इस चिट्ठी में, बच्चों को विज्ञान में रुचि पैदा करने के तरीकों के साथ,पहली प्रसिद्ध विज्ञान कहानी फ्रैंकेस्टाइन की लेखिका मेरी शैली और उन हालात की चर्चा है जिसमें यह कहानी लिखी गयी।
Monday, January 29, 2007
Monday, January 15, 2007
तो क्या खिड़की प्रेमी ठंडे और कठोर होते हैं?
मैंने अपनी पिछली पोस्ट 'लिनेक्स प्रेमी पुरुष - ज्यादा कामुक और भावुक???' पर सुश्री एन्ड्रिया कॉर्डिंगली के विचार रखे। इस चिट्ठी का अन्त करते समय मैंने पूछा था कि, 'क्या यह सब केवल विज्ञापन ही है या फिर...'। मैंने यह इसलिये लिखा कि यदि मैं इस पर फिर से लिखना चाहूं तो यहीं से शुरु कर सकता हूं। रवी जी ने इस चिट्ठी पर टिप्पणी की,
मैं न तो कोई वैज्ञानिक या कंप्यूटर विशेषज्ञ हूं और न ही कंप्यूटर या विज्ञान सम्बन्धित फाईलें पलटता हूं पर विज्ञान मेरा प्रिय विषय रहा है। इसलिये कंप्यूटर पर काम करना, इसके बारे में जानकारी रखना, पसन्द है।
मैंने कंप्यूटर पर काम करना माईक्रोसॉफ्ट के डॉस ऑपरेटिंग सिस्टम से शुरु किया। उसके बाद विंडोज़ ९५ और विंडोस़ ९८ पर भी काम किया। इसी बीच बहुत दिनों तक OS2 पर भी काम किया और इसी पर काम करना चाहता था। यह चला नहीं, इसलिये इस पर काम करना बन्द करना पड़ा।
OS2 एक ऑपरेटिंग सिस्टम है। यह आई.बी.एम. के द्वारा विकसित किया गया था। इस समय यह समाप्त सा है क्योंकि, अब इस पर आई.बी.एम. ने भी सहायता देना बन्द कर दिया है। पर्सनल कंप्यूटर (पी.सी.) की शुरुवात तो स्टीवन जॉबस् (मैक कंप्यूटर) ने की पर इसमें सबसे बड़ा योगदान आई.बी.एम. का था। मेरी लिये यह एक पहेली सा था कि,
मैंने यह पोस्ट रवी जी के सवाल यानि कि खिड़की के संदर्भ पर शुरु की। पर बात ओपेन सोर्स की करने लगा। आप तो यही सोच रहें होंगे कि मैं टिप्पणी समझा ही नहीं। यह आपकी गलती नहीं। यह तो लोग अक्सर कह देते हैं कि, 'उन्मुक्त बाबू, आप पहले बात को समझा करें और फ़िर राय व्यक्त किया करें।' चलिये विषय पर आते हैं - ऐसे इन सब का सम्बन्ध इसी विषय से है। सब्र कीजये इतनी भी ज्लदी क्या है:-)
मैंने अपने प्रश्न का हल ढ़ूढते समय जिन किताबों को पढ़ा उनमें से एक पुस्तक थी - HARD DRIVE Bill Gates and the making of the Microsoft Empire by James Wallace & Jim Erickson. यह पुस्तक Harper Business, जो कि Harper Collins का एक भाग है, ने छापी है। यह १९९३ में आयी थी और तभी मैंने इसे पढ़ा था। शायद, सारे सफल व्यापर घराने की यही कहानी हो।
१९८० दशक के अन्त और १९९० दशक के शुरु में माईक्रोसॉफ्ट के खिलाफ कुछ कानूनी कार्यवाही की गयी थी। इस बारे में न्यूस़वीक में एक लेख १९९१ में छपा था। इस कानूनी कार्यवाही के बारे में बिल गेट्स ने न्यूसवीक को बताया कि,
इस पुस्तक में यह भी लिखा है कि न्यूस़वीक लेख का समापन कैसे हुआ है और कुछ टिप्पणी भी की गयी है। यह इस प्रकार है,
यह अंग्रेजी में है, मैं इसका अनुवाद नहीं करना चाहता। आप, इसका अर्थ स्वयं लगायें और तय करें कि क्या खिड़की वाला (वाले नहीं) ठंडा और कठोर है? :-)
'तो क्या खिड़की (विंडोज़) प्रेमी ठंडे और कठोर होते हैं?'यह हास्य में की गयी टिप्पणी है। यहां पर, हास्य में, कुछ इसी के सन्दर्भ में।
मैं न तो कोई वैज्ञानिक या कंप्यूटर विशेषज्ञ हूं और न ही कंप्यूटर या विज्ञान सम्बन्धित फाईलें पलटता हूं पर विज्ञान मेरा प्रिय विषय रहा है। इसलिये कंप्यूटर पर काम करना, इसके बारे में जानकारी रखना, पसन्द है।
मैंने कंप्यूटर पर काम करना माईक्रोसॉफ्ट के डॉस ऑपरेटिंग सिस्टम से शुरु किया। उसके बाद विंडोज़ ९५ और विंडोस़ ९८ पर भी काम किया। इसी बीच बहुत दिनों तक OS2 पर भी काम किया और इसी पर काम करना चाहता था। यह चला नहीं, इसलिये इस पर काम करना बन्द करना पड़ा।
OS2 एक ऑपरेटिंग सिस्टम है। यह आई.बी.एम. के द्वारा विकसित किया गया था। इस समय यह समाप्त सा है क्योंकि, अब इस पर आई.बी.एम. ने भी सहायता देना बन्द कर दिया है। पर्सनल कंप्यूटर (पी.सी.) की शुरुवात तो स्टीवन जॉबस् (मैक कंप्यूटर) ने की पर इसमें सबसे बड़ा योगदान आई.बी.एम. का था। मेरी लिये यह एक पहेली सा था कि,
- मैक कंप्यूटर दुनिया में सबसे पहला पर्सनल कंप्यूटर, चलने में सबसे आसान (user friendly), फिर भी क्यों सबसे लोकप्रिय नहीं हुआ।
- OS2 उच्च कोटि का ऑपरेटिंग सिस्टम, तकनीक की दृष्टि से सारे ऑपरेटिंग सिस्टम से बेहतर, विंडोस़ से कम से कम १० साल आगे। फिर भी क्यों बैठ गया।
मैंने यह पोस्ट रवी जी के सवाल यानि कि खिड़की के संदर्भ पर शुरु की। पर बात ओपेन सोर्स की करने लगा। आप तो यही सोच रहें होंगे कि मैं टिप्पणी समझा ही नहीं। यह आपकी गलती नहीं। यह तो लोग अक्सर कह देते हैं कि, 'उन्मुक्त बाबू, आप पहले बात को समझा करें और फ़िर राय व्यक्त किया करें।' चलिये विषय पर आते हैं - ऐसे इन सब का सम्बन्ध इसी विषय से है। सब्र कीजये इतनी भी ज्लदी क्या है:-)
मैंने अपने प्रश्न का हल ढ़ूढते समय जिन किताबों को पढ़ा उनमें से एक पुस्तक थी - HARD DRIVE Bill Gates and the making of the Microsoft Empire by James Wallace & Jim Erickson. यह पुस्तक Harper Business, जो कि Harper Collins का एक भाग है, ने छापी है। यह १९९३ में आयी थी और तभी मैंने इसे पढ़ा था। शायद, सारे सफल व्यापर घराने की यही कहानी हो।
१९८० दशक के अन्त और १९९० दशक के शुरु में माईक्रोसॉफ्ट के खिलाफ कुछ कानूनी कार्यवाही की गयी थी। इस बारे में न्यूस़वीक में एक लेख १९९१ में छपा था। इस कानूनी कार्यवाही के बारे में बिल गेट्स ने न्यूसवीक को बताया कि,
'The FTC investigation was a lightening rod to bring computer people forward and say that it would be helpful if Microsoft was hobbled in some way.'
