Thursday, August 30, 2007

अस्सी दिन में दुनिया की सैर

अस्सी दिन में दुनिया की सैर (Around The World in 80 days), जुले वर्न की सबसे प्रसिद्घ पुस्तक है। यह १८७३ में प्रकाशित हुयी थी। यह आज तक का लिखा गया सबसे प्रसिद्घ और सबसे ज्यादा अनुवाद किया हुआ यात्रा विवरण है। यह काल्पनिक है और इस तरह की कोई यात्रा नहीं हुयी थी। इस पुस्तक पर आधारित कई फिल्में भी बनी और सबसे प्रसिद्ध फिल्म, १९५६ में बनी थी। इसे ५ ऑस्कर पुरस्कार भी मिले।

इस उपन्यास के हीरो विलियम फॉग नाम के एक अंग्रेज है। एक दिन फॉग क्लब में मित्रों के साथ बैठे थे। उस दिन डेली टेलीग्राफ में खबर छपी थी कि बम्बई और कलकत्ता के बीच में रेलवे लाइन बिछ गयी है और पूरी दुनिया ८० दिन में घूमी जा सकती है। फॉग समझता है कि ऎसा किया जा सकता है और उसके मित्र कहते हैं कि ऎसा नहीं किया जा सकता है। इस बात पर उन लोगों के बीच २० हजार पौण्ड की शर्त लग जाती है और फॉग, अपने फ्रांसीसी नौकर के साथ उसे पूरा करने के लिए २ अक्टूबर १८७२ को रात ८-४५ बजे लंदन से चल देता है।
उसे शर्त जीतने के लिये, ८ दिसम्बर १८७२ तक क्लब में वापस आना है। उनका मार्ग इस प्रकार है,


लंदन से स्वेज

ट्रेन व स्टीमर द्वारा

७ दिन

स्वेज से बम्बई

स्टीमर द्वारा

१३ दिन

बम्बई से कलकत्ता

ट्रेन द्वारा

३ दिन

कलकत्ता से हांगकांग

स्टीमर द्वारा

१३ दिन

हांगकांग से याकोहामा

स्टीमर द्वारा

६ दिन

हांगकांग से सैनफ्रांसिस्को

स्टीमर द्वारा

२२ दिन

सैनफ्रांसिस्को से न्यूयार्क

ट्रेन द्वारा

७ दिन

न्यूयार्क से लंदन

स्टीमर द्वारा

९ दिन


कुल योग

८० दिन



उन्हीं दिनों, एक बैंक में डकैती हो जाती है और स्काटलैण्ड यार्ड का जासूस फिक्स भी उसकी तलाश में है। फॉग की शक्ल उस डकैत के विवरण से मेल खाती है और फिक्स समझता है कि फॉग बैंक डकैत है। फिक्स स्वेज से उनके साथ हो लेता है और फॉग के नौकर से अपने बारे में बिना बताये, उससे दोस्ती कर लेता है।

इस पुस्तक पर बनी फिल्म का पोस्टर

फॉग बम्बई से कलकत्ता के लिये चलता है। इलाहाबाद में ५० मील पहले उन्हें पता चलता है कि रेलवे लाइन पूरी नहीं बनी है, इसलिए इलाहाबाद तक की दूरी किसी और तरीके से करनी होगी। वह इसके लिए, एक हाथी, २००० पॉउण्ड में खरीदता है। इलाहाबाद से १२ मील रह जाने पर उन्हें एक कारवां मिलता है। हाथी का महावत बताता है कि,
'बुन्देलखन्ड की ऑउरा नाम की रानी को सती करने के लिये ले जाया जा रहा है। ऑउरा एक पारसी महिला है जो बम्बई के अमीर व्यापारी की लड़की है। उसकी शिक्षा अंग्रेजी में हुयी है पर उसके अनाथ हो जाने के कारण उसकी शादी, बुन्देलखन्ड के वृद्घ राजा, से कर दी गयी थी। रानी अपने मन से सती नहीं होना चाहती है। उसे गांजा चरस पिलायी गयी है ताकि वह विरोध न कर सके।'
उस समय बुंदेलखन्ड में सती प्रथा थी। अंग्रेजी की पुस्तक में रानी का नाम Aouda लिखा गया है। हिन्दी में अनुवाद की गयी पुस्तक में उसे अबदा कहा गया है पर मेरे पारसी मित्रों के अनुसार पारसियों में ऑउदा या ऑउडा या अबदा नाम नहीं होता पर ऑउरा होता है। इसीलिये मैंने यह प्रयोग किया है।

फिल्म का एक दृश्य

फॉग, ऑउरा को बचाने की तरकीब करता है। फॉग का नौकर, उसके पति की जगह लेता है और चिता के जलते समय, वह उठ खड़ा होता है। लोगों को लगता है कि कोई भूत आ गया है और यह लोग ऑउरा को लेकर भाग चलते हैं। इलाहाबाद से वे पुन: कलकत्ता के लिये ट्रेन पकड़ते हैं।

फिक्स, फॉग को कलकत्ता में गिरफतार करवा देता है। लेकिन फॉग जमानत ले कर हांगकांग भाग जाता है। ऑउरा को, हांगकांग में, अपने रिश्तेदार के पास रह जाना था। वहां पता चलता है कि ऑउरा के रिश्तेदार यूरोप चले गये हैं। इसलिये फॉग, ऑउरा को साथ लेकर आगे चलता है। उसका एक स्टीमर भी छूट जाता है पर वह दूसरा स्टीमर लेकर याकोहामा पहुंचता है। वहां से सैनफ्रांन्सिस्को और फिर ट्रेन से न्यूयार्क पहुंचता है। रास्ते में ट्रेन पर हमला हो जाता है और फॉग के नौकर को बंधक बना लिया जाता है। इन सब मुश्किलों के बीच, वह लिवरपूल पहुंचता है।

इस बीच फिक्स और फॉग में छुपा छिपी चलती रहती है। फिक्स उसे फिर से पकड़वा देता है, लेकिन तभी पता चलता है कि बैंक डकैत पहले ही पकड़ लिया गया है। फॉग को छोड़ दिया जाता है। फॉग किसी तरह लंदन पहुंचता है। फॉग हर दिन की गणना कर रहा था। गणना के कारण उसे लगता है कि उससे एक दिन की देरी हो गयी और वह शर्त हार गया है। उसका पैसा खतम हो गया था, वह गरीब हो गया। वह ऑउरा से माफी मांगता है कि वह उसे गरीबी में रख रहा है। ऑउरा कहती है कि वह उससे प्रेम करती है और शादी करना चाहती है। फॉग भी उससे प्रेम करने लगा था। वे शादी करना तय कर लेते हैं। फॉग के अनुसार वह दिन इतवार है पर पादरी बताता है कि आज शनिवार है न कि इतवार है। तब फॉग की समझ में आता है कि उसने दुनिया की यात्रा पूरब से पश्चिम की थी और उसे एक दिन का फायदा हुआ और वह शर्त नहीं हारा है। वह तुरन्त क्लब जाता है और शर्त जीत लेता है।

इस पुस्तक में दुनिया भर के जगहों का विवरण है। जूले स्वयं यूरोप से बाहर कभी नहीं गये थे फिर भी जगहों के विवरण एकदम सही हैं। यह पुस्तक को विश्वसनीय बनाते हैं। उस समय, इस पुस्तक के अंश भी अखबारों में इस तरह से छप रहे थे जैसे कि फॉग उन्हें अलग-अलग जगहों से लिखकर भेज रहा हो। यह वर्णन वास्तविकता के इतना करीब था कि लोग यह समझने लगे कि यह सच्ची कहानी है। लोगों ने इस पर अनगिनत पैसों का सट्टा लगाया कि फॉग यह शर्त जीत पायेगा कि नहीं। इसका अपना रोमांच है, उत्सुकता है भौगोलिक प्रमाणिकता है - यही कारण है कि यह आज ही मनपसन्द और पढ़ने योग्य पुस्तक है।

हिन्दी में अनुवाद की गयी पुस्तक

बीते कुछ सालों में लिखी गयी यात्रा संस्मरण की सबसे चर्चित पुस्तक, न तो यात्रा पर्यटन जगहों के बारे में है, न ही वह यात्रा अनूठी तरह से की गयी है। वह कौन सी पुस्तक है; कौन उसका लेखक है? ज्लदी क्या है - इंतजार करिये अगली बार का।

सैर सपाटा - विश्वसनीयता, उत्सुकता, और रोमांच
भूमिका।। विज्ञान कहानियों के जनक जुले वर्न।। अस्सी दिन में दुनिया की सैर

सांकेतिक शब्द
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Monday, August 27, 2007

