Sunday, December 31, 2006

मुजरिम उन्मुक्त, हाजिर हों

'उन्मुक्त आप मुजरिम हैं हिन्दी चिट्ठाजगत की अदालत में हाजिर हों।'
'मैं और मुजरिम, अरे मैंने क्या जुर्म किया है?'
'आपने हरिवंश राय बच्चन की चार भागो में लिखी
जीवनी की समीक्षा करते हुऐ कॉपीराईट का उल्लघंन किया है। इसकी आखरी पोस्ट यहांं है। यह लिखते समय आपने हरिवंश राय बच्चन के कॉपीराईट का उल्लघंन किया है। इसके सबूत में चिट्ठाचर्चा की यह चर्चा पेश है, जिसमें कहा गया है कि,
"उन्मुक्त जी, देख लीजिएगा, शायद बच्चन साहब की आत्मकथा कापीराइट की श्रेणी मे आती है, कंही लेने के देने ना पड़ जाएं।"'
'मी लौर्ड मैं अपने बचाव में अपने वकील मित्र इकबाल को पेश करना चाहता हूं'
'आपको इजाजत दी जाती है'

माई लॉर्ड, मेरा नाम इकबाल है। मैं उन्मुक्त का सहपाठी और वकील हूं। मेरा मुवक्किल निर्दोष है। बचाव में दलील यह है कि,
'यह सच है कि हिन्दी चिट्ठों वा हिन्दी समूहों में कभी, कभी कानून का उल्लघंन होता है पर यह अनजाने में, कानून न जानने के कारण होता है। लेकिन जहां तक मेरे मुवक्किल उन्मुक्त की बात है इसके चिट्ठे की किसी भी चिट्टी पर कोई भी कानून का उल्लघंन नहीं है।

दुनिया का हर कॉपीराईट का कानून, किसी भी कॉपीराईट का उचित प्रयोग करने कि अनुमति देता है, क्योंकि यह सार्वजनिक हित में है और कॉपीराईट का ठीक तरह विकास करने में सहायक है। यही कारण है कि जब कभी कोई पुस्तक, या फिल्म, या गाने की समीक्षा होती है तो उस संदर्भ में कॉपीराईट कार्य के कुछ अंश को उध्दृत किया जा सकता है और किया जाता है। भारतीय कॉपीराईट अधिनियम की धारा ५२ भी इसी तरह तथा कुछ और सुरक्षा प्रदान करती है। मेरे मुवक्किल की चिट्ठियों में कोई गलती नहीं है। इसे बा-इज्जत बरी किया जाय'

यह सच है कि दुनिया भर के कॉपीराईट कानून इस तरह से कॉपीराईट का उचित प्रयोग करने देते हैं। हर देश में यह कानून हमेशा से था पर अब यह ट्रिप्स के कारण लाज़मी हो गया है। मैंने पेटेंट के बारे में लिखते समय ट्रिप्स का जिक्र किया था। यह विश्व व्यापार संगठन (World Trade Organisation) (WTO या डब्लू.टी.ओ.) के चार्टर में का एक समझौता हैं। यह बौद्धिक सम्पत्ति के अधिकारों के न्यूनतम मानकों को तय करता है और सदस्य देशों को उसके अनुपालन के लिए बाध्य करता है । हम तथा विश्व के लगभग सभी देश डब्लू. टी. ओ. के सदस्य हैं इसलिए इन सब देशों को बौद्धिक सम्पत्ति अधिकार के कानून में कम से कम वह सुविधायें देनी होंगी जो इसमें लिखी हैं।

ट्रिप्स का अनुच्छेद ९, ट्रिप्स का बर्न कन्वेंशन से संबन्ध दर्शाता है। यह इस प्रकार है,
Article 9
Relation to the Berne Convention
1. Members shall comply with Articles 1 through 21 of the Berne Convention (1971) and the Appendix thereto. However, Members shall not have rights or obligations under this Agreement in respect of the rights conferred under Article 6 bis of that Convention or of the rights derived therefrom.
2. Copyright protection shall extend to expressions and not to ideas, procedures, methods of operation or mathematical concepts as such.
अथार्त सदस्य देशों को बर्न कन्वेंशन १९७१ के अनुच्छेद १ से २१ का और इसके परिशिष्ट का अनुपालन करना होगा।

बर्न कन्वेंशन १९७१ का अनुच्छेद १० इस प्रकार है।
Article 10
(1) It shall be permissible to make quotations from a work which has already been lawfully made available to the public, provided that their making is compatible with fair practice, and their extent does not exceed that justified by the purpose, including quotations from newspaper articles and periodicals in the form of press summaries.
(2) It shall be a matter for legislation in the countries of the Union, and for special agreements existing or to be concluded between them, to permit the utilization, to the extent justified by the purpose, of literary or artistic works by way of illustration in publications, broadcasts or sound or visual recordings for teaching, provided such utilization is compatible with fair practice.
(3) Where use is made of works in accordance with the preceding paragraphs of this Article, mention shall be made of the source, and of the name of the author if it appears thereon.
अथार्त किसी भी सार्वजनिक कार्य से उध्दरण देना संभव रहेगा यदि वह उसका उचित प्रयोग है लेकिन इस दशा में जहां से उध्दरण लिया गया है और लेखक का नाम देना आवश्यक होगा।

संक्षेप में, हर देश जो कि डब्लू.टी.ओ. का सदस्य है उसे कॉपीराईट का उचित प्रयोग करने की अनुमति देनी होगी अन्यथा उस देश का कानून गलत होगा एवं इन सब देशों के कानून की जब व्याख्या की जायेगी तब उसे ट्रिप्स के परिपेक्ष में देखा जायगा।

भारत, डब्लू.टी.ओ. का सदस्य है, इसके कॉपीराईट अधिनियम की धारा भी इसी परिपेक्ष में पढ़ी जायगी। मैंने बच्चन जी की जीवनी जो कि चार बड़ी, बड़ी पुस्तकों के रूप में है कि समीक्षा की है और इसी संदर्भ में पुस्तक के कुछ अंश उध्दृत किये हैं मैंने बर्न कन्वेंशन के अनुच्छेद १०(३) के मुताबिक किताब का नाम तथा लेखक का नाम भी लिखा है।

