Friday, April 06, 2007

चर्च में राधा कृष्ण

गोवा के चर्च प्रसिद्ध हैं उनमे सबसे ज्यादा प्रसिद्ध हैंः बेसिलका ऑफ बॉम जीज़स और सर कैथ्रिडल। यह दोनो आमने सामने हैं बीच में सड़क है।

बेसिलका ऑफ बॉम जीज़स को बने हुऐ ५०० साल से ज्यादा हो गये हैं। इसमें फ्रांसिस ज़ेवियरस् का शव रखा हुआ है। इस चर्च में मोमबत्ती जलाने का रिवाज है। कहते हैं कि मन मुराद पुरी हो जाती। हम ने भी दस रुपये में पांच मोमबत्ती खरीदीं। चर्च के अन्दर का दृश्य बहुत भव्य था। चर्च के एक अलग बड़ा सा आंगन था मोमबत्ती वहीं एक जगह जलानी थी। मुन्ने की मां ने पूछा
'तुमने क्या मन्नत मांगी।'
मैंने कहा
'वही जो कि मैंने फतेहपुर सीकरी में मांगी थी।'
वह मेरे साथ फतेहपुर सीकरी नहीं गयी थी। उसने दूसरा सवाल पूछने से पहले, मेरे जवाब का अनुमान करते हुऐ कहा,
'यदि अब मैं तुमसे यह पूछूं कि तुमने फतेहपुर सीकरी में क्या मन्नत मांगी थी तो यह मत कहना कि जो तुमने यहां मांगी है।'
मुस्कराहट तो आ ही गयी।

कहा जाता है कि शाहंशाह अकबर को पुत्र नहीं था सूफी संत सलीम चिस्ती के आशिर्वाद से अकबर को तीन पुत्र रत्न प्राप्त हुऐ। उनके एक पुत्र का नाम, उन्हीं के नाम पर सलीम रखा गया। सलीम आगे चल कर जहांगीर के नाम से शाहंशाह बना। फतेहपुर सीकरी अकबर ने सूफी संत सलीम चिस्ती के सम्मान में बनवायी थी। यहां संत सलीम की कब्र भी है। इसी पर चादर चढ़ा कर, मन्नत मांगने की बात रहती है। अकबर ने अपने पुत्र पैदा होने के उपलक्ष में इसे बनवाया था। यहां तो अपने बच्चों के भले के अलावा कोई और क्या मांग सकता है। मैंने वही मांगा जो हम सब चाहते हैं।
'हे ईश्वर, हमारे बच्चों को संतोष, सुख, और शान्ति देना - हम दोनो से ज्यादा, चाहे वह थोड़ा ही ज्यादा क्यों न हो।'

हम लोग सड़क पार कर सर कैथ्रडल में भी गये। यह भी बहुत भव्य है। इसके बाहर का दृष्य हमारे गाईड के साथ यह रहा। गाईड ने बताया कि इस चर्च में कब्रिस्तान भी है। इसमें महत्वपूर्ण पुर्तगालियों की शव भी गड़े हैं। वहां एक चमत्कारी क्रौस भी है। किंवदन्तियों के अनुसार इसका आकार तब तक बढ़ता रहा जब तक ईसा मसीह स्वयं इसके ऊपर नहीं आ गये। इस क्रौस के ऊपर एक सफेद दुप्पटा पड़ा है जिसे ईसा मसीह का प्रतीक कहा जाता है।

क्रौस मुझे हमेशा त्याग का प्रतीक लगता है। मां तो त्याग का ही रूप होती है। क्रौस पर सफेद रंग का कपड़ा - जैसे किसी महिला ने सफेद साड़ी साड़ी का पल्लू ओढ़ रखा हो। अम्मां तो सधवा थीं पर मैंने हमेशा उन्हें सफेद सूती धोती में ही देखा। हम सब भाई बहन की शादी में भी। मेरे पिता यही चाहते थे। मुझे इसे देख कर बस अम्मां की याद आयी।

चर्च की इमारत से बाहर निकलते ही, उसी के आहाते में, दो छोटे सजे हुऐ बच्चे मिले। मैंने पूछा कि तुम क्या बने हो उन्होने कहा कि,
'हम राधा कृष्ण बने हैं।'
वहीं पर उन्होने मुझे एक भजन सुनाया और पोस देकर फोटो भी खिंचवायी। पर मुझे उनकी फीस देनी पड़ी - दोनो को आइसक्रीम खिलानी पड़ी।

चर्च के अन्दर मां मिली और बाहर राधा कृष्ण – यात्रा ही सफल हो गयी।

गोवा में आमदनी का मुख्य स्रोत पर्यटन है पर इसके अलावा भी वहां की मिट्ठी कुछ अलग गुल खिला रही है, यह अगली बार।

Wednesday, April 04, 2007

'व्यक्ति' शब्द पर ६० साल का विवाद – भूमिका: आज की दुर्गा

हमारा समाज पुरुष प्रधान है। इसके मानक पुरुषों के अनुरूप रहते हैं। तटस्थ मानकों की भी व्याख्या, पुरुषों के अनुकूल हो जाती है। कानून में हमेशा माना जाता है कि जब तक कोई खास बात न हो तब तक पुलिंग में, स्त्री लिंग सम्मिलित माना जायेगा। कानून में कभी कभी पुलिंग, पर अधिकतर तटस्थ शब्दों का प्रयोग किया जाता हैं जैसे कि 'व्यक्ति'। अक्सर कानून कहता है कि, यदि किसी 'व्यक्ति' (person),
  • की उम्र ..... साल है तो वह वोट दे सकता है,
  • ने ---- साल ट्रेनिंग ले रखी है तो वह वकील बन सकता है,
  • ने विश्वविद्यालय से डिग्री प्राप्त की है तो वह उसके विद्या परिषद (Academic council) का सदस्य बन सकता है,
  • को गवर्नर जनरल, सेनेट का सदस्य नामांकित कर सकता है।
ऐसे कानून पर अमल करते समय, यह सवाल उठा करता था कि इसमें 'व्यक्ति' शब्द की क्या व्याख्या है। इसके अन्दर हमेशा पुरूषों को ही व्यक्ति माना गया, महिलाओं को नहीं। हैं न, अजीब बात है। भाषा, प्रकृति तो महिलाओं को व्यक्ति मानती है पर कानून नहीं। महिलाओं को, अपने आपको, कानून में व्यक्ति मनवाने के लिए ६० साल की लड़ाई लड़नी पड़ी और यह लड़ाई शुरू हुई उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य से।

