Sunday, April 09, 2006

अनुगूंज १८: मेरे जीवन में धर्म का महत्व

धर्म की पाती, अनुगूंज के नाम।
बताती है अपना धाम,
इसी के साथ अपना काम।
यही है, उन्मुक्त के जीवन का धर्म,
यही है, उन्मुक्त के जीवन में इसका महत्व।

Akshargram Anugunj

नहीं बसता मैं किसी मन्दिर या मस्जिद में,
न ही रहता हूं किसी गिरिजाघर या गुरुद्वारे में,
न ही बसता हूं किसी पूजा घर में।
यह तो है केवल अपना दिल बहलाना,
मैं तो हूं तुम्हारे आशियाना।

मैं नहीं पाया जाता पुरी, रामेश्वर में,
न ही मक्का, मदीना में,
जेरूसलम या कोई अन्य पवित्र स्थल भी नहीं है मेरे ठिकाने।
यह सब तो है लोगों के अफसाने,
तरीके दिल बहलाने के,
क्योंकि मैं तो वास करता हूं, तुम्हारे मन मानस में।

मुझे, न बता सकते हैं कोई महात्मा, योगी,
न ही कोई बाबा सांई,
न ही मेरी व्याख्या कर सके फकीर, पादरी।
यह तो सब हैं लोगों के फसाने,
तरीके खुद को फुसलाने के।

मैं नहीं सीमित गीता या रामायण में,
न ही हूं बंधा बाईबल या कुरान में।
यह तो थे अपने समय के उचित आचरण,
मैं तो हूं ऊपर इनसे।
मैं नहीं बंधता समय से,
मैं हूं स्वयं समय,
क्या करूंगा, खुद से लड़ कर।

जो परम्परा समय के साथ नहीं बदलती,
वह कहलाती रूढ़िवादिता।
मैं नहीं हूं, रूढ़िवादिता,
न ही, जकड़ा जा सकता किसी परम्परा से।
मैं नही बन्धता इनसे,
मैं तो हूं उन्मुक्त, इन बन्धनों से परे।

मैं न तो हूं राम, न ही कृष्ण,
न ही अल्लाह, न ही पैगमबर,
न ही हूं मैं ईसा मसीह,
या पूजा किये जाने वाले कोई और नाम।
यह तो हैं तरीके, लोगों को समझाने के,
मैं तो हूं ऊपर इन सबके।

नही हूं मैं दकियानूसी,
न ही हूं, अन्धी आधुनिकता।
मैं तो हूं केवल एक आचरण।

मैं नही वह आचरण, जो तोड़े दूसरों के पूजा स्थल।
मैं तो हूं वह आचरण,
जो जवानी के मदहोश दिवानो से, रात में अकेली अबला चाहे;
अभिलाशे दंगे में फंसा इन्सान, आवेश में अधें दंगाइयों से।

मैं नहीं धरोवर केवल हिन्दुवों की,
न ही केवल मुस्लिम, सिख, ईसाई की।
मैं तो हूं वह आचरण,
जो पाया जाये, सब मज़हब में।

मैं नही हूं विचारों का टकराव।
मैं तो हूं दूसरे के विचारों का समझाव।
मैं करता विचारों का आदर, समझता दूसरों का पक्ष।
मैं तो हूं अलग अलग विचारों का सगंम,
जो लाता जीवन में कभी खुशी कभी गम।

मैं हूं वह आचरण—
जो आप अपने लियें चाहें, दूसरे से;
या आप लें, अपने ईमान से।

जो मेरे मर्म को जाने,
नहीं जरूरत उसे किसी पूजा स्थल की।
न ही किसी इष्ट देव की,
शान्ति रहे हमेशा, उससे चिपकी।1

जो चले मेरे रस्ते
न भटके वह,
किसी महात्मा, फकीर के बस्ते।
क्योंकि मैं हूं हमेशा संग उसके।

जो मेरे महत्व को समझे
करे कर्म का वह सेवन,
कर्म ही पूजा, कर्म ही उसका जीवन।
उसका मन, मानस चले संग।

आओ ढूढ़ो, पहचानो मुझको,
मैं हूं खड़ा तुम्हारे अन्दर।
मैं तो हूं केवल,
जी हां, केवल
अन्त:मन से लिया गया विवेकशील आचरण।

