अम्मां - अन्तिम समय पर: हमने जानी है जमाने में रमती खुशबू

मेरे पिता अपने काम में व्यस्त रहते थे या फिर समाज सेवा में। उनके पास, हमारे या मां के लिये समय नहीं रहता था। इसलिए मां को जहाँ भी जाना होता था, वे हमारे साथ ही जाती थीं। यह रवैया हमारी शादी के बाद भी चला। मुन्ने की मां ने भी इसे सहर्ष स्वीकार किया।

मां दूसरों के मन की बात समझती थीं और उसे पूरा करने का भरसक प्रयत्न करती थीं। १९८० के दशक में उन्हें दिल की बीमारी हो गयी, अक्सर डाक्टर उन्हें देखने आया करते थे। मेरी सास कुछ साल के लिए अमेरिका पढ़ाने जा रही थीं। मुन्ने की मां, मां की बीमारी के कारण उन्हें दिल्ली तक छोड़ने नहीं जा पा रही थी। उसने मुझे कहा कि मैं दिल्ली जाकर उन्हें छोड़ आऊं। मैंने दिल्ली जाने का प्रोग्राम भी बना लिया। शाम को मेरी पत्नी ने फोन करके बताया कि अम्मा की तबियत खराब है और मैं घर आ जाऊं। उसने डाक्टर को भी बुला लिया था। जब तक मैं घर पहुँचा, डाक्टर साहब मां को देख चुके थे और जाने लगे। चलते-चलते जब मैं डाक्टर साहब को उनकी कार तक छोड़ने गया तो उन्होंने मुझसे कहा कि,

'अम्मा की तबियत ठीक है और तुम दिल्ली जा सकते हो।'
मैंने कहा कि मैं सोचूंगा। पर मुझे कुछ अच्छा नहीं लग रहा था और दिल्ली नहीं गया।

मां की तबियत अगले दिन बहुत अच्छी हो गयी। मुझे लगा कि मैंने बेकार ही दिल्ली प्रोग्राम रद्द किया। इसके एक दिन बाद ही, मां ने सुबह चाय बनायी। अखबार पढ़ते-पढ़ते, चाय पीते समय, उन्हें दिल का दौरा पड़ा। वे वहाँ चली गयी जहां से कोई वापस नहीं आता। वे अन्त तक सारे काम स्वयं करती रहीं। उन्हे न कभी किसी सहारे की जरूरत पड़ी न ही उन्होने किसी का सहारा लिया, न वे ऐसा जीवन पसन्द करती। शायद भगवान भी जिससे ज्यादा प्यार करता है, उसे इसी तरह की जिन्दगी, इसी तरह की मौत देता है। हे ईश्वर, मुझे भी इसी तरह की मौत देना।

कुछ दिनों बाद, बातचीत के दौरान मैंने मुन्ने की मां से कहा कि,
'अच्छा हुआ कि मैं दिल्ली नहीं गया और चला जाता तो मैं कभी अपने आपको माफ नहीं कर पाता पर मेरी समझ में नहीं आया कि डाक्टर साहब ने यह कैसे कह दिया कि मैं दिल्ली जा सकता हूं जबकि अम्मां की तबियत ठीक नहीं थी।'


अम्मां ने डाक्टर साहब को अपनी तबियत के बारे में न बताने कि कसम दी थी

मुन्ने की मां ने बताया कि,
'जब तुम नहीं थे तो अम्मां ने डाक्टर साहब से कहा था कि, तुम दिल्ली जाना चाहते हो, प्रोग्राम बना है, इसलिए डाक्टर साहब तुमसे कह दें कि उनकी तबियम एकदम ठीक है और यह न कहें कि कुछ टेस्ट करवाने हैं। जो भी टेस्ट करवाना है वे अगले दिन आकर लिख देंगे। वे अगले दिन की फीस भी अलग से दे देंगी। उन्होने मुझे और डाक्टर साहब को तुम्हे यह न बताने कि कसम भी दिलवा दी थी। इसलिए मैंने तुम्हे नहीं बताया और डाक्टर साहब ने तुम्हे दिल्ली जाने को कह दिया।'
मुझे लगा कि वह मरते समय भी, इस बात का ख्याल रखती थी कि हम क्या चाहते हैं।

हो सकता है कि आज के समय में बेटे और बेटियों का मां से रिश्ता मदर-डे पर एक कार्ड देना ही रह गया हो पर मैं नहीं समझता कि मां का अपने बेटे और बेटियों से रिश्ता कार्ड तक है। यह कहीं ज्यादा गहरा, कहीं ज्यादा सच्चा है। मैं नहीं समझता कि इसे आंकने के लिये कोई नपना है, न कभी कोई नपना बनाया जा सकेगा।


हमने जानी है जमाने में रमती खुशबू
भूमिका।। Our sweetest songs are those that tell of saddest thought।। कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन, बीते हुए दिन वो मेरे प्यारे पल छिन।। Love means not ever having to say you're sorry ।। अम्मां - बचपन की यादों में।। रोमन हॉलीडे - पत्रकारिता।। यहां सेक्स पर बात करना वर्जित है।। जो करना है वह अपने बल बूते पर करो।। करो वही, जिस पर विश्वास हो।। अम्मां - अन्तिम समय पर

4 टिप्पणियाँ:

अनूप शुक्ला said...

यह दिल को छू लेने वाला संस्मरण है। यह सच है कि लगाव को नापने का कोई पैमाना नहीं होता। इसे केवल महसूस किया जा सकता है!

Udan Tashtari said...

अत्यंत मार्मिक..दिल को छूने वाला संस्मरण.

yunus said...

उन्‍मुक्‍त जी ये आपके जीवन की अनमोल यादें हैं । आप लगातार अच्‍छे संस्‍मरण लिख रहे हैं । दिल को छू गयीं आपकी बातें ।

Hindi Blogger said...

बहुत ही मार्मिक संस्मरण. हमारे साथ बाँटने के लिए धन्यवाद!