अगली बार हम इंगलैंड में 'व्यक्ति' शब्द पर हुऐ कुछ फैसलों पर अपनी नजर डालेंगे।

यदि आप, इस चिट्ठी को पढ़ने के बजाय, सुनना पसन्द करें तो इसे मेरी 'बकबक' पर यहां क्लिक करके सुन सकते हैं। यह ऑडियो क्लिप, ogg फॉरमैट में है। इस फॉरमैट की फाईलों को आप,
  • Windows पर कम से कम Audacity एवं Winamp में;
  • Linux पर लगभग सभी प्रोग्रामो में; और
  • Mac-OX पर कम से कम Audacity में,
सुन सकते हैं। मैने इसे ogg फॉरमैट क्यों रखा है यह जानने के लिये आप मेरी शून्य, जीरो, और बूरबाकी की चिट्ठी पर पढ़ सकते हैं।

आज की दुर्गा
महिला दिवस|| लैंगिक न्याय - Gender Justice|| संविधान, कानूनी प्राविधान और अंतरराष्ट्रीय दस्तावेज।। 'व्यक्ति' शब्द पर ६० साल का विवाद – भूमिका।।

Monday, April 02, 2007

डैनियल और मैक कंप्यूटर

हम गोवा में जिस होटेल में रुके थे वह समुद्र तट के बगल में है पर समुद्र तट होटेल वालों का नहीं है। फिर भी, होटेल वाले समुद्र तट को हमेशा साफ रखते हैं क्योंकि उनके यहां ८०% से अधिक लोग विदेशी हैं और वे इसी समुद्र तट के लिये इस होटेल में आते हैं। समुद्र तट की सफाई भी देखने काबिल थी। समुद्र पर अटखेलियां करती हुई लहरें , तट पर सुन्दर लोग, बेहतरीन नज़ारा और सबसे अच्छी बात, कोई टोकने वाला नहीं।

गोवा में मुझे एक प्रस्तुतीकरण भी देना था, यह समय आभाव के कारण पूरा नहीं हो पाया था। इसे पूरा करने के लिये, मैं सुबह ही लैपटॉप लेकर बाहर चला गया। मुझे वहां जर्मन इंजीनियर डैनियल मिला। वह यांत्रिक इंजीनियर है और गाड़ियों के ब्रेक बनाने वाली कम्पनी में काम करता है। उसके पास मैक कंप्यूटर था। वह विंडोस़ पर काम करता था और कुछ महीने पहले ही मैक पर काम करना शुरू किया है। उसके मुताबिक मैक सॉफ्टवेर बहुत अच्छा और सरल है। मैंने पूछा क्या विंडोस से भी। उसका जवाब था हां। उसके अनुसार जर्मनी में भी लोग चोरी की विंडोस़ प्रयोग करते हैं और यह लगभग ५०% है।

Guten Tag! Daniel,
It was pleasure to meet you. I hope you have tried OpenOffice.Org suit. Do try Firefox, Thunderbird, and Sunbird. They all are open source and great software. Some of Hindi bloggers will like to know more about Mac software. Please let us know more about the same and its support for languages other than English.
Tschüss! (I hope my German is correct) till we meet again.

डैनियल अपनी कंपनी की तरफ से अपने सहयोगी के साथ हिन्दुस्तान आये थे। वे लोग मीटिंग में पूना गये थे फिर गोवा में सम्मेलन में आये थे।

डैनियल को बहुत आशचर्य हुआ कि मेरा लैपटॉप लिनेक्स पर है। मैने उसे इसके बारे में और कुछ अन्य ओपेनसोर्स के सॉफ्टवेर के बारे में जानकारी दी। कुछ देर बाद जब हम फिर मिले तो उसने बताया कि वह ओपेन ऑफिस डाट ऑर्ग की वेबसाईट पर गया था और इसे डाउनलोड कर दिया है। वह इसका प्रयोग करेगा। होटेल में कमरे में तो लाईन से ब्रॉडबैंड था पर सार्वजनिक जगहों पर वाई फाई था। चलिये एक और व्यक्ति ओपेन सोर्स प्रयोग करने के लिये राजी हुआ।




अगली बार चर्च में मिलेंगे राधा कृष्ण से।

Friday, March 30, 2007

संविधान, कानूनी प्राविधान और अंतरराष्ट्रीय दस्तावेज: आज की दुर्गा

हमारे संविधान का अनुच्छेद १५(१), लिंग के आधार पर भेदभाव करना प्रतिबन्धित करता है पर अनुच्छेद १५ (२) महिलाओं और बच्चों के लिये अलग नियम बनाने की अनुमति देता है। यहीं कारण है कि महिलाओं और बच्चों को हमेशा वरीयता दी जा सकती है।

संविधान में ७३वें और ७४वें संशोधन के द्वारा स्थानीय निकायों को स्वायत्तशासी मान्यता दी गयी । इसमें यह भी बताया गया कि इन निकायों का किस किस प्रकार से गठन किया जायेगा। संविधान के अनुच्छेद २४३-डी और २४३-टी के अंतर्गत, इन निकायों के सदस्यों एवं उनके प्रमुखों की एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए सुरक्षित की गयीं हैं। यह सच है कि इस समय इसमें चुनी महिलाओं का काम, अक्सर उनके पति ही करते हैं पर शायद एक दशक बाद यह दृश्य बदल जाय।

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम एक महत्वपूर्ण अधिनियम है। हमारे देश में इसका प्रयोग उस तरह से नही किया जा रहा है जिस तरह से किया जाना चाहिये। अभी उपभोक्ताओं में और जागरूकता चाहिये। इसके अन्दर हर जिले में उपभोक्ता मंच (District Consumer Forum) का गठन किया गया है। इसमें कम से कम एक महिला सदस्य होना अनिवार्य है {(धारा १०(१)(सी), १६(१)(बी) और २०(१)(बी)}।

परिवार न्यायालय अधिनियम के अन्दर परिवार न्यायालय का गठन किया गया है। पारिवारिक विवाद के मुकदमें इसी न्यायालय के अन्दर चलते हैं। इस अधिनियम की धारा ४(४)(बी) के अंतर्गत, न्यायालय में न्यायगण की नियुक्ति करते समय, महिलाओं को वरीयता दी गयी है।