मैं इसका निर्णय हिन्दी चिट्ठे जगत पर छोड़ता हूं।

मेरे द्वारा बच्चन जी की जीवनी पर लिखी गयी चिट्ठियों पर कानून के अलावा कुछ और भी पहलू हैं:
  • मेरे किसी भी चिट्ठे पर कोई भी विज्ञापन नहीं है। न ही मैं इससे कोई पैसा कमा रहा हूं। मेरा इससे कोई फायदा नहीं हुआ। हां इस चर्चा से, कुछ लोगों को इन पुस्तकों के बारे में अवश्य जानकारी हो गयी होगी। इससे कुछ इन पुस्तकों का विज्ञापन ही हुआ होगा। हांलाकि बच्चन जी के कुछ प्रेमी मुझसे रुष्ट हो गये होंगे क्योंकि जो बात मुझे पसन्द नहीं आयी, उसके बारे में मैंने स्पष्ट रूप से कहा। यह भी सच है कि मुझे उनकी कई बातें पसन्द नहीं आयी और मुझे लगा कि बड़े व्यक्ति में कुछ और गुण होते हैं - शायद फाइनमेन में हैं जिनके बारे में मैंने यहां लिखा है। इनके पत्रों की पुस्तक 'Do you have time to think?' की समीक्षा कई कड़ियों में इसी चिट्ठे पर की है। इन कड़ियों की आखरी पोस्ट यहां है। इसके पश्चात इन्हें संकलित कर अपने लेख चिट्ठे पर यहां रखा है;
  • मेरे चिट्ठे पर लिखे लेख बच्चन जी के लेख की कोटि के तो नहीं हैं पर जो भी है वह सब कॉपीलेफ्टेड हैं। मैं विचारों की स्वतंत्रता का पक्षधार हूं और उन्हें लोगो के साथ बाटने एवं उनके विचार जानने की बात करता हूं। इसीलिये मैं सब को, अपनी चिट्ठियों को इसी प्रकार से या संशोधन कर बांटने की स्वतंत्रता भी देता हूं - चाहे वे इसका श्रेय मुझे दें या नहीं। विचारों को सीमित कर रखना मुझे पसन्द नहीं। बच्चन जी ने अपने तथा पन्त जी के विवाद पर चर्चा करते समय लिखा है कि,
    'अगर आपके पास मेरे पत्र पड़े हों और आप उन्हें कभी छपाना चाहें तो मैं कभी आप से नहीं कहूँगा कि पहले मुझे उन्हें सेंसर करने दीजिए।'
    बच्चन जी इस तर्क पर मुझे भी, कम से कम, उनके लेखों के कुछ अंश का उनके नाम के साथ प्रयोग करने में इन जीवनी के कॉपीराईट स्वामी को आपत्ति नहीं होनी चाहिये;
  • बच्चन जी के लेखों के कॉपीराईट स्वामी को कभी कोई आपत्ति हुई तो मुझे बच्चन जी की जीवनी से उध्दृत अंशो को मिटाने में या पूरी चिट्ठी मिटाने में देर नही लगेगी;
  • किताबें तो नश्वर हैं आज हैं कल समाप्त। यह चिट्ठे तो अमर हैं। इन चिट्ठों के साथ, कम से कम इन पुस्तकों की चर्चा जब तक रहेगी जब तक रहेगा यह अन्तरजाल।
इसके बाद भी यदि चिट्टा चर्चा में व्यक्त की गयी शंका के मुताबिक यदि लेने के देने पड़ जायें तो मुझे देने में कभी भी आपत्ति नहीं होगी - न तो इसमें झगड़ा करुगां न ही मुकदमे बाजी।

जब तक रहेंगे सूरज तारे,
जब तक रहेगी पृथ्वी हमारी,
तब तक रहेगा यह अन्तरजाल।
तभी तक रहेंगे यह चिट्ठे सारे,
तब तक रहेगी इन चिट्ठों के संग,
इन पुस्तकों की चर्चा।
अमर हो गये हम सब,
अपने चिट्ठों के संग।
साथ, अमर हो गयीं चिट्ठियां हमारी।

इसी पोस्ट के साथ, वर्ष २००६ को, मुजरिम उन्मुक्त का अलविदा - फिर मिलेंगे नये साल में, नयी बातें, नये विचारों के साथ। नये साल में, हिन्दी चिट्ठे जगत को वह सम्मान मिले - जिसे हम सब चाहते हैं, जिसकी हम सब आशा करते हैं।

हरिवंश राय बच्चन
भाग-१: क्या भूलूं क्या याद करूं
पहली पोस्ट: विवाद
दूसरी पोस्ट: क्या भूलूं क्या याद करूं

भाग-२: नीड़ का निर्माण फिर
तीसरी पोस्ट: तेजी जी से मिलन
चौथी पोस्ट: इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय के अध्यापक
पांचवीं पोस्ट: आइरिस, और अंग्रेजी
छटी पोस्ट: इन्दिरा जी से मित्रता,
सातवीं पोस्ट: मांस, मदिरा से परहेज
आठवीं पोस्ट: पन्त जी और निराला जी
नवीं पोस्ट: नियम

भाग-३: बसेरे से दूर
दसवीं पोस्ट: इलाहाबाद से दूर

भाग -४ दशद्वार से सोपान तक
ग्यारवीं पोस्ट: अमिताभ बच्चन
बारवीं पोस्ट: रूस यात्रा
तेरवीं पोस्ट: नारी मन
चौदवीं पोस्ट: ईमरजेंसी और रुडिआड किपलिंग की कविता का जिक्र

यह पोस्ट: मुजरिम उन्मुक्त, हाजिर हों

Tuesday, December 26, 2006

बच्चन – पंत विवाद

हरिवंश राय बच्चन
भाग-१: क्या भूलूं क्या याद करूं
पहली पोस्ट: विवाद
दूसरी पोस्ट: क्या भूलूं क्या याद करूं

भाग-२: नीड़ का निर्माण फिर
तीसरी पोस्ट: तेजी जी से मिलन
चौथी पोस्ट: इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय के अध्यापक
पांचवीं पोस्ट: आइरिस, और अंग्रेजी
छटी पोस्ट: इन्दिरा जी से मित्रता,
सातवीं पोस्ट: मांस, मदिरा से परहेज
आठवीं पोस्ट: पन्त जी और निराला जी
नवीं पोस्ट: नियम

भाग-३: बसेरे से दूर
दसवीं पोस्ट: इलाहाबाद से दूर

भाग -४ दशद्वार से सोपान तक
ग्यारवीं पोस्ट: अमिताभ बच्चन
बारवीं पोस्ट: रूस यात्रा
तेरवीं पोस्ट: नारी मन
चौदवीं पोस्ट: ईमरजेंसी और रुडिआड किपलिंग की कविता का जिक्र
पंद्रवीं पोस्ट: अनुवाद नीति, हिन्दी की दुर्दशा
सोलवीं तथा अन्तिम यह पोस्ट: बच्चन – पंत विवाद

मैंने, बच्चन जी की जीवनी, उनके तथा पंत जी के कथित विवाद के लिये पढ़नी शुरु की। इसका जिक्र चौथे भाग में है। १९७१ में बच्चन जी ‘पंत के दो सौ पत्र’ का प्रकाशन करना चाहते थे। इनके मुताबिक वे उसे उसी रूप में छपवाना चाहते थे जिस रूप में वे लिखे गये थे पर पंत जी उसे कुछ सेंसर करना चाहते थे। इसी से दोनो के बीच में कुछ मनमुटाव हो गया और वह इतना बढ़ गया कि पन्त जी ने इसका प्रकाशन रोकने के लिये, इलाहाबाद में एक मुकदमा ठोक दिया। बच्चन जी के मुताबिक, बाद में, पंत जी ने अपने वकील की सलाह पर प्रकाशक से इस तरह का समझौता कर लिया कि वे पंत जी पत्रों से वे अंश निकाल देंगे जिस पर पंत जी को आपत्ति है और इसी आधार पर पंत जी ने मुकदमा वापस ले लिया। बच्चन जी लिखते हैं कि,
'पंत जी ने –शायद अपने पक्ष की दुर्बलता देखकर –मुकदमा वापस लेने का ही फैसला किया।'