इस पुस्तक में यह भी लिखा है कि न्यूस़वीक लेख का समापन कैसे हुआ है और कुछ टिप्पणी भी की गयी है। यह इस प्रकार है,
'The Newsweek article ended with an apt passage from John Steinbeck's novel Canary Row: "The things we admire in men, kindness and generosity, openness, honesty, understandingn and feeling are the concomnitants of failure in our system. And those traits we detest, sharpness, greed, acquisitiveness, meanness, egotism and self-interest are the traits of success. And while men admire the quality of the first they love the produce of the second." The same, apparently, was true about Gates.'
यह अंग्रेजी में है, मैं इसका अनुवाद नहीं करना चाहता। आप, इसका अर्थ स्वयं लगायें और तय करें कि क्या खिड़की वाला (वाले नहीं) ठंडा और कठोर है? :-)
Thursday, January 11, 2007
लिनेक्स प्रेमी पुरुष - ज्यादा कामुक और भावुक ? ? ?
लिनेक्स और सेक्स – क्या इन दोनो में सम्बन्ध है।
सुश्री कॉर्डिंगली के अनुसार महिलायें उन पुरुषों को ज्यादा पसन्द करती हैं जो कि पेंग्यूइन से प्रेम करते हैं। उनका अर्थ किसी पेंग्यूइन पक्षी या खिलौने से नहीं है पर लिनेक्स के चिन्ह पेंग्यूइन से है। हूं... हूं क्या बात है। (झूट ही सही, सपने देखने से कौन रोक सकता है)
महिलायें ऐसे लोगो को क्यों पसन्द करती हैं?
क्योंकि ऐसे लोग जोशीले, उत्साही और कामुक होते हैं।
ऐसे लोग मुश्किलों को कैसे झेलते हैं?
मुश्किल का हल निकालने में, लिनेक्स प्रेमियों का कोई सानी नहीं हैं। आप उनके सामने कोई भी मुश्किल रखें, वे बहुत ज्लद उसका हल निकालेगे।
वे ऐसा कैसे कर लेते हैं?
लिनेक्स में स्वयं मुश्किलो का हल निकालना पड़ता है। बस, हल ढ़ूढते हुऐ, वे इस कला में सिद्धहस्त हो चुके होते हैं।
ऐसे लोग क्या सोचते हैं?
यह लोग अकसर मुश्किल बातों का हल सोचते रहते हैं। मसलन यह ब्रहमांड कैसे बना? ब्लैक होल्स कैसे आये? यह बात दीगर है कि जहां वे इन बातों को सोचते हैं वहां उनका क्या औचित्य है - मसलन कार में मस्ती में घूमते समय :-)
लिनेक्स में विश्वास करने वाले लोग कैसे होते हैं?
लिनेक्स प्रयोग करने वाले लोग एक तरफ जहां भावुक होते हैं वहीं अपनी बात न केवल विश्वास करते हैं पर उसे जोर देकर कहने में कभी नहीं हिचकिचाते। यह लोग सपने देखते हैं और उन सपनो को पूरा करने का माद्दः रखते हैं। मालुम नहीं यह लोग सोते भी हैं कि नहीं, पर यह सच दिन रात काम में लगे रहते हैं फिर भी इनकी ऊर्जा में कोई कमी नहीं होती।
क्या यह लोग कंजूस होते हैं?
बिलकुल नहीं। यह लोग न केवल अच्छा पैसा कमाते हैं पर उसे खर्चा भी करना जानते हैं। हां यह बात अलग है कि उनके सब रास्ते लिनेक्स पर जाते हैं :-)
क्या आपको अभी भी इस बात का विश्वास नहीं है?
यदि आप महिला हैं तो आप वह प्रयोग करके देखिये जो कि सुश्री कॉर्डिंगली की महिला मित्र ने किया। यह प्रयोग भी उनकी चिट्ठी में बताया गया है। आप यह तभी करें जब आप शादी-शुदा हों। बाद में यह मत कहियेगा कि मैंने बताया नहीं।
मैं नहीं जानता कि सुश्री कॉर्डिंगली की बात सच है अथवा नहीं। पर यह सच है कि यदि मुन्ने की मां ने इसे पढ़ लिया तो मेरा घर से बाहर निकलना दूभर हो जायगा और किसी भी महिला से बात करने की बात तो दूर, महिलाओं की तरफ देखना भी वर्जित। वह कभी यह बात नहीं मानेगी कि यह इस शर्ट का एक विज्ञापन मात्र है, या केवल हसी-मजाक के लिये लिखी गयी एक चिट्ठी है, जिसके लिखने वाले का भी जवाब नहीं।
'उन्मुक्त जी, आप तो सीरियस बातें किया करते हैं। आपको मजाक कब से सूझने लगा।'भाई, मैं तो यही समझता था कि इन दोनो में कोई सम्बन्ध नहीं है और यह मैं नहीं कह रहा हूं यह तो सुश्री एन्ड्रिया कॉर्डिंगली कह रही हैं। सुश्री कॉर्डिंगली स्वयं लिनेक्स प्रेमी हैं और लिनेक्स के बारे न केवल लिखती हैं पर इसकी मुश्किलों को भी दूर करती हैं।
सुश्री कॉर्डिंगली के अनुसार महिलायें उन पुरुषों को ज्यादा पसन्द करती हैं जो कि पेंग्यूइन से प्रेम करते हैं। उनका अर्थ किसी पेंग्यूइन पक्षी या खिलौने से नहीं है पर लिनेक्स के चिन्ह पेंग्यूइन से है। हूं... हूं क्या बात है। (झूट ही सही, सपने देखने से कौन रोक सकता है)
महिलायें ऐसे लोगो को क्यों पसन्द करती हैं?
क्योंकि ऐसे लोग जोशीले, उत्साही और कामुक होते हैं।
ऐसे लोग मुश्किलों को कैसे झेलते हैं?
मुश्किल का हल निकालने में, लिनेक्स प्रेमियों का कोई सानी नहीं हैं। आप उनके सामने कोई भी मुश्किल रखें, वे बहुत ज्लद उसका हल निकालेगे।
वे ऐसा कैसे कर लेते हैं?
लिनेक्स में स्वयं मुश्किलो का हल निकालना पड़ता है। बस, हल ढ़ूढते हुऐ, वे इस कला में सिद्धहस्त हो चुके होते हैं।
ऐसे लोग क्या सोचते हैं?
यह लोग अकसर मुश्किल बातों का हल सोचते रहते हैं। मसलन यह ब्रहमांड कैसे बना? ब्लैक होल्स कैसे आये? यह बात दीगर है कि जहां वे इन बातों को सोचते हैं वहां उनका क्या औचित्य है - मसलन कार में मस्ती में घूमते समय :-)
लिनेक्स में विश्वास करने वाले लोग कैसे होते हैं?