यौन शिक्षा और सांख्यिकी

कुछ दिन पहले शास्त्री जी ने यौन शिक्षा पर एक लेख 'यौन शिक्षा — पाश्चात्य राज्यों का अनुभव क्या कहता है ?' लिखा। मैंने इस पर टिप्पणी की,
'शास्त्री जी आप गलत नहीं कहते पर फिर भी मैं कहना चाहूंगा कि सांख्यिकी का पहला सिद्धान्त है There are lies, damned lies and statistics. इसका कारण है।
आप सांख्यिकी को जिस तरह से चाहें, प्रयोग कर सकते हैं और वह विश्वसनीय लगता है। सांख्यिकी का प्रयोग सही है या गलत - केवल विशेषज्ञ ही बता सकते हैं। मान लीजिये मैं कहूं कि 'क' टूथपेस्ट अच्छा है क्योंकि इससे मंजन करने वालों में ९०% लोगों के दांत अच्छे रहते हैं। इसका यह अर्थ नहीं कि यह अच्छा टूथपेस्ट है क्योंकि हो सकता है इससे न मंजन करने वालों में से ९५% के दांत अच्छे रहते हों। यदि ऐसा है तो यह खराब टूथपेस्ट हो जायगा।
सोचिये यदि पाश्चात्य देशों में यौन शिक्षा न हुई होती तो क्या हाल होता। यदि तब हाल अच्छे होते तब ही आपकी बात ठीक लगती है अन्यथा नहीं।
अपने देश में जिस तरह के टीवी प्रोग्राम आते हैं जिस तरह की खबरे आती हैं, जिस तरह अंतरजाल पर सब उपलब्ध है - उसे देख कर तो मुझे लगता है कि यौन शिक्षा होनी चाहिये।
इस बारे में मैंने अपने तथा अपने परिवार के व्यक्तिगत अनुभव भी 'यहां सेक्स पर बात करना वर्जित है' और 'यौन शिक्षा' नाम से लिखे हैं। मैं चाहूंगा इनको भी आप देखें फिर राय कायम करें।
ऐसे यौन शिक्षा पर व्यापक बहस जरूरी है।'

यह टिप्पणी किसी कारणवश उस समय प्रकाशित नहीं हो पायी। उसके बाद नीरज जी ने शास्त्री जी असहमत हो कर 'यौन शिक्षा: दो टूक बातें !' नाम की चिट्ठी लिखी। जिस पर उनकी अनुमति से, मैंने यह टिप्पणी कर दी। शास्त्री जी से असहमत हो कर, पंकज जी ने भी एक चिट्ठी 'मेंढक बहरा हो गया' नाम से लिखी। शास्त्री जी इनका जवाब पांच चिट्ठियों यहां, यहां, यहां, यहां, और यहां दिया है। उनके जवाब को एकदम से नहीं नकारा जा सकता।

इस विषय पर इसके पहली लिखी चिट्ठियों की लिंक मेरी दोनो चिट्ठियों में है। यह सब इस विषय पर रोचक और ज्ञानवर्धक बहस है। यह बहस, कम से कम इन चिट्ठियों कि उन टिप्पणियों से बेहतर है जिन टिप्पणियों के द्वारा, यह कहा गया कि लोग इस विषय पर नहीं पढ़ना चाहते चाहे जितना अच्छा
लिखा हो। मेरे विचार से बहस इस तरह से होनी चाहिये न की उस तरह से जैसे अक्सर हो जाती है।

यौन शिक्षा के संदर्भ में, मैं ११-१२वीं कक्षा के विद्यार्थियों को 'फिर मिलेंगे' फिल्म देखने के लिये भी सलाह दूंगा। यदि आपने इसे नहीं देखी हो तो देखें। आप इसे अपने मुन्ने, मुन्नी के साथ देखें या अलग - यह आपके उनके रिश्तों के ऊपर है। मैंने तो यह फिल्म अपने बच्चों के साथ देखी, हांलाकि जब यह फिल्म आयी तब तक वे अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर चुके थे।

मेरा अब भी, यह मत है,
'यौन शिक्षा - कम से कम प्रारम्भिक स्तर की - होनी चाहियेः शायद घर में सबसे अच्छी हो।'
हांलाकि न तो सब इसे ठीक प्रकार से बताने में सक्षम हैं, न ही इस पर लिखी सब पुस्तकें ठीक हैं।


यह तो बात हूई, यौन शिक्षा पर - अब चलते हैं सांख्यिकी पर।

सांख्यिकी के बारे अक्सर कहा जाता है - पहले झूट, फिर बिलकुल झूट, उसके बाद सांख्यिकी। यही बात मैंने अपनी टिप्पणी पर भी लिखी थी। इसका एक उदाहरण, टिप्पणी पर बताया था। इसको समझाने के लिये, यह भी
कहा जाता है,
'यदि आपका सर रैफ्रीजरेटर में हो और पैर जलते स्टोव पर तो सांख्यिकी के अनुसार, औसतन, आप ठीक ठाक हैं।'

यह कार्टून मैथली जी ने, इसी कहावत को उजागर करने के लिये बनाया है। मैथली जी, कौन? अरे वही कैफे हिन्दी और ब्लॉगवाणी वाले - मेरा धन्यवाद और आभार।

किसी और संदर्भ में, मैथली जी के बारे में, मैंने दो चिट्ठियां - 'डकैती, चोरी या जोश या केवल नादानी' और 'हिन्दी चिट्ठाकारिता, मोक्ष, और कैफे हिन्दी' नाम से लिखी हैं।


मैंने, सांख्यिकी, ४० वर्ष पहले अपने विद्यार्थी जीवन में पढ़ी थी। उसके बाद कभी जरूरत नहीं पड़ी। यह टिप्पणी लिखते समय मैंने अपने विद्यार्थी जीवन को याद किया और याद किया उस समय सांख्यिकी पर पढ़ी कई बेहतरीन पुस्तकों को, जो आज भी सांख्यिकी की लाजवाब पुस्तकें मानी जाती हैं। अगली बार, उन्हीं के बारे में बात करेंगे।

यौन शिक्षा और सांख्यिकी

Saturday, August 25, 2007

न्यायपालिका और पर्यावरण

मैं १९७५ में जून में श्रीनगर गया था मुझे याद नहीं पड़ता कि डल झील पर इतनी हाउसबोट थीं या नहीं। डल लेक भी बहुत साफ थी। इस बार गन्दी लगी। लोगों से पूछने पर पता चला कि यह सारी हाउसबोट अवैध है। बहुत कुछ गन्दगी इन्हीं के कारण है। वहां के लोगों का कहना है,
'२५ साल पहले डल लेक की परिधि ३२ किलोमीटर थी। अब घटकर १६ हो गयी है। लोग इसे मिट्टी से पाटकर कब्जा करते जा रहे हैं। इसमें बदमाशी में राज्य सरकार भी भागीदार है। दो साल पहले जम्मू एवं कश्मीर उच्च न्यायालय में लोकहित याचिका दाखिल की गयी जिसे कारण यह रोका जा सका और डल लेक में कुछ सफाई शुरू की गयी।'

गोवा में भी हमने देखा कि न्यायपालिका के कारण वहां का समुद्री-तट बचा। दिल्ली में भी यदि प्रदूषण कम हुआ तो वह न्यायपालिका के कठोर कदमों के कारण। इलाहाबाद में प्रसिद्घ कम्पनी बाग है। जिसके बारे में ममता जी बता रही हैं यह समाप्त हो रहा था। इसे भी एक लोकहित याचिका के द्वारा ही बचाया जा सका।

यह पूथ्वी मां हमें अपने पूर्वजों से नही मिली है इसे तो हमने अपने बच्चों से गिरवी ली है। यह हमारे ऊपर है कि हम
इसे कैसे उन्हें वापस देते हैं। यह बात शायद केवल न्यायपालिका ही समझ पा रही है बाकी लोग तो शायद ...

लोग अक्सर न्यायपालिका के न्यायिक क्रिया-कलापों (Judicial activism) की आलोचना करते हैं पर भूल जाते हैं कि बहुत जगह पर्यावरण बचा हुआ है तो वह न्यायपालिका के कारण ही। नेता ऎसे निर्णय नहीं लेते, जिससे उनके वोट बैंक में कमी आये।

कश्मीर यात्रा
जन्नत कहीं है तो वह यहीं है, यहीं है, यहीं है।। बम्बई का फैशन और कश्मीर का मौसम – दोनो का कोई ठिकाना नहीं है।। मिथुन चक्रवर्ती ने अपने चौकीदार को क्यों निकाल दिया।। आप स्विटज़रलैण्ड में हैं।। हम तुम एक कमरे में बन्द हों।। Everything you desire – Five Point Someone।। गुलमर्ग में तारगाड़ी।। हेलगा कैटरीना और लीनुक्स।। डल झील पर जीवन।। न्यायपालिका और पर्यावरण।।

Monday, August 20, 2007

काम करने की जगह पर महिलाओं के साथ छेड़छाड़

(इस बार चर्चा का विषय है काम करने की जगह पर महिलाओं के साथ छेड़छाड़। इसे आप सुन भी सकते हैं। सुनने के चिन्ह ► तथा बन्द करने के लिये चिन्ह ।। पर चटका लगायें।)


Sexual harassment ...


