Friday, August 21, 2026

हैबियस कॉर्पस केस के पच्चास साल:

मैं, उस समय

आपातकाल, सर्वोच्च न्याययालय और संविधान

मैं इस केस में भागीदार कैसे बना 

सारांश: यह एक नयी श्रंखलाा, 'हैबियस कॉर्पस केस के पच्चास साल: आपातकाल, सर्वोच्च न्याययालय और संविधान' नाम से है। 

यह ऐडीएम जबलपुर बनाम शिव कांत शुक्ल, AIR १९७६ SC १२०७: (१९७६) २ SCC ५२१, यानी प्रसिद्ध हैबियस कॉर्पस केस के बारे में है।

इस फैसले ने आज़ादी के दरवाज़े खोलने के बजाय बंद कर दिए थे। यह फैसला २८ अप्रैल १९७६ को सुनाया गया था। पचास साल बीत चुके हैं। यह समझना दिलचस्प है कि उस वक़्त मुद्दा क्या था, माहौल कैसा था, और बाद में, इस केस का क्या असर हुआ। 

हैबियस कॉर्पस केस के पच्चास साल:

आपातकाल, सर्वोच्च न्याययालय और संविधान

मैं इस केस में भागीदार कैसे हिस्सा बना।। 

१९७३ में क़ानून की डिग्री लेने के बाद मैंने बांदा जिला न्यायालय में वकालत शुरू की, जहां मेरे दो चाचा (योगेन्द्र कुमार सिंह चौधरी और ज्ञानेन्द्र कुमार सिंह चौधरी)—एक सिविल और रेवेन्यू की अदलातों में और दूसरे फौजदारी की अदालतों में—वकालत करते थे। 

एक साल बाद मैं कानपुर ज़िला न्यायालय में, बैरिस्टर नरेंद्र जीत सिंह के साथ वकालत करने चला गया। उनकी पत्नी को कश्मीर में ज़मीन-जायदाद विरासत में मिली थी, इसलिए वे हर साल वहां जाते थे। एक साल बाद उन्होंने मुझे १९७५ की गर्मियां श्रीनगर में बिताने का न्यौता दिया, जो मैंने खुशी-खुशी स्वीकार कर लिया।

उस चर्चित रात, २५-२६ जून की मध्यरात्रि, जब आंतरिक आपातकाल लगी, तब मैं ट्रेन में था। मैं इलाहाबद अपने पिता, वीरेन्द्र कुमार सिंह चौधरी ( वीरेन्द्र भाई साहब) (दद्दा) के चेंबर में शामिल होने जा रहा था।

मेरे पिता राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के अधिकारी थे। हमारा परिवार और रज्जू भैया (बाद में संघ के चौथे सरसंघचालक) के बीच परिवारिक संबन्ध था। हमारे घर एक ही परिसर में थे। वे रोज़ सुबह अख़बार पढ़ने और अक्सर शाम को शाखा के बाद हमारे घर आते थे।

रज्जू भैया भैया, उस ज़ुल्म के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए भूमिगत हो गए। 

४ जुलाई १९७५, की सुबह, पुलिस ने हमारे घर को घेर लिय़ा। वे विनम्र थे उन्होंने नेरे पिता को सुबह सारे काम करने दिये, उन्हें वे नाश्ता करने के बाद पकड़ कर ले गये। 

सबसे पहले, उन्हें डिफेंस ऑफ़ इंडिया रूल्स (DIR) के तहत गिरफ़्तार किया गया। उन्हें ज़मानत मिल गई, लेकिन जेल से बाहर आने से पहले ही उन्हें मेंटेनेंस ऑफ़ इंटर्नल सिक्योरिटी ऐक्ट (MISA) के तहत, फिर से हिरासत में ले लिया गया—यह वही क़ानून है जो अब नेशनल सिक्योरिटी ऐक्ट (NSA) के नाम से जाना जाता है।

हमने मेरे पिता की रिहाई के लिए हैबियस कॉर्पस याचिका दायर की। राज्य सरकार ने शुरू में ही एक आपत्ति की, कि हैबियस कॉर्पस पोषनीय नहीं है। मामला पांच जजों की बेंच के पास भेजा गया। चार से एक के अन्तर से, फैसला से हमारे पक्ष में रहा। लेकिन राज्य सरकार ने, फैसले को, सर्वोच्च न्याययालय में चुनौती दी। इस तरह से, मैं हैबियस कॉर्पस केस में भाग ले सका। 

यह वही केस है जिसने न्यायमूर्ति एचआर खन्ना को सर्वोच्च न्याययालय की बेंच पर बैठने वाले सारे न्यायाधीशों में, सबसे महान न्यायाधीश बना दिया, और जिसके सम्मान में न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा था कि भारत के हर शहर में उनकी एक मूर्ति लगाई जानी चाहिए।

अगली बार हम बात करें कि इस केस में मुद्दा क्या था। 

#ADM JabalpurVersusShivkantShuklz #TheHabeasCorpusCase #VKSChaudhary #VirendraBhaiSaheb #Dadda #VirendraKumarSinghChaudhary #InternalEmergency #Emergency 

No comments:

Post a Comment

आपके विचारों का स्वागत है।