1इसका एक पहलू अगली बार

Saturday, April 08, 2006

९. ओपेन सोर्स सौफ्टवेर - फ्री सौफ़टवेर: इतिहास

इस विषय में पिछली पोस्ट - कौपीलेफ्ट पर

कौपीलेफ्ट शब्द का प्रयोग होने के पहले और अब भी ऐसे सौफटवेयर के लिये फ्री शब्द प्रयोग किया जाता है|

फ्री शब्द का प्रयोग करना रिचर्ड स्टालमेन ने शुरू किया और यह आन्दोलन भी उनका ही शुरू किया गया है| वे 1980 के दशक में मैसाचुसेट इस्टिंट्यूट आफ टेक्नौलोजी में पढ़ाते थे । उनके मुताबिक पहले कम‍प्यूटर प्रोग्रामर सौफटवेयर में कापीराइट क्लेम नहीं करते थे और बहुत आसानी से एक दूसरे को अपना प्रोग्राम दे देते थे लेकिन बाद में कमप्यूटर प्रोग्रामरों ने अपना प्रोग्राम एक दूसरे को देना बन्द कर दिया और किसी और को उनके प्रोग्राम में संशोधन करने का अधिकार भी समाप्त कर दिया । स्टालमेन को लगा कि इस तरह से कम‍प्यूटर सौफटवेयर कुछ खास लोगों के पास रह जायेगा और उसका सर्वांगीण विकास नहीं हो पायेगा । इसलिये उन्‍होंने अपना इन्‍स्‍टीटयूट को छोड कर घन्यू प्रोजेक्‍ट (GNU project), फ्री सौर्स फाउण्डेशन (Free Source Foundation) के अंतर्गत शुरू किया| इसमें उस तरह के सौफटवेयर लिखने शुरु किये जो कि कौपीलेफ्टेड हों|

उन्होंने इस तरह के साफटवेयर को फ्री-सौफटवेयर का नाम दिया| यह इसलिये, क्यों कि उनके मुताबिक इसमें लोगों को कम‍प्यूटर प्रोग्राम या सौफटवेयर को संशोधन करने की स्वतंत्रता है उनका कहना है कि फ्री को ऐसे मत सोचो जैसा फ्री बीयर में है पर ऐसे देखो जैसा कि फ्रीडम आफ स्पीच में है| फ्री सौर्स फाउण्डेशन की वेबसाईट के मुताबिक, उन्ही के शब्दों में
'Free software' is a matter of liberty, not price. To understand the concept, you should think of 'free' as in 'free speech', not as in 'free beer'.


फ्री सौफ़टवेर की क्या शर्तें है तथा इसे क्यों गीपीएल्ड (GPLed) सौफ्टवेर भी कहा जाता है इसके बारे में चर्चा - अगली बार

Friday, April 07, 2006

बोरियत से बचने के लिये, उमंग क्या कर रहा है

पिछली बार यह बताने की बात हुई थी कि उमंग बोरियत से कैसे बच रहा है—यह रहा उसका तरीका|

मैं बहुत दिनो से अपने मित्र उमंग के यहां जाने की सोच रहा था| पिछले इतवार सुबह की सैर के बाद उसके यहां चाय पीने जा पहुंचा| देखा कि महाशय लौन में कुर्सी बैठे थे, मुंह से धुंआ, हांथ में पेन्सिल, सर मेज पर झुका हुआ, और मेज के ऊपर अखबार| उमंग की पत्नी बहुत चाहती है कि उमंग की सिग्रेट छूट जाये पर यह लत ऐसी लगी कि छोड़ने का नाम ही नही ले रही है इन दोनो के बीच बस यही टकरार है पर इसके अलावा सब बढ़िया|

'अच्छा तो सुबह, सुबह क्रौसवर्ड हो रहा है' मैने कहा|

'३ नहीं चलेगा, यहां ९ चलेगा|' मैने उसे बुदबुदाते सुना|

'अरे भाई क्रौसवर्ड में नम्बर कब से चलने लगे' मेरी अवाज कुछ उसका मज़ाक बनाते हुए थी|

'अरे उन्मुक्त अभी तक हिन्दी चिठ्ठेकारों को बोर करते थके नहीं, कि यहां भी चले आये| अरे घनचक्कर यह सुडोकू है न कि क्रौसवर्ड| समय काटने, दिमाग को चुस्त रखने, और बोरियत दूर करने के लिये इससे और कोई अच्छा तरीका नही' उसने कहा|