मैंने अपने सहपाठी तथा वकील मित्र इकबाल से पूछा क्या यह सही है। उसका कहना है कि किसी के लिखे पत्र उसके कॉपीराइट होतें है और उसकी अनुमति के बिना छापे नहीं जा सकते। पंत जी का मुकदमा कमजोर नहीं था। इकबाल का कहना है कि लगता है कि,
'पंत जी बहुत बड़े थे। छोटे (बच्चन जी) की जिद्द देख कर खुद ही झुक गये।'
मालुम नहीं क्या सच है।

मैंने इस विवाद के बारे में संक्षेप में लिखा। इस भाग में, इस विवाद के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है। जिसे न मैं उचित समझता हूं, न ही उसका इससे अधिक जिक्र करना - पढ़ने के बाद दुख हुआ। शायद बड़ा व्यक्ति होने के लिये केवल बड़ा साहित्यकार होना जरूरी नहीं, इसके लिये कुछ और होना चाहिये।


इसी चिट्ठी के साथ यह सिरीस भी समाप्त होती है।

Monday, December 25, 2006

हस्तरेखा विद्या: ... और टोने-टुटके

ज्योतिष, अंक विद्या, हस्तरेखा विद्या, और टोने-टुटके
पहली पोस्ट: भूमिका
दूसरी पोस्ट: तारे और ग्रह
तीसरी पोस्ट: प्राचीन भारत में खगोल शास्त्र
चौथी पोस्ट: यूरोप में खगोल शास्त्र
पांचवीं पोस्ट: Hair Musical हेर संगीत नाटक
छटी पोस्ट: पृथ्वी की गतियां
सातवीं पोस्ट: राशियां Signs of Zodiac
आठवीं पोस्ट: विषुव अयन (precession of equinoxes): हेयर संगीत नाटक के शीर्ष गीत का अर्थ
नवीं पोस्ट: ज्योतिष या अन्धविश्वास
दसवीं पोस्ट: अंक विद्या, डैमियन - शैतान का बच्चा
ग्यारवीं पोस्ट: अंक लिखने का इतिहास
यह बारवीं तथा अन्तिम पोस्ट: हस्तरेखा विद्या

इरविंग वैलेस कल्पित (fiction) उपन्यास के बादशाह हैं, पर उनका मन हमेशा अकल्पित (non-fiction) लेख लिखने में रहता है। उनके अनुसार वे कल्पित उपन्यास इसलिये लिखते हैं क्योंकि उसमें पैसा मिलता है। उन्होंने बहुत सारे अकल्पित लेख लिखे हैं। इन लेखों को मिलाकर एक पुस्तक निकाली है, उसका नाम है, The Sunday Gentleman यह पुस्तक पढ़ने योग्य है। इसमें एक लेख The Incredible Dr. Bell के नाम से है। यह लेख डा. जोसेफ बेल के बारे में है।

डा. जोसेफ बेल वे 19वीं शताब्दी के अंत तथा 20वीं शताब्दी के शुरू में, एडिनबर्ग में सर्जन थे और एक वहां के विश्वविद्यालय में पढ़ाते थे। वे हमेशा अपने विद्यार्थियों को कहते थे कि लोग देखते हैं पर ध्यान नहीं देते। यदि आप किसी चीज को ध्यान से देखें तो उसके बारे में बहुत कुछ बता सकते हैं। उन्होंने बहुत सारे विद्यार्थी को पढ़ाया, उनमें से एक विद्यार्थी का नाम था आर्थर कैनन डॉयल, जो कि शर्लौक होल्मस के रचयिता हैं।

इस लेख में डा. बेल के बहुत सारे उदाहरण बताये गये हैं जब उन्होंने किसी व्यक्ति को देखकर उसके बारे में बहुत कुछ बता दिया। शर्लोक होल्मस एक जासूस थे और कहानियों में ध्यान पूर्वक देखकर बहुत कुछ सुराग ढूढ कर हल निकालते थे। आर्थर कैनन डॉयल ने जब शर्लोक होल्मस की कहानियां लिखना शुरू किया तो उसका चरित्र डा. बेल के चरित्र पर ढाला और डा. वाटसन का चरित्र अपने ऊपर ढाला।

यदि आप किसी कागज को मोड़ें तो हमेशा पायेंगे कि उस कागज को जहां से मोड़ा जाता है, उसमें चुन्नट (Crease) पड़ जाती है। इस तरह से जब हम हंथेली को मोड़ते हैं तो जिस जगह हमारी हथेली मुड़ती है, उस जगह एक चुन्नट, रेखा के रूप में पड़ जाती है। हथेलियों की रेखायें, हाथ के मुड़ने के कारण ही पड़ती हैं।

हम किसी के हाथ को ध्यान से देखें तो कुछ न कुछ उस व्यक्ति के बारे में पता चल भी सकता है। शायद यह भी पता चल जाय कि वह व्यक्ति बीमार है या नहीं। पर उसकी हंथेली की रेखाओं को देखकर यह बता पाना कि उस व्यक्ति की शादी कब होगी, वह कितनी शादियां करेगा, कितने बच्चे होंगे, या नहीं होंगे। यह सब बता पाना नामुमकिन है। यह सब भी ढकोसला है।

निष्कर्ष
मैंने पिछली पोस्टों पर यह बताने का प्रयत्न किया कि ज्योतिष, अंक विद्या, और हस्त रेखा विद्या में कोई भी तर्क नहीं है, फिर भी हमारे समाज में बहुत सारे काम इनके अनुसार होते हैं। बड़े से बड़े लोग इन बातों को विचार में रख कर कार्य करते हैं।

इनका एक कारण मुझे यह समझ में आता है कि यह सब कभी कभी एक मनश्चिकित्सक (psychiatrist) की तरह काम करते हैं। आप परेशान हैं कुछ समझ नहीं आ रहा है कि क्या करें। मुश्किल तो अपने समय से जायगी पर इसमें अक्सर ध्यान बंट जाता है और मुश्किल कम लगती है। पर इसका अर्थ यह नहीं कि इनमें कोई सत्यता है या यह अन्धविश्वास नहीं है या फिर टोने टुटके से कुछ अलग है।

मैं इन सब बातों पर विश्वास तो नहीं करता पर कोई मेरे बारे में अच्छी बात करे, तो सुन लेता हूं। कोई खास व्यक्ति हाथ पकड़ कर बताये तो क्या बात है। हां कभी मेले में आप मुझे किसी चिड़िया से अपना भाग्य
बंचवाते भी देख सकते हैं जैसा कि यहां पर हो रहा है :-)

मैनें यह सब कुछ लोगो के द्वारा टोने टुटके के चिट्ठे पर की गयी आपत्ति के कारण लिखना शुरु किया। अधिकांश लोग टोने टुटके पर कुछ अंश तक विश्वास करते हैं इसलिये यदि कोई टोने टुटके के बारे में लिखे तो लिखे, जिसे पढ़ना हो पढ़े, जिसे न पढ़ना हो वह न पढ़े। हमसे किसी ने भी, किसी और के दिमाग ठेका नहीं ले रखा है।


इसी चिट्ठी के साथ यह श्रंखला भी समाप्त होती है।

Saturday, December 23, 2006

गणित: ... time to think? चुनाव प्रचार

Don’t you have time to think?
पहली पोस्ट: पुस्तक - Don’t you have time to think?
दूसरी पोस्ट: पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा
तीसरी पोस्ट: गायब
चौथी पोस्ट: मानद उपाधि
पांचवीं पोस्ट: खेलो, कूदो और सीखो
छटी पोस्ट: अधिकारी, विशेषज्ञ
सातवीं पोस्ट: काम से ज्यादा महत्व, उसे करने में है
यह आठवीं वा इस विषय पर अन्तिम पोस्ट: गणित