अंर्तरार्ष्टीय स्तर पर सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज Convention of Elimination of Discrimination Against Women (CEDAW) (सीडॉ) है। सन १९७९ में, संयुक्त राष्ट्र ने इसकी पुष्टि की। हमने भी इसके अनुच्छेद ५(क), १६(१), १६(२), और २९ को छोड़, बाकी सारे अनुच्छेद को स्वीकार कर लिया है। संविधान के अनुच्छेद ५१ के अंतर्गत न्यायालय अपना फैसला देते समय या विधायिका कानून बनाते समय, अंतर्राष्ट्रीय संधि (Treaty) का सहारा ले सकते हैं। इस लेख में आगे कुछ उन फैसलों और कानूनों की चर्चा रहेगी जिसमें सीडॉ का सहारा लिया गया है।

क्या महिलायें व्यक्ति होती हैं? आप कहेंगे कि यह क्या बेवफूकी का सवाल है। पुरुष और महिला दोनो ही व्यक्ति होते हैं। जरुर होती होंगी पर क्या कानून की दृष्टि में ऐसा होता है। फिर वही बेवकूफी की बात। उन्मुक्त जी आप अच्छा मजाक कर लेते हैं। मजाक खत्म करें, नहीं तो मैं दूसरा चिट्ठा पढ़ने जा रहा हूं।

कानून में महिलाओं को व्यक्ति का दर्जा मिलने में महिलाओं को ६० साल की लड़ाई लड़नी पड़ी। उन्हें सबसे पहले सफलता मिली अपने देश में। जी हां भारत वर्ष वह भी अपने देश के उच्च न्यायालय में।

तो अगली कुछ चिट्ठियों में इस ६० साल की लड़ाई के बारे में बात करेंगे। बात करेंगे फैसलों के बारे में, देखेंगे कि उनमें क्या कहा गया है। हम चलेंगे दुनिया के न्यायालयों की सैर करने जहां पर यह मुकदमें चले। तो अगली बार मिलेंगे इस ६० साल की लड़ाई की भूमिका के बारे में।

यदि आप, इस चिट्ठी को पढ़ने के बजाय, सुनना पसन्द करें तो इसे मेरी 'बकबक' पर यहां क्लिक करके सुन सकते हैं।


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आज की दुर्गा
महिला दिवस|| लैंगिक न्याय - Gender Justice|| संविधान, कानूनी प्राविधान और अंतरराष्ट्रीय दस्तावेज

Sunday, March 25, 2007

सुहाना सफर और यह मौसम हसीं

गोवा में दो नदियां हैं: मंडोवी और जुआरी। मंडोवी नदी पर शाम को बोट की सैर होती है। यह बोट हैं कि पूरे जहाज। लगभग २५० से ३०० व्यक्ति बैठ सकते हैं। इस पर रेस्तराँ बैन्ड सब कुछ रहता है। जो मन आये वह पीजिये, गाना सुनिये, नाच का मजा लीजये, खुद भी नाचिये, और सैर का आनन्द लीजये।

बोट पर हम लोगो ने, कुछ लोकगीत सुने और कुछ लोक नृत्य भी देखे। साथ के लोग भी नृत्य करने में उत्सुक थे। बैण्ड वाले भी बहुत चालाक थे अधिकतर नाच उसने सैर करने वालों से ही करवाये। इन नाचने वालों में राना दम्पत्ति भी थे। हमारी इनसे मुलाकात बोट पर हुई थी। पति इंडियन एयलाइंस में और पत्नी रिलाएंस रिटेल में काम करती हैं। यह बहुत अच्छा नाचते थे। बोट में कई डेक थे हम लोग बोट के सबसे
ऊपर के डेक पर चले गये। यहां कुछ ज्यादा पैसा देना पड़ता है। यहां पर कुछ कम लोग थे। थोडी देर राना दम्पत्ती भी वही आ गये। मैंने इनसे पूछा कि उन्होने नच बलिये प्रतियोगिता में भाग लिया है कि नहीं। उनके मना करने पर मेरी उनको सलाह थी कि वे भाग लें, उन्हें अवश्य पुरुस्कार मिलेगा। राना दम्पत्ति ने मेरे कहने पर कुछ खास पोस - टाईटैनिक स्टाईल में, और कुछ नाच में चित्र खींचने दिये।
'Hi, both of you dance well. Do participate in the next dance competition and I am sure that you will win a prize. Do let us know in advance, not only we but all Hindi bloggers will be there to cheer you.'

बोट से दृश्य बहुत सुन्दर था। दृश्य का आनन्द लेते हुऐ, जब नजर इधर उधर दौड़ायी तो देखा कि एक कोने एक दूसरा बहुत सुन्दर सा भारतीय जोड़ा खड़ा था। युवती के कपड़े एकदम नये युग के थे। वह पैरों से चिपकी हुई कप्री (capri) पैंट और स्पैगेटी टॉप (spagetti top)} पहने हुऐ थी। हम तो यही समझते हैं कि पैंट नाभी पर रहती थी, वहीं से पहनी जाती है। पर आजकल के लड़के लड़की इसे कमर के सबसे निचले भाग पर रखते हैं। इस युवती ने कप्री इसी तरह से पहन रखी थी। उसका स्पैगेटी टॉप, शायद उसे नूडल स्ट्रैप टॉप (noodle strap top) कहना ठीक होगा, काफी खुला हुआ था। वह नाक में नथनी, कान पर झुमके, माथे पर बिन्दिया, बहुत सारी चूड़ियां और पायल पहने हुऐ थी। चलने में छम-छम आवाज आती थी इसी लिये मैंने उसका नाम रखा छम्मक-छल्लो। मेरी और मुन्ने की मां से शर्त लगी। मेरा कहना था की यह छम-छम चूडियों से आ रही है इसका कहना था कि चूड़ियां और पायल दोनो से।

इस लड़की के चलने में भी एक स्टाईल था। वह कुछ अलग अलग पोस दे कर अपने साथी को रिझा रही थी। मैने उस युवती से पूछा,
'आप क्या बौलीवुड में मॉडल हैं?'
वह मुस्करायी और बोली
'यह आप क्यों कह रहें हैं?'
मैंने कहा,
'आप सुन्दर हैं, आप जिस तरह से चल रहीं हैं, जिस तरह से खड़ी हैं बस इसी के कारण लगा।'
वह फिर मुस्करायी और बोली,
'मैं तो मॉडल नहीं हूं पर मेरे माता पिता मॉडल थे।'
मैंने अपनी और मुन्ने की मां की शर्त के बारे में बताया। बताने की जरूरत नहीं कि वह मुन्ने की मां जीत गयी

युवती भारतीय मूल की इंगलैण्ड की नागरिक थी. उसका लालन पालन वहीं हुआ था। लड़का पंजाबी था और इंगलैंड पढ़ने गया था। जहां दोनो कि मुलाकात हुई और शादी कर ली। वह शादी के बाद पहली बार अपने ससुराल भारत आयी थी। इस समय लड़का डब्लिन, आयरलैन्ड में डॉमिनोस पीट्ज़ा कम्पनी में काम करता है। इसने बताया कि दुनिया में इसके पीट्ज़ा कम्पनी की सबसे ज्यादा ब्रांच हैं और वे पीट्ज़ा हट से अलग सिद्धान्त पर काम करते हैं। वे घर पर पीट्ज़ा आधे घन्टे में पहुचाने में विश्वास करते हैं यदि नहीं कर पाये तो कोई पैसे नहीं लेते हैं।
'Hi, smart ones. The next time, when I am at a place where I can order Domino's Pizza, I am going to have one.'