इसके पहले वह कुछ और कहता कि अन्दर से प्यारी सी आवाज आयी, 'उमुंक्त भैय्या बहुत अच्छे समय पर आये हो, आलू के परांठे बना रही हूं खा कर जाना, दही शहद के से लोगे या आम के अचार के साथ|'

'दोनो के साथ' मैने वहीं से कहा|

मुन्ने की मां को मालुम है कि मेरा उमंग के घर जाने का मतलब नाशता या खाना उसी के यहां| उमंग मेरे बचपन का दोस्त है और हम लोग साथ साथ खेले हैं| उमंग थोड़ा पढ़ाकू किस्म का है और पढ़ाई के बाद अध्यापक हो गया है| उमंग की पत्नी और मुन्ने की मां एक ही जगह से हैं हांलाकि शादी के पहिले जान पहचान नहीं थी पर उमंग की पत्नी सुलझी हुई महिला है और मुन्ने की मां की उससे अच्छी पटती है| मेरी और उमंग कि भी दोस्ती शायद इसी लिये चल रही है कि इन दोनो की पटती है| मुझे समझ मे नही आता है कि लोगों की दोस्ती बरकरार रहने के लिये पत्नियों का भी आपस मे पटना क्यों जरूरी है|

इधर उमंग चालू हो गया सुदोकू के बारे में, 'इसमें क्रौसवर्ड की तरह खाने होतें हैं पर वर्णमाला के अक्षर होने के बजाय कुछ खानों में अकं लिखे होते हैं जिन्हे givens कहा जाता है| बाकी खाने खाली होते हैं जिसमे अकं भरने होते हैं पर वह अकं न तो उस खाने की समतल लाईन, न ही खड़ी लाईन, और न ही उस ब्लौक में होना चाहिये'|

उसने बात को आगे बढ़ाते हुये कहा, 'यह खेल बहुत पुराना नहीं है सबसे पहिले १९७९ में डेल पेसिंल पज़लस एन्ड वर्ल्ड गेमस (Dell Pencil Puzzles & Word Games) नामक एक अमेरिकन पत्रिका में छपा था| इसका ईज़ाद भी वहीं हुआ'

'पर नाम तो जापनी है' मैने अपना ज्ञान बघेरा|

'हां' उसने समझाया| 'यह जपान में ज्यादा लोकप्रिय हो गया तथा वहां पहिले इसे "सूजी वा दोकुशिन नी कगिरू" (suji wa dokushin ni kagiru) कहा गया जिसका मतलब है "केवल एक ही नम्बर हो सकता है"| यह छोटा होकर सुडोकू (Sudoku)हो गया है| अब यह इतना लोकप्रिय हो गया है कि इसकी विश्व प्रतियोगितायें भी होती हैं'

मैने भी कोशिश की| लगा कि अच्छी दिमागी कसरत है| करके देखिये और अपने मुन्ने और मुन्नी से भी करने को कहिये| यह रखेगा अपके दिमाग को चुस्त और ताजा|

यदी इसके बारे कुछ विस्तार में जानकारी चाहें तो अमेरिकन साईटिंस्ट का यह लेख देखें|

चलूं देखूं कौन दरवाजा खटकटा रहा है लगता है धर्मदास जी आ गये हैं| कई दिन से वे अनुगूंज के लिये चिठ्ठी लिखने को कह रहे हैं| यदि नही लिखी, तो गड़बड़ होगी| मुन्ने की अम्मा, मुझसे बात करना छोड़ देगी - अगली बार वही|

Thursday, April 06, 2006

८. ओपेन सोर्स सौफ्टवेर – कौपीलेफ्ट

इसी विषय पर पिछली पोस्ट थी—सौफ्टवेर कैसे सुरक्षित होता है


 कुछ लोग कॉपीराइट का वर्णन कर कंप्यूटर प्रोग्राम को सुरक्षित  इस प्रकार से  कर रहे हैं कि न तो वे स्वयं उस पर कोई भी मालिकाना हक रख रहें हैं न ही कोई और व्यक्ति उनके द्वारा बनाये गये कं‍प्यूटर प्रोग्राम पर मालिकाना अधिकार रख सकता है। उदाहरणार्थ, यदि मैं कोई कं‍प्यूटर प्रोग्राम लिखूं और उसका सोर्स कोड और ऑबजेक्ट कोड में इस तरह की घोषणा तथा शर्त लगाते हुये प्रकाशित करूं कि