काम करने की जगह पर महिलाओं के साथ छेड़छाड़ उससे कहीं अधिक है जितना कि हम और आप समझते हैं। यह बात, शायद काम करने वाली महिलाये या वे परिवार जहां कि महिलायें घर के बाहर काम करती हैं ज्यादा अच्छी तरह से समझ सकते हैं। इस बारे में संसद के द्वारा बनाया गया कोई कानून नहीं है पर १९९७ में Vishakha Vs. State of Rajasthan (विशाखा केस) में प्रतिपादित या फिर कहें कि बनाया गया है।

यह निर्णय, न केवल महत्वपूर्ण है, पर अनूठा भी है।

संसद का काम कानून बनाना है, कार्यपालिका का काम उस पर अमल करना है; और न्यायालय का काम कानून की व्याख्या करना है। प्रसिद्घ न्यायविद फ्रांसिस बेकन ने कहा कि, न्यायाधीश का काम,
'To interpret law and not to make law'
न्याय की व्याख्या करना है न कि कानून बनाना।
न्यायविद हमेशा से इसी पर जोर देते चले आ रहे हैं। हालांकि २०वीं शताब्दी में ब्रिटेन के न्यायाधीश जॉन रीड ने कहा
'We do not believe in fairy tales any more.'
हम अब इस तरह की परी कथाओं में विश्वास नहीं करते हैं।

विशाखा केस में न्यायायलय ने यौन उत्पीड़न (Sexual harassment)
को परिभाषित किया और वे सिद्घान्त बनाये जो काम किये जाने की जगह पर अपनाये जाने चाहिये। यह काम संसद का है न कि न्यायपालिका का नहीं फिर भी न्यायालय ने ऐसा किया। यह अपने देश का पहला केस है जिसमें न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कानून बनाया। न्यायालय के शब्दों में,
'The guidelines and norms [ regarding sexual harassment at working place] would be strictly observed in all workplaces for the preservation and enforcement of the right to gender equality of the working women. These directions would be binding and enforceable in law until suitable legislation is enacted to occupy the field.'
यह सिद्घान्त तब तक लागू रहेंगे जब तक इस बारे में कोई कानून न बनाया जाय।


विशाखा केस के सिद्घान्तों को १९९९ में Apparel Export promotion Council Vs. A.K.Chopra (चोपड़ा केस) में लागू किया गया। इस केस में चोपड़ा की सेवायें, विभागीय कार्यवाही में, इसलिये समाप्त कर दी गयी क्योंकि उसने काम की जगह पर, एक कनिष्क महिला कर्मचारी के साथ छेड़छाड़ की थी। दिल्ली उच्च न्यायालय ने चोपड़ा की याचिका स्वीकार करते हुये उसे वापस सेवा में ले लिया परन्तु जितने समय तक उसने काम नहीं किया था, उसका वेतन नहीं दिलवाया।
उच्चतम न्यायालय ने इस निर्णय के विरूद्घ अपील को स्वीकार कर, चोपड़ा की सेवायें समाप्त करने के विभागीय आदेश को बहाल कर दिया। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि,
'That sexual harassment at the place of work, results in violation of the fundamental right to gender equality and the right to life and liberty.. the two most precious fundamental rights guaranteed by the Constitution of India.'.....
कार्य की जगह यौन उत्पीड़न का होना लैंगिक समानता, स्वतंत्रता एवं जीने के मौलिक अधिकारों का हनन है। यह अधिकार, हमारे संविधान के दो बहुमूल्य अधिकार हैं।

उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली उच्च न्यायालय को फटकार लगाते हुये कहा,
'The observations made by the High Court to the effect that since the respondent did not “actually molest” Miss X but only “tried to molest” her and, therefore, his removal from service was not warranted, rebel against realism and lose their sanctity and credibility....The High Court overlooked the ground realities and ignored the fact that the conduct of the respondent against hhis junior female employee, Miss X, was wholly against moral sanctions, decency and was offensive to her modesty. Reduction of punishment in a case like this....is a retrograde step.'
उच्च न्यायालय ने कहा है कि विपक्ष पक्ष [चोपड़ा] ने सुश्री 'क' के साथ छेड़छाड़ नहीं की थी पर केवल इसका प्रयत्न किया था इसलिये उसे सेवा से हटाया जाना ठीक नहीं था। उनकी यह टिप्पणी वास्तविकता के खिलाफ है। विपक्ष पक्ष का अपनी कनिष्ठ महिला कर्मचारी के साथ का बर्ताव किसी तरह से क्षम्य नहीं था इस तरह के मामले में सजा कम करना पीछे जाने का कदम है। उच्च न्यायालय ने मामले को गलत तरीके से देखा है।

लैंगिक न्याय के परिपेक्ष में - समानता (equality), स्वतंत्रता (liberty) और एकान्तता (privacy) – का क्या अर्थ है यह अगली बार।

आज की दुर्गा
महिला दिवस|| लैंगिक न्याय - Gender Justice|| संविधान, कानूनी प्राविधान और अंतरराष्ट्रीय दस्तावेज।। 'व्यक्ति' शब्द पर ६० साल का विवाद – भूमिका।। इंगलैंड में व्यक्ति शब्द पर इंगलैंड में कुछ निर्णय।। अमेरिका तथा अन्य देशों के निर्णय – विवाद का अन्त।। व्यक्ति शब्द पर भारतीय निर्णय और क्रॉर्नीलिआ सोरबजी।। स्वीय विधि (Personal Law)।। महिलाओं को भरण-पोषण भत्ता।। Alimony और Patrimony।। अपने देश में Patrimony - घरेलू हिंसा अधिनियम।। विवाह सम्बन्धी अपराधों के विषय में।। यौन अपराध।। बलात्कार परीक्षण - साक्ष्य, प्रक्रिया।। दहेज संबन्धित कानून।। काम करने की जगह पर महिलाओं के साथ छेड़छाड़
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Saturday, August 18, 2007

विज्ञान कहानियों के जनक जुले वर्न

विज्ञान कहानियों में पहली लोकप्रिय एवं प्रसिद्घ कहानी मैरी गॉडविन ने 'फ्रैंकेस्टाइन' नाम से लिखी है। इसकी कहानी मैंने अपनी चिट्ठी 'विज्ञान कहानियों के प्रिय लेखक' पर लिखी है पर विज्ञान कहानियों को सम्मान दिलवाने वाले इनके जनक थे, फ्रांसीसी लेखक जुले ग्रैबियल वर्न।

जुले वर्न

जुले का जन्म दिनांक ८-२-१८२८ को नॉंत (Nantes) फ्रांस में हुआ था। जुले ने अपने बचपन के दिन, ल्वार (Loire) नदी के किनारे बिताये। यहां वे अक्सर जहाजों को आते-जाते हुए देखा करते थे और इसने उनके जीवन में बाद में बड़ा असर डाला।

कहा जाता है कि ११ साल की उम्र में जुले एक केबिन बॉय बन कर पानी के जहाज पर विदेश जाना चाहते थे। उनके पिता ने उनके जाने से पहले ही उन्हें पकड़ लिया और जुले वा उनके भाई को, इन सबसे दूर, बोर्डिंग स्कूल में पढ़ने भेज दिया गया। उनके पिता एक सफल वकील थे। वे जुले को वकील के रूप में देखना चाहते थे। १८ साल की उम्र में, जुले को कानून पढ़ने, पेरिस भेज दिया गया। उसे कानून कभी पसंद नहीं आया और वे कहानियां लिखने लगे। जब उनके पिता को यह मालुम चला तो उन्होंने उन्हें खर्च देना बन्द कर दिया। जुले को अपना खर्च चलाने के लिये, स्टॉक-ब्रोकर बनना पड़ा। इसमें वे सफल तो हुए पर यह काम भी उन्हें पसंद नहीं आया।

इसी बीच, पेरिस में उनकी मुलाकात लेखक अलेक्जॉंद्र डिउमा (Alexandre Dumes) और विक्टोर इउगो (Victor Hugo) से हुयी जिन्होंने उन्हें अच्छे लेखन के लिये बहुत सारी टिप्स दी और वे लेखन में जुट गये। वे रोज ६ बजे उठकर बच्चों की पत्रिकाओं के लिये लेख लिखते और १० बजे सूट पहन कर स्टाक-एक्सचेंज चले
जाते थे।

जुले की शादी १८५७ में हुयी। १८६२ में उन्होंने, अपना पहला उपन्यास Five Weeks in a Balloon लिखा। जुले ने इसे हेटज़ल (Jules Hetjel) नाम के प्रकाशक को दिया। उसे यह पुस्तक बहुत पसन्द आयी। इस पुस्तक के प्रकाशन ने जुले को न केवल प्रसिद्घि, पर पैसा भी दिलवाया। यह पुस्तक अपने समय में सबसे ज्यादा बिकने वाली पुस्तक बनी। हेटज़ल ने जुले के साथ एक संविदा की। इसमें जिसके अन्दर, जुले को हर साल कम से कम दो पुस्तकें लिखनी थीं पर उन्हें अच्छे पैसे भी मिलने थे। यह संविदा जीवन भर के लिये थी और इस कारण उन्हें अपने जीवन में पैसे की कभी कमी नहीं रही।

गुब्बारे में पांच सप्ताह

जुले की, दूसरी पुस्तक Paris in the 20th Century थी, जो कि उन्होंने १८६३ में लिखी पर उसे अपने एक
लॉकर में बन्द कर दी। यह पुस्तक उनके पौत्र को २०वीं शताब्दी में मिली और यह १९९४ में प्रकाशित हुयी। उनकी कुछ और प्रसिद्घ पुस्तकें हैं,

  • गुब्बारे में पांच सप्ताह (Five weeks in a balloon)
  • पृथ्वी के केन्द्र की यात्रा (Journey to the Center of the Earth)
  • पृथ्वी से चन्द्रमा तक ( From the Earth to the Moon)
  • समुद्र दुनिया की रोमांचकारी यात्रायें (Twenty Thousand Leagues Under the Sea)
  • चन्द्रमा के चारों तरफ (Around The Moon)
  • अस्सी दिन में दुनिया की सैर (Around The World in 80 days)
  • धूमकेतु पर ( Off On A Comet)

जुले वर्न, कहानी का ताना-बाना बुनने में माहिर थे। उनकी कहानियों में भौगोलिक, वैज्ञानिक और इंजीनियरिंग की बातों का उम्दा तरीके से मिश्रण रहता था। वे जाने-माने तकनीकी या वैज्ञानिक तथ्यों से, आगे भविष्य की बात, कुछ इस तरह से करते थे कि अविश्वसनीय चीजें भी संभव और विश्वसनीय लगती थीं। यही कारण था कि वे पाठकों को अपनी पुस्तकों की तरफ आकर्षित करते थे।