मुझे अगले दिन पता चला कि यह युगल दम्पत्ती हमारे ही होटेल में ही ठहरे थे। वे नाशता करके बाहर जा रहे थे तो हम नाशता करने जा रहे थे। युवती ने हमें देख कर हाथ हिलाया। उसकी चूड़ियां कनखने लगी मुझे लगा कि वह बताना चाहती है छम-छम चूड़ियों से है और शर्त मैंने जीती है न कि मुन्ने की मां ने। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। गोवा में एक बहुत अच्छा ईम्पोरियम है। इसमें भारतवर्ष के सब कोने से समान रहता है। मुन्ने की मां ने जीत कि खुशी में वहां से पहले ही अपने लिये पशमीने का एक शॉल खरीद लिया था। मेरी जेब खाली हो चुकी थी।

आर्यन जी, मुझसे कई बार मैक कंप्यूटर के बारे में पूछ चुके हैं और मैं बता ही नहीं पा रहा हूं। मुझे इस बात की चिन्ता रहती है कि कैसे मैं उनको इसके बारे में बताऊं। गोवा में भी इस बारे में सोचता था। तो अगली बार हम बात करेंगे डैनियल और मैक कंप्यूटर की। जी हां, मस्ती में भी चिट्ठेकारिता का नशा सवार था।

'सुहाना सफर और यह मौसम हसीं' गीत यहां सुनिये।


गोवा
प्यार किया तो डरना क्या।। परशुराम की शानती।। रात नशीले है।। सुहाना सफर और यह मौसम हसीं।। डैनियल और मैक कंप्यूटर।। चर्च में राधा कृष्ण।। मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती।। न मांगू सोना, चांदी।। यह तो बताना भूल ही गया।। अंकल तो बच्चे हैं

यदी आप मुन्ने की मां के साथ जापान के अनुभव लेना चाहें तो यहां पढ़ सकते हैं और एक नये प्रयोग में भाग लेना चाहें तो यहां सुन सकते हैं।

Thursday, March 22, 2007

लैंगिक न्याय - Gender Justice: आज की दुर्गा

इस विषय पर मेरी पिछली चिट्ठी पर अनूप जी ने टिप्पणी कर Gender Justice के लिये हिन्दी का शब्द लैंगिक न्याय सुझाया। मेरे विचार से, यह इसके लिय उपयुक्त शब्द है और अब मैं इसी शब्द का प्रयोग करूंगा।

लैंगिक न्याय अर्थात किसी के साथ लिंग के आधार पर भेद-भाव नहीं होना चाहिये। बहुत से लोग समलैंगिक अधिकारों को भी इसके अन्दर मानते हैं। समलैगिंकों के साथ भेदभाव होता है लेकिन वह इसलिये नहीं कि उनका लिंग क्या है वह इसलिये कि वे अपने लिंग के ही लोगों में रूचि रखते हैं। मेरे विचार से, समलैंगिग अधिकारों को लैंगिक न्याय के अन्दर रखना उचित नहीं है। उनके अधिकारों को अलग से नाम देना, या अल्पसंख्यक (Minority) या जातीय (ethnic) अधिकारों के अन्दर रखना, या Gay rights कहना ठीक होगा।

हम कुछ अन्य श्रेणी के व्यक्तियों के अधिकारों पर भी विचार करें, उदाहरणार्थः
  • Trans- Sexual: यह वह लोग हैं जो एक लिंग के होते हैं पर बर्ताव दूसरे लिंग के व्यक्तियों की तरह से करते हैं;
  • Trans gendered: लिंग परिवर्तित: यह वह व्यक्ति हैं जो आपरेशन करा कर अपना लिंग परिवर्तित करवा लेते हैं। इसमें सबसे चर्चित व्यक्ति रहे रीनी रिचर्डस्। ये पुरुष थे और आपरेशन करा कर महिला बन गये, पर उन्हें महिलाओं की टेनिस प्रतियोगिता में कभी भी खेलने नहीं दिया गया। उन्हें कुछ सम्मान तब मिला जब वे मार्टीना नवरोतिलोवा की कोच बनीं। मैंने इस तरह के लोगों के साथ हो रहे भेदभाव के बारे में Trans-gendered – सेक्स परिवर्तित पुरुष या स्त्री कि चिट्ठी पर लिखा है;
  • Inter-Sex बीच के: लिंग डिजिटल नहीं है। मानव जाति को केवल पुरूष या स्त्री में ही नहीं बांटा जा सकता हैं। हम क्या हैं, कैसे हैं, यह क्रोमोसोम तय करते हैं। यह जोड़े में आते हैं। हम में क्रोमोसोम के २३ जोड़े रहते हैं। हम पुरूष हैं या स्त्री, यह २३वें जोड़े पर निर्भर करता है। महिलाओं में यह दोनों बड़े अर्थात XX होते हैं पुरूषों में एक बड़ा एक छोटा यानि कि XY रहते हैं। अक्सर प्रकृति अजीब खेल खेलती है। कुछ व्यक्तियों में २३वें क्रोमोसोम जोड़े में नहीं होते: कभी यह तीन या केवल एक होते हैं अर्थात XX,Yया XYY, या X, या Y. यह लोग पूर्ण पुरूष या स्त्री तो नहीं कहे जा सकते - शायद बीच के हैं। इसलिए इन्हें Inter-Sex कहा जाता है। संथी सुन्दराजन शायद इसी प्रकार की हैं। इसलिये दोहा एशियाई खेलो में, उनसे रजत पदक वापस ले लिया गया।
ऊपर वर्णित तीनो तरह के व्यक्तियों के साथ लिंग के आधार पर भेदभाव होता है। अधिकतर जगह, यह लोग हास्य के पात्र बनते हैं। इन्हें भी न्याय पाने का अधिकार है पर अपने देश में लैंगिक न्याय का प्रयोग केवल महिलाओं के साथ न्याय के संदर्भ में किया जाता है और इस लेख में हम बात करेंगे महिलाओं के साथ न्याय, उनके सशक्तिकरण की: आज की दुर्गा की।