लिनेक्स प्रयोग करने वाले लोग एक तरफ जहां भावुक होते हैं वहीं अपनी बात न केवल विश्वास करते हैं पर उसे जोर देकर कहने में कभी नहीं हिचकिचाते। यह लोग सपने देखते हैं और उन सपनो को पूरा करने का माद्दः रखते हैं। मालुम नहीं यह लोग सोते भी हैं कि नहीं, पर यह सच दिन रात काम में लगे रहते हैं फिर भी इनकी ऊर्जा में कोई कमी नहीं होती।
क्या यह लोग कंजूस होते हैं?
बिलकुल नहीं। यह लोग न केवल अच्छा पैसा कमाते हैं पर उसे खर्चा भी करना जानते हैं। हां यह बात अलग है कि उनके सब रास्ते लिनेक्स पर जाते हैं :-)
क्या आपको अभी भी इस बात का विश्वास नहीं है?
यदि आप महिला हैं तो आप वह प्रयोग करके देखिये जो कि सुश्री कॉर्डिंगली की महिला मित्र ने किया। यह प्रयोग भी उनकी चिट्ठी में बताया गया है। आप यह तभी करें जब आप शादी-शुदा हों। बाद में यह मत कहियेगा कि मैंने बताया नहीं।
मैं नहीं जानता कि सुश्री कॉर्डिंगली की बात सच है अथवा नहीं। पर यह सच है कि यदि मुन्ने की मां ने इसे पढ़ लिया तो मेरा घर से बाहर निकलना दूभर हो जायगा और किसी भी महिला से बात करने की बात तो दूर, महिलाओं की तरफ देखना भी वर्जित। वह कभी यह बात नहीं मानेगी कि यह इस शर्ट का एक विज्ञापन मात्र है, या केवल हसी-मजाक के लिये लिखी गयी एक चिट्ठी है, जिसके लिखने वाले का भी जवाब नहीं।
Tuesday, January 09, 2007
गेहूं और हल्दी का लफड़ा: पेटेंट पौधों की किस्में एवं जैविक भिन्नता
पहला भाग: पेटेंट
दूसरा भाग: पेटेंट और कंप्यूटर प्रोग्राम
तीसरा भाग: पेटेंट पौधों की किस्में एवं जैविक भिन्नता
पहली पोस्ट: प्रस्तावनादूसरा भाग: पेटेंट और कंप्यूटर प्रोग्राम
तीसरा भाग: पेटेंट पौधों की किस्में एवं जैविक भिन्नता
दूसरी पोस्ट: बासमती चावल का झगड़ा
यह पोस्ट: गेहूं और हल्दी का लफड़ा
अगली पोस्ट: नीम पर कड़ुवाहट
गेहूं
यूलिवर नाम की कम्पनी गलेटी नामक गेहूं का बीज बनाती थी। इसे मोसेन्टो ने खरीद लिया। उसके पश्चात इस पर यूरोपियन पेटेंट कार्यालय के म्यूनिख कार्यालय से इस पर 21-5-2003 को एक पेटेंट प्राप्त किया। हमारे देश में नपहाल (Nap Hal) नाम का एक सामान्य किस्म का गेहूं होता है गलेटी में वहीं गुण हैं जो कि नपहाल में हैं इसका प्रयोग चपाती बनाने में किया जाता है। नपहाल में अन्य गेहूं की किस्मों से कम ग्लूटेन (Gluten) होता है जो इसकी Viscoelasticity को कम कर देता है। यह पकाने के दौरान कम फूलती है। यह कुरकुरे ब्रेड बनाने में प्रयोग किया जाता है। इस पेटेंट के खिलाफ कार्यवाही करने पर इसे 23-1-2004 को रद्द कर दिया गया।
हल्दी: Turmeric
हल्दी के कई गुण हैं इसमें कई तरह की बीमारियां जैसे कि वातज रोग (Rheumatoid) और जोड़ों का दर्द (Osteoarthritis) को ठीक करने की क्षमता है। इस पर कई तरह के पेटेंट मिल चुके हैं। इस पर एक पेटेंट, घाव भरने के लिए भी था। यह मार्च 1995में में दिया गया था। यह मिस्सीसिप्पी विश्वविद्यालय में दो भारतीयों को दिया गया। हमने (भारतवर्ष ने) पूर्व कला के आधार पर इस पेटेंट को चुनौती देते हुए यू.एस.पी.टी.ओ. के यहां एक आपत्ति दाखिल की। इस आपत्ति को स्वीकार कर लिया गया और यह पेटेंट रद्द कर दिया गया है।
Sunday, January 07, 2007
आभार, धन्यवाद, बधाई
आप सबका आभार और धन्यवाद। आपने मुझे इस लायक समझा कि उदियमान चिट्ठाकार २००६ में एक पदक मेरे हाथ भी लग गया। मेरा प्रयत्न रहेगा कि मैं और अच्छा लिखूं ताकि इन्टरनेट पर हिन्दी के विस्तार में कुछ योगदान कर सकूं।
मैं उस अज्ञात बन्धु का भी आभार प्रगट करना चाहता हूं, जिसने मुझे इस चुनाव के लिये नामांकित किया। क्योंकि उसके बिना तो मैं यहां तक नहीं पहुंच सकता था।
मेरे चिट्ठियों पर बहुत कम टिप्पणियां रहती हैं। मेरी अधिकतर चिट्ठियां बिना किसी टिप्पणी के हैं। इसलिये मैं कभी नहीं सोचता था कि मेरी चिट्ठियों को लोग पसन्द करते होंगे। तरकश पर अनूप जी ने मेरा परिचय देते समय लिखा कि मैं टिप्पणियां कम करता हूं। टिप्पणियों के बारे में पर तरुन जी ने यहां बताया कि इन पर 'इस हाथ ले उस हाथ दे' का सिद्धान्त लगता है। मैं सबके चिट्ठे तो अवश्य पढ़ता हूं पर यह सच है कि टिप्पणियां कम कर पाता हूं। कभी समय कि कमी, तो कभी यह न समझ पाने की इतनी सुन्दर चिट्ठी पर क्या लिखूं कि इसकी सुन्दरता बढ़ जाये। आने वाले समय पर मेरा यह भी प्रयत्न रहेगा कि मैं चिट्ठेकार बन्धुवों कि चिट्ठियों पर अधिक से अधिक टिप्पणी करूं।
मेरी तरफ से समीरलाल जी, शुऐब जी, और सागर चन्द जी को पुरुस्कार जीतने की बधाई।
सबको बधाई, जिन्होने इस चुनाव में वोट दिया। हांलाकि मैंने स्वयं या फिर मुन्ने की मां ने इस चुनाव में कोई वोट नहीं दिया। यह इस कारण से नहीं कि हमें इस चुनाव में कोई दिलचस्पी नहीं, पर इसलिये कि हम इस चुनाव में निष्पक्ष रहना चाहते थे। मैं तो मुन्ने की मां के अलावा किसी और को वोट दे ही नहीं सकता था, न ही देने की हिम्मत थी :-)
