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| न्यायामूर्ति एच.आर. खन्ना |
इस चिट्ठी और आने वाली कुछ आगे की चिट्ठियों, हम 'हेबियस कॉर्पस' केस में, मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट रूम के अनुभवों के बारे में बात करेंगे।
यह चिट्ठी, उस पहले सवाल के बारे में है, जिसने इस मामले में छाई खामोशी को तोड़ा था। यह सवाल न्यायामूर्ति एच.आर. खन्ना ने पूछा था।
हैबियस कॉर्पस केस के पच्चास साल: आपातकाल, सर्वोच्च न्याययालय और संविधान
मैं इस केस में भागीदार कैसे हिस्सा बना।। न्यायालय के सामने क्या सवाल थे।। बहस के पहले - बेंच में बदलाव।। वेश्या कुंवारी - पिछले प्रभाव से।। वह सवाल जिसने खामोशी तोड़ी।।
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'हेबियस कॉर्पस' मामले की सुनवाई १५ दिसंबर १९७५ को शुरू हुई। वह एक बहुत ठंडा दिन था।तत्कालीन अटॉर्नी जनरल, निरेन डे ने अपनी दलीलें उसी अंदाज में शुरू कीं, जैसा कि उस समय की सरकार का रवैया था—यानी कोर्ट पर दबाव डालना या उसे डराना-धमकाना।
मेरा मकसद उनका अनादर करना नहीं है, क्योंकि अब वे हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन उस समय उन्होंने वाकई दहशत पैदा कर दी थी। दहशत इतनी ज्यादा थी कि पहले दिन किसी भी जज ने कोई सवाल नहीं पूछा। दूसरे दिन, दोपहर के आसपास, न्यायामूर्ति खन्ना ने पहला सवाल पूछा।
"अनुच्छेद २१ में 'जीवन' (life) का भी जिक्र है। क्या सरकार की दलीलें 'जीवन' के अधिकार पर भी लागू होंगी?"बिना रुके, बिना झिझक के, निरेन डे ने जवाब दिया, "इसमें बीच का कोई रास्ता नहीं है। भले ही किसी का जीवन गैर-कानूनी तरीके से छीन लिया जाए, फिर भी कोर्ट असहाय हैं।"
(इसका जिक्र AIR रिपोर्ट के पैराग्राफ १६५ में मिलता है)
उन्होंने एक और उदाहरण दिया—कल्पना कीजिए कि लंच के बाद बेंच को यह बताया जाए कि पाकिस्तानी पैराट्रूपर्स कनॉट प्लेस में उतर गए हैं और प्रधानमंत्री आवास की ओर बढ़ रहे हैं, तो क्या ऐसे में कोर्ट को सरकार की कार्रवाई में दखल देना चाहिए? क्या गोली चलाने से पहले उन्हें कोर्ट की मंजूरी का इंतजार करना चाहिए? यह कोई बहुत उचित उदाहरण नहीं था, लेकिन उनका अंदाज यही था।
लेकिन उस सवाल, उसके जवाब और उस उदाहरण का अपना असर हुआ।
इसके बाद, लंच के बाद अन्य जजों (न्यायामूर्ति चंद्रचूड़ और न्यायामूर्ति भगवती) ने भी तीखे और असहज करने वाले सवाल पूछने शुरू कर दिए। इससे हमें काफी राहत मिली।
जब तक केंद्र और राज्य सरकारों के वकीलों ने अपनी दलीलें पूरी कीं, तब तक पहले दिन का सारा तनाव खत्म हो चुका था। कोर्ट का माहौल अब काफी बेहतर और खुशनुमा हो गया था।
अगली पोस्ट में हम बात करेंगे कि कैसे एस.एन. कक्कड़ अपनी बात पर अडिग रहे।
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