अगली बार इस विषय से सम्बंधित संविधान और कानून के प्राविधान एवं अंतरराष्ट्रीय दस्तावेजों की।

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यदी आप मुन्ने की मां के साथ जापान के अनुभव लेना चाहें तो यहां पढ़ सकते हैं।

आज की दुर्गा
महिला दिवस|| लैंगिक न्याय - Gender Justice||

Thursday, March 15, 2007

रात नशीले है

मुन्ने की मां भी मेरे साथ गोवा में थी। होटल समुद्र के किनारे था। मैंने होटेल के कमरे की खिड़की से पर्दा हटाया तो देखा समुद्र के किनारे विदेशी धूप सेंक रहे हैं। बहुत सारी महिलायें भी थी। इसी नजारे को देख कर मैंने अपनी चिट्ठी प्यार किया तो डरना क्या में दूसरी बात लिखी थी। मैं तन्मयता से खिड़की से बाहर देख रहा था कि तभी मुन्ने की मां भी आ गयी बोली
'क्या देख रहे हो।'
मैंने कहा,
'समुद्र और क्या।'
वह
बोली,
'मैं जानती हूं कि तुम क्या देख रहे हो, खींचो पर्दा।'
मरता क्या न करता, पर्दा खींचना पड़ गया। उसने मेरे हाथ से कैमरा छीन लिया। कहा उधर कुर्सी पर बैठो, मैं चित्र खींचती हूं। देखिये कमरे की खिड़की से यह चित्र उसी खींचा है। क्या बेकार है? बाद में भी कैमरा उसी हाथ रहा सारे चित्र उसी के खींचे हुऐ हैं :-(

होटल में जगह जगह क्या बढ़िया बार थे और सब तरह के पीने का समान। पर मुन्ने की मां जो मुझसे चिपकी, बस साये की तरह लगी रही। सब मजा चला गया। अगली बार तो मैं अकेले ही आऊंगा। मैं यह कर सकता हूं। आपको मालुम होना चाहिये घर का बॉस मैं हूं और मुन्ने की मां ने, मुझे यह सबसे बताने की अनुमति दे रखी है।

अधिकतर भारतीय लोग अपने परिवार के साथ थे। बस हम ही दो लोग गोवा में थे। हमारे बच्चों के पंख निकल आये हैं। वे अपना घर बसा कर, हमारे बसेरे से दूर, अपना बसेरा ढ़ूढ़ने, सात समुन्दर दूर निकल गये हैं। रेस्तरां में, दोपहर के खाने पर बैंड बज रहा था। मैंने हिन्दी गाना सुनाने की प्रार्थना की, तो उसने मना कर दिया। वहां पर बहुत से विदेशी थे। इसलिये वे लोग या तो अंग्रेजी के गाने गाते थे या फिर कोंकणी के।

मेरे अनुरोध पर बैंड ने कोंकनी में एक गीत सुनाया। यह कुछ 'पुकारता, चला हूं मैं' की धुन में था। उसने बताया कि यह एक प्रेम गीत है। मेरे विद्यार्थी जीवन में बीटल बहुत लोकप्रिय हुआ करता था मैंने उनसे बीटल का कोई गाना सुनाने को कहा। उन्होने
'I want to hold your hand'
सुनाया। उनका यह गाना शायद सबसे चर्चित गाना है। शादी के ३० साल बाद मैं और मुन्ने की मां अपने दूसरे हनीमून पर थे - केवल हमीं नहीं, वहां पर सब।

रात को सम्मेलन के लोगों का खाना अलग जगह समुद्र के किनारे था। खाने की जगह पर जाने लगा तो एक जगह शतरंज की बाजी बिछी थी। मैं इसे देखने लगा तो एक विदेशी महिला की आवाज सुनायी पड़ी,
'If I knew chess then I would have played chess with you.'
मैंने मुड़ कर देखा तो बार में एक विदेशी दम्पत्ती, बार का मजा ले रहे थे। महिला ने मुझे अपना नाम ब्रेन्डा बताया। मैंने कुछ देर उन लोगों से बात की, फिर चल दिया खाने पर।
Brenda, it was a pleasure to meet you. You have promised that you will learn chess and we will play, when we meet again.
खाना दूर समुद्र के किनारे था। वहां एक ग्रुप गाना गा रहा था। धुन मस्तानी थी पर गाना समझ में नहीं आ रहा था, शब्द कुछ अजीब से इस प्रकार लगते थे
रात नशीले है
मस्त जैंहां है
रूप तेरा मास्ताने

फिर समझ में आया, यहां केवल भारतीय थे। इसीलिये बैंड हिन्दी पिक्चर आराधना का गाना गा रहे थे।

अगली बार 'सुहाना सफर और यह मौसम हसी' में भाग लेते हैं नच बलिये में और मिलते हैं छम्मक-छल्लो से।

देखिये, मैंने यह कभी नहीं कहा था कि मैं दूसरी बात के लिये फोटुवें दिखाउंगा जैसा कि चिट्ठाचर्चा में
यहां मान लिया गया है। मैंने तो केवल यह कहा था कि मैं सब सच सच बता दूंगा कि वहां मेरे साथ क्या हुआ। मुझे डर यह था कि कहीं आप लोग मुझे बीबी से डरने वाला समझ कर, मेरे चिट्ठे का बहिष्कार न करने लग जांय। आप खुद इस विषय पर दूसरी 'परशुराम की शनती' वाली चिट्ठी में पढ़ लीजये कि मैंने क्या कहा था।

Tuesday, March 13, 2007

आज की दुर्गा: महिला दिवस

मेरी पिछली चिट्ठी प्यार किया तो डरना क्या पर जीतेन्द्र जी कि टिप्पणी,
'गोवा की याद करा कर, लेख लिखने के लिए उकसा दिया आपने। अब झेलिएगा लेख।'
मैं उनके गोवा यात्रा के लेखों का इंतजार कर रहा हूं, देखना है कि उनका अनुभव मेरे अनुभव जैसा ही रहा या फिर अलग था।