उनकी कहानियों में, भविष्य में क्या होगा, इसका पहले से ही वर्णन था। उन्होंने टी.वी. के बारे में, रेडियो के आविष्कार के पहले ही बता दिया था। उन्होंने इसका नाम फोनो टेलीफोटो रखा था। राइट बन्धुओं के उड़ने के
५० साल पहले उन्होंने अपनी किताबों में हेलीकाप्टर का जिक्र किया था। आप यदि उनकी पुस्तकों को पढ़ें तो उसमें सबमेरीन, हवाई जहाज, एयर कंडीशन, गाइडेड मिसाइल और टैंक का वर्णन है।

जुले वर्न, अपनी कहानियों के जीव जन्तुओं के साथ

उनकी पुस्तक समुद्र दुनिया की रोमांचकारी यात्रायें में कैप्टन नीमो की सबमैरीन का नाम नौटिलस (Nautilus) था और वह समुद्र से प्राप्त की गयी बिजली से चलती थी। जब अमेरिका ने अपनी पहली परमाणु सबमैरीन बनायी तो उसका नाम भी नौटिलस रखा। लीग दूरी नापने का पैमाना है और एक लीग लगभग तीन मील के बराबर होता है।

जुले, बाद में, पेरिस से आमिएं (Amiens) चले गये और अपना सारा जीवन उसी शहर में बिताया। उनकी अधिकतर पुस्तकें वहीं लिखी गयी हैं। उनकी मृत्यु दिनांक २४ मार्च १९०५ में हुयी। उनकी मृत्यु के बाद, पेरिस के अखबारों कुछ इस तरह से श्रद्धांजली दी गयी,
'The old story teller is dead. It is like passing of Santa Claus.'

जुले वर्न से प्रभावित हो कर, कुछ लेखकों ने हिन्दी हिन्दी में विज्ञान कहानियां लिखीं है। इसके बारे में आप यहां पढ़ सकते हैं।

जुले वर्न और जुले वर्न अपनी कहानियों के कुछ जीव जन्तुओं के साथ का चित्र विकीपीडिया से है और ग्नू मुक्त प्रलेखन अनुमति पत्र की शर्तों के अन्दर प्रकाशित हैं।

सैर सपाटा - विश्वसनीयता, उत्सुकता, और रोमांच
भूमिका।। विज्ञान कहानियों के जनक जुले वर्न

Thursday, August 16, 2007

डल झील पर जीवन

मैं १९७५ की गर्मी में कश्मीर आया था। यह मेरी दूसरी ट्रिप है और मेरी पत्नी की पहली। उस समय डल झील के बीचोबीच चार चिनार के पेड़ थे और प्लेटफार्म बनाकर एक रेस्ट्राँ चला करता था, इसमें कटी पतंग के एक गाने 'अच्छा तो हम चलते हैं' की शूटिंग हुयी थी। यह बहुत सुन्दर जगह थी। मुझे बताया गया कि अब यह बन्द हो गया है।

हमारी हाउसबोट के बगल एक पेड़ भा। उसमें चील दम्पत्ति ने अपना घोसला बना रखा था। उनके दो बच्चे भी थे। वे खाना लाकर उन्हें खिलाते थे। जब मैं उनकी फोटो ले रहा था तो वह चील मुझे घूर कर देख रही थी कि कहीं मैं उसके बच्चों को कुछ चोट न पहुंचा दूं।

मुझे यहां जहीर आलम मालिश करने वाला मिला। यह बीकानेर के रहने वाले हैं और इनकी शादी भोपाल में हुयी है वहीं पर घर जमा लिया है। वहां इनकी Face to face नाम की बाल काटने की दुकान पुराने भोपल में है। साल में ४ महीने भोपल में और ८ महीने कश्मीर में रहते हैं। मैंने उनसे मालिश करवायी। मैंने इसके पहले कभी नहीं करवायी थी। समझ में नहीं आया कि अच्छी थी कि नहीं, पर २०० रूपये जरूर जेब से निकल गये।


यहां पर हाउसबोट का नगर बसा है लगता है श्रीनगर में आने वाला पर्यटक यहीं रूकता है नाव वाले फेरी लगाते रहते हैं। कोई ठण्डा बेच रहा है कोई जूता। कोई आपको जैकेट बेचना चाहता है तो कोई आपको गहने। उसी के बीच जीवन चल रहा है। यह सब डल झील को बर्बाद भी कर रहा है। इस बारे में वहां क्या हो रहा है यह अगली बार



कश्मीर यात्रा
जन्नत कहीं है तो वह यहीं है, यहीं है, यहीं है।। बम्बई का फैशन और कश्मीर का मौसम – दोनो का कोई ठिकाना नहीं है।। मिथुन चक्रवर्ती ने अपने चौकीदार को क्यों निकाल दिया।। आप स्विटज़रलैण्ड में हैं।। हम तुम एक कमरे में बन्द हों।। Everything you desire – Five Point Someone।। गुलमर्ग में तारगाड़ी।। हेलगा कैटरीना और लीनुक्स।। डल झील पर जीवन।।

Monday, August 13, 2007

दहेज संबन्धित कानून

(इस बार चर्चा का विषय है दहेज संबन्धित कानून। इसे आप सुन भी सकते हैं। सुनने के चिन्ह ► तथा बन्द करने के लिये चिन्ह ।। पर चटका लगायें।)


dowry prhibition w...


दहेज बुरी प्रथा है। इसको रोकने के लिये दहेज प्रतिषेध अधिनियम १९६१ बनाया गया है पर यह कारगर सिद्घ नहीं हुआ है। इसकी कमियों को दूर करने के लिये फौजदारी (दूसरा संशोधन) अधिनियम १९८६ के द्वारा, मुख्य तौर से निम्नलिखित संशोधन किये गये हैं:
  • भारतीय दण्ड संहिता में धारा ४९८-क जोड़ी गयी;
  • साक्ष्य अधिनियम में धारा ११३-क, यह धारा कुछ परिस्थितियां दहेज मृत्यु के बारे में संभावनायें पैदा करती हैं;
  • दहेज प्रतिषेध अधिनियम को भी संशोधित कर मजबूत किया गया है।
पर क्या केवल कानून बदलने से दहेज की बुराई समाप्त हो सकती है। - शायद नहीं। यह तो तभी समाप्त होगी जब हम दहेज मांगने, या देने या लेने से मना करें। उच्चतम न्यायालय ने भी १९९३ में, कुण्डला बाला सुब्रमण्यम प्रति आंध्र प्रदेश राज्य में कुछ सुझाव दिये हैं। न्यायालय ने कहा,
'Laws are not enough to combat the evil. A wider social movement of educating women of their rights, to conquer the menace, is....needed more particularly in rural areas where women are still largely uneducated and less aware of their rights and fall an easy prey to their exploitation.....
It is expected that the courts would deal with such cases in a more realistic manner and not allow the criminals to escape on account of procedural technicalities or insignificant lacunae in the evidence as otherwise the criminals would receive encouragement and the victims of crime would be totally discouraged by the crime going unpunished. The courts are expected to be sensitive in cases involving crime against women. The verdict of acquittal made by the trail court in this case is an apt illustration of the lack of sensitivity on the part of the trial court.'
दहेज की बुराई केवल कानून से दूर नहीं की जा सकती है। इस बुराई पर जीत पाने के लिये सामाजिक आंदोलन की जरूरत है। खास तौर पर ग्रामीण क्षेत्र में, जहां महिलायें अनपढ़ हैं और अपने अधिकारों को नहीं जानती हैं। वे आसानी से इसके शोषण की शिकार बन जाती हैं।. . . .
न्यायालयों को इस तरह के मुकदमे तय करते समय व्यावहारिक तरीका अपनाना चाहिये ताकि अपराधी, प्रक्रिया संबन्धी कानूनी बारीकियों के कारण या फिर गवाही में छोटी -मोटी, कमी के कारण न छूट पाये। जब अपराधी छूट जाते हैं तो वे प्रोत्साहित होते हैं और आहत महिलायें हतोत्साहित। महिलाओं के खिलाफ आपराधिक मुकदमे तय करते समय न्यायालयों को संवेदनशील होना चाहिये।
इस मुकदमे में परीक्षण न्यायालय ने दोषी को छोड़ दिया था। यह दर्शाता है कि न्यायालय संवेदनशील नहीं हैं।

उच्चतम न्यायालय का कथन अपनी जगह सही है पर मेरे विचार से दहेज की बुराई तभी दूर हो सकती है जब,
  • महिलायें शिक्षित हों; और
  • आर्थिक रूप से स्वतंत्र हों।
इसके लिये, समाज में एक मूलभूत परिवर्तन की जरूरत है जिसमें महिलाओं को केवल यौन या मनोरंजन की वस्तु न समझा जाय- न ही बच्चा पैदा करने की वस्तु।

अगली बार - काम करने की जगह पर यौन उत्पीड़न।

आज की दुर्गा
महिला दिवस|| लैंगिक न्याय - Gender Justice|| संविधान, कानूनी प्राविधान और अंतरराष्ट्रीय दस्तावेज।। 'व्यक्ति' शब्द पर ६० साल का विवाद – भूमिका।। इंगलैंड में व्यक्ति शब्द पर इंगलैंड में कुछ निर्णय।। अमेरिका तथा अन्य देशों के निर्णय – विवाद का अन्त।। व्यक्ति शब्द पर भारतीय निर्णय और क्रॉर्नीलिआ सोरबजी।। स्वीय विधि (Personal Law)।। महिलाओं को भरण-पोषण भत्ता।। Alimony और Patrimony।। अपने देश में Patrimony - घरेलू हिंसा अधिनियम।। विवाह सम्बन्धी अपराधों के विषय में।। यौन अपराध।। बलात्कार परीक्षण - साक्ष्य, प्रक्रिया।। दहेज संबन्धित कानून

Saturday, August 11, 2007

शताब्दी के सबसे चर्चित मुकदमे का फैसला - एस.सी.ओ. पानी में?