  • यह मैने लिखा है; और
  • इसमें मेरा कॉपीराइट है; और
  • मैं हर व्यक्ति को इस कम‍प्यूटर प्रोग्राम (सोर्सकोड और ऑबजेक्ट कोड) की कापी करने, वितरण करने, तथा संशोधन करने का अधिकार देता हूं। इसके लिये उन्हें मुझे कोई रॉयलटी नहीं देनी होगी;
पर इसकी शर्त यह है कि,

  • यदि वह व्यक्ति कम‍प्यूटर प्रोग्राम का संशोधित करके या बिना संशोधित किये वितरित करता हैं तो उसे भी सोर्सकोड और ऑबजेक्ट कोड प्रकाशित करना होगा; और
  • अन्य लोगों को वही स्वतंत्रता देनी होगी जैसी कि मैंने उसे दी है।
अब इस घोषणा और शर्त के कारण न तो मैं स्वयं न और कोई अन्य व्यक्ति इस कं‍प्यूटर प्रोग्राम के प्रयोग करने अथवा संशोधन करने हक रख सकता है। इस तरह की घोषणा के द्वारा मैने सुनिश्चित कर दिया है कि कोई अन्य व्यक्ति भी इसका प्रयोग अथवा संशोधन बिना कॉपीराइट के उल्लंघन किये कर सकता है । साधारणतय:,  कॉपीराइट का अर्थ यह होता है कि कोई अन्य व्यक्ति उसका प्रयोग अथवा संशोधन उसके मालिक की अनुमति के  न कर सके। यहां कॉपीराइट का प्रयोग करते हुये ठीक इसका उल्टा काम हुआ। कॉपीराइट का यदि कोई उल्टा शब्द हो सकता है तो वह है कॉपीलेफ्ट। यह एक नया शब्द है और अभी तक अंग्रेजी के शब्द कोश में नहीं आया है हालांकि कंप्यूटर शब्दकोश में यह एक प्रचलित शब्द है। जिस कं‍प्यूटर प्रोग्राम के लाईसेंस में इस तरह की घोषणा और शर्त होती है उसे कॉपीलेफ्टेड सॉफ्टवेयर कहा जाता है। इस तरह का सॉफ्टवेयर फ्री सॉफ्टवेयर, भी कहलाता है। इसके बारे में - अगली बार।

Wednesday, April 05, 2006

लोगों को बोर कर रहे हो

मेरी '६. ओपेन सोर्स सौफ्टवेर – कौपीराइट एवं ट्रेड सीक्रेट' पोस्ट पर एक अज्ञात टिप्पणी के बारे में मेरी पत्नी ने कहा कि किसी ने मुझे अप्रैल फूल बनाया है। मैं कहां दबने वाला; तुरन्त उस अज्ञात व्यक्ति के लिये एक चिठ्ठा 'पल भर के कोई हमें प्यार कर ले' पोस्ट किया। एक टिप्पणी फिर आ गयी। मैने जैसे ही टिप्पणी देखी, तो आवाज दी,
'मुन्ने कि मां. देखो ने फिर से टिप्पणी आ गयी है और नाम भी है। अब तो मान गयीं, कि किसी ने मुझे अप्रैल फूल नहीं बनाया।'

'देखूं' वह किचेन से निकल रही थी और हाथ साड़ी में पोंछती हुई बोली। देखने के बाद कहा,
'मुझे जरा पुरानी टिप्पणी तो दिखाओ।'
देखने के बाद, वह कुछ शर्लौक होम्लस के अन्दाज मे बोली,
'अच्छा तो यह माज़रा है'।
'क्या माज़रा है', मैने घबराते हुए सवाल पूछा। उसने मेरी तरफ ऐसे देखा जैसे कह रही हो elementary my dear Watson फिर बोली
'देखो दोनो टिप्पणी एक ही है न'।
मैने कहा
'हां, तो क्या टिप्पणी तो आयी है।'