जीतेन्द्र जी ने टिप्पणी करते समय यह की यह बात भी कही कि

'आप डिसाइड नही कर पाए कि होटल पर लिखे या लीनिक्स पर'।
यह बात कुछ करोंच सी गयी। लगता है, मेरे दिमाग में ओपेन सोर्स और लिनेक्स कुछ ज्यादा ही घूमता रहता है। मुझे इससे बाहर आना चाहिये - गेयर बदलना चाहिये। महिला दिवस अभी ही गुजरा है, इसलिये सोचा कि मैं महिला अधिकारों के ऊपर नयी श्रृंखला की शुरुवात करूं। यह श्रृंखला लम्बी चलेगी और गेयर अपने आप बदल जायग। पहला प्यार तो भूलना मुश्किल होता है फिर भी, महिलाओं को दिमाग में रखूंगा तो शायद भूल पाऊं :-)

दुर्गा, शक्ति का रूप हैं। इतनी शक्तिमान कि भगवान राम ने भी लंका पर आक्रमण के समय, दुर्गा की आराधना की। उनकी कथा कुछ ऐसी है कि जब देवता, महिषासुर से संग्राम में हार गये और उनका ऐश्वर्य, श्री और स्वर्ग सब छिन गया तब वे दीन-हीन दशा में वे भगवान के पास पहुँचे। भगवान के सुझाव पर सबने अपनी सभी शक्तियॉं (शस्त्र) एक स्थान पर रखीं। शक्ति के सामूहिक एकीकरण से दुर्गा उत्पन्न हुई। पुराणों में उसका वर्णन है - उसके अनेक सिर हैं, अनेक हाथ हैं। प्रत्येक हाथ में वह अस्त्र-शस्त्र धारण किए हैं। सिंह, जो साहस का प्रतीक है, उसका वाहन है। ऐसी शक्ति की देवी ने महिषासुर का वध किया। वे महिषासुर मर्दनी कहलायीं।

मेरे विचार से यह कथा संघटन की एकता का महत्व बताने के लिये बतायी गयी है। शक्ति, संघटन की एकता में ही है। उनके सहस्त्र सिर और असंख्य हाथ, वास्तव में संघटक के सहस्त्रों सिर और असंख्य हाथ हैं। कथा की शिक्षा है - साथ चलोगे तो हमेशा जीत का सेहरा बंधेगा। देवताओं को जीत तभी मिली जब उन्होने अपनी ताकत एकजुट की। मैं अवधिया जी प्रार्थना करूंगा कि वे विस्तार से दुर्गा की कथा हम सबको बतायें।

दुर्गा, शक्तिमयी हैं, उनका सशक्तिकरण हो चुका है। लेकिन आज की महिला क्या शक्तिमयी है? क्या उसका सशक्तिकरण हो चुका है? क्या वह आज दुर्गा बन चुकी है? शायद नहीं, पर उसके पास कुछ अधिकार तो हैं, वह कुछ तो शक्तिमान हुई। यह अधिकार, यह शक्तियां उसे किसी ने दिये नहीं हैं। यह उसने खुद लड़ कर प्राप्त किये हैं। इस श्रृंखला में हम नजर डालेंगे उन किस्से कहानियों पर, उन कानून पर, उन फैसलों पर, जिन्होने महिला अधिकारों को सुदृढ़ किया और उसे कुछ हद्द तक दुर्गा का रूप दिया। पर सबसे पहले कुछ बातें इस महिला दिवस के बारे में।

महिला दिवस ८ मार्च को क्यों मनाया जाता है?
अमेरिका में सोशलिस्ट पार्टी के आवाहन, यह दिवस सबसे पहले सबसे पहले यह २८ फरवरी १९०९ में मनाया गया। इसके बाद यह फरवरी के आखरी इतवार के दिन मनाया जाने लगा। १९१० में सोशलिस्ट इंटरनेशनल के कोपेनहेगन के सम्मेलन में इसे अन्तरराष्ट्रीय दर्जा दिया गया। उस समय इसका प्रमुख ध्येय महिलाओं को वोट देने के अधिकार दिलवाना था क्योंकि, उस समय अधिकर देशों में महिला को वोट देने का अधिकार नहीं था।

१९१७ में रुस की महिलाओं ने, महिला दिवस पर रोटी और कपड़े के लिये हड़ताल पर जाने का फैसला किया। यह हड़ताल भी ऐतिहासिक थी। ज़ार ने सत्ता छोड़ी, अन्तरिम सरकार ने महिलाओं को वोट देने के अधिकार दिये। उस समय रुस में जुलियन कैलेंडर चलता था और बाकी दुनिया में ग्रेगेरियन कैलेंडर। इन दोनो की तारीखों में कुछ अन्तर है। जुलियन कैलेंडर के मुताबिक १९१७ की फरवरी का आखरी इतवार २३ फरवरी को था जब की ग्रेगेरियन कैलैंडर के अनुसार उस दिन ८ मार्च थी। इस समय पूरी दुनिया में (यहां तक रूस में भी) ग्रेगेरियन कैलैंडर चलता है। इसी लिये ८ मार्च, महिला दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।

समय की कहानी, कैलेंडरों में अन्तर यह भी बहुत मजेदार किस्सा है। यह कभी मैं विस्तार से आपको सुनाऊगां। पर मुझे प्रसन्नता होगी यदि आप में से कोई इसकी कहानी लिखना शुरु करे।

महिलाओं के अधिकारों की बात करते समय एक शब्द Gender Justice प्रयोग होता है। इस शब्द के अर्थ अलग अलग समय पर, अलग अलग देश में अलग अलग रूप में जाने जाते हैं। चलिये अगली बार हम बात करेंगे इस शब्द के अर्थ की और जानेगे, कि हमारे देश इस समय यह किस अर्थ में लिया जाता है।

मैं नहीं जानता कि Gender Justice के लिये हिन्दी में क्या उपयुक्त शब्द है। शब्दार्थ के अनुसार से तो यह लिंग न्याय होता है पर क्या यह सही है? मुझे प्रसन्नता होगी यदी आपमें से कोई इसके लिये सही शब्द बताये।



आज की दुर्गा
महिला दिवस|| लैंगिक न्याय - Gender Justice|| संविधान, कानूनी प्राविधान और अंतरराष्ट्रीय दस्तावेज।। 'व्यक्ति' शब्द पर ६० साल का विवाद – भूमिका।। इंगलैंड में व्यक्ति शब्द पर इंगलैंड में कुछ निर्णय।। अमेरिका तथा अन्य देशों के निर्णय – विवाद का अन्त।। व्यक्ति शब्द पर भारतीय निर्णय और क्रॉर्नीलिआ सोरबजी।। स्वीय विधि (Personal Law)।। महिलाओं को भरण-पोषण भत्ता।। Alimony और Patrimony।। अपने देश में Patrimony - घरेलू हिंसा अधिनियम।। विवाह सम्बन्धी अपराधों के विषय में।। यौन अपराध।। बलात्कार परीक्षण - साक्ष्य, प्रक्रिया।। दहेज संबन्धित कानून।। काम करने की जगह पर महिलाओं के साथ छेड़छाड़।। समानता - समान काम, समान वेतन।। स्वतंत्रता।। एकान्तता और निष्कर्ष।।
महिला दिवस के बारे में विस्तार से जानकारी यहां और यहां देखी जा सकती है।