मेरी तरफ से तरकश टीम को भी बधाई। उन्होने न केवल इस तरह के आयोजन की बात सोची पर इसका इसका सफल आयोजन भी कराया। मैं आशा करता हूं कि वे न केवल इसका आयोजन हर साल करेंगे पर इस तरह के अन्य आयोजन भी करते रहेंगे जिससे लोगो में जोश बना रहेगा। आने वालो सालो में अलग अलग श्रेणियों में भी आयोजन कराने की बात सोची जा सकती है या फिर कुछ इस तरह के आयोजन की जिसमें न केवल किसी साल में शुरु किये गये चिट्ठेकार पर सारे चिट्ठेकार भाग ले सकें।
मुझे एक बात का दुख भी है। हमारे साथ कोई महिला चिट्ठाकार नहीं है।
मुझे मुन्ने की मां को कई बार कहना पड़ता है तब वह कोई चिट्ठी पोस्ट करती है। जब मैं उससे पूछता हूं कि वह और चिट्ठियां क्यों नहीं पोस्ट करती, तो उसका जवाब रहता है कि,
मैं उस अज्ञात बन्धु का भी आभार प्रगट करना चाहता हूं, जिसने मुझे इस चुनाव के लिये नामांकित किया। क्योंकि उसके बिना तो मैं यहां तक नहीं पहुंच सकता था।
मेरे चिट्ठियों पर बहुत कम टिप्पणियां रहती हैं। मेरी अधिकतर चिट्ठियां बिना किसी टिप्पणी के हैं। इसलिये मैं कभी नहीं सोचता था कि मेरी चिट्ठियों को लोग पसन्द करते होंगे। तरकश पर अनूप जी ने मेरा परिचय देते समय लिखा कि मैं टिप्पणियां कम करता हूं। टिप्पणियों के बारे में पर तरुन जी ने यहां बताया कि इन पर 'इस हाथ ले उस हाथ दे' का सिद्धान्त लगता है। मैं सबके चिट्ठे तो अवश्य पढ़ता हूं पर यह सच है कि टिप्पणियां कम कर पाता हूं। कभी समय कि कमी, तो कभी यह न समझ पाने की इतनी सुन्दर चिट्ठी पर क्या लिखूं कि इसकी सुन्दरता बढ़ जाये। आने वाले समय पर मेरा यह भी प्रयत्न रहेगा कि मैं चिट्ठेकार बन्धुवों कि चिट्ठियों पर अधिक से अधिक टिप्पणी करूं।
मेरी तरफ से समीरलाल जी, शुऐब जी, और सागर चन्द जी को पुरुस्कार जीतने की बधाई।
सबको बधाई, जिन्होने इस चुनाव में वोट दिया। हांलाकि मैंने स्वयं या फिर मुन्ने की मां ने इस चुनाव में कोई वोट नहीं दिया। यह इस कारण से नहीं कि हमें इस चुनाव में कोई दिलचस्पी नहीं, पर इसलिये कि हम इस चुनाव में निष्पक्ष रहना चाहते थे। मैं तो मुन्ने की मां के अलावा किसी और को वोट दे ही नहीं सकता था, न ही देने की हिम्मत थी :-)
मेरी तरफ से तरकश टीम को भी बधाई। उन्होने न केवल इस तरह के आयोजन की बात सोची पर इसका इसका सफल आयोजन भी कराया। मैं आशा करता हूं कि वे न केवल इसका आयोजन हर साल करेंगे पर इस तरह के अन्य आयोजन भी करते रहेंगे जिससे लोगो में जोश बना रहेगा। आने वालो सालो में अलग अलग श्रेणियों में भी आयोजन कराने की बात सोची जा सकती है या फिर कुछ इस तरह के आयोजन की जिसमें न केवल किसी साल में शुरु किये गये चिट्ठेकार पर सारे चिट्ठेकार भाग ले सकें।
मुझे एक बात का दुख भी है। हमारे साथ कोई महिला चिट्ठाकार नहीं है।
मुझे मुन्ने की मां को कई बार कहना पड़ता है तब वह कोई चिट्ठी पोस्ट करती है। जब मैं उससे पूछता हूं कि वह और चिट्ठियां क्यों नहीं पोस्ट करती, तो उसका जवाब रहता है कि,
- कंप्यूटर तुम्हारा ज्यादा अच्छा मित्र है; या
- घर का काम कौन करेगा; या
- मुझे कंप्यूटर कम समझ में आता है।
Saturday, January 06, 2007
एक शब्द, एक हीरो, एक जीरो
क्या एक शब्द आपका जीवन बदल सकता है? क्या एक शब्द आपको हीरो से जीरो या जीरो से हीरो बना सकता है? जी हां, और यह शब्द है मकाका। इसने कम से कम दो व्यक्तियों का जीवन बदल दिया: एक हैं भारतीय मूल के अमेरीकी निवासी एस.आर. सिद्धार्थ और दूसरे हैं अमेरिका के ही निवासी जौर्ज ऐलेन पर यह कैसे हुआ?
जौर्ज ऐलेन अमेरिका में सेनेटर हैं। ये फिर से चुनाव लड़ रहे हैं और रिप्बलिकन पार्टी की तरफ से अमेरिका के राष्ट्रपति का चुनाव लड़ने का सपना देखते हैं। यह जगह जगह अपनी मीटिंगे कर रहे थे। इनकी हर मीटिंग में भारतीय मूल के अमेरीकी निवासी सिद्धार्थ रहते थे। सिद्धार्थ, डेमोक्रेटिक पार्टी के समर्थक हैं। एक मीटिंग में भाषण के दौरान ऐलेन ने, सिद्धार्थ को मकाका कह कर सम्बोधित किया और यही कह कर अमेरिका में स्वागत किया। सिद्धार्थ के पास वीडियो कैमरा था जिससे वह इस भाषण की क्लिप खींच रहा था उसने इसे वेब में डाल दिया। फिर तो इतना बवाल मचा कि पूछो मत।
वाशिंगटन पोस्ट ने, ऐलेन के खिलाफ एक सम्पादकीय लिखा। ऐलेन को सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी पड़ी। फिर भी तूफान थमा नहीं। उनका चुनाव प्रचार टूट गया, वे हीरो से जीरो हो गये और उनकी मीटिंगे होना बन्द हो गयीं। सिद्धार्थ जिसे कोई नहीं जानता था वह जीरो से हीरो हो गया। सेलन डाट कॉम ने सिद्धार्थ को २००६ का व्यक्ति (person of the year) मान लिया।
आखिरकार मकाका कहने से क्या हो गया? ऐसा क्या है, इस शब्द में?
अपने देश में साधारणतया बन्दर (rhesus monkey) पाये जाते हैं। पुरानी फ्रेन्च कॉलोनियों में, इन्ही बन्दरों के लिये मकाका शब्द का प्रयोग किया जाता है। यदि इस शब्द को व्यक्तियों के लिये प्रयोग किया जाय तो, यह जातीय निन्दा के रूप में देखा जाता है। अमेरिकियों ने इसे भारतीय मूल के लोगों के खिलाफ, जातीय निन्दा के रूप में देखा। बस, इसीलिये इतना बवाल मच गया।
यह हादसा अगस्त २००६ के महीने में हुआ था। काफी दिन बीत गये हैं। फिर मैं, इतने दिन बाद क्यों इसके बारे में लिख रहा हूं?