उसने मेरी बात की अनसुनी कर दी। वह कई बार मुझसे कह चुकी है कि यदि चौका चूल्हा मैं सम्भाल लू और वह काम करे तो हम लोगों की ज्यादा तथा जल्दी तरक्की हो। उसने मुझे दिखाते हुये सम्झाया कि दोनो टिप्पणी एक ही हैं और कोई अन्तर नही है। उसकी यह बात सच है उसने इसके तीन कारण बताये:
  1. तुम्हारे कमप्यूटर में कोई वायरस आ गया। यदि यह है तो बहुत अच्छा है क्योंकि कुछ दिन तक इस मुये कमप्यूटर से तो छुट्टी मिली; मुन्ने और मुझे तो समय मिलेगा।
  2. यह टिप्पणी कोई व्यक्ति न करके कोई मशीन कर रही हो।
  3. यदी पहली दोनो बात सच नहीं हैं तो तुम अवश्य लोगों को बोर कर रहे हो।
मैंने झुंझलाते हुए कहा कि
'यदी तीसरी बात सच है तो तुम कैसे कह सकती हो कि मैं लोगों को बोर कर रहा हूं'।

उसने ठन्डे स्वर में कहा,
'टिप्पणी की आखरी पंक्ति पढ़ो। तुमने हिन्दी में लिखा और वह चायनीज़ भाषा के बारे में कह रहा है। बोर कर रहे होगे, इसी लिये वह ऐसा कह रहा है।'

मुन्ने का टिफिन लगाना है कह कर चल दीं। मैने जाते जाते, उसे बुदबुदाते सुना,
'यदी मैं तुम्हे इन २५ सालों में समझ पायी हूं तो तीसरी ही बात सच होगी|'
मैं अक्सर सोचता हूं यदी उसने मुन्नी और मुन्ने का इतना अच्छा ख्याल न रखा होता या खाना इतना लाचीज़ न बनाती तो बस मैं ....श श श कहीं उसने पढ़ लिया तो।

मैने भी तीनो संभावनावों पर बारी बारी विचार करना शुरू किया,
  • मेरा कमप्यूटर लिन्कस पर है। लिनेक्स पर वायरस नहीं आते हैं पर आ तो सकते हैं। यदि आये तो इस सोते हुये कस्बे में कोई ठीक नही कर सकता है बाहर ही ले जाना पड़ेगा। चेतावनी: नारद जी यदि १५ दिन तक मेरा कोई चिठ्ठा पोस्ट न हो तो समझ जाईयेगा। कहीं से वायरस आ रहा है। संजय जी तरकश से कोई न कोई अच्छा तीर निकाल कर चलाइयेगा, ताकि और किसी को न तंग कर पाये। मैने तो अपना सारा डाटा का बैक अप ले लिया है।
  • मैने ब्लौगरस डौट कौम से पूछा है कि शब्द सत्यापित करके टिप्पणी देने वाले प्रोग्राम की क्या किसी ने काट निकाल ली है। उन्होने कहा है कि वे टेस्ट करके बतायेंगे। जैसे ही मुझे कुछ पता चलता है मैं आप तक पहुंचाता हूं
  • ह म् म् म् म् म् म् ..... यह तो बिलकुल बेकार की बात है। हर जना मुझसे कहता है कि मैं लोगों को बोर कर रहा हूं। इसका मतलब यह थोड़ी है कि यह बात सही है। मैं तो यह एक कान से सुनता हूं और दूसरे से निकाल देता हूं। पिछले इतवार को उमंग ही मुझसे यही कह रहा था। उसने तो इस बोरियत से बचने के लिये कुछ करना शुरू कर दिया है।
अब आप पूछेंगे कि उमंग ने क्या करना शुरू कर दिया है आप भी तो बोरियत से बचना चाहते होगें - यह अगली बार।

Tuesday, April 04, 2006

७. ओपेन सोर्स सौफ्टवेयर – सॉफ्टवेयर कैसे सुरक्षित होता है

इस विषय पर कौपीराइट एवं ट्रेड सीक्रेट के बारे में पिछली पोस्ट|

१. कॉपीराइट की तरह: इस विषय की चौथी पोस्ट (४. ओपेन सोर्स सौफ्टवेर – सौफ्टवेर क्या है) पर चर्चा की थी कि आजकल सोर्सकोड ऊचें स्तर की कमप्यूटर भाषाओं (high level languages) में अंग्रेजी भाषा के शब्दों एवं वर्णमाला का प्रयोग करते हुये लिखा जाता है। यह उस सॉफ्टवेयर के कार्य करने के तरीके को बताता है तथा यह एक तरह का वर्णन है। यदि, इसे प्रकाशित किया जाता है तो उस सॉफ्टवेयर के मालिक या जिसने उसे लिखा है उसका कॉपीराइट होता है।