यदि आप, इस चिट्ठी को पढ़ने के बजाय, सुनना पसन्द करें तो इसे मेरी 'बकबक' पर यहां क्लिक करके सुन सकते हैं। यह ऑडियो क्लिप, ogg फॉरमैट में है। इस फॉरमैट की फाईलों को आप,
  • Windows पर कम से कम Audacity एवं Winamp में;
  • Linux पर लगभग सभी प्रोग्रामो में; और
  • Mac-OX पर कम से कम Audacity में,
सुन सकते हैं। मैने इसे ogg फॉरमैट क्यों रखा है यह जानने के लिये आप मेरी चिट्ठी 'पापा, क्या आप उलझन में हैं' पर पढ़ सकते हैं।
अन्य चिट्ठों पर क्या नया है इसे आप दाहिने तरफ साईड बार में, या नीचे देख सकते हैं।

Saturday, March 10, 2007

परशुराम की शानती

परशुराम की शानती? उनकी तो शादी नहीं हुई थी फिर यह शानती कहां से आ गयी - अरे बाबा, मेरा मतलब शान्ति, वह शान्ति जिसकी हम सब को तलाश है।

कहते है परशुराम क्षत्रियों से क्रोधित हो गये। वे क्यों क्रोधित हो गये, इसकी कथा तो अवधिया जी ने यहां बतायी है। संक्षेप में यह क्रोध कामधेनु गौमाता के पीछे हुआ था। क्रोधित परशुराम को,
भगवान ने शान्ति पाने के लिये तपस्या का मार्ग सुझाया और कहा कि जहां तीर गिरे, वहीं तपस्या करो। तीर तो अरब की खाड़ी में गिरा। समुद्र देव ने वहां से पानी हटा कर जमीन उन्हें सौंप दी। परशुराम, गौमाता के साथ वहां तपस्या करने पहुंचे इसलिये उसका जगह का नाम गोवा पड़ा।

समुद्र देव ने स्वयं जमीन परशुराम को जमीन दी थी इसलिये वहां उनकी हमेशा कृपा रहती है। आज तक कभी समुद्र के कारण कोई विपदा नहीं आयी। सुनामी का भी कोई असर नहीं पड़ा था।

परशुराम जी ने शिव की तपस्या की और शान्ति प्राप्त की। इसलिये कहा जाता है कि जो भी गोवा जाता है उसे वहां शान्ति मिलती है। हांलाकि इसमें पुर्तगालियों का भी बहुत बड़ा हाथ है।

पणजी में एक प्रसिद्ध मंगेश मन्दिर है। परशुराम ने भगवान शिव की तपस्या की थी शायद इसलिये यह भगवान शिव का मन्दिर है। गोवा के पास परुशराम का भी मंदिर है।

शिव मन्दिर पहले पुराने गोवा में था। सोलवीं शताब्दी में जब पुर्तगालियों ने हिन्दुवों पर अत्याचार करना शुरू किया तो वे है पणजी की तरफ भागे और अपने देवी देवता भी ले आये। इस मन्दिर को तब ही पणजी में स्थापित किया गया। यह भव्य है।

शिव जी के मन्दिर जाते समय रास्ते में मेरी मुलाकात रवी से हुई। वे लोगों के बदन पर जगह जगह ठप्पा
लगाते हैं। उसके अनुसार यह लगभग एक माह तक रहता है। सबसे छोटे का २० रुपया और सबसे बड़े का ५० रुपया। मैंने पूछा कि दिन में कितने पैसे मिल जाते हैं। उसने बताया कि लगभग ३००-४०० रुपये मिल जाते हैं।

विदेशी महिलायें तो अजीब अजीब जगह ठप्पा लगवा रहीं थी। मैने तो हांथ में सबसे छोटा ठप्पा लगवाया पर ७० रुपये खर्च हो गये।
'उन्मुक्त, क्या कहा ७० रुपये। लगता है कि गणित में तो हमेशा फेल होते होगे।'
नहीं भाई मैने तो उसे २० ही रुपये दिये पर मेरे सहयोगी लोग कहने लगे यह ठप्पा तो शर्ट की बांह के अन्दर है, लोग कैसे देखेंगे। इसके लिये तो बिना बांह की शर्ट होनी चाहिये।

मेरे पास तो बिना बांह की कोई शर्ट नहीं है। वहां छोटी छोटी बहुत सी दुकाने थीं, जिन पर हर तरह की शर्ट मिल रहीं थी। मैंने दुकान वाली महिला से शर्ट दिखाने को कहा तो इसने ३५ रुपये की बांह वाली शर्ट दिखायी। मैंने कहा मुझे तो बिना बांह की चाहिये, क्योंकि सबको ठप्पा दिखाना है। वह समझ गयी कि आज तो एक मुर्गा फंसा है। उसने झट से दिखायी और ५० रुपये दाम बताया। मैंने कहा कि यह तो बिना बांह की है, सस्ती होनी चाहिये। पर वह ठस से मस नहीं हुई। हार कर ५० रुपये की ली। हो गया ना ७० रुपये का चूना।

मैंने पिछली चिट्ठी पर होटेल की दो खास बातों के बारे में जिक्र किया था। वे बातें यह हैं:
  • महिलाओं की तो नेकरे छोटी होती जा रहीं हैं और पुरषों की बड़ी;
  • गोरे चिट्टे (विदेशी) महिला बदन पर जितने कम कपड़े (बस चले तो सब उतार दें पर यह कानूनी तौर पर मना है), और गेहुवें तथा श्याम (मुन्ने की मां जैसी देसी) महिला बदन पर उतने ही ज्यादा।
इस बात पर अनूप जी ने टिप्पणी कर के कहा कि,
'सही है। आगे की फोटुयें दिखाइये ना अपनी दो बातों के समर्थन में !:)'
आजकल तो बहुत ज्लदी ही लोगों पारा गर्म हो जाता है। नारद से बहिष्कार करने की बात करने लगते हैं। कुछ चिट्ठों को नारद से हटा भी दिया गया है।
कुछ लोग रूठ कर चिट्ठेकारी न करने की बात करने लगते हैं। इन सब बातों का ध्यान में रख कर, मैंने टिप्पणी पर फुरसत से गम्भीरता पूर्वक विचार किया।

मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि वहां क्या हुआ, क्या सच है, यह जग जाहिर करना जरूरी है। पर फिर भी मैं पहले से ऐलान कर देता हूं कि अगली चिट्ठी के बाद मेरे चिट्टा के हाल का कारण न तो नारद को समझा जाय, न ही उन लोगों को जो मेरे चिट्ठे के बारे में मालुम नहीं क्या, क्या कहेंगे पर इसका समपूर्ण दायित्व केवल फुरसतिया जी का है किसी और को इसका जिम्मेवार न समझा जाय।

जब आप
फोटुयें देखेंगे तो नशे में तो डूबेंगे ही। तो चलिये अगली बार डूबते हैं 'रात नशीले है' में। जी हां मेरी हिन्दी कमजोर नहीं है, मैंने सही शब्द का प्रयोग किया है - नशीले।

अगली पोस्ट तक, दिल थाम कर बैठिये।

बहना आप भी जाईयेगा नहीं। देखियेगा और पढ़ियेगा नारी सशक्तिकरण का यह रूप भी।

गोवा
प्यार किया तो डरना क्या।। परशुराम की शानती।। रात नशीले है।। सुहाना सफर और यह मौसम हसीं।। डैनियल और मैक कंप्यूटर।। चर्च में राधा कृष्ण।। मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती।। न मांगू सोना, चांदी।। यह तो बताना भूल ही गया।। अंकल तो बच्चे हैं

Thursday, March 08, 2007

प्यार किया तो डरना क्या

अपने पैसे से तो पांच सितारा होटेल में ठहरना तो बहुत मंहगा है, कम से कम मेरे मेरे जेब के बाहर। सम्मेलन हमेशा पांच सितारा होटलों में होते हैं। उनमें जाने का यही फायदा है कि कम से कम उसी के बहाने वहां का भी नजारा देख लिया। हांलाकि जैसा फाइनमेन की पुत्री मिशेल Do you have time to think में बताती हैं कि फाइनमेन सम्मेलनो में होटलों से बोर होकर कर जंगलों में कैम्पिंग करना पसंद करते थे पर यह अपने देश में तो सम्भव नहीं लगता है।

मुझे, दो साल पहले कलकत्ता जाना पड़ा था। हयात ग्रुप का नया होटल बना है, वहीं पर हमारा
सम्मेलन था। कमरे बढ़िया इंटरनेट का कनेक्शन, पर वह मेरे लिनेक्स लैपटॉप पर चल कर नहीं दिया। मैंने होटल वालों से कहा। उन्होने एक व्यक्ति को भेजा। वह कोई विशेष्ज्ञय तो नहीं लगता था पर थोड़ा बहुत कंप्यूटर के बारे में जानता था। उसने मेरे लैपटौप को देखा और कहा कि,
'बहुत सुन्दर स्क्रीन है। लगता है विंडोस़ की कोई नयी थीम डाली है।'
मैंने कहा,
'यह विंडोस़ नहीं है, लिनेक्स है।'
'लिन्क्स? यह क्या होता है।'
उसने आश्चर्य से पूछा।

मैंने,कंप्यूटर के औपरेटिंग सिस्टम के बारे में उसकी क्लास ही ले ली। बताया कि यह कितनी तरह के होते हैं, इनमेम क्या अन्तर होता है, जैसा कि कुछ मैंने अपनी ओपेन सोर्स सॉफ्टवेर की चिट्ठी पर बताया है। उसने मुझसे पूछा कि मैं अगली बार कब आ रहा हूं। मैंने कहा,
'यह क्यों पूंछ रहे हो।'
उसका जवाब था,
'मैं लिनेक्स के बारे मैं सब सीख कर रखूंगा ताकि आपको मुश्किल न हो।'
बहुत खूब।

पिछले साल कोची में हयात ग्रुप में हुऐ एक सम्मेलन में रहने का मौका मिला। यहां पर भी अनुभव कलकत्ता
की तरह ही रहा।

इस साल मुझे गोवा जाना पड़ा। यहां सिडाडे डी गोवा के नाम के होटल में टहरने का मौका मिला। यह एक पांच सितारा होटेल है और बहुत अच्छा है। मुझे लगा कि लिनेक्स काफी लोकप्रिय हो चुका है इसलिये यहां बेहतर अनुभव रहेगा। पर यहां भी, मेरे लैपटॉप के साथ वही हुआ को कि मेरे साथ हयात कलकत्ता में हुआ था।

चलिये, प्यार किया तो डरना क्या। कम से कम तीन लोगों को तो मैंने लिनेक्स के बारे में बताया। वे अगली बार इसके लिये तैयार रहेंगे।

ऐसे आखिरकर, मैंने यहां पर लिनेक्स लैपटॉप की मुश्किल का हल निकाल ही लिया। बस जालक्रम विन्यास में जा कर यदि कोई लैन का कनेक्शन बना है तो इसका आईपी पता स्वचलित कर दे या नया इसी तरह का लैन कनेक्शन बना लें - बस काम फिट।

गोवा और यह होटेल दोनो बहुत अच्छे लगे। इसके बारे में आपको बताउंगा, कुछ चित्र भी लिये थे, वह भी पोस्ट करूंगा। यहां होटेल में दो खास बातें देखने को मिलीः
  • महिलाओं की तो नेकरे छोटी होती जा रहीं हैं और पुरषों की बड़ी;
  • गोरे चिट्टे (विदेशी) महिला बदन पर जितने कम कपड़े (बस चले तो सब उतार दें पर यह कानूनी तौर पर मना है), और गेहुवें तथा श्याम (मुन्ने की मां जैसी देसी) महिला बदन पर उतने ही ज्यादा।

तो मिलते हैं अगली बार परशुराम की शानती से - अरे बाबा, वही शान्ति, जिसकी हम सब को तलाश है।

मुगले आज़म फिल्म का गीत 'प्यार किया तो डरना क्या' सुनिये।



गोवा
प्यार किया तो डरना क्या।। परशुराम की शानती।। रात नशीले है।। सुहाना सफर और यह मौसम हसीं।। डैनियल और मैक कंप्यूटर।। चर्च में राधा कृष्ण।। मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती।। न मांगू सोना, चांदी।। यह तो बताना भूल ही गया।। अंकल तो बच्चे हैं