मैंने पिछले साल, हिन्दी चिट्टाकारी की शुरुवात करते समय इसी चिट्ठे पर में दो श्रंखलाये कई कडियों में - ओपेन सोर्स सॉफ्टवेर और लिनेक्स की कहानी - नाम से लिखी थीं। बाद में इन कड़ियों को संजो कर इसी नाम से अपने लेख चिट्ठे में यहां और यहां रख दीं। लिनेक्स की कहानी में मैंने उन मुकदमों का भी जिक्र किया था जो लिनेक्स पर बौद्धिक सम्पदा के उल्लंघन के कारण चल रहे हैं। यह मुकदमे एस.सी.ओ. ने चलाये थे। यह मुकदमे इस शताब्दी के सबसे चर्चित मुकदमे हैं। इनके फैसलो से, सूचना प्रद्योगिकी का रास्ता भी बदल सकता है।

इस मुकदमे में, एस.सी.ओ. का कहना था कि नॉवल ने य़ूनिक्स के बौद्धिक संपदा अधिकार इसे बेच दिये हैं पर नॉवल के अनुसार उसने एस.सी.ओ. को यूनिक्स के बौद्धिक सम्पदा अधिकार नहीं बेचे हैं। उसने एस.सी.ओ. को केवल यूनिक्स का विकास करने तथा दूसरे को लाइसेंस देने का अधिकार दिया था। इस पर एस. सी. ओ. ने नॉवल पर मुकदमा दायर किया कि, और
  • नॉवल गलत कह रहा है कि एस.सी.ओ. यूनिक्स के बौद्धिक सम्‍पदा अधिकार का मालिक नहीं है;
  • नॉवल का यह कहना कि नॉवल यूनिक्स के बौद्धिक सम्पदा अधिकारों का मालिक है एस.सी.ओ. के व्यापार में रूकावट डाल रहा है उसे रोका जाय;
  • इस बात कि घोषणा की जाय कि एस.सी.ओ. यूनिक्स के बौद्धिक सम्पदा अधिकार का मालिक है न कि नॉवल;
  • उसे नॉवल से हर्जाना दिलवाया जाय।


इस मुकदमें के मुख्य विवाद को कल १० अगस्त २००७ में, जज़ किंबल ने नॉवल के पक्ष में तय कर दिये गये हैं। जज़ किंबल के अनुसार, यूनिक्स के बौद्धिक सम्पदा अधिकार नॉवल के पास हैं और उसे इस बात का अधिकार है कि वह एससीओ को आई.बी.एम. के विरुद्ध अपने दावे के इस भाग को वापस लेने या छोड़ने के लिये कह सकता है। हांलाकि यदि नॉवल ने कोई संविदा तोड़ी है तो उस संबन्ध का मुकदमा चलता रहेगा।


यह फैसला एस.सी.ओ. के द्वारा आई.बी.एम. के खिलाफ चल रहे मुकदमें पर भी असर डालेगा और लगता है कि वह नहीं चल पायेगा।


जज़ किंबल का फैसला आप यहां पढ़ सकते हैं। यह कुछ मुश्किल है। इसे समझने के लिये आपको तकनीक और कानून दोनो का कुछ ज्ञान होना चाहिये। इस बारे में न्यूयॉर्क टाईम्स का लेख भी देखें। इसे समझना आसान है। आप यहां, एक दूसरे लेख को, पढ़ सकते हैं।

इन मुद्दों और इस फैसले के महत्व को समझने के लिये लिनेक्स की कहानी की चिट्ठी भी देखें। इस फैसले से ओपेन सोर्स के बारे में FUD (फड) समाप्त हुआ। अब यह मत कह दीजियेगा कि फड क्या होता है। ऐसे यह, होता क्या है इस बारे में आप यहां पढ़ सकते हैं। लगता है कि सूरज पश्चिम से ही निकलेगा और हम सुन्दरता की देवी के पास ही पहुंचेगे।

यदि कल हम सुन्दरता की देवी के पास पहुंचे थे तो क्या
एस.सी.ओ. पानी में डूब गया है। यह मैं क्यों कह रहा हूं।

अपने सौर मंडल में दो ग्रह अनूठे हैं - शुक्र और वरूण। शुक्र पर तो सूरज तो पश्चिम से निकलता है। वरुण, समुद्र
के देवता हैं। वरुण ग्रह की धुरी लगभग ९८% झुकी है। इस कारण लेटा-लेटा सा सूरज के चक्कर लगाता है।


वरूण ग्रह का वॉयजर-२ से लिया गया चित्र

इस फैसले के बाद तो एस.सी.ओ. तो धाराशायी हो गया - लेट ही गया है। यह बात तो उनके शेयरों के दाम से भी लगती है। जब एस.सी.ओ. ने आई.बी.एम. के खिलाफ मुकदमा किया तो उसके शेयर की कीमत १९.४१ डॉलर हो गयी थी लेकिन कल, फैसले के बाद, यह गिर कर केवल १.५५ डॉलर रह गयी है। इन्हे ज्लद ही कुछ करना होगा। यह तो पहले कोर्ट का फैसला है देखते हैं कि एस.सी.ओ. अपील करता है कि नहीं। यदि करता है तो उसमें क्या होता है।

वरुण के चन्द्रमा - आकार के अनुसार

आज यह चिट्ठी लिखने बैठा तो मैंने उस समय की पुनः याद की जब मैंने यह चिट्ठियां लिखी थीं। उस समय मुझे हिन्दी चिट्ठाकारी में कुछ कटु अनुभवों से गुजरना पड़ा।

मेरे मित्र जो अंग्रेजी में चिट्ठे लिखते हैं उनकी हमेशा यही सलाह रहती थी कि मैं अंग्रेजी में लिखूं। एक समय ऐसा भी आया कि जब मैंने तय कर लिया था कि मैं हिन्दी में लिखना छोड़ दूंगा। मुझे प्रसन्नता है कि मैंने ऐसा नहीं किया।

यह सारे चित्र विकीपीडिया से लिये गये हैं और ग्नू मुक्त प्रलेखन अनुमति पत्र की शर्तों के अन्दर प्रकाशित किये गये हैं।

Wednesday, August 08, 2007

हेलगा कैटरीना और लीनुक्स

हम लोग गुलमर्ग से श्रीनगर आये। यहां हम हाउस बोट मे रहे। यहां पर मेरी मुलाकात हेलगा कैटरीना से हुई। वे फिनलैण्ड से हैं और डाक्टर हैं। वे भी उसी हाउस बोट में ठहरी थीं। कैटरीना साड़ी बहुत अच्छी तरह से पहने हुयी थी। मेरे उन्हें यह बताने पर, मुस्कराईं और बोलीं,
'मैं भारत तीसरी बार आई हूं। मुझे यह देश बेहद पसन्द है। मुझे पढ़ना अच्छा लगता है और पहली बार, कृष्णामूर्ती को पढ़ने के बाद, मैंने भारत आने का मन बनाया था।'

कैटरीना के एक लड़का (१६साल) और एक लड़की (१४ साल) है। वे तलाकशुदा हैं पर उनकी पती से अब भी मित्रता है। इस समय उनके पती, उनके घर में रह कर बच्चों की देखभाल कर रहे हैं।

Linus Torvalds फिनलैंड से है। वे, १९९१ में, हेलसिंकी पॉलीटेक्निक में पढ़ रहे थे। उस समय, उन्होने Linux का करनल (Kernel) प्रकाशित किया था। जाहिर है हमारी बातों में Linus Torvalds भी थे। कैटरीना ने बताया कि Linus Torvalds का सही उच्चारण लीनुस टोरवाल्डस् है और फिनलैंड में Linux को लीनुक्स की तरह बोलते हैं न कि लिनेक्स। क्या मालुम क्या सही और क्या नहीं।

कैटरीना में मुझसे पूंछा कि क्या मैं लीनुस के परिवार के बारे में जानता हूं। मैंने कहा कि मैंने उसकी आत्मजीवनी 'Just for fun : The story of a accidental revolutionary' पढ़ी है। इस लिये उनके जीवन के बारे में काफी कुछ मालुम है। यह पुस्तक कैटरीना ने नहीं पढ़ी थी। मैंने उसे बताया कि यह पुस्तक बहुत अच्छी है और न केवल पढ़ने योग्य है पर प्रेरणा की स्रोत है। उसने वायदा किया कि वह उसे पढ़ेगी और अगली बार हम उस पर कुछ बात भी करेंगे।

हमने नोकिया टेलीफोन कम्पनी के बारे में भी बात की क्योंकि यह फिनिश कम्पनी है।

कैटरीना के अनुसार फिनलैण्ड की सबसे अच्छी बात वहां की सुरक्षा है, वहां टैक्स ज्यादा है पर चिकित्सा, पढ़ाई सब मुफ्त है। वहां सारे विश्वविद्यालय सरकारी हैं। वे स्वयं एक बढ़ई के चार बच्चों में से एक थीं। उनके पिता डाक्टरी की पढ़ाई का पैसा नहीं दे सकते थे पर वे डाक्टर इसलिए बन पायीं क्योंकि पढ़ाई के लिए पैसे नहीं देना पड़ा था।