कुछ समय से हिन्दी चिट्ठे-जगत में बन्दर की कथा सुन रहा हूं। बस इसी से इसकी याद आयी।
मैं क्षमा प्रार्थी हूं। मेरे विचार से हिन्दी चिट्ठे जगत में बन्दर के अलावा भी कई अन्य रोचक विषय चर्चा के लिये हैं।
जौर्ज ऐलेन अमेरिका में सेनेटर हैं। ये फिर से चुनाव लड़ रहे हैं और रिप्बलिकन पार्टी की तरफ से अमेरिका के राष्ट्रपति का चुनाव लड़ने का सपना देखते हैं। यह जगह जगह अपनी मीटिंगे कर रहे थे। इनकी हर मीटिंग में भारतीय मूल के अमेरीकी निवासी सिद्धार्थ रहते थे। सिद्धार्थ, डेमोक्रेटिक पार्टी के समर्थक हैं। एक मीटिंग में भाषण के दौरान ऐलेन ने, सिद्धार्थ को मकाका कह कर सम्बोधित किया और यही कह कर अमेरिका में स्वागत किया। सिद्धार्थ के पास वीडियो कैमरा था जिससे वह इस भाषण की क्लिप खींच रहा था उसने इसे वेब में डाल दिया। फिर तो इतना बवाल मचा कि पूछो मत।
वाशिंगटन पोस्ट ने, ऐलेन के खिलाफ एक सम्पादकीय लिखा। ऐलेन को सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी पड़ी। फिर भी तूफान थमा नहीं। उनका चुनाव प्रचार टूट गया, वे हीरो से जीरो हो गये और उनकी मीटिंगे होना बन्द हो गयीं। सिद्धार्थ जिसे कोई नहीं जानता था वह जीरो से हीरो हो गया। सेलन डाट कॉम ने सिद्धार्थ को २००६ का व्यक्ति (person of the year) मान लिया।
आखिरकार मकाका कहने से क्या हो गया? ऐसा क्या है, इस शब्द में?
अपने देश में साधारणतया बन्दर (rhesus monkey) पाये जाते हैं। पुरानी फ्रेन्च कॉलोनियों में, इन्ही बन्दरों के लिये मकाका शब्द का प्रयोग किया जाता है। यदि इस शब्द को व्यक्तियों के लिये प्रयोग किया जाय तो, यह जातीय निन्दा के रूप में देखा जाता है। अमेरिकियों ने इसे भारतीय मूल के लोगों के खिलाफ, जातीय निन्दा के रूप में देखा। बस, इसीलिये इतना बवाल मच गया।
यह हादसा अगस्त २००६ के महीने में हुआ था। काफी दिन बीत गये हैं। फिर मैं, इतने दिन बाद क्यों इसके बारे में लिख रहा हूं?
कुछ समय से हिन्दी चिट्ठे-जगत में बन्दर की कथा सुन रहा हूं। बस इसी से इसकी याद आयी।
मैं क्षमा प्रार्थी हूं। मेरे विचार से हिन्दी चिट्ठे जगत में बन्दर के अलावा भी कई अन्य रोचक विषय चर्चा के लिये हैं।
Sunday, December 31, 2006
मुजरिम उन्मुक्त, हाजिर हों
'उन्मुक्त आप मुजरिम हैं हिन्दी चिट्ठाजगत की अदालत में हाजिर हों।'
'मैं और मुजरिम, अरे मैंने क्या जुर्म किया है?'
'आपने हरिवंश राय बच्चन की चार भागो में लिखी जीवनी की समीक्षा करते हुऐ कॉपीराईट का उल्लघंन किया है। इसकी आखरी पोस्ट यहांं है। यह लिखते समय आपने हरिवंश राय बच्चन के कॉपीराईट का उल्लघंन किया है। इसके सबूत में चिट्ठाचर्चा की यह चर्चा पेश है, जिसमें कहा गया है कि,
'आपको इजाजत दी जाती है'
माई लॉर्ड, मेरा नाम इकबाल है। मैं उन्मुक्त का सहपाठी और वकील हूं। मेरा मुवक्किल निर्दोष है। बचाव में दलील यह है कि,
यह सच है कि दुनिया भर के कॉपीराईट कानून इस तरह से कॉपीराईट का उचित प्रयोग करने देते हैं। हर देश में यह कानून हमेशा से था पर अब यह ट्रिप्स के कारण लाज़मी हो गया है। मैंने पेटेंट के बारे में लिखते समय ट्रिप्स का जिक्र किया था। यह विश्व व्यापार संगठन (World Trade Organisation) (WTO या डब्लू.टी.ओ.) के चार्टर में का एक समझौता हैं। यह बौद्धिक सम्पत्ति के अधिकारों के न्यूनतम मानकों को तय करता है और सदस्य देशों को उसके अनुपालन के लिए बाध्य करता है । हम तथा विश्व के लगभग सभी देश डब्लू. टी. ओ. के सदस्य हैं इसलिए इन सब देशों को बौद्धिक सम्पत्ति अधिकार के कानून में कम से कम वह सुविधायें देनी होंगी जो इसमें लिखी हैं।
ट्रिप्स का अनुच्छेद ९, ट्रिप्स का बर्न कन्वेंशन से संबन्ध दर्शाता है। यह इस प्रकार है,
बर्न कन्वेंशन १९७१ का अनुच्छेद १० इस प्रकार है।
संक्षेप में, हर देश जो कि डब्लू.टी.ओ. का सदस्य है उसे कॉपीराईट का उचित प्रयोग करने की अनुमति देनी होगी अन्यथा उस देश का कानून गलत होगा एवं इन सब देशों के कानून की जब व्याख्या की जायेगी तब उसे ट्रिप्स के परिपेक्ष में देखा जायगा।
भारत, डब्लू.टी.ओ. का सदस्य है, इसके कॉपीराईट अधिनियम की धारा भी इसी परिपेक्ष में पढ़ी जायगी। मैंने बच्चन जी की जीवनी जो कि चार बड़ी, बड़ी पुस्तकों के रूप में है कि समीक्षा की है और इसी संदर्भ में पुस्तक के कुछ अंश उध्दृत किये हैं मैंने बर्न कन्वेंशन के अनुच्छेद १०(३) के मुताबिक किताब का नाम तथा लेखक का नाम भी लिखा है।
मैं इसका निर्णय हिन्दी चिट्ठे जगत पर छोड़ता हूं।
मेरे द्वारा बच्चन जी की जीवनी पर लिखी गयी चिट्ठियों पर कानून के अलावा कुछ और भी पहलू हैं:
दूसरी पोस्ट: क्या भूलूं क्या याद करूं
चौथी पोस्ट: इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अध्यापक
पांचवीं पोस्ट: आइरिस, और अंग्रेजी
छटी पोस्ट: इन्दिरा जी से मित्रता,
सातवीं पोस्ट: मांस, मदिरा से परहेज
आठवीं पोस्ट: पन्त जी और निराला जी
नवीं पोस्ट: नियम
बारवीं पोस्ट: रूस यात्रा
तेरवीं पोस्ट: नारी मन
चौदवीं पोस्ट: ईमरजेंसी और रुडिआड किपलिंग की कविता का जिक्र
'मैं और मुजरिम, अरे मैंने क्या जुर्म किया है?'