भौतिक शास्त्र मेरा प्रिय विषय था। मुन्ने की मां को गणित अच्छी लगती है। मैं हमेशा कहता हूं कि भौतिक शास्त्र तो रानी है और गणित नौकरानी - जहां चाहो लगा लो। गणित के यही गुण गणित को राजरानी बनाते हैं क्यंकि विज्ञान में इसके बिना ठौर नहीं।

फ्रेड्रिक हिप्प १६ साल के नवयूवक ने १९६१ में फाइनमेन को पत्र लिख कर बताया कि भौतिक शास्त्र उसे अच्छा लगता है पर गणित पसंद नहीं आती है। वह क्या करे। फाइनमेन ने उसे लिखा कि,
'To do any important work in physics a very good mathematical ability and aptitude are required. Some work in applications can be done without this, but it will not be very inspired.
If you must satisfy your “personal curiosity concerning the mysteries of nature” what will happen if these mysteries turn out to be laws expressed in mathematical terms (as they do turn out to be )? You cannot understand the physical work in any deep or satisfying way without using mathematical reasoning with facility.'
मुझे तो मालुम है कि मुन्ने की मां तो हमेशा सही रहती है, उससे जीत पाना संभव नहीं।

इसी पोस्ट के साथ 'Do you have time to think?' पुस्तक की समीक्षा समाप्त होती है। बच्चन जी की जीवनी के चारों भाग की समीक्षा अपने अन्तिम चरण में है, इसकी भी आखिरी और सबसे महत्वपूर्ण कड़ी लिखनी है जिसमें जिक्र रहेगा पन्त जी बच्चन जी विवद पर चर्चा।शीघ्र ही कोई दूसरी पुस्तक पढ़ कर आपके सामने प्रस्तुत करूगां तब तक चलिये चुनाव की सरगर्मी में भाग लेते हैं।

चुनाव प्रचार
भाईयों और बहनो (मुन्ने की मां को छोड़ कर)
मैं भी २००६ के सर्वश्रेष्ठ उभरते हुऐ चिट्ठाकार चुनाव का उम्मीदवार हूं, कृपा दृष्टि बनाये रखियेगा। जीतने पर मेरा वायदा:
  • मैं २००७ में, साल भर आपको पोस्ट लिख कर बोर करूगां;
  • यदि आपको नींद नहीं आती है नींद आने की शर्तिया दवा। कुछ और करने की जरूरत नहीं - बस केवल मेरी पोस्टें पढ़िये, नींद तुरन्त आयेगी;
  • मैंने एक कैमरा भी खरीद लिया है २००७ में चित्रों से भी बोर करूंगा।
मैं नहीं समझता हूं इससे अच्छा किसी और का चुनाव प्रचार है: एकदम छोटा, लेकिन to the point.

आजकल, मुन्ने की मां का मूड ऑफ है। उसने भी २००६ में लिखना शुरू किया। आप में किसी ने मेरा तो नॉमिनेशन कर दिया पर उसका नहीं किया। कह रही है कि मैं अब कोई पोस्ट नहीं लिखूंगी। चिट्ठेकार भैइया लोग तो मुझे मानते ही नहीं, किसी ने मेरा
नॉमिनेशन नहीं किया

उसका मूड ठीक करने के लिये,
मैंने ही चुपके से उसके नाम से अभी, अभी नॉमिनेशन कर दिया है। देर हो गयी है - चुनाव कानून सख्त होता है। मुझे मालुम है कि उसका नामांकन इसी बात पर खारिज हो जायगा पर मूड तो ठीक होगा। कम से कम चाय तो नसीब होगी, देखिये अभी बता कर हलवा बनवाता हूं।

Thursday, December 21, 2006

अनुवाद नीति, हिन्दी की दुर्दशा

हरिवंश राय बच्चन
भाग-१: क्या भूलूं क्या याद करूं
पहली पोस्ट: विवाद
दूसरी पोस्ट: क्या भूलूं क्या याद करूं

भाग-२: नीड़ का निर्माण फिर
तीसरी पोस्ट: तेजी जी से मिलन
चौथी पोस्ट: इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय के अध्यापक
पांचवीं पोस्ट: आइरिस, और अंग्रेजी
छटी पोस्ट: इन्दिरा जी से मित्रता,
सातवीं पोस्ट: मांस, मदिरा से परहेज
आठवीं पोस्ट: पन्त जी और निराला जी
नवीं पोस्ट: नियम

भाग-३: बसेरे से दूर
दसवीं पोस्ट: इलाहाबाद से दूर

भाग -४ दशद्वार से सोपान तक
ग्यारवीं पोस्ट: अमिताभ बच्चन
बारवीं पोस्ट: रूस यात्रा
तेरवीं पोस्ट: नारी मन
चौदवीं पोस्ट: ईमरजेंसी और रुडिआड किपलिंग की कविता का जिक्र
यह पोस्ट: अनुवाद नीति, हिन्दी की दुर्दशा

कुछ दिन पहले हिन्दी चिट्ठजगत में अनुवाद सम्बन्धी नीति की चर्चा रही। यहां पर कुछ लिखा भी गया। बच्चन जी दिल्ली में विदेश मंत्रालय में अनुवाद करने का कार्य करते थे। वे अनुवाद की नीति के बारे में कहते हैं,
'भाषा सरल-सुबोध होगी
पर बोलचाल के स्तर पर गिरकर नहीं
लिखित भाषा के स्तर पर उठकर, अगर अनुवाद को
सही भी होना है।
और मेरा दावा है कि लिखित हिन्दी अंग्रेजी के ऊंचे से ऊंचे स्तर को छूने की क्षमता आज भी रखती है।'

वे भाषा के प्रथम आयोग के परिणामो के बारे में दुख प्रगट करते हुऐ कहते हैं कि,
'सबसे दुर्भाग्यपूर्ण परिणाम था कि १५ वर्ष तक यानी १९६५ तक अंग्रेजी की जगह पर हिंदी लाना न आवश्यक है, न संभव; सिद्धान्तत: हिंदी राजभाषा मानी जायगी, अंग्रेजी सहचरी भाषा; (व्यवहार में उसके विपरीत: अंग्रेजी राजभाषा, हिंदी सहचरी - अधिक उपयुक्त होगा कहना ‘अनुचरी’)। सरकारी प्रयास हिंदी के विभिन्न पक्षों को विकसित करने का होगा - प्रयोग करने का नहीं - जिसमें कितने ही १५ वर्ष लग सकते हैं। मेरी समझ में प्रयोग से विकास के सिद्धान्त की उपेक्षा कर बड़ी भारी गलती की गई; अंततोगत्वा जिसका परिणाम यह होना है कि हिंदी तैयारी ही करती रहेगी और प्रयोग में शायद ही कभी आए - “डासत ही सब निशा बीत गई, कबहुँ न नाथ नींद भरि सोयो"।'

