हमारी पहेली बाज का चिठ्ठा, मार्टिन गार्डनर से भी ज्यादा नाम कमाये, ज्यादा लोकप्रिय हो। उसको मेरी शुभकामनायें।

पता चला है कि पहेली बाज अवकाश पर हैं जब तक वह वापस आतें हैं मैं मार्टिन गार्डनर की पुस्तक Entertaining Mathematical Puzzles से दो पहेलियों को आपके लिये पेश कर रहा हूं यह अंग्रेजी मे उन्ही के शब्दों में,
पहली:
Divide 30 by ½ and add 10. What's the result?

हम् म् ऽऽऽ...म् जवाब २५ तो नहीं है।

दूसरी:
Suppose you take a new job and the boss offers you a choice between:
  1. Rs. 40,000 for your first year of work, and a raise of Rs.8,000 for each year thereafter;
  2. Rs. 20,000 for your first six months of work, and a raise of Rs. 2000 every six months thereafter.
आप कौन सा औफर लेगें और क्यों। बेशक वह औफर लेंगे जिसमें ज्यादा पैसे मिलते। हम् म् ऽऽऽ...म् पर वह है कौन सा।

पहेलियों का आजकल बहुत जोर है एक ज़ज साहब पहेली बाज बन गये हैं उन्होने अपने फैसले में एक पहेली बूझ ली। अगली बार हम लोग उस फैसले में बूझी गयी पहेली के बारे और उसके हल के बारे में चर्चा करेंगे।

1साईंटिफिक अमेरिकन अब भारतवर्ष में प्रकाशित होने लगी है यदि आपके मुन्ने या मुन्नी ग्यारवीं कक्षा या उसके उपर पढ़ते हों तथा विज्ञान मे रुचि रखते हों तो इसे उनके लिये मंगवाइये।

सांकेतिक शब्द
book, book, books, Books, books, book review, book review, book review, Hindi, kitaab, pustak, Review, Reviews, किताबखाना, किताबखाना, किताबनामा, किताबमाला, किताब कोना, किताबी कोना, किताबी दुनिया, किताबें, किताबें, पुस्तक, पुस्तक चर्चा, पुस्तकमाला, पुस्तक समीक्षा, समीक्षा,

Monday, May 01, 2006

उर्मिला की कहानी - घटना की सच्चाई

मैंने मुन्ने की मां को गुस्सा क्यों आया पोस्ट में बताया था कि उर्मिला और ईकबाल मेरे विश्वविद्यालय के सहपाठी हैं तथा मुन्ने की मां उर्मिला की फोटो को लेकर गुस्सा हो गयी थी| और इसके बाद उर्मिला की कहानी- मुकदमे की दास्तान पोस्ट उस पर चले मुकदमे के बारे में जिक्र किया था| उर्मिला की कहानी - अदालत का फैसला पोस्ट पर बताया था कि मुकदमे के बाद उर्मिला तथा उसका परिवार शहर छोड़ कर कहीं चले गये| पर शहर छोड़ने से पहिले उर्मिला ने ईकबाल को उस रात की सच्चाई बतायी थी अब वही सच्चाई|

यह भी अजीब कहानी है उस दिन उर्मिला नन्दोई के घर मे चली गयी थी वहां उसे पता चला कि उसकी ननन्द नहीं थी| वह अपने मायके यानि कि उर्मिला के ससुराल में थी घर में नन्दोई के मित्र थे| उर्मिला वापस अपने मायके आना चाहती थी पर नन्दोई ने उससे सबके लिये चाय बनाने के लिये अनुरोध किया| इसको वह मना नहीं कर पायी क्योंकि घर में चाय बनाने के लिये और कोई नहीं था|

वह जब चाय बनाने गयी तब नन्दोई तथा उनके मित्रों ने दरवाजा बन्द कर दिया| उसके साथ उन सब ने रात भर जबरदस्ती गलत कार्य किया| वे लोग अगले दिन उसे बेहोशी की हालत में पोस्ट औफिस के पास छोड़ आये| मैने जब इकबाल से पूछा कि उसने यह बात क्यों नहीं अपने पति या कोर्ट मे कही| तब ईकबाल ने कहा कि उसने उर्मिला से यह पूछा था पर उर्मिला ने उसे कोई जवाब नहीं दिया|

मैने मुन्ने की मां की प्रतक्रिया जानने के लिये कहा,
'उर्मिला ने गलती की| उसे यह बात कोर्ट में कहनी चाहिये थी'
उसने कोई जवाब नही दिया मैने उसकी आखों की तरफ देखा| उनसे गुस्सा तो काफूर हो चुका था पर वह किसी गहरे सोच में डूबी लग रही थी; वह मेरी बात से सहमत नहीं लगती थी मुझे तो उसके हाव-भाव से लगा कि वह कहना चाह रही है कि मर्द क्या समझें औरत का जीवन|

लक्षमण की उर्मिला के दर्द को तो तुलसी दास जी भी नही समझ पाये| वह तो केवल सीता जी के त्याग को समझ पाये| उर्मिला के त्याग तथा दर्द को समझने के लिये नव-युग में मैथली शरण गुप्त को जन्म लेना पड़ा|

हा स्वामी! कहना था क्या क्या
कह न सकी कर्मों का दोष!
पर जिसमें सन्तोष तुम्हे हो
मुझे है सन्तोष!
वह क्या इस पर विशवास करती थी, मालुम नहीं, कह नहीं सकता| पर इस उर्मिला के दर्द को क्या उसका लक्षमण या कोई और समझेगा?

मैं एक बात अवश्य जानता हूं कि उर्मिला एक साधारण लड़की नहीं थी वह एकदम सुलझी, समझदार, बुधिमान, वा जीवन्त लड़की थी| उसने पुरानी बातों को भुला कर नया जीवन अवश्य शुरू कर दिया होगा| उसका एक भाई विदेश में था क्या उसी के पास चली गयी| कुछ पता चलेगा तो बतांऊगा| आप में से तो बहुत लोग विदेश में रहतें हैं कभी आपको उर्मिला मिले तो कहियेगा कि हम सब उसे याद करते हैं; मिलना चाहेंगे और मुन्ने की मां भी मिलना चाहेगी।

उर्मिला की कहानी
मुन्ने की मां को गुस्सा क्यों आया।। मुकदमे की दास्तान।। अदालत का फैसला।। घटना की सच्चाई