Sunday, January 06, 2008

भारतीय सभ्यता, संस्कृत, और उपनिषद के जर्मन विद्वान – मैक्स मुलर: बर्लिन यात्रा

मैक्स मुलर (Max Müller) का जन्म ६ दिसम्बर १८२३ में देसा, (Dessan, Germany) में हुआ था। लिपजिंग विश्वविद्यालय से पढ़ाई और पी.एच.डी. लेने के बाद १८४५ में वे फ्रांस चले गये जहां उन्होंने संस्कृत सीखी। १८४६ में वे, संस्कृत का और अच्छा अध्ययन करने, इंगलैंड चले गये। उन्होंने १८६८ से १८७५ तक आल सोलस् कालेज All Soules College, Oxford में Comparative Theology के प्रोफेसर रहे।

जन्मः ६.१२.१८२३ – मृत्युः २८.१०.१९००

मैक्स मुलर ने भारतीय सभ्यता, संस्कृत, उपनिषद का अच्छा अध्ययन किया और कई पुस्तकें लिखी । इनमें मुख्य हैं:
  1. A History of Ancient Sanskrit Literature So Far As It Illustrates the Primitive Religion of the Brahmans (1859),
  2. Lectures on the Science of Language (1864, 2 vols.),
  3. Chips from a German Workshop (1867-75, 4 vols.),
  4. Introduction to the Science of Religion (1873),
  5. जर्मन लोगों को यह सुन कर आश्चर्य हुआ कि मैक्स मुलर के नाम पर भारत में भवन और मार्ग हैं।

    India, What can it Teach Us? (1883),
  6. Biographical Essays (1884),
  7. The Science of Thought (1887),
  8. Six Systems of Hindu Philosophy (1899),
  9. Natural Religion (1889),
  10. Physical Religion (1891),
  11. Anthropological Religion (1892),
  12. Theosophy, or Psychological Religion (1893).
  13. Auld Lang Syne (1898),
  14. My Autobiography: A Fragment (1901);
  15. The Life and Letters of the Right Honourable Friedrich Max Müller (1902, 2 vols.), यह उनकी पत्नी द्वारा सम्पादित है
उनकी मृत्यु २८ अक्टूबर १९०० में हो गयी।

मैक्स मुलर (Max Muller) कभी भारत नहीं आये हैं पर भारतीय सभ्यता के बारे में बहुत काम किया है। जर्मनी में, मैंने उनके बारे में लोगों से पूछा पर उन्होंने मैक्स मुलर का नाम नहीं सुना था। मैंने उन्हें बताया कि वे जर्मन थे उन्होंने भारतीय सभ्यता और संस्कृत भाषा पर बहुत काम किया था। उनके नाम पर भारत में भवन और मार्ग हैं। उन्हें यह सुन कर आश्चर्य हुआ।

बर्लिन-वियाना यात्रा
जर्मन भाषा।। ऑस्ट्रियन एयरलाइन।। बीएसएनएल अन्तरराष्ट्रीय सेवा - मुश्कलें।। बर्लिन में भाषा की मुश्किल।। ऑफिस, स्कूल साइकिल पर – स्वास्थ भी बढ़िया, पर्यावरण भी ठीक।। बर्लिन दीवार का टूटना और दिलों का मिलना।। भारतीय सभ्यता, संस्कृत, और उपनिषद के जर्मन विद्वान – मैक्स मुलर।।

अंतरजाल की मायानगरी श्रंखला में, मेरा नया पॉडकास्ट डोमेन नाम विवाद (Domain name dispute) सुनिये।
Domain Name Dispute
Domain Name Disput...
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यह ogg फॉरमैट में है। इस फॉरमैट की फाईलों को आप -
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  • Linux पर सभी प्रोग्रामो में - सुन सकते हैं।
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इस चिट्ठी में चित्र ग्नू स्वतंत्र अनुमति पत्र की शर्तों के अन्दर प्रकाशित हैं।











यह पोस्ट मेरी बर्लिन यात्रा का संस्मरण है और भारतीय सभ्यता, संस्कृत, और उपनिषद के जर्मन विद्वान – मैक्स मुलर के बारे में है। यह हिन्दी (देवनागरी लिपि) में है। इसे आप रोमन या किसी और भारतीय लिपि में पढ़ सकते हैं। इसके लिये दाहिने तरफ ऊपर के विज़िट को देखें।

yah post berlin yatraa ka sansmranna hai aur bharteey sbhyta, sanskrit, aur upnishad ke vidvan - max muller ke baare men hai. yah hindee {devanaagaree script (lipi)} me hai. ise aap roman ya kisee aur bhaarateey lipi me padh sakate hain. isake liye daahine taraf, oopar ke widget ko dekhen.

This post is part my travel to Berlin and is about Max Muller, German scholar of Indian philosphy, Sanscrit and Indian scripture. It is in Hindi (Devnagri script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.


सांकेतिक शब्द
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8 comments:

  1. 'जर्मनियों को आश्चर्य हुआ'

    जो नहीं जानते उन भारतीयों को भी आश्चर्य होगा.

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  2. संजयजी नें ठीक कहा, किन्‍तु आपने जैसे मूलर को याद दिलाया वैसे ही सामयिक रूप से उल्‍लेख उचित है इससे नहीं जानने वालों/भुला देने वालों को भी इनके सिद्धांत याद आ जाते हैं ।

    संजीव

    छत्‍तीसगढ के शक्तिपीठ – 2

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  3. मैक्समुलर हमारे लिये तो महत्वपूर्ण नाम है।

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  4. उन्मुक्त जी आपने अपने ब्लॉग पर बर्लिन यात्रा के सन्दर्भ मे मैक्समुलर की चर्चा कर एक बार फिर हमें अपने गौरवमय अतीत की याद दिला दी है ,मगर आश्चर्य है कि इस महान मेधा के धनी विद्वान को लोग ख़ुद उसकी जन्मभूमि पर ही भूल चुके हैं .
    मगर हम उनके चिर ऋणी हैं ,उनके विपुल साहित्य से परिचय कराकर आपने बहूत अछा किया ....कोटिशः धन्यवाद

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  5. आज यह भी जान गए सिर्फ भारत के ही लोग अपने महापुरुषो को नहीं भूलते विदेशों में भी लोग अपने महापुरुषों को भूल जाते हैं.

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  6. मुझे भी बहुत आश्चर्य हुआ यह जानकर....मैंने भी मॅक्स म्युलर का नाम काफ़ी सुना था लेकिन केवल जर्मन सन्दर्भ में...मुझे कभी न पता था की संस्कृत के लिए भी उनका इतना योगदान रहा है...

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  7. रचना7:25 am

    मै इन सब मे से कुछ पुस्तकें जरूर पढना चाहूँगी..

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  8. ईश्वर बार-बार इस प्रका के विद्वान को धरा पर नहीं भेजते |

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