कैटरीना के पीठ पर एक चिन्ह था। मैंने पूछा कि यह ठप्पा है या टैटू। उसने मुस्करा कर कहा,
'यह टैटू है। इसे मैंने अपने आप को चालिसवें जन्मदिन पर उपहार दिया है। अगले साल मैं पच्चास की हो जाउंगी। मैं नहीं समझ पा रही कि मैं अपने आप को क्या उपहार दूं।'
कैटरीना को अपने लिये उपहार तय करने में देर नहीं लगी। हम लोग शाम को हाउस बोट पहुंचे तो वहां पर बनारसी साड़ियों का मेला लगा था। चारो तरफ साड़ियों फैली हुई थी। वह बोली,
'मैं पच्चासिवें जन्म दिन के लिये साड़ी खरीद रहीं हूं पर तय नहीं कर पा रही हूं कि कौन सी लूं। क्या आप मेरी मदद करेंगे।'
मुझे हरे रंग वाली साड़ी अच्छी लग रही थी। उसने वही ले ली।

मुझे कैटरीना साहसी महिला लगीं। वह भारत अकेले आयीं हैं और कशमीर में पैदल ट्रेक कर रही थीं। फिर बोट पर ट्रेकिंग करने जा रहीं थीं। उसने मुझे फोटो दिखाये जिसमें वह घोड़े वालों या गाइड के घर में या फिर टेंट में रूकी। मेरे पूछने पर कि क्या वह यह सब, बिना अपने बच्चों के, अकेले आनन्द से कर पा रहीं हैं। उसने कहा,
'मेरे बच्चे साहसी नहीं हैं, उन्हें इस तरह ट्रेक करने में मजा नहीं आता है। वे जरा सी गन्दगी से घबरा जाते हैं इसीलिए मैं उन्हें साथ नहीं लायी।'


मुझे ट्रेकिंग अच्छी लगती है पर मुन्ने की मां को नहीं। जब बच्चे साथ रहते थे तब हम लोगों ने कई इस तरह के ट्रिप लिये थे पर अब नहीं। अकेले हिम्मत नहीं पड़ती है। कैथरीन से बात हो गयी है अगली बार जब वह भारत आकर ट्रेकिंग पर जायेंगी तब हम ट्रेकिंग पर साथ चलेगे।


कश्मीर यात्रा
जन्नत कहीं है तो वह यहीं है, यहीं है, यहीं है।। बम्बई का फैशन और कश्मीर का मौसम – दोनो का कोई ठिकाना नहीं है।। मिथुन चक्रवर्ती ने अपने चौकीदार को क्यों निकाल दिया।। आप स्विटज़रलैण्ड में हैं।। हम तुम एक कमरे में बन्द हों।। Everything you desire – Five Point Someone।। गुलमर्ग में तारगाड़ी।। हेलगा कैटरीना और लीनुक्स

Sunday, August 05, 2007

मित्रता दिवस पर सैर सपाटा - विश्वसनीयता, उत्सुकता, और रोमांच

कुछ दिन पहले रत्ना जी मे भूले बिसरे किस्से-१ नामक चिट्ठी में लिखा
'यात्रा-विवरण मैंने कभी नहीं लिखे। मुझे लगता था कि यात्रा अगर अनूप जी साइकिल यात्रा की तरह ज़रा वखरी टाइप की हो तभी लिखने में कुछ नवीनता है वरना चट-पट बस, कार, रेल या जहाज़ में बैठे और गंतव्य पर पंहुच कर घिसे-पिटे पर्यटन-स्थल देखकर उस पर बयानबाज़ी करना तो सरासर अधजल गगरी छलकत जाए के समान बचकाना और बेमाना है। '
वे आगे लिखती हैं कि,
'अन्तरजाल पर और पर्यटन-पुस्तकों में किसी स्थान के विषय में चाहे पूर्ण जानकारी मिल जाए पर उस स्थान का आँखों देखा हाल उतना ही महत्वपूर्ण है जितना किसी पुस्तक को पढ़कर उसके विषय में बात करना या लिखना । इससे न केवल उस किताब/स्थान के बारे में अन्य लोगों के मन में दिलचस्पी पैदा होती है बल्कि जिन्होने उस किताब को पढ़ा होता है या वो स्थान देखा होता है उन्हें उस विषय से सम्बन्धित, दिमाग के पिछवाड़े वाले स्टोर में पड़ी, ढेरों बातें याद आ जाती है और विचारों की रेल सरपट दौड़ने लगती है।'
रत्ना जी तो घिसी पिटी जगह नहीं जाती हैं वे तो कभी सिंगापुर, तो कभी मलेशिया तो कभी हाँककाँग जाती हैं। हांलाकि घिसी पिटी जगह पर भी उनके द्वारा लिखी गयी 'भूले बिसरे किस्से-१' वाली चिट्ठी शानदार है।

उनकी यह बात एकदम सच है कि दूसरे की चिट्ठी पढ़ने से औरों के मन में भी रेल दौड़ने लगती हैं। अब देखिये उनकी चिट्ठी को पढ़ने के बाद मैं यात्रा विवरण को के बारे में सोचने लगा; वे क्या कारण हैं जो किसी यात्रा विवरण को यादगार बनाते हैं?

काश मुझे यह मालुम होता :-( मैं भी रतना जी जैसी बढ़िया चिट्ठी लिख देता।

मेरी पिछली श्रंखला हमने देखी है जमाने में रमती खुशबू समाप्त समाप्त हो गयी है; आज की दुर्गा भी समाप्त के करीब है। रतना जी चिट्ठी से ख्याल आया कि क्यों न मैं एक नयी श्रंखला शुरू करूं, जिसमें यात्रा विवरण की यादगार पुस्तकों और उसके लेखकों के बारे में बात करूं। धन्यवाद - रत्ना जी।

एक अच्छे यात्रा विवरण के लिये जरूरी नहीं है कि यात्रा किसी नयी जगह की जाय या फिर अनूठी तरह से की जाय। यदि यात्रा विवरण -
  • विश्वसनीय है;
  • पाठक को रोमांचित करता है;
  • उसके मन में उत्सुकता जगाता है -
तो निश्चित जानिये कि वह यादगार वर्णन बनेगा चाहे वह घिसी पिटी जगह का हो या फिर घिसी पिटी तरह से की गयी यात्रा का हो। ऐसे वर्णन, हमेशा पाठक के करीब पहुंचाते हैं। यह भी सच है कि नयी जगह की यात्रा करने में या अनूठे तरह से यात्रा करने में रोमांच या फिर उत्सुकता पैदा करना आसान है पर यादगार यात्रा वर्णन के लिये तो यात्रा करना भी जरूरी नहीं।
'क्या कहा, बिना यात्रा के, यात्रा विवरण।'
जी हां, आपने ठीक सुना - बिना यात्रा के यात्रा विवरण।

यदि आप दुनिया की सबसे प्रसिद्ध यात्रा विवरण को देखें -
  • जिसे दुनिया की सारी भाषाओं में अनुवाद किया गया;
  • जिसे सबसे ज्यादा बार पढ़ा गया;
  • जो लगभग १३० साल बीत जाने के बाद भी उतना लोकप्रिय है जितना कि तब जब वह लिखा गया;
  • जब वह मुख्य अखबारों में कड़ियों में प्रकाशित हो रहा था तो इतना विश्वसनीय था कि लोग उसे सच मान बैठे और उसमें लगी शर्त के ऊपर अनगिनत पैसों का सट्टा लगा बैठे -
वह यात्रा विवरण लेखक ने घर में बैठ कर लिखा था। वह न केवल उस समय पर आज भी लोगों की मन पसन्द है।

जी हां, आप सही समझ रहे हैं, उस यात्रा वर्णन का नाम हैः अस्सी दिन में दुनिया की सैर (Around the World in Eighty days)। इसे जुले वर्न (Jules Vern) ने लिखा है। जुले वर्न को विज्ञान कहानियों के जनक कहा जाता है। और इस पुस्तक पर चर्चा करने से पहले हम उन्हीं के बारे में बात करेंगे।

इस चिट्ठी को समाप्त करने से पहले मैं रत्ना जी और अन्य चिट्ठाकार बन्धुवों से एक अनुरोध करना चाहूंगा। यदि आप किसी चिट्ठाकार बन्धु या उसकी चिट्ठी का उल्लेख अपनी चिट्ठी में करते हैं तो उसे संदर्भित चिट्ठाकार के चिट्ठे से या फिर उसकी उस चिट्ठी से या फिर उसके संक्षिप्त आत्म विवरण से कड़ी के रूप में जोड़ दें, जैसा कि मैंने इस चिट्ठी में रत्ना जी की चिट्ठियों से किया है या प्यार को प्यार ही रहने दो, कोई नाम न दो: हमने जानी है जमाने में रमती खुशबू - निष्कर्ष या अंतरजाल पर हिन्दी कैसे बढ़े की चिट्ठी पर अन्य चिट्ठाकारों की चिट्ठियों से किया है।