ऑबजेक्ट कोड कम्प‍यूटर को चलाता है और यह हमेशा प्रकाशित होता है, परन्तु क्या यह किसी चीज का वर्णन है अथवा नहीं इस बारे में शक था। ट्रिप्स के समझौते के अन्दर यह कहा गया कि कंप्यूटर प्रोग्राम को कॉपीराइट की तरह सुरक्षित किया जाय। इसलिये ऑबजेक्ट कोड हमारे देश में तथा संसार के अन्य देशों में इसी प्रकार से सुरक्षित किया गया है।

कंप्यूटर प्रोग्राम के ऑबजेक्ट कोड तो प्रकाशित होतें हैं पर सबके सोर्स कोड प्रकाशित नहीं किये जाते हैं। जिन कमप्यूटर प्रोग्राम के सोर्स कोड प्रकाशित किये जाते हैं उनमें तो वे कॉपीराइट से सुरक्षित होते हैं। पर जिन कंप्यूटर प्रोग्राम के सोर्स कोड प्रकाशित नहीं किये जाते हैं वे ट्रेड सीक्रेट की तरह सुरक्षित होते हैं।

२. ट्रेड सीक्रेट की तरह: मालिकाना कंप्यूटर प्रोग्राम में समान्यत: सोर्स कोड प्रकाशित नहीं नही किया जाता है तथा वे सोर्स कोड को ट्रेड सीक्रेट की तरह ही सुरक्षित करते हैं। यह भी सोचने की बात है कि वे सोर्स कोड क्यों नही प्रकाशित करते हैं?

सोर्स कोड से ऑबजेक्ट कोड कम्पाईल (compile) करना आसान है; यह हमेशा किया जाता है और इसी तरह प्रोग्राम लिखा जाता है। पर इसका उलटा यानि कि ऑबजेक्ट कोड से सोर्स कोड मालुम करना असम्भ्व तो नहीं पर बहुत मुश्किल तथा महंगा है। इस पर रिवर्स इन्जीनियरिंग का कानून भी लागू होता है। इसी लिये सोर्स कोड प्रकाशित नहीं किया जाता है। इसे गोपनीय रख कर, इसे ज्यादा आसानी से सुरक्षित किया जा सकता है। रिवर्स इन्जीनियरिंग भी रोचक विषय है, इसके बारे पर फिर कभी।

३. पेटेन्ट की तरह: ‘बौधिक सम्पदा अधिकार (Intellectual Property Rights)’ शीर्षक में चर्चा हुई थी कि सॉफ्टवेयर को पेटेन्ट के द्वारा भी सुरक्षित करने के भी तरीके हैं कई मालिकाना सॉफ्टवेयर इस तरह से भी सुरक्षित हैं पर यह न केवल विवादास्पद हैं, पर कुछ कठिन भी हैं। इसके बारे में फिर कभी।

४. सविंदा कानून के द्वारा: सविंदा कानून(Contract Act) भी सॉफ्टवेयर की सुरक्षा में महत्वपूण भूमिका निभाता है। आप इस धोखे में न रहें कि आप कोई सॉफ्टवेयर खरीदते हैं। आप तो केवल उसको प्रयोग करने के लिये लाइसेंस लेते हैंl आप उसे किस तरह से प्रयोग कर सकते हैं यह उसकी शर्तों पर निर्भर करता है । लाइसेंस की शर्तें महत्वपूण हैं। यह सविंदा कानून के अन्दर आता है।

ओपेन सोर्स सॉफ्टवेयर में सोर्स कोड हमेशा प्रकाशित होता है। यह किस प्रकार का सॉफ्टवेयर होता है यह इसके लाइसेंसों की शर्तों पर निर्भर करता है, जिसके अन्तर्गत यह प्रकाशित किये जाते हैं। इसके बारे में बात करने से पहिले हम लोग बात करेगें: कॉपीलेफ्ट (Copyleft), फ्री सॉफ्टवेयर, और जी.पी.एल. {General Public License (GPL)} की। यह उस सौफ्टवेर के कार्य करने के तरीके को बताता है तथा यह एक तरह का वर्णन है यदि इसे प्रकाशित किया जाता है तो उस सौफ्टवेर के मालिक या जिसने उसे लिखा है उसका कौपीराइट होता है|