'आपने हरिवंश राय बच्चन की चार भागो में लिखी जीवनी की समीक्षा करते हुऐ कॉपीराईट का उल्लघंन किया है। इसकी आखरी पोस्ट यहांं है। यह लिखते समय आपने हरिवंश राय बच्चन के कॉपीराईट का उल्लघंन किया है। इसके सबूत में चिट्ठाचर्चा की यह चर्चा पेश है, जिसमें कहा गया है कि,
"उन्मुक्त जी, देख लीजिएगा, शायद बच्चन साहब की आत्मकथा कापीराइट की श्रेणी मे आती है, कंही लेने के देने ना पड़ जाएं।"''मी लौर्ड मैं अपने बचाव में अपने वकील मित्र इकबाल को पेश करना चाहता हूं'
'आपको इजाजत दी जाती है'
माई लॉर्ड, मेरा नाम इकबाल है। मैं उन्मुक्त का सहपाठी और वकील हूं। मेरा मुवक्किल निर्दोष है। बचाव में दलील यह है कि,
'यह सच है कि हिन्दी चिट्ठों वा हिन्दी समूहों में कभी, कभी कानून का उल्लघंन होता है पर यह अनजाने में, कानून न जानने के कारण होता है। लेकिन जहां तक मेरे मुवक्किल उन्मुक्त की बात है इसके चिट्ठे की किसी भी चिट्टी पर कोई भी कानून का उल्लघंन नहीं है।
दुनिया का हर कॉपीराईट का कानून, किसी भी कॉपीराईट का उचित प्रयोग करने कि अनुमति देता है, क्योंकि यह सार्वजनिक हित में है और कॉपीराईट का ठीक तरह विकास करने में सहायक है। यही कारण है कि जब कभी कोई पुस्तक, या फिल्म, या गाने की समीक्षा होती है तो उस संदर्भ में कॉपीराईट कार्य के कुछ अंश को उध्दृत किया जा सकता है और किया जाता है। भारतीय कॉपीराईट अधिनियम की धारा ५२ भी इसी तरह तथा कुछ और सुरक्षा प्रदान करती है। मेरे मुवक्किल की चिट्ठियों में कोई गलती नहीं है। इसे बा-इज्जत बरी किया जाय'
यह सच है कि दुनिया भर के कॉपीराईट कानून इस तरह से कॉपीराईट का उचित प्रयोग करने देते हैं। हर देश में यह कानून हमेशा से था पर अब यह ट्रिप्स के कारण लाज़मी हो गया है। मैंने पेटेंट के बारे में लिखते समय ट्रिप्स का जिक्र किया था। यह विश्व व्यापार संगठन (World Trade Organisation) (WTO या डब्लू.टी.ओ.) के चार्टर में का एक समझौता हैं। यह बौद्धिक सम्पत्ति के अधिकारों के न्यूनतम मानकों को तय करता है और सदस्य देशों को उसके अनुपालन के लिए बाध्य करता है । हम तथा विश्व के लगभग सभी देश डब्लू. टी. ओ. के सदस्य हैं इसलिए इन सब देशों को बौद्धिक सम्पत्ति अधिकार के कानून में कम से कम वह सुविधायें देनी होंगी जो इसमें लिखी हैं।
ट्रिप्स का अनुच्छेद ९, ट्रिप्स का बर्न कन्वेंशन से संबन्ध दर्शाता है। यह इस प्रकार है,
Article 9अथार्त सदस्य देशों को बर्न कन्वेंशन १९७१ के अनुच्छेद १ से २१ का और इसके परिशिष्ट का अनुपालन करना होगा।
Relation to the Berne Convention
1. Members shall comply with Articles 1 through 21 of the Berne Convention (1971) and the Appendix thereto. However, Members shall not have rights or obligations under this Agreement in respect of the rights conferred under Article 6 bis of that Convention or of the rights derived therefrom.
2. Copyright protection shall extend to expressions and not to ideas, procedures, methods of operation or mathematical concepts as such.
बर्न कन्वेंशन १९७१ का अनुच्छेद १० इस प्रकार है।
Article 10अथार्त किसी भी सार्वजनिक कार्य से उध्दरण देना संभव रहेगा यदि वह उसका उचित प्रयोग है लेकिन इस दशा में जहां से उध्दरण लिया गया है और लेखक का नाम देना आवश्यक होगा।
(1) It shall be permissible to make quotations from a work which has already been lawfully made available to the public, provided that their making is compatible with fair practice, and their extent does not exceed that justified by the purpose, including quotations from newspaper articles and periodicals in the form of press summaries.
(2) It shall be a matter for legislation in the countries of the Union, and for special agreements existing or to be concluded between them, to permit the utilization, to the extent justified by the purpose, of literary or artistic works by way of illustration in publications, broadcasts or sound or visual recordings for teaching, provided such utilization is compatible with fair practice.
(3) Where use is made of works in accordance with the preceding paragraphs of this Article, mention shall be made of the source, and of the name of the author if it appears thereon.
संक्षेप में, हर देश जो कि डब्लू.टी.ओ. का सदस्य है उसे कॉपीराईट का उचित प्रयोग करने की अनुमति देनी होगी अन्यथा उस देश का कानून गलत होगा एवं इन सब देशों के कानून की जब व्याख्या की जायेगी तब उसे ट्रिप्स के परिपेक्ष में देखा जायगा।
भारत, डब्लू.टी.ओ. का सदस्य है, इसके कॉपीराईट अधिनियम की धारा भी इसी परिपेक्ष में पढ़ी जायगी। मैंने बच्चन जी की जीवनी जो कि चार बड़ी, बड़ी पुस्तकों के रूप में है कि समीक्षा की है और इसी संदर्भ में पुस्तक के कुछ अंश उध्दृत किये हैं मैंने बर्न कन्वेंशन के अनुच्छेद १०(३) के मुताबिक किताब का नाम तथा लेखक का नाम भी लिखा है।
मैं इसका निर्णय हिन्दी चिट्ठे जगत पर छोड़ता हूं।
मेरे द्वारा बच्चन जी की जीवनी पर लिखी गयी चिट्ठियों पर कानून के अलावा कुछ और भी पहलू हैं:
- मेरे किसी भी चिट्ठे पर कोई भी विज्ञापन नहीं है। न ही मैं इससे कोई पैसा कमा रहा हूं। मेरा इससे कोई फायदा नहीं हुआ। हां इस चर्चा से, कुछ लोगों को इन पुस्तकों के बारे में अवश्य जानकारी हो गयी होगी। इससे कुछ इन पुस्तकों का विज्ञापन ही हुआ होगा। हांलाकि बच्चन जी के कुछ प्रेमी मुझसे रुष्ट हो गये होंगे क्योंकि जो बात मुझे पसन्द नहीं आयी, उसके बारे में मैंने स्पष्ट रूप से कहा। यह भी सच है कि मुझे उनकी कई बातें पसन्द नहीं आयी और मुझे लगा कि बड़े व्यक्ति में कुछ और गुण होते हैं - शायद फाइनमेन में हैं जिनके बारे में मैंने यहां लिखा है। इनके पत्रों की पुस्तक 'Do you have time to think?' की समीक्षा कई कड़ियों में इसी चिट्ठे पर की है। इन कड़ियों की आखरी पोस्ट यहां है। इसके पश्चात इन्हें संकलित कर अपने लेख चिट्ठे पर यहां रखा है;