किसी और की चिट्ठी को जोड़ना सरल है - वर्डप्रेस और ब्लॉगर में तो बहुत आसान। बस आप अपनी चिट्ठी में उन शब्दों को चुनिये - वर्डप्रेस में जंजीर पर तथा ब्लॉगर में पर हरे गोले (जिसमें ऊपर कोष्टक में काले का चिन्ह है) पर – चटका लगाइये। उसके बाद चिट्ठे का, या फिर उस कड़ी का, या आत्म विवरण की यू.आर.एल. को बाहर आयी खड़की में चिपकाइये। यह करने कई कारण हैं:
  • यह वेब शिष्टाचार की निशानी है;
  • कभी कभी कुछ चिट्ठियां पढ़ने छूट जाती हैं - खुदा न खास्ता यदि यह वह चिट्ठी हो जिसमें किसी का संदर्भ हो और वह जवाब न दे - शर्म की बात है न। रत्ना जी ने मेरी गोवा यात्रा संस्मरण की याद की और यदि मैंने टिप्पणी भी न की होती तो गंवारपना हो जाता। संदर्भित करने पर, यदि उस समय पढ़ने से छूट भी जाय तो बाद में पकड़ा जा सकता है और संदर्भित व्यक्ति जवाब दे सकता है;
  • दूसरा व्यक्ति आप की चिट्ठी के द्वारा वहां आसानी से पहुंच सकेगा जिसके बारे में आप बात कर रहें हैं। जो आपकी चिट्ठियों को पसन्द करता है उसका, आपकी पसन्द की चिट्ठियों को पसन्द करने की सम्भावना ज्यादा है;
  • आज हम एक दूसरे को जानते हैं। सोचिये आज से सौ साल बाद जब कोई रत्ना जी की यह चिट्ठी पढ़ेगा तो क्या वह उन्मुक्त को जानता होगा। यदि लिंक होती तो तुरन्त मेरे चिट्ठे में पहुंच सकता था। मेरे चिट्ठे से वह रत्ना जी के चिट्ठे पर पहुंच सकता है क्योंकि लिंक है;
  • यह अंतरजाल पर संदर्भित व्यक्ति की विद्यमानता को बढ़ाता है। यह, आपकी तरफ से, संदर्भित व्यक्ति के लिये, बहुत छोटा पर अनमोल तोहफ़ा है।
यदि,
  • आप संदर्भित व्यक्ति से नाराज हैं; या
  • आप अंतरजाल पर, उसकी विद्यमानता नहीं बढ़ाना चाहते; या फिर
  • उसे पसन्द नहीं करते फिर भी उसे संदर्भित करना पड़ रहा है,
तो अवश्य उसकी कड़ी न दे।

संदर्भ न करना, एक तरह से यह दर्शाता है कि,
  • आप उसे पसन्द नहीं करते हैं;
  • यह उस व्यक्ति के लिये एक तरह का उलाहना है;
  • उससे रूठना है।
रत्ना जी यदि अज्ञान्तावश मेरे द्वारा कोई गुस्ताखी हो गयी है तो पहले से ही माफी मांग लेता हूं।

आज मित्रता दिवस भी है मैं सारे चिट्ठाकार बन्धुवों की तरफ मित्रता का हाथ बढ़ाता हूं। आइये, हम सब मिल कर, आने वाले समय में अंतरजाल पर हिन्दी को सशक्त माध्यम बनायें।

अगली बार मिलेंगे हैं विज्ञान कहानियों के जनक और पिता - जुले वर्न – के साथ।

पानी बरस रहा है लगता है कि आज का गोल्फ गोल हुआ।

सैर सपाटा - विश्वसनीयता, उत्सुकता, और रोमांच
भूमिका।।

Friday, August 03, 2007

बलात्कार परीक्षण - साक्ष्य, प्रक्रिया: आज की दुर्गा

(इस बार चर्चा का विषय है बलात्कार परीक्षण: साक्ष्य, प्रक्रिया। इसे आप सुन भी सकते हैं। सुनने के चिन्ह ► तथा बन्द करने के लिये चिन्ह ।। पर चटका लगायें।)

rape evidence proc...


विधि आयोग ने अपनी ८४वीं रिपोर्ट पर साक्ष्य अधिनियम को भी बदलने के लिए संस्तुति की थी। इस रिपोर्ट के द्वारा साक्ष्य अधिनियम की धारा १४६ की उपधारा ४ और नयी धारा ५३-क जोड़ने की बात है। लेकिन सरकार ने रिपोर्ट की इन संतुतियों को स्वीकार नहीं किया। यह संशोधन साक्ष्य अधिनियम में नहीं किया गया है। इसके बावजूद न्यायालयों ने इसके सिद्घान्त को अपने निर्णयों के द्वारा स्वीकार कर लिया है। मुख्यत:, यह कार्य उन्होंने, १९९१ और १९९६ में दो अलग-अलग निर्णयों
State of Maharashtra Vs. Madhukar Narain Mardikar (मधुकर केस) और १९९६ में State of Punjab Vs. Gurmeet Singh (गुरमीत केस), में किया है।

मधुकर केस, सेवा से सम्बन्धित केस था। एक पुलिस इंस्पेक्टर पर, बलात्कार करने में और उसके सम्बन्ध में गलत कागजात तैयार करने का आरोप था। विभागीय कार्यवाही में, यह आरोप सिद्घ हो जाने के बाद, पुलिस इन्स्पेक्टर को नौकरी से हाथ धोना पड़ा। पुलिस इन्स्पेक्टर ने, बम्बई उच्च न्यायालय में गुहार लायी। उसकी याचिका स्वीकार कर ली गयी और उसे नौकरी पर वापस कर दिया गया। उच्चतम न्यायालय इस फैसले को यह कहते हुए रद्द कर दिया,
'The High Court observes that since Banubi [the women who was raped] is an unchaste women it would be extremely unsafe to allow the fortune and career of a government official to be put in jeopardy upon the uncorroborated version of such a woman who makes no secret of her illicit intimacy with another person. She was honest enough to admit the dark side of her life. Even a woman of easy virtue is entitled to privacy and no one can invade her privacy as and when he likes. … Therefore, merely because she is a woman of easy virtue, her evidence cannot be thrown overboard.'
उच्च न्यायालय ने कहा कि, बनुबी [महिला जिसके साथ बलात्कार किया गया] गिरे चरित्र की महिला थी और किसी भी सरकारी अफसर का भविष्य ऎसी महिला के असमर्थित बयान पर तय करना ठीक नहीं होगा जो कि अपने और दूसरे व्यक्ति के साथ गलत सम्बन्धों को स्वीकार करती है। इस महिला ने अपने जीवन के गिरे हिस्से को स्वीकार कर सच्चाई बरती है। आसान सतीत्व चरित्र की महिलाओं को भी एकान्तता का अधिकार है। उनकी एकान्तता के साथ कोई व्यक्ति मनमानी नहीं कर सकता है। किसी महिला की गवाही केवल इसलिये नहीं नकारी जा सकती है कि वह आसान सतीत्व चरित्र की है।

गुरमीत सिंह का केस बलात्कार से सम्बन्धित दाण्डिक केस था। विचारण न्यायालय ने गुरमीत सिंह को छोड़ दिया था लेकिन पंजाब व हरियाणा उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार की अपील को स्वीकार कर गुरमीत सिंह को सजा दे दी थी। उच्चतम न्यायालय ने गुरमीत सिंह की सजा बहाल करते हुये कहा,
'The courts must deal with such [rape] cases with utmost sensitivity. The courts should examine the broader probabilities of a case and not get swayed by minor contradictions of insignificant discrepancies in the statement of the prosecutrix. … If evidence of the prosecutrix inspires confidence, it must be relied upon without seeking corroboration of her statement in material particulars.'…
Some defence counsels adopt the strategy of continual questioning of the prosecutrix as to the details of the rape. Then victim is required to repeat again and again the details of rape incident not so much a to bring out the facts on record or to test her credibility but to test her story for inconsistencies with a view to attempt to twist the interpretation of events given by her so as to make them appear inconsistent with her allegations. … The court must also ensure that cross-examination is not made a means of harassment or causing humiliation to the victim of crime. The Court, therefore, should not sit as a silent spectator while the victim of crime is being cross-examined by the defence. It must effectively control the recording of evidence in the court.

Wherever possible it may also be worth considering whether it would not be more desirable that the cases of sexual assaults on the females are tried by lady Judges, wherever available, so that the prosecutrix can make her statement with greater ease. …
The courts should, as far as possible, avoid disclosing the name of the prosecutrix in their orders to save further embarrassment to the victim of sex crime. …
We … hope that the trial courts would take recourse to the provisions of Sections 327(2) and (3) CrPC liberally. Trial of rape cases in camera should be the rule and an open trial in such cases an exception.'
न्यायालयों को बलात्कार के मामलों पर संवेदनशीलता से विचार करना चाहिए। न्यायालयों को मुकदमें की व्यापक संभावनाओं को देखना चाहिए और अभियोक्त्री के कथन में मामूली विसंगतियों या अमहत्वपूर्ण अंतर के कारण डांवाडोल नहीं होना चाहिए। यदि अभियोक्त्री का साक्ष्य विश्वास उत्पन्न करता है तो उस पर बिना किसी समर्थित गवाही के भरोसा किया जाना चाहिए।
कई अधिवक्ता, अभियोक्त्री से बलात्कार के संबंध में निरंतर प्रश्न करते रहने की नीति अपनाते हैं। उससे बलात्कार संबंधित घटना के ब्यौरे को बार-बार दोहराने की अपेक्षा इसलिये नहीं की जाती है, ताकि अभिलेख पर तथ्यों को लाया जा सके अथवा उसकी विश्वसनीयता का परीक्षण किया जा सके बल्कि इसलिये कि घटनाक्रम के निर्वचन को मोड़कर उसमें विसंगति लायी जा सके। न्यायालय को यह देखना चाहिए कि प्रतिपरीक्षा, आहत व्यक्ति को परेशान करने या जलील करने का तरीका तो नहीं है। प्रतिपरीक्षा के समय, न्यायालय को मूक दर्शक के रूप में नहीं बैठना चाहिये पर उस पर कारगर रूप से नियंत्रण करना चाहिये।
यह भी विचारणीय है कि क्या यह अधिक वांछनीय नहीं कि, जहां तक संभव हो लैंगिक आघात के मामलों का विचारण महिला न्यायाधीशों द्वारा, किया जाए। इस तरह आहत महिला आसानी से अपना बयान दे सकती है।
जहां तक संभव हो, न्यायालय आहत महिला का नाम निर्णयों में न लिखें जिससे उसे आगे जलील न होना पड़े।
हम यह आशा करते हैं कि विचारण न्यायालय दंड प्रक्रिया संहिता की धारा ३२७ (२) और (३) के अन्दर निहित अधिकारों का उपयोग उदारतापूर्वक करेंगे। सामान्यत: बलात्कार के मुकदमे बन्द न्यायालय में होने चाहिये और खुला विचारण अपवाद होना चाहिए।