मुझे बच्चन जी की यह बात ठीक लगती है। हिन्दी की दुर्दशा का यह भी एक कारण है।


अन्य चिट्ठों पर क्या नया है इसे आप दाहिने तरफ साईड बार में, या नीचे देख सकते हैं।

Tuesday, December 19, 2006

बासमती चावल का झगड़ा: पेटेंट पौधों की किस्में एवं जैविक भिन्नता

पहला भाग: पेटेंट
दूसरा भाग: पेटेंट और कंप्यूटर प्रोग्राम
तीसरा भाग: पेटेंट पौधों की किस्में एवं जैविक भिन्नता
पहली पोस्ट: प्रस्तावना
यह पोस्ट: बासमती चावल का झगड़ा
अगली पोस्ट: गेहूं और हल्दी का लफड़ा

राइस टेक एक अमेरिकन कम्पनी है यह कासमती और टैक्समती के नाम से चावल बेच रही थी। १९९४ में राइस टेक ने २० तरह के बासमती चावल के लिए पेटेंट प्राप्त करने के लिए यू.एस. पेटेंट एण्ड ट्रेड आर्गेनाइजेशन (यू.एस.पी.टी.ओ.) में एक आवेदन पत्र दाखिल किया। यू.एस.पी.टी.ओ. ने १९९७ में सभी पेटेंटों को मंजूर कर दिया। हमने अप्रैल २००० में तीन पेटेंटों की पुन: परीक्षा के लिए एक आवेदन पत्र प्रस्तुत किया । यह आवेदन पत्र उच्चतम न्यायालय के Research Foundation for Science Technology & Ecology and others Vs. Ministry of Agriculture and others (1999) 1 SCC 655 में की गयी कार्यवाही के तहत किये गये।

राइसटेक ने इन तीन के साथ एक और पेटेंट को वापस ले लिया। बाद में राइसटेक से 11 अन्य पेटेंटों को भी वापस लेने के लिए भी कहा गया जो कि उसने वापस ले लिया। राइसटेक को पेटेंट का नाम भी Basmati Rice lines and Grains से बदल कर Bas 867 RT 1121 and RT 117 करना पड़ा पर अन्त में राइसटेक को अगस्त २००१ में बासमती पर पांच पेटेंट दिये गये।

बासमती चावल हिमालय की तराई में पैदा होता है। इसी तरह से इसके नाम का प्रचलन भी हुआ। यह विश्व के अन्य भाग में पैदा नहीं किया जाता है। किसी अन्य स्थान पर पैदा किया गया चावल को बासमती भी नहीं कहा जा सकता है। बासमती एक भौगोलिक सूचक है। हमने राइसटेक के आवेदन पत्र में पेटेंट के आधार पर आक्षेप किया था लेकिन बासमती का एक ‘भौगोलिक सूचक’ के रूप में दावा नहीं किया था। राइसटेक अमेरिका में पैदा किया गये चावल को, बासमती कहते हुए बेच सकता है। यह अजीब बात है कि अमेरिका में बासमती चावल पैदा हो सकता है।

हमने भौगोलिक उपदर्शन (रजिस्ट्रीकरण और संरक्षण) अधिनियम १९९९ बनाया है । हमें बासमती को एक भौगोलिक सूचक के रूप में दर्ज करना चाहिये फिर आगे कार्यवाही करनी चाहिये ताकि कोई भी इसके नाम का गलत लाभ न ले सके। अगली पोस्ट पर हम गेंहू पर उठे विवाद के बारे में चर्चा करेंगे।


अन्य चिट्ठों पर क्या नया है इसे आप दाहिने तरफ साईड बार में, या नीचे देख सकते हैं।

Saturday, December 16, 2006

हरिवंश राय बच्चन: ईमरजेंसी और रुडिआड किपलिंग की कविता का जिक्र

हरिवंश राय बच्चन
भाग-१: क्या भूलूं क्या याद करूं
पहली पोस्ट: विवाद
दूसरी पोस्ट: क्या भूलूं क्या याद करूं

भाग-२: नीड़ का निर्माण फिर
तीसरी पोस्ट: तेजी जी से मिलन
चौथी पोस्ट: इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय के अध्यापक
पांचवीं पोस्ट: आइरिस, और अंग्रेजी
छटी पोस्ट: इन्दिरा जी से मित्रता,
सातवीं पोस्ट: मांस, मदिरा से परहेज
आठवीं पोस्ट: पन्त जी और निराला जी
नवीं पोस्ट: नियम

भाग-३: बसेरे से दूर
दसवीं पोस्ट: इलाहाबाद से दूर

भाग -४ दशद्वार से सोपान तक
ग्यारवीं पोस्ट: अमिताभ बच्चन
बारवीं पोस्ट: रूस यात्रा
तेरवीं पोस्ट: नारी मन
यह पोस्ट: ईमरजेंसी और रुडिआड किपलिंग की कविता का जिक्र

यदि किसी के व्यक्तित्व का सही आंकलन करना है तो उसे मुश्किल के समय पर देखें न कि खुशहाली के समय पर। अपने देश काले समय का दौर आया: १९७५-७७ का समय। यह देश के लिये मुश्किल का समय था। लोगों को सही आंकलन, उस समय उनके बर्ताव से किया जा सकता है। इस समय कई बुद्धिजीवियों ने शासक दल का सर्मथन दिया। बच्चन जी उनमें से एक थे। बाद में शायद उन्हें इसका कुछ पछतावा रहा। वे इसे, इस तरह से समझाते दिखते हैं।
'एक दिन किसी ने मुझे प्रधान मंत्री निवास से फोन किया, शायद संजय ने, कि क्या मेरा नाम आपात्कालीन स्थिति के समर्थकों में दिया जा सकता है? और अगर मैं सच कहूँ तो केवल गांधी परिवार से अपनी मैत्री और निकटता के कारण मैंने फोन पर ही हामी भर दी। बाद को कई दिनों तक रेडियो और टेलीविजन के माध्यम से कई और लेखकों के साथ मेरा नाम भी इमर्जेसी के समर्थकों में प्रसारित किया गया। जहाँ तक मुझे याद है, उनमें दो प्रमुख नाम थे गुरूमुख सिंह ‘मुसाफिर’ के और सरदार जाफरी के।'

मैंने उर्मिला की कहानी बताते समय इस विषय की पहली पोस्ट पर अपने सहपाठी इकबाल का जिक्र किया था जो कि वकील है। उसे इमरजेंसी के कई कटु अनुभव रहे। अमिताभ बच्चन ने भी इमरजेंसी को समर्थन दिया था इसीलिये उसने इमरजेंसी के समय से ही अमिताभ बच्चन की पिक्चरें देखना छोड़ दिया था। मैंने एक बार पूछा कि तुम्हारे एक व्यक्ति के पिक्चर न देखने से क्या होगा। उसने कहा कि,
'कुछ नहीं, पर कम से कम एक व्यक्ति तो उसके समर्थकों में से कम हुआ। इस बारे में विरोध जताने का यही सबसे अच्छा तरीका है।'
इकबाल फिर कभी पिकचर हॉल में, अमिताभ बच्चन की पिकचरें देखने नहीं गया। मालुम नहीं अब जाता है कि नहीं। क्योंकि अब तो गांधी परिवार ने भी इमरजेंसी के बारे में अपनी गलती स्वीकार के ली और बच्चन परिवार, नेहरू-गांधी परिवार से दूर चला गया।

बच्चन जी की सातवीं पोस्ट मांस मदिरा से परहेज पर इदन्नम्मन ने टिप्पणी कर पूछा था,
'उन्मुक्त जी कया आपने इनकी जीवनी में Rudiard Kipling की कविता पढी? अगर हाँ तो बताना कैसी लगी।'
बच्चन जी अपने जीवनी के चौथे भाग में बताते हैं कि वे 'बसेरे से दूर’ को लिखते समय टूटे-गिरेपन की हालत से गुजर रहा थे और इस परिस्थिति को संभलने के लिये उन्होने किपलिंग की ‘If’ शीर्षक कविता का सहारा लिया था। हालांकि इस कविता का जिक्र मुझे उनकी जीवनी के तीसरे भाग में नहीं मिला था। उन्होने इमरजेंसी के बाद यही कविता इंदिरा गांधी को चुनाव हार जाने के बाद, उनकी हिम्मत बढ़ाने के लिये भेजी थी।

मुझे यह कविता कैसी लगी?