- मेरे चिट्ठे पर लिखे लेख बच्चन जी के लेख की कोटि के तो नहीं हैं पर जो भी है वह सब कॉपीलेफ्टेड हैं। मैं विचारों की स्वतंत्रता का पक्षधार हूं और उन्हें लोगो के साथ बाटने एवं उनके विचार जानने की बात करता हूं। इसीलिये मैं सब को, अपनी चिट्ठियों को इसी प्रकार से या संशोधन कर बांटने की स्वतंत्रता भी देता हूं - चाहे वे इसका श्रेय मुझे दें या नहीं। विचारों को सीमित कर रखना मुझे पसन्द नहीं। बच्चन जी ने अपने तथा पन्त जी के विवाद पर चर्चा करते समय लिखा है कि,
'अगर आपके पास मेरे पत्र पड़े हों और आप उन्हें कभी छपाना चाहें तो मैं कभी आप से नहीं कहूँगा कि पहले मुझे उन्हें सेंसर करने दीजिए।'
बच्चन जी इस तर्क पर मुझे भी, कम से कम, उनके लेखों के कुछ अंश का उनके नाम के साथ प्रयोग करने में इन जीवनी के कॉपीराईट स्वामी को आपत्ति नहीं होनी चाहिये; - बच्चन जी के लेखों के कॉपीराईट स्वामी को कभी कोई आपत्ति हुई तो मुझे बच्चन जी की जीवनी से उध्दृत अंशो को मिटाने में या पूरी चिट्ठी मिटाने में देर नही लगेगी;
- किताबें तो नश्वर हैं आज हैं कल समाप्त। यह चिट्ठे तो अमर हैं। इन चिट्ठों के साथ, कम से कम इन पुस्तकों की चर्चा जब तक रहेगी जब तक रहेगा यह अन्तरजाल।
जब तक रहेंगे सूरज तारे,
जब तक रहेगी पृथ्वी हमारी,
तब तक रहेगा यह अन्तरजाल।
तभी तक रहेंगे यह चिट्ठे सारे,
तब तक रहेगी इन चिट्ठों के संग,
इन पुस्तकों की चर्चा।
अमर हो गये हम सब,
अपने चिट्ठों के संग।
साथ, अमर हो गयीं चिट्ठियां हमारी।
इसी पोस्ट के साथ, वर्ष २००६ को, मुजरिम उन्मुक्त का अलविदा - फिर मिलेंगे नये साल में, नयी बातें, नये विचारों के साथ। नये साल में, हिन्दी चिट्ठे जगत को वह सम्मान मिले - जिसे हम सब चाहते हैं, जिसकी हम सब आशा करते हैं।जब तक रहेगी पृथ्वी हमारी,
तब तक रहेगा यह अन्तरजाल।
तभी तक रहेंगे यह चिट्ठे सारे,
तब तक रहेगी इन चिट्ठों के संग,
इन पुस्तकों की चर्चा।
अमर हो गये हम सब,
अपने चिट्ठों के संग।
साथ, अमर हो गयीं चिट्ठियां हमारी।
हरिवंश राय बच्चन
भाग-१: क्या भूलूं क्या याद करूं
पहली पोस्ट: विवादभाग-१: क्या भूलूं क्या याद करूं
दूसरी पोस्ट: क्या भूलूं क्या याद करूं
भाग-२: नीड़ का निर्माण फिर
तीसरी पोस्ट: तेजी जी से मिलनचौथी पोस्ट: इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अध्यापक
पांचवीं पोस्ट: आइरिस, और अंग्रेजी
छटी पोस्ट: इन्दिरा जी से मित्रता,
सातवीं पोस्ट: मांस, मदिरा से परहेज
आठवीं पोस्ट: पन्त जी और निराला जी
नवीं पोस्ट: नियम
भाग-३: बसेरे से दूर
दसवीं पोस्ट: इलाहाबाद से दूरभाग -४ दशद्वार से सोपान तक
ग्यारवीं पोस्ट: अमिताभ बच्चनबारवीं पोस्ट: रूस यात्रा
तेरवीं पोस्ट: नारी मन
चौदवीं पोस्ट: ईमरजेंसी और रुडिआड किपलिंग की कविता का जिक्र
यह पोस्ट: मुजरिम उन्मुक्त, हाजिर हों
Tuesday, December 26, 2006
बच्चन – पंत विवाद
हरिवंश राय बच्चन
भाग-१: क्या भूलूं क्या याद करूं
पहली पोस्ट: विवाद
दूसरी पोस्ट: क्या भूलूं क्या याद करूं
भाग-२: नीड़ का निर्माण फिर
तीसरी पोस्ट: तेजी जी से मिलन
चौथी पोस्ट: इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अध्यापक
पांचवीं पोस्ट: आइरिस, और अंग्रेजी
छटी पोस्ट: इन्दिरा जी से मित्रता,
सातवीं पोस्ट: मांस, मदिरा से परहेज
आठवीं पोस्ट: पन्त जी और निराला जी
नवीं पोस्ट: नियम
भाग-३: बसेरे से दूर
दसवीं पोस्ट: इलाहाबाद से दूर
भाग -४ दशद्वार से सोपान तक
ग्यारवीं पोस्ट: अमिताभ बच्चन बारवीं पोस्ट: रूस यात्रा तेरवीं पोस्ट: नारी मन चौदवीं पोस्ट: ईमरजेंसी और रुडिआड किपलिंग की कविता का जिक्र पंद्रवीं पोस्ट: अनुवाद नीति, हिन्दी की दुर्दशा सोलवीं तथा अन्तिम यह पोस्ट: बच्चन – पंत विवाद
Monday, December 25, 2006
हस्तरेखा विद्या: ... और टोने-टुटके
ज्योतिष, अंक विद्या, हस्तरेखा विद्या, और टोने-टुटके
पहली पोस्ट: भूमिकादूसरी पोस्ट: तारे और ग्रह
तीसरी पोस्ट: प्राचीन भारत में खगोल शास्त्र
चौथी पोस्ट: यूरोप में खगोल शास्त्र
पांचवीं पोस्ट: Hair Musical हेर संगीत नाटक
छटी पोस्ट: पृथ्वी की गतियां
सातवीं पोस्ट: राशियां Signs of Zodiac
आठवीं पोस्ट: विषुव अयन (precession of equinoxes): हेयर संगीत नाटक के शीर्ष गीत का अर्थ
नवीं पोस्ट: ज्योतिष या अन्धविश्वास
दसवीं पोस्ट: अंक विद्या, डैमियन - शैतान का बच्चा
ग्यारवीं पोस्ट: अंक लिखने का इतिहास
यह बारवीं तथा अन्तिम पोस्ट: हस्तरेखा विद्या
इरविंग वैलेस कल्पित (fiction) उपन्यास के बादशाह हैं, पर उनका मन हमेशा अकल्पित (non-fiction) लेख लिखने में रहता है। उनके अनुसार वे कल्पित उपन्यास इसलिये लिखते हैं क्योंकि उसमें पैसा मिलता है। उन्होंने बहुत सारे अकल्पित लेख लिखे हैं। इन लेखों को मिलाकर एक पुस्तक निकाली है, उसका नाम है, The Sunday Gentleman यह पुस्तक पढ़ने योग्य है। इसमें एक लेख The Incredible Dr. Bell के नाम से है। यह लेख डा. जोसेफ बेल के बारे में है।
डा. जोसेफ बेल वे 19वीं शताब्दी के अंत तथा 20वीं शताब्दी के शुरू में, एडिनबर्ग में सर्जन थे और एक वहां के विश्वविद्यालय में पढ़ाते थे। वे हमेशा अपने विद्यार्थियों को कहते थे कि लोग देखते हैं पर ध्यान नहीं देते। यदि आप किसी चीज को ध्यान से देखें तो उसके बारे में बहुत कुछ बता सकते हैं। उन्होंने बहुत सारे विद्यार्थी को पढ़ाया, उनमें से एक विद्यार्थी का नाम था आर्थर कैनन डॉयल, जो कि शर्लौक होल्मस के रचयिता हैं।
