इस चिट्ठी में कोवलम अन्तर्राष्ट्रीय समुद्र तट की चर्चा है।
Friday, December 25, 2009
Friday, December 18, 2009
सफल वकील, मुकदमा शुरू होने के पहले, सारे पहलू सोच लेते हैं
सैमुएल लाइबोविट्ज़, २०वीं शताब्दी के दूसरे चतुर्थांश में अमेरिका के सबसे प्रसिद्ध वकील थे। 'बुलबुल मारने पर दोष लगता है' श्रृंखला की इस चिट्ठी में, चर्चा है कि उन्हें पहला मुकदमा कैसे मिला और उसमें क्या हुआ।
इस चिट्ठी को आप सुन भी सकते है। सुनने के लिये यहां चटका लगायें।
यह पॉडकास्ट ogg फॉरमैट में है। सुनने के लिये, दाहिने तरफ का विज़िट, 'मेरे पॉडकास्ट बकबक पर नयी प्रविष्टियां, इसकी फीड, और इसे कैसे सुने' देखें।
सैमुएल की पृष्ठभूमि ऐसी नहीं थी कि उन्हें मुकदमे मिल सकें। एक बार कॉर्नेल विश्वविद्यालय में, जब कानून के डीन ने, उनसे, इस बारे में बात की तब सैमुएल का कहना था
'मैं पहले प्रसिद्व वकील बनूंगा। तब, बड़ी-बड़ी कम्पनियां मेरे पास मुकदमा कराने आयेंगी और मैं पैसे कमा सकूंगा।'
सैमुएल लाइबोविट्ज़ का यह चित्र लाइफ पत्रिका के सौजन्य से।
लेकिन जब सैमुएल वकील बन गये तब सबसे मुश्किल, उन्हें अपना पहला मुकदमा मिलने में हुई।
न्यायालय में जब आरोपी वकील नहीं कर पाते है तब न्यायालय उनके लिए वकील नियुक्त करता है। सैमुएल को भी अपना पहला मुकदमा इसी तरह मिला।
इस मुकदमें के आरोपी के ऊपर आरोप था कि उसने शराबखाने का ताला खोलकर, पैसे और शराब की चोरी की। उसी दिन सुबह, उसे शराब के नशे में धुत्त, पकड़ लिया गया। उसकी जेब में वह चाभी भी मिली जिससे उसने ताले को खोला था। पुलिस के सामने उसने अपना गुनाह कबूल करा लिया। अमेरिका में पुलिस के सामने दिया बयान न्यायालय में देखा जा सकता है हालांकि भारत में नहीं।
सैमुएल ने अपने मित्रों, सहयोगियों से इस संबन्ध में सलाह ली। उनका कहना था कि,
- आरोपी को अपना दोष मान लेना चाहिए। क्योंकि सारे सबूत आरोपी के खिलाफ हैं।
- दोष मान लेने पर सजा कम हो जायगी।
कई रात, बिस्तर में लेटे-लेटे, सोचते-सोचते, उसे एक युक्ति समझ में आयी। यदि वह चल गयी तो जीत उसकी, नहीं तो आरोपी को सजा तो होनी ही थी। मुकदमा शुरू होने पर, अभियोजन के अधिवक्ता एवं न्यायाधीश को आश्चर्य हुआ, जब आरोपी ने आरोप स्वीकार नहीं किया।
अभियोजन का पक्ष समाप्त हो जाने के बाद, आरोपी ने गवाही दी कि उसने, पुलिस अत्याचार के कारण, आरोप स्वीकार कर लिया था।
अभियोजन का कथन था कि आरोपी ने चाभी से ताला खोलकर चोरी की है। सैमुएल ने न्यायालय के समक्ष बहस की,
'क्या सरकारी वकील ने यह स्वयं देखा है कि आरोपी के जेब से मिली चाभी से शराबघर का ताला खुल सकता था या नहीं। यदि नहीं तो, न्यायालय एवं जूरी चल कर देखें कि क्या इस चाभी से उस ताले को खोला जा सकता है। यदि ताला नहीं खुलता है तो उसके मुवक्किल पर चोरी का आरोप नहीं बनता है।'
यह सच था कि सरकारी वकील स्वयं इस बात की जांच नहीं की थी कि उस चाभी से ताला खोला जा सकता था अथवा नहीं। अभियोजन पक्ष के अधिवक्ता को लगा कि यदि,
- इस समय न्यायधीश, जूरी के सदस्य जा कर देखते हैं तो न्यायालय और जूरी का समय बरबाद होगा। इस तरह के अनगिनत मुकदमे लम्बित थे, उनका भी फैसला होना था।