कवितायें अक्सर गागर में सागर भरती हैं। मुझे कम समझ में आती हैं, शायद इसलिये कुछ कम अच्छी लगती हैं। मेरे विचार से किसी भी कृति का आनन्द, इस पर भी निर्भर करता है कि वह किस तरह से वह प्रयोग की गयी हो। बच्चन जी ने इस कविता का प्रयोग इमरजेंसी के बारे में जिक्र करते हुऐ लिखी है। आप खुद समझ सकते हैं मुझे यह कैसी लगी होगी।


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Wednesday, December 13, 2006

अंक लिखने का इतिहास: ... टोने टुटके

ज्योतिष, अंक विद्या, हस्तरेखा विद्या, और टोने-टुटके
पहली पोस्ट: भूमिका
दूसरी पोस्ट: तारे और ग्रह
तीसरी पोस्ट: प्राचीन भारत में खगोल शास्त्र
चौथी पोस्ट: यूरोप में खगोल शास्त्र
पांचवीं पोस्ट: Hair Musical हेर संगीत नाटक
छटी पोस्ट: पृथ्वी की गतियां
सातवीं पोस्ट: राशियां Signs of Zodiac
आठवीं पोस्ट: विषुव अयन (precession of equinoxes): हेयर संगीत नाटक के शीर्ष गीत का अर्थ
नवीं पोस्ट: ज्योतिष या अन्धविश्वास
दसवीं पोस्ट: अंक विद्या, डैमियन - शैतान का बच्चा
यह पोस्ट: अंक लिखने का इतिहास
अगली पोस्ट: हस्तरेखा विद्या
अधिकतर सभ्यताओं में लिपि के अक्षरों को ही अंक माना गया। रोमन लिपि के अक्षर I को एक का अंक माना गया क्योंकि यह शक्ल से एक उंगली जैसा है। इसी तरह II को दो का अंक माना गया क्योंकि यह दो उंगलियों की तरह है। रोमन लिपि के अक्षर V को पांच का अंक माना गया। यदि आप हंथेली को देखे जिसकी सारी उंगलियां चिपकी हो और अंगूंठा हटा हो तो वह इस तरह दिखेगा। रोमन X को उन्होंने दस का अंक माना क्योंकि यह दो हंथेलियों की तरह हैं। L को पच्चास, C को सौ, D को पांच सौ और N को हजार का अंक माना गया। इन्हीं अक्षरों का प्रयोग कर उन्होंने अंक लिखना शुरू किया। इन अक्षरों को किसी भी जगह रखा जा सकता था। इनकी कोई भी निश्चित जगह नहीं थी। ग्रीक और हरब्यू (Hebrew) में भी वर्णमाला के अक्षरों को अंक माना गया उन्हीं की सहायता से नम्बरों का लिखना शुरू हुआ।

नम्बरों को अक्षरों के द्वारा लिखने के कारण न केवल नम्बर लिखे जाने में मुश्किल होती थी पर गुणा, भाग, जोड़ या घटाने में तो नानी याद आती थी। अंक प्रणाली में क्रान्ति तब आयी जब भारतवर्ष ने लिपि के अक्षरों को अंक न मानकर, नयी अंक प्रणाली निकाली और शून्य को अपनाया। इसके लिये पहले नौ अंको के लिये नौ तरह के चिन्ह अपनाये जिन्हें १,२,३ आदि कहा गया और एक चिन्ह ० भी निकाला। इसमें यह भी महत्वपूर्ण था कि वह अंक किस जगह पर है। इस कारण सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि सारे अंक इन्हीं की सहायता से लिखे जाने लगे और गुणा, भाग, जोड़ने, और घटाने में भी सुविधा होने लगी। यह अपने देश से अरब देशों में गया। फिर वहां से 16वीं शताब्दी के लगभग पाश्चात्य देशों में गया, इसलिये इसे अरेबिक अंक कहा गया। वास्तव में इसका नाम हिन्दू अंक होना चाहिये था। यह नयी अंक प्रणाली जब तक आयी तब तक वर्णमाला के अक्षरों और अंकों के बीच में सम्बन्ध जुड़ चुका था। जिसमें काफी कुछ गड़बड़ी और उलझनें (Confusion) पैदा हो गयीं।

इस कारण सबसे बड़ी गड़बड़ यह हुई कि किसी भी शब्द के अक्षरों से उसका अंक निकाला जाने लगा और उस शब्द को उस अंक से जोड़ा जाने लगा। कुछ समय बाद गड़बड़ी और बढ़ी। उस अंक वही गुण दिये जाने लगे जो कि उस शब्द के थे। यदि वह शब्द देवी या देवता का नाम था तो उस अंक को अच्छा माना जाने लगा। यदि वह शब्द किसी असुर या खराब व्यक्ति का था तो उस अंक को खराब माना जाने लगा। यहीं से शुरू हुई अंक विद्या: इसका न तो कोई सर है न तो पैर, न ही इसका तर्क से सम्बन्ध है न ही सत्यता से। इसका सम्बन्ध महज अन्धविश्वास है - यह एक तरह का टोना टुटका ही है।

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Sunday, December 10, 2006

काम से ज्यादा महत्व, उसे करने में है: ... time to think?

Don’t you have time to think?
पहली पोस्ट: पुस्तक - Don’t you have time to think?
दूसरी पोस्ट: पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा
तीसरी पोस्ट: गायब
चौथी पोस्ट: मानद उपाधि
पांचवीं पोस्ट: खेलो, कूदो और सीखो
छटी पोस्ट: अधिकारी, विशेषज्ञ
यह पोस्ट: काम से ज्यादा महत्व, उसे करने में है

हम सब के जीवन में कोई न कोई आदर्श रहा है। मेरे जीवन में - एक नहीं, कई रहे। उन्होने अलग अलग तरह से मेरे जीवन, मेरी विचारधारा पर असर डाला। इनमे से कईयों से कभी नहीं मिला। फाइनमेन उनमें से एक थे। उनके मुताबिक काम से ज्यादा महत्व उसे करने में है: जो अच्छा लगे, जिसमें मन लगे - वह करो पर करो उसे बढ़िया।

एक बार कोची नामक एक विद्यार्थी ने फाइनमेन को पत्र लिखा कि वह भौतिक शास्त्र के साधारण विषय पर काम कर कर रहा है और नामरहित है। इस पत्र ने फइनमेन को दुखी किया। उन्हें लगा कि कोची के अध्यापक ने उसे ठीक से नहीं बताया कि क्या महत्वपूर्ण है और क्या नहीं है। फाइनमेन ने कोची को पत्र लिखा कि,
'The worthwhile problems are the once you can really solve or help solve, the ones you can really contribute something to. A problem is grand in science if it lies before us unsolved and we see some way for us to make a little headway into it.'