इन दो निर्णयों के द्वारा न्यायालयों ने इन छः सिद्धानतों को प्रतिपादित किया हैः
  1. किसी महिला की गवाही केवल इसलिये नहीं नकारी जा सकती है कि वह आसान सतीत्व चरित्र की है;
  2. यदि अभियोक्त्री का साक्ष्य विश्वास उत्पन्न करता है तो उस पर बिना किसी समर्थित गवाही के भरोसा किया जाना चाहिए;
  3. प्रतिपरीक्षा के समय, न्यायालय को मूक दर्शक के रूप में नहीं बैठना चाहिये पर उस पर कारगर रूप से नियंत्रण करना चाहिये;
  4. जहां तक संभव हो लैंगिक आघात के मामलों का विचारण महिला न्यायाधीशों द्वारा, किया जाए;
  5. न्यायालय आहत महिला का नाम निर्णयों में न लिखें;
  6. सामान्यत: बलात्कार के मुकदमे बन्द न्यायालय में होने चाहिये और खुला विचारण अपवाद होना चाहिए।

अगली बार चर्चा का विषय रहेगा दहेज प्रतिषेध कानून के बारे में।

आज की दुर्गा
महिला दिवस|| लैंगिक न्याय - Gender Justice|| संविधान, कानूनी प्राविधान और अंतरराष्ट्रीय दस्तावेज।। 'व्यक्ति' शब्द पर ६० साल का विवाद – भूमिका।। इंगलैंड में व्यक्ति शब्द पर इंगलैंड में कुछ निर्णय।। अमेरिका तथा अन्य देशों के निर्णय – विवाद का अन्त।। व्यक्ति शब्द पर भारतीय निर्णय और क्रॉर्नीलिआ सोरबजी।। स्वीय विधि (Personal Law)।। महिलाओं को भरण-पोषण भत्ता।। Alimony और Patrimony।। अपने देश में Patrimony - घरेलू हिंसा अधिनियम।। विवाह सम्बन्धी अपराधों के विषय में।। यौन अपराध।। बलात्कार परीक्षण - साक्ष्य, प्रक्रिया

Thursday, August 02, 2007

प्यार को प्यार ही रहने दो, कोई नाम न दो: हमने जानी है जमाने में रमती खुशबू - निष्कर्ष

खामोशी फिल्म १९६९ में आयी। इसका निर्देशन असित सेन ने किया है। इसमें राजेश खन्ना और वहीदा रहमान ने मुख्य भूमिका निभायी थी।

राजेश खन्ना

कहानी इस प्रकार है कि राजेश खन्ना एक असफल प्रेम प्रसंग के कारण अपना मानसिक संतुलन खो
बैठते हैं। पागलखाने में राधा नाम की एक नर्स हैं जिसका किरदार वहीदा रहमान ने निभाया है। डाक्टर, वहीदा रहमान को राजेश खन्ना के साथ प्रेम का नाटक करने को कहते हैं। राजेश खन्ना तो ठीक हो जाते हैं पर वहीदा रहमान अपना मानसिक संतुलन खो बैठती है क्योंकि इसके पहले धर्मेन्द्र के साथ प्रेम का नाटक करते-करते वह सच में उससे प्रेम करने लगी थी और बार-बार प्रेम का नाटक नहीं कर सकती।


वहीदा रहमान

खामोशी की सहृदय नर्स राधा के किरदार में वहीदा का अभिनव अद्वितीय है। इस किरदार को उनकी जैसी संवेदनशील कलाकारा ही अभिनीत कर सकती थी, कोई और नहीं। हांलाकि मुझे इस फिल्म की कहानी में कोई दम या सत्यता नहीं लगती।


धर्मेन्द्र
(राजेश खन्ना एवं धर्मेन्द्र के चित्र खामोशी फिल्म से नहीं हैं। यह चित्र अंग्रेजी विकीपीडिया से लिये गये हैं और उसी की शर्तों के साथ प्रकाशित किये गये हैं)


इस फिल्म में गुलजार का लिखा एक गीत है जिसे लता मंगेशकर ने गाया है। यह गाना मेरे प्रिय गानो में से एक है। इसके बोल इस प्रकार हैं:
'हमने देखी है उन आँखों की महकती खुशबू,
हाँथ से छू के इसे रिश्तों का इल्जाम न दो।
सिर्फ अहसास है ये, रूह से महसूस करो,
प्यार को प्यार ही रहने दो, कोई नाम न दो।

प्यार कोई भूल नहीं, प्यार आवाज नहीं,
एक खामोशी है, सुनती है कहा करती है।
न ये झुकती है न रूकती है न ठहरी है कहीं,
नूर की बूंद है सदियों से बहा करती है।
सिर्फ अहसास है ये, रूह से महसूस करो,
प्यार को प्यार ही रहने दो, कोई नाम न दो।'


स्नेहलता

'मुस्कराहट सी खिली रहती है आँखों में कहीं,
और पलकों के उजाले से झुकी रहती है।
होंठ कुछ कहते नहीं काँपते ओठों से मगर,
इसमें खामोशी के अफसाने रूके रहते हैं।
सिर्फ अहसास है ये, रूह से महसूस करो,
प्यार को प्यार ही रहने दो, कोई नाम न दो।'

यह गीत राजेश खन्ना की पहली प्रेमिका के ऊपर फिल्माया गया है। इसका अभिनव एक गुजराती कलाकारा स्नेहलता ने किया है। मुझे यह नहीं समझ में आया था कि यह उस पर क्यों फिल्माया गया था। यह तो वहीदा रहमान के किरदार राधा पर फिल्माया जाना चाहिये था।

इस गाने को आप पियानो पर भी सुन सकते हैं। यह पियानो मैंने नही बजाया है। ईश्वर ने मुझे जीवन के मधुरतम रसों - संगीत, गाने, कविता - से वंचित रखा। यह मैंने हिन्दी चिट्ठे एवं पॉडकास्ट की इस चिट्ठी से लिया है। इसे सुरजीत चटर्जी ने बजाया है जिनके बारे में आप उसी चिट्ठी में पढ़ सकते हैं।



इस गाने को, विडियो में भी देख सकते हैं।

जहां तक मैं समझता हूं, यही है -

  • इस श्रंखला का सरांश,
  • इस जमाने की रमती खुशबू,
  • रिश्तों की महकती खुशबू।
रिश्ते तो हैं विश्वास, इसे बांध कर मत रखो - प्रेम तो अपने हर रंग में, बन्धन रहित है।

मैंने यह श्रंखला रचना जी की रिश्ते नाम की चिट्ठी के कारण शुरू की। मुझे अच्छा लगा कि उन्होने ने निराशवादिता के भ्रम को गुम हुआ मित्र वापस आया में दूर कर दिया। वे कुछ समय तक, इस श्रंखला के साथ रहीं फिर एक अप्रत्याशित दुर्घटना के कारण बीच में ही चली गयीं। इस श्रंखला के अतिरिक्त, उनके कारण, मैंने कई चिट्ठियां लिखींः


यह चिट्ठी, यह श्रंखला - रचना जी की बेटी पूर्वी को, उसकी याद में, समर्पित है। पूर्वी संगीत प्रेमी थी। उसके द्वारा बजाया गया, अनाड़ी फिल्म का गीत 'किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार' का आनन्द ले। यह गाना भी मुझे बेहद पसन्द है।


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आशा है कि रचना जी ज्लद ही अपने सामान्य जीवन में आयेंगी और दुख को भूल कर चिट्ठाकारी पुनः शुरू करेंगी। क्या मालुम, हिन्दी चिट्ठाकारी ही उनके दुख को दूर करे।

इसी चिट्ठी के साथ यह श्रंखला समाप्त होती है। अब कुछ नया शुरू करेंगे। फिर भी, मैं इस श्रंखला पर कभी एक पुनःलेख लिखना चाहूंगाः

  • इस श्रंखला का मेरे जीवन में क्या महत्व रहा;
  • इसने मेरे, मेरे परिवार, हम भाई बहनो के बीच कितनी खुशियां भरीं;
  • इसने मेरे मित्रों के जीवन में क्या बदलाव किया।
कब लिखूंगा, क्या मालुम - कह नहीं सकता। शायद कभी नहीं - हो सकता है रचना जी के हिन्दी चिट्ठा जगत में वापस आने के बाद :-)

भूमिका।। Our sweetest songs are those that tell of saddest thought।। कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन, बीते हुए दिन वो मेरे प्यारे पल छिन।। Love means not ever having to say you're sorry ।। अम्मां - बचपन की यादों में।। रोमन हॉलीडे - पत्रकारिता।। यहां सेक्स पर बात करना वर्जित है।। जो करना है वह अपने बल बूते पर करो।। करो वही, जिस पर विश्वास हो।। अम्मां - अन्तिम समय पर।। अनएन्डिंग लव।। प्रेम तो है बस विश्वास, इसे बांध कर रिशतों की दुहाई न दो।। निष्कर्षः प्यार को प्यार ही रहने दो, कोई नाम न दो।। जीना इसी का नाम है।।