- ताला न खुला, तो सरकारी वकील की भद्द उड़ जायेगी।
इस मुकदमे के बारे में अगले दिन अखबार में कुछ नहीं निकाला पर जेल में अन्य कैदियों, अधिवक्ताओं के बीच, यह बातचीत चलने लगी कि यह वकील कुछ ख़ास है। यहीं से, सैमुएल का सितारा, चमकना शुरू हो गया।
सैमुएल ने अपना पहला मुकदमा, रात में ही, बिस्तर पर सोचते सोचते जीत लिया था। उसने यह आदत, जीवन भर डाली। वह मुकदमा के शुरू होने से पहले ही सारे पक्षों के बारे में सोच लेता था। यही एक अच्छे वकील की निशानी है। वकील का वास्तविक जीवन, अर्ल स्टैनली गार्डनर के कल्पित वकील, पैरी मेसन की तरह नहीं, जो मुकदमें के दौरान ही सोचा करता था। हर सफल वकील मुकदमा शुरू होने के पहले ही, उसके सारे पहलुओं के बारे में सोच लेते हैं।
इस मुकदमें से, सैमुएल ने एक दूसरी बात यह सीखी, कि जूरी, पुलिस-अत्याचार के बारे में आसानी से विश्वास कर लेते हैं। इस बात ने भी, उसे अन्य मुकदमों सफलता दिलवायी।
क्या चश्मदीद गवाह, न चाहते हुऐ भी, आरोपी की गलत शिनाख्त कर देते हैं। इस बारे में, सैमुएल के क्या विचार हैं, यह अगली बार।
बुलबुल मारने पर दोष लगता है
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Friday, December 11, 2009
पति, पत्नी के घर में रहते हैं
महल में बाहर की तरफ उन्नीसवीं शताब्दी की बनी एक खास घड़ी, जिसमें
घन्टे के पूरे होने पर उतनी बार ऊपर के बकरों सिर, एक दूसरे से टक्कर मारते
हैं।
Thursday, December 03, 2009
सफलता हमेशा काम के बाद आती है
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Friday, November 27, 2009
वकीलों की सबसे बेहतरीन जीवनी - कोर्टरूम
सैमुएल लाइबोविट्ज़, २०वीं शताब्दी के दूसरे चतुर्थांश में अमेरिका के सबसे प्रसिद्ध वकील थे। 'बुलबुल मारने पर दोष लगता है' श्रृंखला की इस चिट्ठी में, उनके जीवन पर लिखी पुस्तक 'कोर्टरूम' के बारे में चर्चा है।
'डार्विन, विकासवाद, और मज़हबी रोड़े' श्रृंखला की कड़ी 'यदि विकासवाद जीतता है तो ईसाइयत बाहर हो जायेगी' में, मैंने वकील क्लेरेन्स डैरो (Clarence Darrow) की चर्चा की थी। उनका जन्म १८ अप्रैल, १८५७ को हुआ था। उन्न्नीसवी शताब्दी के अंत होते होते वे अमेरिका के सबसे जाने माने वकील के रूप में स्थापित हो गये थे। उनका सितारा उदय हो चुका था। उसी समय एक अन्य वकील, सैमुएल लेबो (Samuel Lebeau) का जन्म १४ अगस्त १८९३ में रोमानिया में हुआ।१८९७ में सैमुएल के पिता अमेरिका आ गये। वहां लोगों की सलाह पर सैमुएल के पिता ने अपने नाम का अमेरिकीकरण कर लिया—लेबो की जगह वे लाइबोविट्ज़ (Leibowitz) हो गये।
सैमुएल को विद्यार्थी जीवन में, वक्तृत्व (elocution) और वाद विवाद प्रतियोगिताएं (debate) बेहद पसन्द थे। इसमें, वे हमेशा आगे रहते थे। पिता के सुझाव पर सैमुएल ने वकील बनने की ठानी और कानून की शिक्षा कॉर्नेल विश्वविद्यालय से पूरी की।