इस लेख में डा. बेल के बहुत सारे उदाहरण बताये गये हैं जब उन्होंने किसी व्यक्ति को देखकर उसके बारे में बहुत कुछ बता दिया। शर्लोक होल्मस एक जासूस थे और कहानियों में ध्यान पूर्वक देखकर बहुत कुछ सुराग ढूढ कर हल निकालते थे। आर्थर कैनन डॉयल ने जब शर्लोक होल्मस की कहानियां लिखना शुरू किया तो उसका चरित्र डा. बेल के चरित्र पर ढाला और डा. वाटसन का चरित्र अपने ऊपर ढाला।
यदि आप किसी कागज को मोड़ें तो हमेशा पायेंगे कि उस कागज को जहां से मोड़ा जाता है, उसमें चुन्नट (Crease) पड़ जाती है। इस तरह से जब हम हंथेली को मोड़ते हैं तो जिस जगह हमारी हथेली मुड़ती है, उस जगह एक चुन्नट, रेखा के रूप में पड़ जाती है। हथेलियों की रेखायें, हाथ के मुड़ने के कारण ही पड़ती हैं।
हम किसी के हाथ को ध्यान से देखें तो कुछ न कुछ उस व्यक्ति के बारे में पता चल भी सकता है। शायद यह भी पता चल जाय कि वह व्यक्ति बीमार है या नहीं। पर उसकी हंथेली की रेखाओं को देखकर यह बता पाना कि उस व्यक्ति की शादी कब होगी, वह कितनी शादियां करेगा, कितने बच्चे होंगे, या नहीं होंगे। यह सब बता पाना नामुमकिन है। यह सब भी ढकोसला है।
निष्कर्ष
मैंने पिछली पोस्टों पर यह बताने का प्रयत्न किया कि ज्योतिष, अंक विद्या, और हस्त रेखा विद्या में कोई भी तर्क नहीं है, फिर भी हमारे समाज में बहुत सारे काम इनके अनुसार होते हैं। बड़े से बड़े लोग इन बातों को विचार में रख कर कार्य करते हैं।
इनका एक कारण मुझे यह समझ में आता है कि यह सब कभी कभी एक मनश्चिकित्सक (psychiatrist) की तरह काम करते हैं। आप परेशान हैं कुछ समझ नहीं आ रहा है कि क्या करें। मुश्किल तो अपने समय से जायगी पर इसमें अक्सर ध्यान बंट जाता है और मुश्किल कम लगती है। पर इसका अर्थ यह नहीं कि इनमें कोई सत्यता है या यह अन्धविश्वास नहीं है या फिर टोने टुटके से कुछ अलग है।
मैं इन सब बातों पर विश्वास तो नहीं करता पर कोई मेरे बारे में अच्छी बात करे, तो सुन लेता हूं। कोई खास व्यक्ति हाथ पकड़ कर बताये तो क्या बात है। हां कभी मेले में आप मुझे किसी चिड़िया से अपना भाग्य
बंचवाते भी देख सकते हैं जैसा कि यहां पर हो रहा है :-)मैनें यह सब कुछ लोगो के द्वारा टोने टुटके के चिट्ठे पर की गयी आपत्ति के कारण लिखना शुरु किया। अधिकांश लोग टोने टुटके पर कुछ अंश तक विश्वास करते हैं इसलिये यदि कोई टोने टुटके के बारे में लिखे तो लिखे, जिसे पढ़ना हो पढ़े, जिसे न पढ़ना हो वह न पढ़े। हमसे किसी ने भी, किसी और के दिमाग ठेका नहीं ले रखा है।
इसी चिट्ठी के साथ यह श्रंखला भी समाप्त होती है।
Saturday, December 23, 2006
गणित: ... time to think? चुनाव प्रचार
Don’t you have time to think?
पहली पोस्ट: पुस्तक - Don’t you have time to think?दूसरी पोस्ट: पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा
तीसरी पोस्ट: गायब
चौथी पोस्ट: मानद उपाधि
पांचवीं पोस्ट: खेलो, कूदो और सीखो
छटी पोस्ट: अधिकारी, विशेषज्ञ
सातवीं पोस्ट: काम से ज्यादा महत्व, उसे करने में है
यह आठवीं वा इस विषय पर अन्तिम पोस्ट: गणित
भौतिक शास्त्र मेरा प्रिय विषय था। मुन्ने की मां को गणित अच्छी लगती है। मैं हमेशा कहता हूं कि भौतिक शास्त्र तो रानी है और गणित नौकरानी - जहां चाहो लगा लो। गणित के यही गुण गणित को राजरानी बनाते हैं क्यंकि विज्ञान में इसके बिना ठौर नहीं।
फ्रेड्रिक हिप्प १६ साल के नवयूवक ने १९६१ में फाइनमेन को पत्र लिख कर बताया कि भौतिक शास्त्र उसे अच्छा लगता है पर गणित पसंद नहीं आती है। वह क्या करे। फाइनमेन ने उसे लिखा कि,
'To do any important work in physics a very good mathematical ability and aptitude are required. Some work in applications can be done without this, but it will not be very inspired.मुझे तो मालुम है कि मुन्ने की मां तो हमेशा सही रहती है, उससे जीत पाना संभव नहीं।
If you must satisfy your “personal curiosity concerning the mysteries of nature” what will happen if these mysteries turn out to be laws expressed in mathematical terms (as they do turn out to be )? You cannot understand the physical work in any deep or satisfying way without using mathematical reasoning with facility.'
इसी पोस्ट के साथ 'Do you have time to think?' पुस्तक की समीक्षा समाप्त होती है। बच्चन जी की जीवनी के चारों भाग की समीक्षा अपने अन्तिम चरण में है, इसकी भी आखिरी और सबसे महत्वपूर्ण कड़ी लिखनी है जिसमें जिक्र रहेगा पन्त जी बच्चन जी विवद पर चर्चा।शीघ्र ही कोई दूसरी पुस्तक पढ़ कर आपके सामने प्रस्तुत करूगां तब तक चलिये चुनाव की सरगर्मी में भाग लेते हैं।
चुनाव प्रचार
भाईयों और बहनो (मुन्ने की मां को छोड़ कर)मैं भी २००६ के सर्वश्रेष्ठ उभरते हुऐ चिट्ठाकार चुनाव का उम्मीदवार हूं, कृपा दृष्टि बनाये रखियेगा। जीतने पर मेरा वायदा:
- मैं २००७ में, साल भर आपको पोस्ट लिख कर बोर करूगां;
- यदि आपको नींद नहीं आती है नींद आने की शर्तिया दवा। कुछ और करने की जरूरत नहीं - बस केवल मेरी पोस्टें पढ़िये, नींद तुरन्त आयेगी;
- मैंने एक कैमरा भी खरीद लिया है २००७ में चित्रों से भी बोर करूंगा।
आजकल, मुन्ने की मां का मूड ऑफ है। उसने भी २००६ में लिखना शुरू किया। आप में किसी ने मेरा तो नॉमिनेशन कर दिया पर उसका नहीं किया। कह रही है कि मैं अब कोई पोस्ट नहीं लिखूंगी। चिट्ठेकार भैइया लोग तो मुझे मानते ही नहीं, किसी ने मेरा नॉमिनेशन नहीं किया।
उसका मूड ठीक करने के लिये, मैंने ही चुपके से उसके नाम से अभी, अभी नॉमिनेशन कर दिया है। देर हो गयी है - चुनाव कानून सख्त होता है। मुझे मालुम है कि उसका नामांकन इसी बात पर खारिज हो जायगा पर मूड तो ठीक होगा। कम से कम चाय तो नसीब होगी, देखिये अभी बता कर हलवा बनवाता हूं।
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