Wednesday, June 13, 2007

जो करना है वह अपने बल बूते पर करो: हमने जानी है जमाने में रमती खुशबू

इस श्रंखला की Love means not ever having to say you're sorry पर मैंने अपनी मां के बारे में लिखने की बात की थी। इस चिट्ठी के बाद, ज्ञानदत्त पाण्डे जी की ईमेल आयी कि मैं पिता-पुत्र के संबन्धों के बारे में भी लिखूं।

मेरे पिता हमेशा अपने व्यवसाय या फिर समाजिक सेवा में व्यस्त रहते थे। उनके पास हमारे या मां के लिये कभी समय नहीं होता था। हमें इसका हमेशा मलाल रहा।

मैं अक्सर अपने मित्रों को पिता के साथ मौज करते देखता था, जलन भी होती थी। यह सारी कमी मां ही ने पूरी की। पिता यदि चाहते तो बहुत पद मिल सकते थे हमारे लिये बहुत कुछ कर सकते थे पर कभी किया नहीं। सबके पिता करते थे इसीलिये हमें वे समझ में नहीं आते थे। उनका कहना था,

'जो करना है वह अपने बल बूते पर करो। यही जीवन, सार्थक जीवन है।'

आज, जीवन के तीन चौथाई बसन्त देख लेने के बाद, अब पिता समझ में आने लगे हैं, उनके सिद्धान्त भी समझने लगा हूं, उन पर गर्व भी होने लगा है। उनसे जुड़ी कई बातें, उनके सिद्धान्त आपातकाल के समय (१९७५-७७) के हैं। वे लगभग दो साल जेल में रहे।

कहा जाता व्यक्ति की सही पहचान करने का समय मुसीबत का समय होता है वह समय नहीं जब सब अच्छा चल रहा हो। आपातकाल का समय हमारे लिये मुश्किलो भरा समय था। इसके बारे में भी लिखूंगा।


आपातकाल का समय हमारे लिये मुश्किलो भरा समय था


मेरे विचार में पिता की कही बातों के साथ, यह भी आवश्यक है कि हम आने वाली पीढ़ी के साथ समय व्यतीत करें। हमारे बच्चे ही हमारे सबसे बड़ी सम्पदा हैं। पिता के सिद्धन्तो के कारण हम उस स्कूल में गये जहां एक साधरण हिंदुस्तानी जाता है। शायद यही कारण हो कि मुन्ने के बड़े होते समय मैंने उसका दाखिला देहरादून में, हिन्दुस्तान के एक सबसे जाने माने बोर्डिंग स्कूल में करवा दिया। दाखिले के समय उस स्कूल के प्रधानाचार्य (या शायद उप- प्रधानाचार्य) ने कहा,

'हमारा स्कूल हिन्दुस्तान का सबसे अच्छा स्कूल उन बच्चों के लिये है जिनके माता पिता के पास बच्चों के लिये समय नहीं है।'

मुझे अपना जीवन याद आया। मैं मुन्ने को वापस ले आया। उस स्कूल में नहीं पढ़ाया। मैं नहीं चाहता था कि मेरे बच्चे कभी सोचे कि हमारे पास उनके लिये समय नहीं था। मुझे यह भी लगा कि जो संस्कार हम उसको दे सकेंगे वह संस्कार यह स्कूल, जिसका अधिकारी ऐसा सोचता हो, न दे सकेगा। मैंने उनके साथ कुछ समय बिताया है और इसका कुछ जिक्र 'Don't you have time to think' और 'पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा' चिट्ठियों में किया है।

अगली बार कुछ अपने पिता के बारे में, कुछ आपातकाल के बारे में।


भूमिका।। Our sweetest songs are those that tell of saddest thought।। कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन, बीते हुए दिन वो मेरे प्यारे पल छिन।। Love means not ever having to say you're sorry ।। अम्मां - बचपन की यादों में।। रोमन हॉलीडे - पत्रकारिता।। यहां सेक्स पर बात करना वर्जित है।। जो करना है वह अपने बल बूते पर करो।। करो वही, जिस पर विश्वास हो।। अम्मां - अन्तिम समय पर।। अनएन्डिंग लव।। प्रेम तो है बस विश्वास, इसे बांध कर रिशतों की दुहाई न दो।। निष्कर्षः प्यार को प्यार ही रहने दो, कोई नाम न दो।। जीना इसी का नाम है।।

2 comments:

  1. आपके पिता और आपात काल के बारे में उत्सुकता है।
    आप जीवन के तीन चौथाई बसंत देख चुके हैं। अब क्या लिखूँ, बस नमन है आपको।

    ReplyDelete
  2. बेहतरीन संस्मरण। आपके परिवार के प्रति आदर से मन भर उठा।

    ReplyDelete

आपके विचारों का स्वागत है।