बीसवीं शताब्दी के पहले चतुर्थांश के अन्त होते होते सैमुएल ने अपना नाम अमेरिका के जाने माने फौजदारी के वकील के रूप में स्थापित कर लिया। दूसरे चतुर्थांश में वे अमेरिका में फौजदारी के सबसे प्रसिद्व वकील हो गये। १९४१ में उन्होंने न्यायाधीश बनना स्वीकार कर लिया। न्यायधीश के रूप में वे जल्दी गुस्सा हो जाते थे। इसलिये वे बाद में कुछ विवादास्पद हो गये थे। उनकी मृत्यु ११ फरवरी, १९७८ में हो गयी।
सैमुएल लाइबोविट्ज़ एवं उनकी पत्नी अपने पौत्र के साथ खेलते हुऐ - चित्र लाइफ पत्रिका के इस सौजन्य से।
१९५० में, क्वेंटिन रिनॉल्डस् (Quentin Reynolds) ने सैमुएल की जीवनी, कोर्टरूम (Courtroom) नामक पुस्तक में लिखी है। यह वकीलों के द्वारा लिखी गयी आत्मकथा या उनकी बारे में लिखी जीवनियों में सबसे अच्छी लिखी पुस्तक है। यह पुस्तक न केवल हर वकील को, पर प्रत्येक व्यक्ति के पढ़ने योग्य है। बहुत से लोग, वकीलों के बारे में अच्छे विचार नहीं रखते हैं। यह पुस्तक उनके नजरिये को बदलेगी।
अगली बार बात करेंगे सैमुएल को पहला मुकदमा कैसे मिला और उसमें क्या हुआ।
इस चिट्ठी को आप सुन भी सकते है। सुनने के लिये यहां चटका लगायें। यह ऑडियो फाइल ogg फॉरमैट में है। इन फाइलों को आप सारे ऑपरेटिंग सिस्टम में, फायरफॉक्स ३.५ या उसके आगे के संस्करण में सुन सकते हैं। इन फॉरमैट की फाइलों को आप,
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बुलबुल मारने पर दोष लगता है
भूमिका।। वकीलों की सबसे बेहतरीन जीवनी - कोर्टरूम।।book, book, books, Books, books, book review, book review, book review, Hindi, kitaab, pustak, Review, Reviews, science fiction, किताबखाना, किताबखाना, किताबनामा, किताबमाला, किताब कोना, किताबी कोना, किताबी दुनिया, किताबें, किताबें, पुस्तक, पुस्तक चर्चा, पुस्तक चर्चा, पुस्तकमाला, पुस्तक समीक्षा, समीक्षा,
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Friday, November 20, 2009
Friday, November 13, 2009
बुलबुल मारने पर दोष लगता है - भूमिका

हार्पर ली (Harper Lee) का लिखा उपन्यास, 'टु किल अ मॉकिंगबर्ड' (To Kill A Mockingbird), २०वीं शताब्दी के उत्कृष्ट अमेरिकन साहित्य में गिना जाना जाता है। 'बुलबुल मारने पर दोष लगता है' मेरी नयी श्रंखला है। यह, इस उपन्यास और उससे जुड़ी घटनाओं और कहानियों के बारे में है। यह चिट्ठी इस श्रंखला की भूमिका है।
इस चिट्ठी को आप यहां चटका लगा कर सुन सकते हैं। यह पॉडकास्ट ogg फॉरमैट में है। यदि सुनने में मुश्किल हो तो दाहिने तरफ का विज़िट,
इस चिट्ठी को आप यहां चटका लगा कर सुन सकते हैं। यह पॉडकास्ट ogg फॉरमैट में है। यदि सुनने में मुश्किल हो तो दाहिने तरफ का विज़िट,
'मेरे पॉडकास्ट बकबक पर नयी प्रविष्टियां, इसकी फीड, और इसे कैसे सुने'
देखें।
कुछ समय पहले, मेरी तबियत खराब हो जाने के बाद, मेरी बिटिया रानी और बेटे राजा ने कुछ पुस्तकें भिजवायीं थी। इनमें एक पुस्तक 'हू द हेल इज़ ओ ॑-हारा' (Who the Hell is O'Hara) है। इस पुस्तक में, दुनिया के ५० बेहतरीन लिखे उपन्यासों के बारे में लिखा है कि वे किस प्रकार से लिखे गये हैं। इसमें अधिकतर उपन्यास मेरे पढ़े हुऐ हैं या मैंने उनके बारे में सुना है। मुझे यह पुस्तक ही सबसे अच्छी लगी इसलिये इसे ही सबसे पहले पढ़ना शुरू किया। यह मुझे बेहद पसन्द आयी।