फाइनमेन का सुझाव था कि पहले छोटी छोटी और आसान मुश्किलों का हल खोजो जो कि आसानी से मिल सकता है। उनके मुताबिक,
'You will get the pleasure of success, and of helping your fellow man, even if it is only to answer a question in the mind of a colleague less able than you. You must not take away from yourself these pleasures because you have some erroneous idea of what is worthwhile.'
फाइनमेन ने पत्र में यह भी बताया कि उन्होने स्वयं,
'I have worked on innumerable problem that you would call humble, but which I enjoyed and felt very good about because I sometimes could partially succeed.'


फाइनमेन का मानना था कि,
'You do any problem that you can, regardless of field.'
न तो सरदर्द लेने की जरूरत है न ही घबराने की - कयोंकि,
'In no field is all the research done. Research leads to new discoveries and new questions to answer by more research.'
उनके अनुसार,
'No problem is too small or too trivial if we can really do something about it.'

पत्र में फानमेन, आगे लिखते हैं कि,
'You say you are a nameless man. You are not to your wife and to your child. You will not long remain so to your immediate colleagues if you can answer their simple question when they come into your office. You are not nameless to me. Do not remain nameless to yourself — it is too sad a way to be. Know your place in the world and evaluate yourself fairly, not in terms of the naïve ideals of your own use, nor in terms of what you erroneously imagine your teacher’s ideals are.'

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Thursday, December 07, 2006

पेटेंट पौधों की किस्में एवं जैविक भिन्नता: प्रस्तावना

पहला भाग: पेटेंट
दूसरा भाग: पेटेंट और कंप्यूटर प्रोग्राम
तीसरा भाग: पेटेंट पौधों की किस्में एवं जैविक भिन्नता
यह पोस्ट: प्रस्तावना

प्रकृति में पायी जाने वाली वस्तुओं के गुणों का पेटेंट नहीं कराया जा सकता है पर प्रकृति में प्राप्त वस्तुओं या इसके गुणों का प्रयोग कर यदि कोई नवीन उत्पाद बनाया जाय तो उसको पेटेंट कराया जा सकता है । एक सार्वजनिक प्रक्रिया या उत्पाद, अथवा परंपरागत जानकारी को पेटेंट नहीं किया जा सकता है क्योंकि यह नवीन आविष्कार नहीं है। इनको दोहरा कर दूसरी प्रक्रिया या प्राप्त उत्पाद को भी पेटेंट नहीं कराया जा सकता है क्योंकि यहां भी यह नवीन आविष्कार नहीं कहे जा सकते हैं।

हमारे देश में रासायनिक प्रक्रियाओं द्वारा तैयार किये गये उत्पाद या खाद्य पदार्थ, या औषधि, पर पेटेंट नहीं दिया जा सकता था। इसका यह अर्थ नहीं होता है कि इस तरह के उत्पाद हमारे देश में होते नहीं थे, या उनका हमारे देश में प्रयोग नहीं किया जाता था। हमारे देश में केवल इनका पेटेंट नहीं होता था हालांकि बाहर के देशों में, इस तरह की कोई भी रोक नहीं थी तथा वहां इस तरह के उत्पाद का पेटेंट होता था। ट्रिप्स के अन्दर इस तरह की कोई रोक नहीं लगायी जा सकती है इसलिये अब इस तरह के पेटेंट अपने देश में भी दिये जाने लगे हैं।

हमने जैविक भिन्नता (Biological Diversity) अधिनियम २००२ बनाया हैं इसको बनाने के निम्न कारण हैं।
  • जैविक भिन्नता का संरक्षण करना;
  • जैविक भिन्नता के संघटकों का ठीक प्रकार से प्रयोग करना; और
  • जैविक साधन की जानकारी के प्रयोग से प्राप्त होने वाले लाभ का उचित एवं न्यायपूर्ण बंटवारा होना।
बहुत सारे देशों में उन उत्पाद पर पेटेंट दे दिये गये हैं जिन पर हम पेटेंट नहीं देते थे और बहुत से पेटेंट पारम्परिक जानकारी या पूर्वकला की जानकारी न मिल पाने के कारण दिये जा चुके हैं। यह पेटेंट चावल, गेहूं, नीम, हल्दी, इसपगोल, सौंफ, धनिया, जीरा, सूरजमुखी, मूंगफली, अरंडी रेड़ी, करेला, जामुन, ब्रिंजल और आंवला के प्रयोग के बारे में हैं जिनकी हमें परम्परागत जानकारी थी। इसमें से कुछ तो समाप्त कर दिये गये हैं पर, अधिकतर अभी भी हैं। हमें इन सब पेटेंटों के बारे में विचार करना चाहिए और हो सके तो उन्हें समाप्त करवाना चाहिये। आने वाली पोस्टों पर, कुछ उन पेटेंट की चर्चा करेंगे, जो समाप्त कर दिये गये हैं। सबसे पहले बात करेंगे बासमती चावल की - यह अगली बार।

Monday, December 04, 2006

हरिवंश राय बच्चन: नारी मन

हरिवंश राय बच्चन
भाग-१: क्या भूलूं क्या याद करूं
पहली पोस्ट: विवाद
दूसरी पोस्ट: क्या भूलूं क्या याद करूं

भाग-२: नीड़ का निर्माण फिर
तीसरी पोस्ट: तेजी जी से मिलन
चौथी पोस्ट: इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय के अध्यापक
पांचवीं पोस्ट: आइरिस, और अंग्रेजी
छटी पोस्ट: इन्दिरा जी से मित्रता,
सातवीं पोस्ट: मांस, मदिरा से परहेज
आठवीं पोस्ट: पन्त जी और निराला जी
नवीं पोस्ट: नियम

भाग-३: बसेरे से दूर
दसवीं पोस्ट: इलाहाबाद से दूर

भाग -४ दशद्वार से सोपान तक
ग्यारवीं पोस्ट: अमिताभ बच्चन
बारवीं पोस्ट: रूस यात्रा
यह पोस्ट: नारी मन

कहा जाता है कि नारी को समझ पाना, पुरषों के लिये सुलभ नहीं है। बच्चन जी संवेनदशील थे - कई महिलाओं के नजदीक रहे। अपनी जीवनी कुछ ऐसे सम्बन्धों की भी चर्चा की जिसे भारतीय समाज में दबी जुबान से बात की जाती है। मेरे लिये कहना मुश्किल है कि वे नारी मन को अच्छा समझ पाये कि नहीं। यह तो वही व्यक्ति कह सकता है जो स्वयं इसमें पारंगत रहा हो - मैं नहीं। पर मैं बच्चन जी के नारी विश्लेषण से सहमत नहीं हूं। ऐसा क्यों है, मैं नहीं बता सकता हूं, मैं स्वयं न तो इसे समझ पा रहा हूं और नही इसे तर्क पर रख पा रहा हूं।