अगली बार - कौपीलेफ्ट
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Monday, April 03, 2006

पल भर के कोई हमें प्यार कर ले

मैने २ अप्रैल को '६. ओपेन सोर्स सौफ्टवेर – कौपीराइट एवं ट्रेड सीक्रेट' नाम का चिठ्ठा पोस्ट किया था। उसी दिन इस पर एक अज्ञात टिप्पणी इस प्रकार की आयी।
'hello my friend!
i'm portuguese and your blog is amazing!
stay like this!
bye-bye!
a little thing: I don't know read chinese!

7:09 PM' प्रसन्नता और आश्चर्य दोनो एक साथ: पुर्तगाली लोग भी हिन्दी में लिखे चिठ्ठे पढ़ते हैं; नारद मुनि ने कहां तक आपनी पैंठ बना ली। फिर आखरी लाईन पढ़ी, तो सोचा कि यदि इस पोस्ट को चाईनीस़ समझ कर अनुवाद किया जाय तो इसका जरूर कोई आश्चर्यजनक मतलब निकलेगा। फिर लगा कि सच है भी कि नहीं। अरे मित्र, इस तरह की पोस्ट अज्ञात नही की जाती है। इंडीब्लागीस प्रतियोगिता-नामांकन शुरू हो गया है, नारद मुनि तो यही कहेंगे कि उनमुक्त जी ने तो अभी से अपनी ही ढपली बजानी शुरू कर दी है। कम से कम नाम तो लिखा करो; कुछ तो विश्वसनीय लगे।

टिप्पणी में कुछ अच्छी बात भी लिखी थी; पत्नी को दिखायी, तो बोली,
'अरे अकलमन्द यदी हिन्दुस्तान में २ अप्रैल है तो पश्चिम में १ अप्रैल होगी। आखरी लाईन से तो लगता है कि तुम्हारे किसी मित्र या फिर किसी पाठक ने तुम्हे अप्रैल फूल बनाया है'
बात समझ में आयी। पत्नियों की बातें तो कभी गलत होती नहीं; कम से कम उनके पतियों के लिये।

खैर बहुत साल पहिले एक पिक्चर देखी थी, भूल गया कि कितने साल पहिले की बात है। उसमे एक गाना सदा बहार देव आनंद ने हेमा मालिनी की शोख अदायों पर गाया था। मै पूरा गाना भूल गया हूं, उसकी लय और कुछ पंक्तियां याद हैं। इस टिप्पणी पर याद आयीं,
पल भर के कोई हमें प्यार कर ले
झूठाऽऽ ही सही
ल ल ल ला ल ला ला
झूठाऽऽ ही सही।

Sunday, April 02, 2006

६. ओपेन सोर्स सौफ्टवेर – कौपीराइट एवं ट्रेड सीक्रेट

इस विषय पर पिछला चिठ्ठा|
कौपीराइट
कौपीराइट किसी चीज के वर्णन में हैं। यदि आप कोई अच्छी कहानी लिखें, या कोई गाना संगीत-बद्ध करें, या पेन्टिंग करे तो यह किसी चीज़ का वर्णन होगा| उसमें आपका कापीराइट होगा| यदी उसे प्रकाशित करें तो कोई और उसे आपकी अनुमति के बिना प्रयोग नही कर सकता है|

ट्रेड सीक्रेट
ट्रेड सीक्रेट जैसा की नाम कहता है यह केवल उसी को मालुम होता है जो उसे निकालता या ढ़ूढता है| दुनिया का सबसे अचछा ट्रेड सीक्रेट है कोका-कोला का नुसखा| उसे केवल कोका-कोला के मालिक ही जानते हैं| कोका-कोला का मिश्रण गाढ़े रूप में आता है और लोग तो केवल उसमें पानी मिलाते हैं और बोतलों में भरते हैं|