हार्पर ली (Harper Lee) का लिखा उपन्यास 'टु किल अ मॉकिंगबर्ड' (To Kill A Mockingbird) २०वीं शताब्दी के उत्कृष्ट अमेरिकन साहित्य में गिना जाता है।
इस पुस्तक में लिखे उपन्यासों की कहानियों में से एक लेख, उपन्यास 'टु किल अ मॉकिंगबर्ड' (To Kill A Mockingbird) के बारे में है। इसे हार्पर ली (Harper Lee) ने लिखा है। यह उपन्यास २०वीं शताब्दी के उत्कृष्ट अमेरिकन साहित्य में गिना जाता है। मेरी बिटिया रानी के मुताबिक यह ऐसा उपन्यास है जिसे अमेरिका के कॉलेज जाने वाले प्रत्येक विद्यार्थी ने कम से कम एक बार पढ़ा है।
इस उपन्यास की कहानी १९३० दशक की है जो एक बहन, उसके भाई, और उनके मित्र की, अपने वकील पिता के यहां बड़े होने की कहानी है। यह एक बेहतरीन उपन्यास है जिसे पुलिट्ज़र पुरूस्कार (Pulitzer Prize) भी मिल चुका है। यह ४० भाषाओं में प्रकाशित हो चुका है। इसकी अभी तक ३ करोड़ प्रतिलिपियां बिक चुकी हैं।
इस उपन्यास पर एक फिल्म भी इसी नाम से बनी है, जिसे तीन ऑस्कर पुरस्कार मिले। ग्रेगरी पेक का जिक्र मैंने अपनी श्रंखला हमने जानी जमाने में रमती खुशबू की इस कड़ी में किया है। उन्हें इस फिल्म में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के लिये ऑस्कर पुरस्कार मिला है।
इस उपन्यास पर एक फिल्म भी इसी नाम से बनी है, जिसे तीन ऑस्कर पुरस्कार मिले। ग्रेगरी पेक का जिक्र मैंने अपनी श्रंखला हमने जानी जमाने में रमती खुशबू की इस कड़ी में किया है। उन्हें इस फिल्म में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के लिये ऑस्कर पुरस्कार मिला है।
यह उपन्यास १९६० में लिखा गया था। १९५० दशक में रीडर्स् डाइजेस्ट की संघनित पुस्तकें (Reader's Digest Condensed Books) आनी शुरू हुईं। मेरे पास शायद यह सारी हैं। हम भाई बहन ने अपना बचपन यही पढ़ते गुजारा। मैंने यह उपन्यास इसी में, १९६० दशक के अन्तिम सालों, में पढ़ा था और उसी समय इस फिल्म को भी देखा था। यह श्रंखला पुनः रीडर्स् डाइजेस्ट के चयनित संस्करण (Reader's Digest Select Editions) नाम से आना शुरू की गयी हैं।।
वास्तविक जीवन में भी ली का बड़ा भाई और मित्र था। उसके पिता भी वकील थे। शादी के पहले उनकी माँ का नाम फिंच था, जो कि उपन्यास में इनका सर-नाम है। लोगों का कहना है कि यह इनकी जीवनी है। लेकिन पर ली इस बात को तो नकारती है पर यह भी स्वीकारती हैं कि उन्होंने जो जीवन में देखा उसी को इस कहानी में उतारा गया है। ली इस उपन्यास के बारे में कहती हैं,
'I never expected any sort of success with Mockingbird. I was hoping for a quick and merciful death at the hands of the reviewers but, at the same time, I sort of hoped someone would like it enough to give me encouragement. Public encouragement. I hoped for a little, as I said, but I got rather a whole lot, and in some ways this was just about as frightening as the quick merciful death I'd expected.'