बच्चन जी कहते हैं कि तुलसी दास जी ने
'एक ओर तो उन्होंने सीता के रूप में आदर्श नारी की कल्पना की और दूसरी ओर, जहॉं भी मौका मिला नारी की निंदा करते रहे, प्राय: उसकी कामुकता की ओर संकेत करते हुए।'
इसका कारण वे इस तरह से बताते हैं।
'विवाह हो गया था, पर पत्नी उनकी अनुपस्थिति में, बिना उनकी अनुमति के मायके भाग गई थी। आधी रात को तुलसीदास को पत्नी की याद सताती है ... पहुँच जाते हैं [पत्नी] के कमरे में। ... कहा तो यह जाता है कि ... [पत्नी] ने कहा कि जैसी प्रीति आपको मेरे हाड़-मांस के शरीर से है वैसी प्रीति यदि आप रघुनाथ जी से करते तो आपका जन्म-जन्मांतर सुधर जाता ... क्षमा करेंगे, इस विषय में मेरी अलग ही कल्पना है। अधिक संभावना इसकी है कि उस रात तुलसीदास ने ... [अपनी पत्नी] को किसी और के साथ देखा। उस रात उनकी मोहनिद्रा नहीं टूटी। नारी के प्रति उनका मोह भंग हुआ—‘Frailty thy name is woman’ (नारी तेरा नाम छिन्नरपन)। '

हो सकता है कि वे ठीक हों, पर मालुम नहीं क्यों मुझे यह ठीक नहीं लगता - शायद मैं कम संवेदनशील हूं या फिर महिलाओं को नजदीक से कम परखा है।

वे भारतीय नारी की मुश्किलों के बारे में लिखते हैं कि,
'परंपरागत मर्यादाओं में बँधी भारतीय नारी की बड़ी मुसीबत है। किसी पुरूष के प्रति यदि उसमें प्रेम जागे तो वह सीधे-साफ शब्दों में यह नहीं कह पाती कि मैं तुमसे प्रेम करती हूँ। प्राय: वह उसे अपना भाई बनाती है। उसकी कलाई पर राखी बांधती है और इस प्रकार उससे किसी संबंध से जुड़ उसे अपना सखा, साथी, मित्र, प्रेमी बना पति के रूप में भी पाने की कामना करती है।'

उनके मुताबिक शूर्पणखा भी अनाड़ी थी। उनके अनुसार,
'यदि वह [शूर्पणखा] बहन बनकर राम के हाथ में राखी बॉंधने के लिए आई होती, तो ... अरण्य कांड के बाद रामायण की कथा कुछ और ही तरह लिखी जाती।'

वे साहित्य की दुनिया से दो उदाहरण भी देते हैं।
'सुनता हूं कि पुष्पा ने भी भारती के हाथ में पहले राखी बांधी थी; आज वे उनसे एक पुत्र, एक पुत्री की मां हैं। नंदिता जी को आज प्राय: सभी लोग भगवतीचरण वर्मा की पत्नी के रूप में जानते हैं। उन्होंने भी पहले वर्मा जी के हाथ में राखी ही बांधकर उनसे बहन का रिश्ता कायम किया था।'
बच्चन जी के अनुसार अजिताभ और रोमेला का प्रेम भी, शायद इसी तरह से शुरु हुआ। यह सब सच है कि नहीं यह तो वे ही लोग बता सकते हैं। पर अब समय बदल गया है यह आज सच न हो। मैंने तो नहीं पर मेरे कई मित्रों ने प्रेम विवाह किया पर उनका पत्नी से रिश्ता कभी भी बहन के रूप में नहीं शुरु हुआ था वह हमेशा मित्र के रूप में ही शुरु हुआ था।

मेरे और उनके विचारों की भिन्नता का कारण शायद यही हो कि हम लोग अलग अलग समय में पैदा हुऐ और अलग अलग वातावरण में बड़े हुऐ। इसने हमारी विचारधारा पर भी असर डाला।

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Saturday, December 02, 2006

गोलकुण्डा का किला और अंधेरी रात

हैदराबाद
पहली पोस्ट: आप किस बात पर, सबसे ज्यादा झुंझलाते हैं
दूसरी पोस्ट: निजाम के गहने और जैकब हीरा
यह पोस्ट: गोलकुण्डा का किला और अंधेरी रात

हैदराबाद में एक देखने का स्थल है - गोलकुण्डा का किला। इसमें शाम को आवाज और रोशनी का कार्यक्रम होता जिसमें वे इसके इतिहास के बारे में बताते हैं। यह बहुत अच्छा है, कभी वहां जायें तो इसे अवश्य देखें। मैंने इसे कई बार देखा है।

एक बार मैं इसके अंग्रेजी के प्रोग्राम को देखने के लिए गया था। इसमें अंग्रेजी में आवाज अमिताभ बच्चन की है पर थोड़ी देर बाद आवाज और रोशनी दोनो गायब हो गयीं। जाहिर है कि बिजली चली गयी थी। कुछ देर तक जब बिजली नहीं आयी तो पता चला कि पावर कट है और जेनरेटर की डीज़ल खत्म हो गया है। बाजार से डीज़ल मंगवाया गया है पर आने में समय लगेगा।

जहां तक मुझे याद पड़ता है उस रात अमावस्या थी - कम से कम चांद तो नहीं निकला था। आकाश में तारे सुन्दरता बिखेर रहे थे। मैंने पूंछा कि जब तक बिजली नहीं आती है तब तक क्या वे लोग तारों के बारे में बात करना पसन्द करेंगे। वहां पर बैठे लोगों की समझ में नहीं आ रहा था कि क‍या करें, बोर हो रहे थे - उन्होंने हामी भर दी। मैं अपने मित्रों के बीच ज्यादा बोलने के लिये बदनाम हूं। आदत से लाचार - हो गया शुरु।

मुझे लगा कि सबसे पहला काम लोगों में उत्सुकता बढ़ाना है इसलिये सबसे पहले तारों के वर्गीकरण के बारे में बताना शुरु किया जैसा कि मैंने यहां बताया। जब मैने वर्गीकरण को याद करने वाला वाक्य
'Be A Fine Girl Kiss Me' और उसके बाद इसमें जोड़े नये तीन वर्ग को याद करने के लिये वाक्य 'Right Now Sweetheart' बताया तो मुझे लगा कि कुछ लोग हल्के हल्के मुस्कुरा रहें हैं और उन्हें मजा आने लगा है।

इसके बाद आकाश में तारा समूहों के बारे मैं बताना शुरु किया। तब शुरु हुआ राशियों का सफर और वे क्यों महत्वपूर्ण हैं। इन सब के बारे में मैंने कुछ यहां और यहां लिखा है। इतने में जनरेटर चलने की आवाज शुरु हो गयी और बिजली आ गयी। इस प्रोग्राम में अधिकतर लोग विदेशी थे। मैंने देखा कि कुछ एक दूसरे को चूम रहे थे, कुछ हाथ पकड़ कर प्यार का इज़हार कर रहे थे। एक विदेशी महिला ने मुस्कराते हुऐ कहा,
‘Thank you for taking us on star trek’
इतने में प्रोग्राम शुरु हो गया। अमिताभ बच्चन की आवाज आनी शुरु हो गयी और हम सब उसके जादू में खो गये।