ट्रेड सीक्रेट को सुरक्षित करने के लिये दुनिया के कई देशों में अलग कानून है पर अपने देश में नहीं| इसके लिये तो संविदा तोड़ने या विश्वास तोड़ने का मुकदमा ही ठोका जा सकता है| हांलाकि ट्रिप्स इस तरह का कानून बनाने को कहता है पर हमने नहीं बनाया | हमारे हिसाब से संविदा या विश्वास तोड़ने का मुकदमा दायर करना, ट्रिप्स की शर्तों को पूरा करता है| चलिये जब विश्व व्यापार संगठन में कोई यह मुद्दा उठायेगा तो देखेंगे, हम तो अगली बार की चिन्ता करें जब हम बात करेंगे कि सौफ्टवेर कैसे सुरक्षित होता है|


इसमें पहली टिप्पणी पर पोस्ट 'पल भर के कोई हमें प्यार कर ले'

Saturday, April 01, 2006

धर्म - मेरे विचार से

लगता है कि हिन्दी चिठ्ठाकारों के बीच धर्म की बहस गर्म हो रही है। इसमें मेरे विचार भी - मालुम नहीं कि घी का काम करेगें या पानी का।

मैं agnostic (अज्ञेयवादी) हूं। मेरे विचार से—
  • दूसरे से अपने प्रति जिस आचरण की आपेक्षा हो, वही आचरण दूसरे के साथ करना;
  • जिस आचरण को अपना अन्त:मन ठीक कहे, उस आचरण का ही पालन करना;
  • जिस आचरण को अपना अन्त:मन ठीक न कहे, उसको त्यागना—
ही धर्म है।

Agnostic की हिन्दी अज्ञेयवादी ही है न? अंग्रेज़ी का शब्द इस लिये प्रयोग किया क्योंकि मैं agnostic के हिन्दी अर्थ के बारे में विश्वस्त नहीं था। पिछली बार धार्मिक शब्द के गलत प्रयोग पर आलोक जी ने गलती ठीक की थी। क्या Agnostic के हिन्दी शब्द की कोई पुष्टि करेगा?

५. ओपेन सोर्स सौफ्टवेर - बौधिक सम्पदा अधिकार (Intellectual Property Rights)

इस विषय पर पिछला चिठ्ठा|
बौधिक सम्पदा अधिकारों मस्तिक्ष की उपज हैं| दुनिया के देश, कई सदियों से अपने-अपने कानून बना कर इन्हे सुरक्षित करते चले आ रहें हैं | सन १९९५ में विश्व व्यापार संगठन (World Trade Organisation) बना| इस संगठन का एक समझौता है Agreement on the Trade related aspect of intellectual property rights (TRIPS) या ट्रिप्स| सारे देश जो विश्व व्यापार संगठन के सदस्य हैं, उन्हे इसे मानना है तथा अपने कानून इसी के मुताबिक बनाने हैं| हम भी बौधिक सम्पदा अधिकार से सम्बन्धित कानूनों को इसी के कारण बदल रहे हैं ताकि वह ट्रिप्स मुताबिक हो जाये| कई लोगों का इसी लिये कहना है कि हम लोग कानून इसलिये नही बदल रहें हैं कि हमें उनकी आवश्यकता है पर इस लिये कि ट्रिप्स कहता है तथा विश्व व्यापार संगठन एवं ट्रिप्स के कारण हमने अपनी प्रभुत्ता खो दी है| खैर यह विवाद अलग है हमें तो ओपेन सोर्स सौफ्टवेर के बारे में बात करनी है तथा केवल इसी सम्बन्ध में बौधिक सम्पदा अधिकारों के बारे में थोड़ी बहुत जानकारी कर रहें हैं|


ट्रिप्स में सात तरह के बौधिक सम्पदा अधिकार के बारे में चर्चा की गयी है इसमें तीन तरह के अधिकार, यानी की कापीराइट (Copyright), ट्रेड सीक्रेट (Trade Secret), तथा पेटेन्ट (Patent), कमप्यूटर सौफ्टवेर को प्रभावित करते हैं| सौफ्टवेर को पेटेन्ट कराने का मुद्दा विवादास्पद है तथा कुछ कठिन भी| यदी आप चाहेगें तो पेटेन्ट के बारे में कभी आगे बात करेगें क्योंकि पेटेन्ट भी अपने में महत्वपूर्ण मुद्दा है| इसे फिलहाल हम छोड़ देते हैं तथा अगली बार कापीराइट एवं ट्रेड सीक्रेट के बारे मे बात करेगें|