मैं इस उपन्यास में कोई आशा नहीं रखती थी। लेकिन यह भी सोचती थी इसे शायद कोई पसन्द करेगा और मुझे प्रोत्साहित करेगा। मैं थोड़ा बहुत चाहती थी पर यह तो बहुत अधिक था और यह उतना ही डरावना जितना इसका न लोकप्रिय होना।
When you're at the top, there's only one way to go.
ली ने इस उपन्यास के बाद, कोई अन्य पुस्तक या लेख नहीं लिखा। वे लोगों के बीच से गायब हो गयी। क्या कारण था इसका? उन्होंने, अपने चचेरे भाई को, इसका कारण इस तरह से बताया,
'When you're at the top, there's only one way to go.'
जब आप सबसे ऊपर होते हैं तो जाने का केवल एक ही तरीका है।
यह श्रंखला इसी उपन्यास के बारे में है। इसकी कहानी की चर्चा करने से पहले हम अगली बार बात करेंगे २०वीं शताब्दी के दूसरे चतुर्थांश में अमेरिका के सबसे प्रसिद्ध वकील और उसकी जीवनी पर लिखी पुस्तक पर। मेरे विचार से वकीलों की लिखी आत्मकथा या उनकी जीवनी पर लिखी पुस्तकों में सबसे बेहतरीन पुस्तक है। उसके बाद अमेरिका के एक प्रसिद्ध मुकदमे की। 'उन्मुक्त जी, इन वकील साहब, या प्रसिद्ध मुकदमे का इस उपन्यास से क्या संबन्ध है। लगता है कि आप तो बस लोगों को चक्कर में डाल रहें हैं।'
इनका संबन्ध तो है। यह आपको इस श्रंखला के दौरान ही बता चलेगा। इंतज़ार कीजिए।
'लगता है उन्मुक्त जी की एक और श्रंखला झेलनी पड़ेगी।'
बुलबुल मारने पर दोष लगता है
इस श्रंखला की सारी कड़ियां नीचे चटका लगा कर पढ़ सकते हैं। यदि सुनना चाहें तो ► पर चटका लगा कर सुन सकते हैं। ख्याल रहे ऑडियो क्लिप ऑग मानक में है। इसे कैसे सुनते हैं यह तो मालुम हैं न। नहीं तो दाहिने तरफ का विज़िट ‘बकबक पर पॉडकास्ट कैसे सुने‘ देखें।
भूमिका: ►।। वकीलों की सबसे बेहतरीन जीवनी – कोर्टरूम: ►।। सफल वकील, मुकदमा शुरू होने के पहले, सारे पहलू सोच लेते हैं: ►।। कैमल सिगरेट के पैकेट पर, आदमी कहां है: ►।। अश्वेत लड़कों ने हमारे साथ बलात्कार किया है: ►।। जुरी चिट्ठे में जालसाज़ी की गयी है: ►।। क्या ‘टु किल अ मॉकिंगबर्ड’ हर्पर ली की जीवनी है: ►।। बचपन के दिन भी क्या दिन थे: ►।। पुनः लेख – ‘बुलबुल मारने पर दोष लगता है’ श्रृंखला के नाम का चयन कैसे हुआ: ►।। अरे, यह तो मेरे ध्यान में था ही नहीं।।
मेरे घर में तरह तरह की चिड़ियायें आती रहती हैं। पहला चित्र मेरे घर में आयी बुलबुल का है और अन्तिम चित्र विकिपीडिया के सौजन्य से मॉकिंगबर्ड का है।
सांकेतिक शब्द
। To kill a mockingbird, Harper Lee, Pulitzer Prize, Reader's Digest Condensed Books, Reader's Digest Select Editions,
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Friday, November 06, 2009
Friday, October 30, 2009
हम तो पूरी दिल्ली में बदनाम हैं
मुझे दिल्ली में एक अच्छी पुस्तक दुकान की तलाश थी। इस बार वह मिल गयी। इस चिट्ठी में उसी की चर्चा है।
शुभा के अनुसार, मेरे तीन प्यार में से, एक प्यार पुस्तकों से है। यह सच है, वे मेरी सबसे प्रिय मित्र हैं। हांलाकि, जबसे अन्तरजाल का चस्का लगा, तब से कुछ समय अन्तरजाल पर भी बीतता है। जाहिर है पुस्तकों के लिये समय कम हो गया। मैं बाहर जाते समय, पुस्तकों की जगह लैपटॉप ले जाने लगा। देव भूमि हिमाचल की यात्रा पर जाते समय मैंने तय कर लिया था कि लैपटॉप नहीं केवल पुस्तकें ले जाउंगा। यात्रा में, पढ़ने के लिये चार पुस्तकें ले गया था। यह अलग अलग विषय पर थीं।- पहली, फ्रीमन डाइसन की 'द सन, जनोम, एण्ड द इंटरनेट' (The Sun, Genome and the Internet by Freeman J Dyson) थी। यह विज्ञान और तकनीक से संबन्धित है;
- दूसरी, मैनेजमेन्ट से संबन्धित शू शिन ली की 'बिज़िनस द सोनी वे' (Business the Sony Way by Shu Shin Luh) थी;
- तीसरी, मेरी प्रिय लेखिका आशापूर्णा देवी की हिन्दी उपन्यास 'प्रारब्ध' थी; और

- चौथी, कानून से संबन्धित, सदाकान्त कादरी की 'ट्रायल' (Trial by Sadakant kadri)।
यात्रा के बाद, मुझे लगा कि केवल पुस्तकें ले जाना ठीक था - कम से कम तीन तो पढ़ लीं। लैपटॉप न रहने के कारण भी कुछ अनुभव भी हुऐ। यह हिमाचल यात्रा संस्मरण के दौरान लिखूंगा।
दूसरे शहर में, पुस्तकों की दुकान जाना, मेरा पसंदीदा शौक है। हैदराबाद में पुस्तक की दुकान में झुंझलाहट लगी। दिल्ली और लखनऊ में पुस्तकों की दुकान के बारे में, मार्टिन गार्डनर की पुस्तकों के बारे में जिक्र करते समय किया। बुकवर्म के बन्द हो जाने के बाद मैं टैक्सन जाने लगा पर वहां का अनुभव अच्छा नहीं रहा। लेकिन दिल्ली में मेरे ठिकाने के सबसे पास टैक्सन की ही दुकान है इसलिये वहीं जाता हूं। हिमाचल यात्रा के बाद, दिल्ली में रुकते समय वहां गया था।
इस बार टैक्सन में युवतियां बात तो नहीं कर रहीं थीं पर एक सज्जन जोर जोर से मोबाइल पर पुस्तकों के ऑर्डर के बारे में बात कर रहे थे। समय की कोई पाबंदी नहीं रही होगी क्योंकि जब तक मैं वहां था वे बात करते रहे। मैंने टैक्सन से, पांच पुस्तकें ली। अब लैपटॉप न रहने के कारण अन्तरजाल पर तो भ्रमण करना था इसलिये साइबर कैफे की तलाश, में चल दिया - कभी बायें तो कभी दायें। वहीं पर एक अन्य पुस्तक की दुकान बेसमेन्ट में दिखायी पड़ी। कभी उस तरफ गया नहीं था, इसलिये इस पर कभी नजर नहीं पड़ी थी। सोचा चलो इसको देखा जाय, साइबर कैफे को बाद ढ़ूँढ़ा जायगा।
इस पुस्तक दुकान का नाम मिडलैण्ड बुक शॉप था। यह जी-८ (बेसमेन्ट) साउथ एक्सटेंशन पार्ट-१, नयी दिल्ली में है। इसमें ज्यादा पुस्तकें दिखीं पर वे अस्त-वयस्त थी। मैंने जो पुस्तकें टैक्सन में खरीदी थीं वे सारी वहां थीं पर उसके साथ बहुत सारी वे भी थीं जो टैक्सन में नहीं थीं। मुझे लगा कि पुस्तकों के मामले में यह बेहतर दुकान है। यहां पर भी मैंने चार अन्य पुस्तकें लीं। मैंने इसके मालिक से कहा,
'आपके यहां बहुत पुस्तकें हैं। इनका सेल क्यों नहीं लगा लेते ताकि पुस्तकें ठीक से लगायी जा सके और पुस्तकें ढूढ़ने में सुविधा रहे।'उसने कहा,
'मुझे पुस्तकों से प्यार है। मैं नहीं चाहता कि कोई ग्राहक पुस्तक लेने आये और हम उसे दे न सकें। इसलिये हमारी दुकान में अधिक पुस्तकें हैं। हम रोज़ एक अलमारी ठीक करते हैं लेकिन जब तक उस पर वापस आते हैं उसकी पुस्तकें पुनः अस्त-वयस्त हो जाती हैं।'
मैंने उससे बिल बनवाया तो लगभग २५०० रुपये का आया। उसने उस पर मुझे २०% कम कर दिया। मेरे कस्बे का दुकान वाला जहां मैं लगभग १५ दिन में, एक बार पहुंच जाता हूं २०% तो क्या १०% भी कम नहीं करता। यहां तो मैं पहली बार गया था। मैंने उसे पैसे कम करने के लिये भी नहीं कहा था उसने फिर भी कर दिया। मुझे आश्चर्य हुआ। मैंने उसे धन्यवाद दिया तो उसने मुस्कुराते हुऐ कहा,
'इस बात के लिये तो हम दिल्ली के दुकान पुस्तक के मालिकों के बीच बदनाम हैं।'उसने यह भी बताया,
'हमारी एक अन्य दुकान इसी नाम से २०, ऑरोबिन्दो प्लेस् हॉज़ खास नयी दिल्ली में और न्यू बुक लैण्ड नाम से इंडियन ऑयल भवन जनपथ नयी दिल्ली में भी है। आप को वहां भी कम दाम में पुस्तक मिलेगी।'दिल्ली में मुझे, मिडलैण्ड बुक शॉप के रूप में, अच्छी पुस्तक की दुकान मिल गयी है। यदि आप कभी इस दुकान पर जायें और वहां किसी ग्राहक को दुकानदार या वहां खरीदने वालों से बात करते देखें तो समझ लीजियेगा कि वह कौन व्यक्ति है।
'उन्मुक्त जी यह तो बताईये कि साउथ एक्सटेंशन में कोई साइबर कैफ़े मिला? क्या आप अन्तरजाल पर जा पाये?'हां जा तो पाया पर नानी याद आ गयी। उसके बारे में फिर कभी।
सांकेतिक शब्द
Wednesday, October 21, 2009
मुझे, केवल कुमारी कन्या ही मार सके
कन्याकुमारी जाते समय हमें मालुम चला कि इसे कन्याकुमारी क्यों कहते हैं। इस चिट्ठी में इसी की चर्चा है।
एक दिन हम लोग त्रिवेन्द्रम से कन्याकुमारी के लिये चले। कन्याकुमारी पहुंचने में लगभग ढाई घन्टे का समय लगता है। रास्ते में, एक टूरिस्ट गाइड खरीदी। इसमें कन्याकुमारी का यह नाम क्यों पड़ा, इसकी कथा इस तरह से बतायी गयी है।
कहा जाता है कि बाणासुर नामक दैत्यों का राजा था उसने ब्रह्मा जी की पूजा कर उनसे अमृत देने का वर मांगा। ब्रह्माजी ने कहा,
'अमृत तो नहीं मिल सकता है पर जिस तरह से तुम अपनी मृत्यु चाहते हो वह मांग सकते हो।‘इस पर उसने कुमारी कन्या से ही मृत्यु मांगी। वह सोचता था कि कोई भी कुमारी कन्या उसे नहीं मार सकती है।
इसके पश्चात बाणासुर, देवताओं को तंग करने लगा। तंग होकर, देवताओं ने भगवान विष्णु और लक्ष्मीजी से सहायता की गुहार लगायी। उन्होंने उन्हें पराशक्ति, जो कि देवी पार्वती का ही एक रूप हैं, की पूजा करने को कहा। ब्रह्मा जी के वर के कारण वे ही बाणासुर से मुक्ति दिला सकती थीं। देवताओं की पूजा से प्रसन्न हो कर, देवी पराशक्ति ने, बाणासुर को मारने का वायदा किया। उन्होंने कुमारी कन्या के रूप में जन्म लिया।
कन्याकुमारी में विवेकानन्द रॉक मेमोरियल से समुद्र का दृश्य
‘भगवन आपकी शादी का शुभ मुहूर्त सुबह के पहले है। इसलिए वह सुबह के पहले ही शादी करें।‘शिवजी अपनी बारात लेकर सुचीन्द्रम नामक जगह पर रूके। सुबह के पूर्व उनके बारात लेकर शादी के लिए निकलने के पहले ही, नारद जी ने मुर्गे का रूप धारण करके बांग देना शुरू कर दिया। जिससे उन्हें लगा कि सुबह हो गयी है और महूर्त नहीं रहा। इसलिए वे शादी के लिए नहीं गये।
कहा जाता है कि कुमारी कन्या की जब शादी नहीं हो पायी तो उसके सारे गहने और जेवरात रंग बिरंगे पत्थरों में बदल गये, जो कि इस समय भी कन्याकुमारी के समुद्र तट पाये जाते हैं।
बाणासुर को, कुमारी कन्या की सुंदरता के बारे में पता चला। उसने उनसे शादी करने की इच्छा प्रकट की जिसे, उन्होंने मना कर दिया। बाणासुर, उन्हें बलपूर्वक जीतकर उनसे शादी करनी चाही। इस पर दोनो के बीच युद्घ हुआ और बाणासुर मारा गया । इस तरह से उस अत्याचारी की मृत्यु हुयी। इसलिये इस जगह का नाम कन्याकुमारी पड़ा।
इस कहानी में मुझे कुछ संशय लगता है। जहां तक मुझे मालुम है बाणासुर बालि का पुत्र था और भगवान शिव का भक्त। उसने वर के रूप में ऐसे योद्दा से युद्ध करने की इच्छा प्रगट की थी जो उसे हरा सके। उसे भगवान कृष्ण ने पराजित किया। बाद में वह हिमालय में भगवान शिव की तपस्या करने चला गया। मुझे कन्याकुमारी में बाणासुर की कथा, महिसासुर और देवी दुर्गा कहानी का दूसरा रूप लगता है।
सुचीन्द्रम में, सुचीन्द्र मन्दिर है। यह शिव जी का मंदिर है हालांकि इसमें ब्रम्हा और विष्णु जी की भी मूर्ति है। यहां पर गणेश जी की पत्नी की भी मूर्ति है।
सुचीन्द्र मन्दिर का चित्र विकिपीडिया से
कहा जाता है जिस चट्टान पर एक टांग से खड़े होकर कुमारी कन्या ने अपनी पूजा की, वहां पर उसका एक निशान बना हुआ है। स्वामी विवेकानंद उस निशान को देखने के लिए वहां गये जिससे उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ। इसी चट्टान पर विवेकानंद रॉक मेमोरियल बना हुआ है। यह जगह देखने लायक है। कन्याकुमारी में, देवी कुमारी मन्दिर भी है।
कोचीन-कुमाराकॉम-त्रिवेन्दम यात्रा
क्या कहा, महिलायें वोट नहीं दे सकती थीं।। मैडम, दरवाजा जोर से नहीं बंद किया जाता।। हिन्दी चिट्ठकारों का तो खास ख्याल रखना होता है।। आप जितनी सुन्दर हैं उतनी ही सुन्दर आपके पैरों में लगी मेंहदी।। साइकलें, ठहरने वाले मेहमानो के लिये हैं।। पुरुष बच्चों को देखे - महिलाएं मौज मस्ती करें।। भारतीय महिलाएं, साड़ी पहनकर छोटे-छोटे कदम लेती हैं।। पति, बिल्लियों की देख-भाल कर रहे हैं।। कुमाराकॉम पक्षीशाला में।। क्या खांयेगे - बीफ बिरयानी, बीफ आमलेट या बीफ कटलेट।। आखिरकार, हमें प्राइवेट और सरकारी होटल में अन्तर समझ में आया।। भारत में समुद्र तट सार्वजनिक होते हैं न की निजी।। रात के खाने पर, सिलविया गुस्से में थी।। मुझे, केवल कुमारी कन्या ही मार सके।।हिन्दी में नवीनतम पॉडकास्ट Latest podcast in Hindi
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सांकेतिक शब्द
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